आफत नीं आभूषण है बुजुर्ग

respectforeldersसकळ जियाजूण में बाळपणो, जवानी अर बुढापो अै तीन अवस्थावां आवै ई आवै। बाळपणो सगळां सूं आलो, व्हालो अर मस्ती वाळो हुवै तो बुढापो दौरो अर दुखदायक हुवै। जवानी तो दीवानी हुवै। इण अवस्था में मिनख छैलाई में छोळां भरतो आसमान सामी थूकण सूं चूकै कोनी, भलांई ऊपरनैं थूक्योड़ो पाछो करमड़ै पर ई पड़ो। मस्ती अर मनगत मौजां माणण री दीठ सूं हुवो भलांई सोच्योड़ै काम नैं सिग चढावण री हूंस री दीठ सूं ; जवानी री अवस्था किणी पण जूण रो सुरग मानीज सकै। ओ ई समै हुवै जद जीव आपरै तन, मन अर धन रो मनगत उपयोग करतो आपरै जीवण रो औचित्य सिद्ध कर सकै। आपरी ऊरमावां अर खिमतावां रो पूरो फायदो इणी उमर में लियो जा सकै। जवानी भागदौड़, जिम्मेदारियां, संघर्ष अर समझौतां री सड़कां नापण रो काळखंड पण हुवै तो ओ ई काळखंड मनगत मौजां माणण रो ई हुवै। होळै-होळै जवानी रा थपेड़ा अर बाखाजाबड़ सूं आदमी अनुभवी बणै बोछरड़ायां छोड़’र स्याणो हुवै, जोश अर जुनून सूं होश अर थ्यावस रो हाथ थामै। खुदोखुद, परिवार अर समाज सूं लेय देस-राष्ट्र सारू काम करण रो ओ निकेवळो टेम हुवै। जवानी री पोळ माथै ईज बुढापै रो वासो है। बुढापो खंखारा करतो, बारणा बजावतो, हेला पाड़तो इण पोळ माथै सदीनो त्यार उभो रैवै। ‘खीरां आई खीचड़ी नै टीलो आयो टप्प’ री तर्ज माथै जियां ई सरीर रा हाण हटै, गोडा ढळै, बियां ई बुढापो आय वळै। बाळपणै री मौजां जवानी री जिम्मेदारी वाळै समदर में कणा अर कठै छाईंमाईं हुवै ठा ई नीं पड़ै, बियां ई जवानी वाळो जोश, रौब-दौब अर ठसक-ठरका बुढापै वाळै बियावान में बड़तां-बड़तां बिन-बतळायां ई बाय-बाय कर ज्यावै अर पाछा मुड़’र देखै ई कोनी कै जकी जवानी आपणा इतरा नखरा झेल्यां अर आपणै कैयां-कैयां कितरा कौतक कर्या, उणरी खोज-खबर तो ल्यां। पण ना करै नारायण। ओ ई दुनियां रो धारो है, ना थारो है ना म्हारो है, ईं पर किण रो सारौ है !

अबै आयो बुढापो। मुंशी प्रेमचंदजी ‘बुढापै नै बाळपणै रो पुनरागमन’ बतायो है। आ बात साव साची है। आदमी रो मन बेगो सो’क बूढो कोनी हुवै। बाळपणै में टाबर रो मन करै कै तेज दौड़ूं पण सरीर सांभणो कोनी आवै जणा दौड़ीजै कोनी। मन में आवै कै चांद नै पकड़ूं पण हाथ आवै नीं। घर में पड़ी चीजां रै ढोळण-पंचोळण री घणी जी में आवै पण घर वाळा पार नीं पड़ण द्यै। लबोलवाब ओ कै बाळापै में मन तो बणै पण तन रो साथ कोनी मिलै। आ री आ गत बुढापै में हुवै। मन तो मालजादो मोट्यार रो मोट्यार रैवै, बेगो सो क्यांरो मानै। ताल मिलतां ई तालर घालण ढूकै पण गोडा साथ द्यै जणा। ओ मन तो खासा करम में खायां सबूरी लेवै। पण तन खोखलो हुज्यावै। हाथ-पग हालै नीं, जीभ सावळ चालै नीं, कान सुणै कोनी, माथो गुणै कोनी, आंख्यां दीखै नीं, हियो सीखै नीं। मनैग्यानै तो घर रो मुखियो बो ई हुवै पण होळै-होळै सगळी चीजां उणरै हाथां सूं खिसकती जावै। थोड़ा दिन टाबरिया रायचंद बणायां राखै पण जियां ई टाबरां नै जवानी वाळै बायरै रो फटकारो लागै अर टाबर नस रा लटकारा करता मूंढो मोड़’र रायचंद री राय नैं ठुकराय’र खुद ठाकर बण बैठै।

