आपां बात करां औरां री, आपां री करसी कोई और

आपणो ओ संसार बादळां री फिरत-घिरत री छाया रै मानींद कद किण सूं छूट जाय, इणरो ठाह कोई नैं ई पण नीं है। देही रै अवसाण पछै पाछो कोई देही मिलसी का नीं इण बात रो ई कोई नैं ठाह नीं है पण ओ जरूर ठाह है कै जको जलम्यो है उण सारू मरणो लाजमी है। मौत अटल साच है, इणमें कोई मीन-मेख नीं है। हां! मौत रा गेला घणा है। कद अर कुणसै बैवै कोई नैं मरणो पड़ै ओ करमां री खेती पर टिकेड़ो है। करमां सारू रिख-मुनियां लारला कई जलमां रा खाता खंगाळण री बातां मांडी है। इण जलम रो ई नीं कई जलमां रो पाप अर पुन्न जीवात्मा रै साथै संचरण करै। आ बात कोरी मानखै पर नीं वरन समूची जीयाजूणा पर लागू हुवै। हां! मिनखा देही री आ बदताई है कै इण देही मांय आपां आछा अर बुरा करमां री जाणकारी ले सकां। सावळ अर सूंधी राह चुण सकां। करणीय अर अकरणीय रो भेद कर सकां। दूजा जीवधारी मिनख रै बस में हुवै जद के मिनख और कोई रै बस में नीं होय आपरी मरजी रो मालक हुवै। अनुभव रा आकर अर चतुर्भुज रा चाकर मनीषियां ठौड़-ठौड़ इण बात माथै जोर दियो है कै मिनखा जूणी बार-बार नीं मिलै। चौरासी लाख जूणियां में भटकण रै बाद सावळ करम हुवै तो मिनखा देही नसीब हुवै। इण देही मांय आयां पछै ई जे लारलै जलमां रा करम फोरा हुवै तो पछै मिनख आपरै मन चायो जीवण नीं जी सकै अर कुमौत मर खपै। इण मिनखा देही मांय दूजी देही सूं बत्ती चीज है- विवेक। मिनख नैं आपरै विवेक री तणी कदै ई तोड़णी नीं चाईजै। जठै ताणी संभव हुवै विवेक सूं काम करणो चाईजै। मोकळा संतां, भगतां अर साहितकारां लोकजीवण री सहज अर सरस बातां बतावतां इण बात माथै जोर दियो है कै क्रोध कबाड़ै रो मोटो कारण है अर धीरज किणी पण समस्या रो सावजोग समाधान काढ़ण रो सबळ औजार।

राजस्थान रा अेक भगत कवि ओपाजी आढा हुया। वां सरल अर सहज प्रवाही भासा मांय आम लोगां नैं ओपतो जीवण जीणै सारू सुभग सीख देवतां मोकळा गीत अर छंद लिख्या। वांरै अेक गीत रो दाखलो देवतां इण जीवण रो असली मकसद समझां। भगवान चतुर्भुज रो चावो चाकर कवि ओपा आढा इण जग रा मिनखां नैं समझावतां लिखै कै ‘जे कर सको तो इण मिनखा जूण रो लाभ लेवतां भलाई रा काम करो। ओ संसार रैण बसेरो है। रात बीती अर बात बीती। दोय दिनां री साव थोड़ी सी टेम रा पावणा हो, इण बात नै जाणतां थकां क्यूं कोई सूं राड़ मोल ल्यो। क्यूं जण-जण री कूड़ उथळता फिरो। जे इण जीवण रो सार समझ सको तो थोड़ा दिनां रै जीवण खातर कोई सूं बिगाड़खातो मती करो-

कर जांणै तो कोई भलाई कीजो, लाभ जनम रो लीजो लोय।
पुरखां दो दिन तणा प्रांमणा, किण सूं मती बिगाड़ो कोय।।

