चारण साहित्य का इतिहास – डॉ. मोहन लाल जिज्ञासु

| कड़ी – १४८ | छटा अध्याय – आधुनिक काल (प्रथम उत्थान)
| धारावाहिक श्रंखला – प्रत्येक मंगल, शुक्र एवं रविवार को प्रेषित
| सन्दर्भ – पद्य साहित्य – राष्ट्रीय काव्य

गोपालदान ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध मानसिंह की वीरता का प्रकाशन किया है-[…]

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नसीहत री निसाणी – जाल जी रतनू

किसी का बिन जाणिये, विश्वास न कीजै।
गैणा गांठा बेच के, अन सूंगा लीजै।
पढवाचा कीजै नही, बिन मौत मरीजै।
ठाकुर से हेत राखके, हिक दाम न दीजै।
भांग शराब अफीम का, कोई व्यसन न कीजै।
दुसमण की सौ बीनती, चित्त ऐक न दीजै।

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गीत कुशल जी रतनू रे वीरता रो बगसीराम जी रतनू रचित

राजस्थान मे चारण कवि ऐक हाथ मे कलम तथा दूसरे हाथ मे कृपाण रखते थे। महाराजा मानसिंह जी जोधपुर के कहे अनुसार रूपग कहण संभायो रूक। ऐक बार मानसिंह जी का भगोड़ा बिहारी दास खींची को भाटी शक्तिदान जी ने साथीण हवेली मे शरण दी, इस पर मान सिह जी ने क्रुद्ध होकर फोज भेज दी। शरणागत की रक्षा हेतु भाटी शक्तिदान जी ऐवं खेजड़ला ठाकुर सार्दुल सिंह जी ने सामना किया। इस जंग मे मेरे ग्राम चौपासणी के उग्रजी के सुपुत्र कुशल जी रतनू ने पांव मे गोली लगने के बाद भी युद्व किया।
उनकी वीरता पर तत्कालीन कवि बगसीराम जी रतनू ने निम्नलिखित डिंगल गीत लिखा जो यहाँ पेश है।

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जाट सिर झाट खागां

मध्यकालीन इतियास नै पढां तो व्यक्तिगत अहम पूर्ति अर व्यक्तिगत वैमनस्यता री बातां तो साची निगै आवै पण जिण जातिगत वैमनस्यता अर कटुता री बातां आजरै इतियासकारां लिखी है वै सायत घणीकरीक मनघड़त अर गोडां घड़्योड़ी लागै क्यूंकै जातिगत कटुता उण जुग में सायत नीं ही अर जे ही तो ई आजरै संदर्भ में जिको मनोमालिन्य है उवो जातियां में नीं हुय’र मिनखां में हो। भलांई उण दिन मिनख कमती हा पण मिनखाचार घणो हो। क्यूंकै उण जुग में ऐड़ा दाखला पढण में नीं रै बरोबर आवै। उण जुग में एक बीजै रै पेटे सनमान, अपणास समर्पण अर अपणास खोब-खोब’र भर्योड़ी ही।[…]

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हुलसाया-मन-हंस

स्वर्णाभा बिखरी सुखद, अद्भुत नभ अभिराम।
लगता है वो आ रहा, फिर से मन के धाम।।१

नीला, अरुणिम, गेरूआ, श्याम श्वेत अरु लाल।
सूर्य क्षितिज के थाल से, रहता रंग उछाल।।२

प्रत्यूषा आई पहन, तुहिन-बिंदु-मणि माल।
जली शर्वरी देख यह, चली भृकुटि कर लाल।।३

सप्तपदी की ले शपथ, भरा मांग सिंदूर।
प्राची का लो कर रहा, रवि घूंघट पट दूर।।४[…]

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आंखड़ियांह देखां पदम

बीकानेर रो इतियास पढां तो एक नाम आपांरै साम्हीं आवै जिको वीरता, अडरता, उदारता, री प्रतिमूरत निगै आवै। वो नाम है महाराज पदमसिंहजी रो। पदमसिंहजी जितरा वीर उतरा ई गंभीर तो उतरा ई लोकप्रिय। किणी कवि कह्यो है–

सेल त्रभागो झालियां, मूंछां वांकड़ियांह।
आंखड़ियांह देखां पदम, सुखयारथ घड़ियांह।।

पछै प्रश्न उठै कै इण त्रिवेणी संगम री साक्षात प्रतिमा मुगलां रै अधीन कै उणांरो हमगीर क्यूं रह्यो?[…]

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नर लेगो नवकोट रा

मारवाड़ रो इतियास पढां तो एक बात साम्हीं आवै कै मारवाड़ रा चांपावत सरदार सामधर्मी सबसूं ज्यादा रह्या तो विद्रोही पणो ई घणो राखियो यानी रीझ अर खीझ में समवड़। मारवाड़ में चांपावतां नै चख चांपा रै विरद सूं जाणीजै। जिणांनै कवियां आंख्यां री संज्ञा दी है तो बात साव साफ है कै उणां आंख्यां देखी माथै ई पतियारो कियो-
आंख्यां देखी परसराम, कबू न झूठी होय।  अर जठै हूती दीठी उठै राज रा सामधर्मी रह्या अर जठै अणहूती दीठी उठै निशंक राज रै खिलाफ तरवारां ताणण में संकोच नीं कियो।[…]

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जंबुक ऐ क्यूं जीविया?

रोटी चीकणी जीम लैणी पण बात चीकणी नीं कैणी री आखड़ी पाल़णिया केई कवेसर आपांरै अठै हुया है। आपां जिण बात री आज ई कल्पना नीं कर सकां, उवा बात उण कवेसरां उण निरंकुश शासकां नै सुणाई जिणां रो नाम ई केई बार लोग जीभ माथै लेवता ई शंक जावता।

ऐड़ो ई एक किस्सो है महाराजा जसवंतसिंहजी जोधपुर (प्रथम) रो।[…]

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