अठै आतां मनैं लागै कै प्रेमचंदजी कही जकी बात तो साची ही पण पूरी कोनी कहीजी, अधूरी रैयगी। बुढापो बाळपणै रो पुनरागमन तो है पण बाळपणै में चढण री आस हुवै उणरै विपरीत बुढापै में गुडण रो डर। इण दीठ सूं बुढापो बाळपणै सूं घणो अबखो अर अखरण वाळो है। बाळपणै में तो जे टाबर रो मन करै अर उणसूं आपरै सरीर री खिमता नीं होवण सूं कोई चीज नीं लेईजै तो उणनैं पिछतावो कोनी हुवै क्योंकै बो आ सोचल्यै कै स्यात आ चीज म्हारै खातर कोनी। दूजी बात आ कै उण टाबर नैं उणरी इच्छित चीज दिरावण सारू घर रा जवान अर बूढा सगळा त्यार खड़्या रैवै। भलांई भुळा-चपळा’र ई करो पण टाबर री जिद नैं पूरी करण री आफळ घर वाळा सगळा करै। इणनैं दूसरै रूप में कहूं तो इयां कै बाळपणै रो साथ तो जवानी अर बुढापो दोनूं देवै क्योंकै बो तो ऊगतो सूरज है, उणनै तो जगती जुंवारड़ा करै। टाबर सारू अै दो चीजां पक्ष वाळी है। पण बुढापै रा कजिया घणां दौरा। पैली बात तो आ कै जका काम काल ताणी बो करतो आयो है, बै आज सगळा उणरै बस रा कोनी रैया। सगळो घर जकै रै अेक खंखारै सागै हरकत में आज्यावतो बो उणरै हेलां सूं भी हालै ई कोनी। का’ल ताणी उणरो कैयोड़ो कानून मानीजतो पण आज तो बो कानून नैं बांच-र सुणावै तो ई लोगड़ा मानै कोनी। अबै उणरी कोई गिनरत ई कोनी। बाळपणै में तो ठा कोनी हुवै कै कुण ठीक कैवै अर कुण बेठीक पण बुढापै में तो सगळो ठा रैवै। बाळपणो दुनियां री घाईघूंचळी अर स्वारथ सगाायां नैं पैचाणै कोनी इण खातर सौरो है पण बुढापो तो आं घाटां रो छक-छक’र पाणी पियोड़ो। अेक-अेक नैं आगूंछ जाणै पण करै कांई, जोर कोनी चालै। इण वास्तै ओ बुढापो ज्यादा दौरो। दूजै कानी देखां तो टाबर रो जिद पूरो करणियो परिवार बूढियै रै जिद नै बावळो बता’र किनारै करै। कित्ती ई चोखी अर चतराई वाळी बात करो भलांई पण लारला तो मानै ई नीं। इणसूं बेजां दुख हुवै पण सारै कांई। बूढा हुग्या ढोर ज्यांका दमड़ा लेग्या चोर।