कवि ओपा आढा जोर देय देय’र कैयो है कै भाई इण संसार सूं जाणो छै, जाणो छै, जाणो छै। इण कारण मन रै मांय सावळ स्याणां बण’र सोचो। दोय दिनां री पावणाचारी में जीभ पर इमरत री ठौड़ कड़वो जहर क्यूं राखो।

जाणो छै जाणो छै जाणो, समझो भीतर होय सयांन।
बे दिन काज जहर क्यूं बोलो, मरदां दूर तणां मिजमांन।।

मतलब कै मरणो तो पड़सी। कितरा ई कळाप करो। कितरा ई झूठ बोलो। कितरा ई पैंतरा बदळो। नाटक मोकळा करो भलांई, धरमराज रा दूत तो बारै दिखतै चेहरै सूं नीं मांयली आतमा सूं मिनख री पिछाण करै। वांरी निजरां सूं बचणो दौरो ई नीं नामुमकिन है। चित्रगुप्तजी री बही मांय सगळी ओळियां खराखरी ई लिखीजै। धरमराज रै दरबार मांय ना घूस चालै ना सूंक (रिश्वत)। बठै ना भाई-भतीजावाद आडो आवै ना कोई जेक, पेक अर चैक। इण सारू स्याणां अर जाणीजाण संतां मांड-मांड कैयो है कै जे ओ ठाह है कै नहचै ई अेक दिन अठै रो सगळो अठै ई छोड़’र उठै (परलोक) जावणो ई जावणो है तो पछै अै छळछिद्र किण सारू। राजस्थानी कवि चमन जी तो अठे ताणी कैवै कै कितरा ई छाना राख’र छळछिद्र करो पण हरि सूं तो अछाना होवणा ई होवणा है। जिस्या करम करो उणरै मुजब फळ भोगणो पकायत है। इण मन नैं भरमावण अर भटकावण सूं कीं नीं बणै। हियै में कांगसी फेर’र देखो इण जीव नैं ओ जग छोड’र जावणो पड़सी। काळ रो निसाण हर घड़ी घमकतो आपां सब नें चेतावै कै ओ संसार थारो थिर आसरो कोनी। इण महताऊ मिनखादेही रो होवणो सारथक तद ई हो सकै जद मिनख मानव धरम रै मुजब आचरण करतां परमात्मा रा गुण गावै। कदे मकान अर कदे दुकान सारू राड़ रोपणियां री अकल पर तरस आवै। रोजीनां खेतां री सींवां माथै लट्ठ बाजै। पड़ोसी तो सात सुखां मांय सूं अेक मोटो सुख मानीज्यो है पण संसार में आधै सूं ज्यादा पड़ोसी आपस में रोजीनां दांता-चिगथो करता ई लाधै। पड़ोसणा बाड़ां अर भींतां रै आसै-पासै खड़ी अेक दूजी रा लखण इयां बखाणै जाणै आं रो बरगां रो बैर है। अै मकान अर दुकान, खेत अर खदान सगळा लारै रैसी, हाथ मसळतां जावणो पड़सी। राजा होवो भलां रंक इण मारग पर तो बैवणो ई पड़सी। बां बांटां अर हाटां रा नेम-कानून निकेवळा है। बठै रा नाप-जोख न्यारा है। राव, रंक अर राणा सगळां नैं अेक दिन जावणो पड़सी अर आज ताणी कोइ गयोड़ो पाछो आय’र आपरी संचेड़ी माया अर भेळी करेड़ी भांज नैं अंवेरी हुवै, इसी सुणी कोनी। गयो जको गयो। कवि चमनजी लिख्यो –

छाना छलछिद्र व्है तो हरि तैं अछाना होय,
कर ते कमाना कर्म तैसा फल पाना है।
मन भरमाना मूढ हेर हिय आना सोच,
जीव जग जाना ये तो काल का निसाना है।
चमन सयाना होके गाना गुन ईसर के,
कौन का मकाना कौन ठाकुर ठिकाना है।
राव रंक राना सब सोवत मसाना बीच,
अेक दिन जाना फेर आना है न जाना है।

