आई अरदास रा कवत्त/छप्पय

karnimata।।दूहा।।
साद सताबी संभल़ै, मोड़ो मत कर मात।
थल़ धरणी थारै थकां, पावै दुख क्यूं पात।।1
किया सिद्ध तैं करनला, कितरा म्हारा काज।
रीझ तुंही फिर राखजै, लोहड़याल़ी लाज।।2
पतियारो किणरो प्रतख, पर निज नहीं पिछांण।
रहूं भरोसै रावल़ै, करै रिच्छा किनियांण।।3
आरत गज री ईश्वर, खरो तज्यो खगराज।
चढजै ज्यूं ही चितारियां, हमै भीर हिंगल़ाज।।4

।।कवत्त/छप्पय।।
हुई भीर हिंगल़ाज, जाझ जग तारण जरणी।
सदा केहरी साज, काज संतन रा करणी।
आरत सांभ अवाज, राज वाहर नित बैणी।
नमो गरीब नवाज, लाज रखण पख लैणी।
सगतियां तणी सिरताज तूं, सदा सहायक सेवियां।
उर दाझ मेट सुख आपणी, कर दल़ पासै केवियां।।1

आईनाथ अनाद, आप मामड़ घर आई।
भाई महरख भीर, सात बैनां सुरराई।
वरदाई रख बात, संतजन साय सदाई।
लाई जेज न लेस, धावतां पैला ध्याई।
महमाई तो मानी मुदै, सँकल़ाई जग साबतै।
सुखदाई मात गिरधर सदा, फल़दाई करजै फतै।।2

रोक लियो रविरत्थ, कत्थ आ जबरी कीनी।
सिंधु तणी समरत्थ, पांण हत्थ धारा पीनी।
हठी तड़गियो हत्त, रत्त सूं लोहड़ रंगी।
गुफा तेमड़ै गत्त, सत्त दी बात सुचंगी।
मत्त रै मुजब गिरधर मुणै, सदा नाम तो सत्त है।
विकराल़ कल़ू में बीसहथ, छत्रधार रेणवां छत्त है।।3

नमो सैणलानाथ, आथ ईहग्गां अप्पै।
जप्पै जग जस जाप, कष्ट जिणां रा कप्पै।
संपै सुख ही सात, सेवगां साथ सचाल़ी।
थप्पै जुढियै थांन, दिपै धिन रूप दयाल़ी।
सुरराय हाथ सिरपै सदा, धरपै धणियप धारियां।
समरियां गीध रैणी सदा, सैणी कारज सारियां।।4

हुवो सरण हम्मीर, दियो चित्तौड़ दयाल़ी।
करां मिटाई कोढ, कियो तन हेम कृपाल़ी।
नृप नवैघण नूंत, पाव भर भात पकायो।
सारी सैन समेत, छतो भर पेट छकायो।
नर नार नांम नरही नमै, अन्नपूरणा ईसरी।
बिरवड़ी गीध वाहर बणै, ताल़ बजंतां तीसरी।।5

माल्हणदे महमाय, अरिथट आय उथाल़ण।
पाल़ण पातां पूर, सदा दुख मांय संभाल़ण।
टाल़ण विघन तमाम, देव दुविधारु दाल़ण।
आलण वँश में आप, इल़ा विरद नमो उजाल़ण।
सगतियां झूल़ त्रिसूल़ सज, मेख दल़द्दर मारणी।
सारणी गीध गरजी सदा, चाड सुणै झट चारणी।।6

देवलदे दातार, सको संसार सरावै।
धिनो लोहड़ीधार, कार अदभूत करावै।
भुजां तिहारै भार, तार फसियोड़ी तरणी।
आई अबै उबार, हार पण मनरी हरणी।
कवि गीध पार पावै कवण, मयंद स्वार जस मँडणी
सेवगां लार भलियासधू, (तूं )दूठ दोखियां दंडणी।।7

नमो नागैही नांम, भोम मँडलीक भमायो।
मंडी चारणां मांम, गाज कर राज गमायो।
कामेही कर क्रोध, जाम रो गात जल़ायो।
पेमलदे इल़ प्रगट, रूठ कर कलो रुल़ायो।
पूरजै आस गिरधर प्रतख, पाल़ सदा ही राख पत्।
सुकवियां साद बैचर सुणै, बिखमी पड़तां बीसहथ।।8

सुणी शेख री साद, सिंध मग बेग सिधाई।
भाई री कर भीर, कृपा कर जेल़ कटाई।
पेख पसार्यो पांण, उदध में साह उबार्यो।
वहा तनै विरदाल़, तुंही अणँदै नैं तार्यो।
मारियो कांन मोटो कुटल़, खीज कमर नैं खाल़ियो।
पाल़ियो गीध रिड़माल पख, तवां विघन तैं टाल़ियो।।9

इल़ा तुंही अवलंब, करै विलंब न काई।
जयो जयो जगतंब, किया कज सिध किताई।
राज वीक नैं राज, साज धर जंगल़ सचाल़ी।
दंगल़ मांयां देख, रखी लज जैत रढाल़ी।
कर जोड़ दास गिरधर कहै, सदा सँपूरण आस सो।
अरदास इती आ अबंका, बीसहथी विसवास तो।।10

लागा वैरी लार, करै किरतब्ब किताई।
पड़ू नहीं हूं पार, जाल़ निज रचै जिताई।
महा विपत में मात, थेटू भरोसौ थारो।
आप बिनां इम आज, सगत कुण देवै सारो।
ईसरी गीध आंणी अवस, भीड़ मिटांणी तूं भल़ै।
मेटजै तास मनरी मुदै, साद मेहाई सँभल़ै।।11

मुणां चँदू महमाय, गात सालम रो गाल़ै।
वसू हुई विखियात, पात धरम तुंही पाल़ै।
पढै नाम परभात, मात जेरै दुख मेटै।
वल़ै चावी आ बत, भांणवां संपत भेंटै।
छोरवां परै तोरी छती, छांनी नको ज छांवड़ी।
गीधियो कहै सुणजै गिरा, माफ गुन्हो कर मावड़ी।।12

विलखा देखै बाल़, सदा लंकाल़ सजावै।
रीझै आणँद राल़, भाल़ पंपाल़ भगावै।
खमा तनै खपराल़, खाल़ दल़ अरि खांडाल़ी।
दया करै डाढाल़, रखै प्रतपाल़ रुखाल़ी।
करनला टाल़ किणनै कहूं, अवर न दीखै आसरो।
गीधियो कहै सुणजै गिरा, दोख निवारै दासरो।।13

सुण पीथल री साद, बही जद राजलबाई।
मही रखण मरजाद, आद ज्यूं वाहर आई।
रचियो नाहर रूप, भूप पख नमो भुजाल़ी।
डरियो अकबर देख, चरित थारा चरताल़ी।
जग गीध बात जाहर जको, भर डग पूगी भीर तूं।
दासरै पाण ऊपर दिया, साच निभायो सीर तूं।14

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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