कोई आदमी रै जीभ नीं हुवै जद बो हियै पिछतावण ले लेवै कै भगवान उणनै बोलण री ताकत कोनी दी पण जे जीभ हुवै अर पछै उणसूं बोलीजै कोनी का कोई बोलण देवै कोनी तो बा हालत घणी दुखदाई हुवै। बुढापै री हालत बा ई है। सरीर री चेतना मंद पड़ण लागै, मन हार-थाक’र मायूस हुयोड़ो मांचो झालल्यै। धन आवण रा गेला होळै-होळै बंद हुज्यावै। हाय-तौबा करतो आपरी पीड़ बांटण री खेंचळ करै पण कोई सुणै कोनी। सनै-सनै आदत हुज्यावै। सौक्यूं सहन करण लागै। संसार रा सुख अर स्वाद उण सारू बेमानी बण ज्यावै। आपरै अनुभव अर चिंतन सूं मन नैं समझावतो मौन धारण कर लेवै। ना आसा, ना अपेक्षा, ना रीझ, ना खीज, ना ओळमो, ना साबास, बस अेक ठहराव सो आज्यावै। घर-परिवार रा जियां चावै, बियां ई बुढापो ढळण सारू त्यार हुज्यावै।

विदेसां री बात तो न्यारी है, बठै तो बूढो हुयां टेमसर ‘बूढ-रैवास’ (ओल्ड अेज होम) में दाखिलो हुज्यावै। कई बार तो लागै कै बा व्यवस्था ठीक है। सगळां सारू समान तो है। बठै आवणियां में आ बात हुवै कै ‘‘ना बो कोईनैं जाणै तो ना उणनैं कोई जाणै’’, इण वास्तै कोई सूं आस-अपेक्षा रो काम ई कोनी। जे आपस में जाणै तो ई कोई उजर-ईसको कोनी। हुवै जियां ठीक, नियती रा दास बण’र जीवणो मंजूर। पण आपणै अठै बूढा-बडेरां पर दोहरी मार पड़ै। आपां लाल्यो अर जुंवार दोनूं आपणी राखां। बेसकै ई पड़ां अर बिडारूपण भी राखां। ओ तो सनातन साच है कै बूढो हुयां आपरा हाण हटै अर आवण वाळी पीढी नैं उणरा काम संभाळणा पड़ै। तिजोरी री कूंचियां कितरा दिन कड़तू रै लटकायां फिरो, बै तो भोळावणी ई पड़ै। काया री निजोरी हालत नैं सहण करणी पड़ै। घर रै कामां मांय राय, परामर्श बंद होवणा ई होवणा है। अै तो ठीक पण आपां तो सगळा श्रवणकुमार रैयग्या नीं आपां कद मानां कै माईतां री आ गत है। चुणाव लड़णो हुवै तो मतोमती फैसलो लेवां, घर खरीदण-बेचण रो मतोमती फैसलो लेवां, टाबरां री भणांई अर सगाई तकात खुद ई तय करां पण अपणै आपनै आज्ञाकारी अर संस्कारी बणावण सारू आदतन अेक वाक्य जरूर बोलां कै ‘म्हारै माताजी का पिताजी री आ ई इच्छा ही’। आ भी ठीक क्योंकै इणसूं माईतां नै के कुफायदो हुवै। पण कई बार कोई नै चंदो नीं देवणो हुवै, का कोई सगाई नीं करणी हुवै, का टीकै रा रिपिया ज्यादा लेवणा हुवै तो आज री पीढी माईतां री ओट ले’र काम काढै। फटाक सी बोलै आ बात म्हारै बापूजी रै कोनी जची सा। जाणै बापड़ा ! बापूजी रै कैयां बिनां तो नाळाछोड ई कोनी करै। वाह रे श्रवण कुमारो!