आपणी आ ऊमर ‘इम-इम’ करतां खिण-खिण बीतती जावै है। आज सूं का’ल, का’ल सूं परसों, पछे तरसों, लारलै साल, इयां करतां टेम आपरी जचेड़ी चाल चालै। समै सूं मोटो तो कोई सम्राट हुयो न हुवै। इण कारण आपां सब इणरी चाल सूं प्रभावित हुयां बिनां नीं रैय सकां। बीत्योड़ै समै अर अठै सूं सिधाया जकां मिनखां नैं आज आपां याद करां, बियां ई काल लारली पीढ़ी आपां नैं याद करसी। आपां जियां बडेरां री बातां करां बियां आवण वाळी पीढियां आपणी बातां करसी। जोगां नैं जोगा अर नाजोगां नैं नाजोगा कैय सरावणा-बिसरावणा ई होसी। जस-अपजस री अर गुण-अवगुण री बातां पण चालसी। इण खिण-खिण बीतती ऊमर अर बधती-नीठती माया रो गुमेज नीं करणो। बीतणहार नैं तो बीतणो ई पड़सी। भांत-भांत रै लोभ-लालचां री बळबळती भोभर में काया नैं मती होमो। टेम जावै पण बातां नीं जावै। जे भलो नीं कर सको तो कोई रो बुरो तो मती करो। कोई रो माण नी कर सको तो अपमान तो मती करो। जीवतां जस नीं ले सक्या तो कोई बात कोनी पण मर्यां पाछै तो लोकजीभ में अपजस रा भागी मत बणो। जगती रो ढांचो तो गेलोगेल ई चाल्या करै। आज आपां रोजीना विक्रमादित्य बणेड़ा लोगां रा फड़दखाता बाचां अर न्याय री ताकड़्यां तोलता रैवां तो बो दिन आपां नैं ई आवणो है। फड़दखाता तो आपणा ई खराखरी लिखीजेड़ा है। इण कारण जियां आपां लोगां री पारख करां, बियां ई आपां नैं ई पारख री परखी में तो आवणो ई पड़सी। लोगां री जीभ तो जांचण रै स्वाद पड़ेड़ी है, बा तो जांचैला ईज। –

इम इम करता जावै ऊमर, परमें काल परार क पौर।
आपां बात करां अवरां री, आपां री करसी कोई और।।

जीवण रो सार ओ ई है कै इण मिनखादेही रो माण करतां सावळ अर सूंधै मारग चाल’र कमाण-खावण री नींत राखां। सदा सांवरै नैं माथै राखां। खोट-कपट अर दंद-फंद सूं जीव नैं घ्यारी में मत फंसावो। मिनख री ताकत है-उणरो ठीमरपणो, उणरै मन री मजबूती, उणरै आचरण री पवित्रता अर उणरो ऊजळो चरित्र। भगवान रै प्रति साचा भाव राखतां उणरा गुण गावो। छोटी-छोटी बातां अर छदम स्वारथां रै जाळ में फंस’र खुद री औकात नैं ओछी मत करो। छिलरियां दांई चालतां ई छेह मती देवो। मतोमती मोटा बण खुद नैं खुदा मत मानो। सस्ती लोकप्रियता अर खिण भर री बडाई रै लालच में संस्कारां रो सोनो अडाणै मत मेल्हो। दिल नैं दरियाव बणावो, जिणरी गैराई रो संसार कायल बणै। अै दिन ताळी देवतां बीत ज्यावैला। घोड़ो हांकणो पड़ैला। मन री मन में लेय सिधावणो पड़ैला –

गरवा होय हरी गुण गावो, छीलर जेम न दाखौ छेह।
आज क काल पयांणौ ‘ओपा’, दिहड़ा गया सो ताळी देह।।

~~डॉ गजादान चारण ‘शक्तिसुत’

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