आऊवै धरणै रा महानायक अखोजी बारठ

मारवाड़ रै मध्यकालीन इतिहास में आऊवा रो चारण धरणो चावो है। मारवाड़ रै शासकां अर चारणां रा संबंध प्रगाढ रैया है पण जोगानजोग राजा उदयसिंह री बगत ऐ संबंध किणी गल़तफहमी रा शिकार होय बिगड़ग्या। उदयसिंह चारणां रा गांम जबत कर लिया। विरोध होयो। समझाइस होई पण राजा नीं मानियो। छेवट1643 वि. में चारणां आऊवै री आंटीली धरती माथै धरणो दियो।

आऊवो उण दिन ठाकुर गोपाल़दासजी चांपावत री जागीर रो एक गांम हो। राजा गोपाल़दासजी नैं कैवायो कै धरणो म्हारै खिलाफ है सो आप धरणो उठावो। नीतर हूं गांम खालसै कर दूंला। गोपालदासजी सपूती रा रूप अर वचन रा धणी हा। उणां कैवायो “चारणां धरणो म्हारै विश्वास माथै दियो है। सो म्है अर म्हारी जिण जीवती है जितै तो धरणो उठै नीं अर म्हां मरियां चारण जाणै र धरणो जाणै! रैयी बात गांम खालसै करण री तो आपनै जिकां जोधपुर दियो वां ई म्हांनै पाली दी। खोसै कै खालसै करै जिणरै बूकियां में गाढ चाहीजै।”

उदयसिंह जाणै हा कै गोपाल़दासजी सूं टकर लैणी कोई हंसी रम्मत नीं है। उणां उणी बगत खारी सूं बारठ अखैजी नैं बुलाया। खारी रै बारठ महपाजी रै भल्लणजी, भल्लणजी रै बाछूजी अर बाछूजी रै बेटै भाणोजी रै घरै अखैजी रो जलम होयो। उल़्लेखजोग है कै अखैजी री मा रो सुरगवास अखैजी रै बाल़काल़ में होयग्यो हो सो अखैजी रो पाल़ण-पोषण राव मालदेवजी री राणी अर उदयसिंह री मा सरूपदे झाली घणै लाड अर दुलार सूं करिय़ो।

किंवदंती है कै एक दिन किशोरावस्था में अखोजी अर उदयसिंह दोनूं राणीसा कनै बैठा हा कै अचाणचक सरूपदे जी री आंख सूं आंसू टपकियो।

आंसू देखर उदयसिंह पूछियो “मा तूं नवकोटी मारवाड़ री धणियाणी अर थारै धणी री हाक सूं हिरण बांडा होवै। पछै थारी आंख में आंसू ?”

सरूपदे कैयो “बेटा म्है तनै अर अखै नै एक जेड़ो लाड देयर मोटा किया है। म्हैं अखै नैं ई म्हारो बेटो मानियो है। पछै तूं तो किणी ठिकाणै रो धणी बणैला पण अखो तो चारण है! सो इणरै कनै ठिकाणो कठै ? इणनै तो आपरो कविकर्म ही निभावणो पड़ैला। अखै री भविस री हालत माथै आंसू आया है।”

उदयसिंह कैयो अखो म्हारो भाई। हूं अखै नैं ठिकाणै रो धणी कर र राखूंला। ओ म्हारो वचन है।” ज्यूं ई उदयसिंह कनै जोधपुर रो राज आयो। उणां अखैजी नैं सम्मान साथै जागीर दीनी। उल्लेख मिलै कै उण बगत अखैजी कनै इकतीस गांम हा। इतरा गाम उण बगत किणी चारण कनै नीं हा।

सो उदयसिंह, अखैजी नै कैयो कै आप जावो अर ज्यू त्यू समझाइस कर धरणो उठावो। अखोजी आऊवै गया। चारणां अखैजी नैं आया देख विरदाया। कवि दुरसाजी आढा रै आखरां में-

अखवी आवंतांह, वाहर विसोतर तणी।
तोर वदन तपतांह, भाण दवादस भाणवत।।
काल़ी कांबल़ तांण, ऊतारी व्रन री अखा।
राव तणै सिर रांण, भल ओढाड़ी भाणवत।।

अखोजी समझग्या कै चारण म्हनैं ई धरणै में भेल़ो बैठावणो चावै। जातिय हित रै आगै निजी हितां नैं तुच्छ मात्र गिणणिया अखोजी धरनार्थियां रै कांधै सूं कांधो जोड़ भेल़ा बैठा। परवर्ती कवि खेमोजी आसिया रै आखरा में-

रोहड़ अखवी रांण, साथ खटव्रन सिघाल़ा।
बैठा धरणै बहसि, राव ऊपरा रढाल़ा।।

दुरसाजी आढा लिखै –

तूट छमंछर वरस तिंयाल़ै,
बात पड़ी कुल़घात विचाल़ै।
अधपत उदक धरा अड़वाल़ै,
रोहड़ ग्वाल़ थको रखवाल़ै।।

बात जोधपुर पूगी तो दरबार रै रीस रो कोई छेह नीं रैयो। उणां उणी समै अखोजी रा इकतीस गांम जब्तै कर लिया। साथै दो कटारी पूगती करी कै एक तूं चारणां रै कारण थारी खावैला तो एक भेल़ी म्हारै कानी सूं ई खाई।

अखैजी दोनूं कटारी खाय जात हित में निस्वार्थ बलिदान दियो। इण महान बलिदानी नैं उण बगत चारण जात आपरै “वरन पातसाह” रै विरद सूं विभूषित कियो। किणी समकालीन कवि ऱो एक कवत्त पढणजोग है जिणमें इण महा त्यागी रै अंजसजोग त्याग रो वरणाव है-

त्याग गांम इकतीस, धणी तजियो छत्रधारी।
मिल़ियो धरणै मांह, वडै मन मरण विचारी।
धणी हुकम सिरधार, पहर जमडाढां पोढै।
रंग हो रोहड़ रांण, अति जस सिर पर ओढै।
वीसासौ साख इकमुख भणै, दिल सुध जाति विरद दियो।
तिण दीह अखो रेणव तिलक, वरन पतसाह.बजियो।।

जात हित में सम्मान, जागीर, अर भ्रातृत्व संबंधां नैं त्याग अखोजी एक आदर्श उपस्थित करग्या। सही मायनै में आऊवै धरणै रा दो महानायक हा जिणां निस्वार्थ भाव सूं प्रेरित होय धरणै नैं सफल़ बणायो। एक तो गोपाल़दासजी चांपावत, जिणां राज री गिनर नीं करर चारणां नैं शरण जागा अर सुरक्षा दीनी तो दूजा अखोजी बारठ, जिणां जात हित में सर्वस्व त्याग मरण सूं अनुराग कियो। दोयां नैं ई म्हारा प्रणाम।

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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