दूजी कानी देखां तो घर में बापड़ो बापूजी हेलाहेल मचा राखी है कै आज धणियै री चटणी री ठौड़ रात री मैंदी भेयोड़ी ही बा बाटकड़ी पकड़ायदी। आ पाछी लेज्यावो अर धणियै री चटणी ल्याद्यो पण बीं री कोई कोनी सुणै। बापड़ो लूखी-सूखी खाय’र थोड़ी ताळ मन में क्रोध करै। राम नैं अरदास करै हे राम! उठा लै। पछै पाछो ठंडो। कोई रीस न रोळो। चुपचाप आपरो जीव लियां पड़्यो रैवै। पण पड़्यो कुण रैवण देवै। कोई घरै आवै तो आज भी संस्कार वश बडेरां रा समाचार पूछै अर जे नीं पूछै तो घर वाळां नैं आ बात बतावण री खतावळ लागी रैवै कै म्है माईतां नैं भी सागै राखां। आवण वाळै नैं बडेरां सूं मिलावणूं लाजमी। इण खातर बूढियै री कोठड़ी रो झाड़ू काढै। उणनै उठा-पटक कर’र उणरा गूदड़ा-गाभा बदळै, सरीर रा कपड़ा ई बदळावै। सिराणै दवाई रा भांडिया अर गोळ्यां रा पत्ता सजा’र राखै। रुम-स्प्रे छिड़कै। बापड़ै बूढियै नैं छींका आवै पण मिजमानां नैं दिखावण सारू जरूरी है। आवण वाळो बूढियै नैं कीं सुख-साता पूछै तो सगळै सवालां रो जबाब घरवाळा ई देता जावै, उणनैं जबान उथळण ई नीं देवै। जे कायो हुयोड़ो कीं बोलै तो टोक द्यै ‘थे बोलो मती डाक्टर साहब अबार ई बता’र गया है नीं कै थे कम बोल्या करो’।

खेतीबाड़ी करणियां लोग जाणै कै थकेड़ो बळद धोरै चढती टेम भाज’र चढै। उणरो भाजणो कोई जवानी रो दिखावो करणो कोनी। बो बापड़ो डरतो भाजै जाणै कदास जे धोरै री चढाई में रुकीजग्यो तो पाछी गाडी गडकै चढाण री तागत उणरी नीं है। बो आपरी कमजोरी छिपावण वास्तै भाज’र धोरै चढै। इण बात नैं सगळा जाणै अर बो बळद ई जाणै। बा री बा बात आपणै घरां मांय श्रवणकुमारां री है। माईतां रै बोल्यां पैली खुद आपरी जीभारेल नैं इतरी स्पीड पकड़ाद्यै कै कई बार तो जंक्सन रा जंक्सन ई नॉनस्टाप निकाळद्यै। बीं थाकेड़ै बळद दांई आं श्रवण कुमारां नै ई ओ डर रवै कै कठैई बूढियो का बूढळी साच नीं बताद्यै। बातां इसी करै जाणै बापड़ा बरसां बरस सूं इणी ढाळै काम कर रिया है। म्हारा बापूजी झांझरकै च्यार बज्यां जागै। आं नै उठतां ई चाय चाईजै। रोटी तो चूरोड़ी ई खावै। टीवी मांय फलाणा-फलाणा सीरियल देखै, समाचार सुणै। धोती-कुरता नील दियां बिनां कोनी पैरै। कमरो आंनै अेकदम जच्योड़ो ई चाईजै। जूस आनै फलाणो चोखो लागै। दूध फीको लेवै। बायां आवै तो पांच सौ सूं कम हाथ में कोनी देवै। कठै सूं ई लाओ पण आं री इच्छा तो पूरी करणी ई पड़ै। जिद्दी घणां है कित्तो ई कैय दियो कै अबै कठैई मत जावो पण 10 वें दिन आपरो बींटो बांध’र त्यार हुज्यावै कै गांव जास्यूं। कोई नैं सागै कोनी लेज्यावै। खुद पर भरोसो है कै अेकलो ई जाऊं। बठै तीनूं भायां नै अर बां रा टाबरां नै संभाळ’र 20-25 दिनां सूं पाछा आवै। इतरै तो काठा बीमार हुज्यावै, भरती करवाणा पड़ै। पण आं री इच्छा है जियां ई करां। माईत तो भगवान बरोबर हुवै। सामलो ई हां भरै अर अै बखाण करै। बूढियै रो जी अमूझै। मन ई मन सोचै देख! साव लूण री पोवण में लागर्या है अर अै तो पोवै सो पावै पण सामलो ई गबागब खावण में लागर्यो है। बुढियो मांय रो मांय बड़बड़ावै कै 10 वें दिन त्यार नीं हुवै तो कै करै क्योंकै 11 वैं दिन तो दूजोड़ै बेटै री बारी है। रोटी जीमणी हुवै तो बठै ई जावणो पड़सी। बींटो जचावण री बात है तो तीनां मिल’र अेक बींटो दिरायो है, बिछावणो हुवै तो लेज्यावणो ई पड़सी। घर में कित्ताई बिछावणा बाफर पड़्या हुवो भलांई पण बूढां नैं कुण देवै। अेकलो नीं जावूं तो सागै कुणनैं लेज्याऊं, थांनै अर थांरा टाबरां नैं म्हारै मांय बास आवै।

बो अेकर तो सोचै पोल खोलूं अर आं श्रवणकुमारां रा माळीपानां उतारूं। थोड़ी देर काळजै में चिणखां सी उठै पण फेरूं माईत तो माईत हुवै। बो आ सोच’र राजी हुवै कै करो भलां ई मत पण आपणी ओलाद नैं इण बात रो ठा जरूर है कै बडेरां री सारटेव करण सारू के-के काम करणां पड़ै। उणनै ओ ई पण ठा है कै घरै रागसां दांई दुख देवणियो उणरो बेटो मंचां पर भासण देवती वेळा आदर्शां रो पूतळो बणै, लोगां री ताळियां सूं रीझै। बो मन ई मन सोचै जे सगळी जवान पीढी बुढापै री वेदना नैं अेक दिन खातर समझल्यै तो बुढापो इत्तो दौरो कोनी हुवै पण आ संभव कोनी।

ओ इयांकलो विषै है कै लिख्यां ई जावो भलांई पण जवान पीढी सूं इतरो ई कैवणो है कै बूढा-बडेरा बेकार कोनी हुया करै। आं रो उपयोग घर में अर समाज में कित्तो है, इणरो आंको करणो ब्होत दौरो काम है। आं अनुभवी अर जुग रै जथारथ रा जाणीजांण लोगां री अेक बात जीवण री दसा अर दिसा नैं बदळण री खिमता राखै। आं री दुआ दुनियां री सगळी दोगाचींती अर दुर्बलतावां नैं दूर करण री रामबाण औखद है। संस्कारां री जीती-जागती पोसाळ आपणां अै बडेरा आपां सूं कीं नीं चावै। फगत इतरो सो सोचो कै बै आपां सागै नीं वरन आपां वां रै सागै रै रिया हां। बै आपणै सारू आफत नीं आभूषण है। श्राप नीं वरदान है बूढ़ा। फगत दिखावो करण खातर सेवा नीं करणी। सेवा नैं संस्कार बणाओ। मायतां रो माण राखण सूं बत्तो दुनियां में कोई धर्म अर कर्त्तव्य नीं है। वां री सेवा सूं बढ’र कोई श्रेष्ठ काम नीं है। वां री आज्ञा रो पाळण करणो आपणै जीवण री सौराई रो आधार बणै। जे भारत नै भारत राखणो चावो अर भारतीय संस्कृति नैं जींवती राखणी चावो तो बडेरां रो माण करणो सीखो। माईतां रै सागै रैवो अर वांरै अनुभवां सूं खुद रो जीवण संवारो। अै बूढा-बडेरा आपणै घरां री साख अर संस्कृति रा गैणा है, आं री हिफाजत कर्यां ई आपणी मिनखाजूण पूरी मानीज सकै।

~~डॉ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’
विभागाध्यक्ष- स्नातकोत्तर हिंदी विभाग

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