आवड़ आराधना रो गीत

।।दूहो।।
मुद्राल़ी मामड़सधू, रिछपाल़ी वड रीत।
विमल़ सुजस रच वाचियो, गुणी त्रिकुटबंध गीत।।

।।गीत त्रिकुटबंध।।
अनुपम्म तन धिन आवड़ा,
महि अवतरी घर मामड़ा,
भावड़ा सुधमन देख भगती, सगत रूपां सात।
जयो सगत जूनी जोगणी,
भल जगत ख्यातां तो भणी
विपत मचियण पात वचियण।
गुणण रचियण गीत गुणियण।
जणण जपियण सयल़ जण जण।
करत कवियण साद सुणियण।
संकट भंजियण बहै सचियण।
सजण आसण सिघ सोहण।
चढण जोगण चसण चखियण।
करण अरियण कोप कण कण। हितू सिर रख हाथ।। १

रंग अन्नडां सिर राजणी,
वल़ उणी नामां वाजणी
अग्राजणी भू ऊपरै तूं,निसाचर कर नास।
त्रिशूल़ ज्यां सिर तोखिया,
सज क्रोध रगतस सोखिया
नजर अणडर पसर निसचर।
सधर गिरवर जचर जिण सिर।
कंदर अंदर वसर घर कर।
विकट तरवर विचर वनचर।
डगर नर वर तजी डरफर।
बिखर इण डर माड़ वसुधर।
निडर बल़ पण उतर नग पर।
पटक पामर किया पाधर। दुनी हरसत दास।। २

भल तोय गिरवर भावणा,
रंग रूप ज्यां रल़ियावणा
सरसावणा हद जिकै सोहै,रमै जिथियै रास।
भल बजै बाजा भांतरा,
सुर लगै ज्यां हद सांतरा
हुय हाक हमहम गूंज गिरियम।
झूल़ जमजम नाच नचियम।
घमघमत त्रबंक वजै घमघम।
ढमढमत ढोलां बोल ढमढम।
डमडमत डमरू नाद डमडम।
थमथमत फणधर लुल़ै थमथम।
रमरमत आयल रमै रमरम।
नमनमत सुरनर नमै नमनम। ईसरी आवास।। ३

जग वरण जामण जानवी,
महि मुणै जस रस मानवी
वर दैण ज्यां तूं वाहर,जगत जाहर जेम।
थिर भूप अवनी थापिया,
सतहीण रूठी सापिया
सतहत सूमर अपत स्रापत।
समा अतसत कियत असपत।
थपत महिपत माड़ थिरपत।
तणु विजपत हत्थ दे तखत।
छतपत धारत दत तो छत।
प्रणमत जादम पा प्रभत।
कथ वात मत कुण सकै कथ।
अहिपत थाकत ज्यां अखत। कवी पूगै केम।।४

पह सरण तुझरी पावड़ा,
मुझ सांभ हेलो मावड़ा
आवड़ा झट वेल़ आवै,धणी भीरत धार।
भल भाव छोरू भावड़ा,
तुंही मेट संकट तावड़ा
बिखम बणियण बाखलो भण।
अगन धुखियण नांख अरियण।
झल़ तन जल़ियण चख झरियण।
अवर कुणियण बगत न अण।
कपण दोयण काज करियण।
सरण असरण धरण संतजण।
ताप मिटयण नाम तुझ तण।
तरण तारण आच तणियण। काढ बाखल बार।।५

भांण भल़हल़ रोकियो भल,
गांन गुणियण ऊचरै गल
अनुज हित चित गई अहिपुर,सुधा लेयण साथ।
लंगड़ी जद विरद लीधो,
काज अदभुत धरा कीधो
सचर फणधर डसै सहुदर।
हंस नीसर पूग घर हर।
झट खबर उणवर ली जबर।
दिनकर प्रखर मत भर डगर।
जप अगर जोगण ओ जिकर।
तण तिमिरहर कर कर तकर।
वल़ गिनर नह धर छायवर।
दिढ पसर कर रवि ढक डकर। वसु चावी बात।।६

कुटल़ उदधी वाद कीनो,
दधी नह झट माग दीधो
पह हथाल़ी घाल पीधो,अजै धर ऐनाण।
जठर मे दरियाव जार्यो,
महण रो हद मांण मार्यो
वाट मत कट उदध युं बट।
जटाल़ी तट कयो झटपट।
वीर भट दे आगल़ी वट।
कुवट मत बह त्याग कुल़वट।
दध नकट खटपट कीध दट।
मरट रख नट गयो मगवट।
घण अघट उमट रीस युं घट।
पी गई गटगट जल़ प्रगट आवड़ा आपांण।।७

दासुड़ी थांनग तुंह देवी,
सदा मुरधर माड़ सेवी
जग अजेवी जामणी तूं,राज मोटी रीत।
हेतवां दुरमत्त हरणी,
वल़ू कल़जुग तोय वरणी
बल़ बीसहथ जस तो विमल़।
तद सकल़ खल़ भग जाय टल़।
मनै अणकल़ आज महियल़।
चरित कुल़छल़ किया चहुंवल़।
स़पत परघल़ नको रै सल़।
सबल़ सह सिर विदग वच्छल़।
आप अतकल नाम निरमल़।
पढै अवचल़ विघन परजल़ गीध कथियो गीत।।८

दूहो
सँकट टल़ै सुख अहर निस, सैण मिल़ै शुभचीत।
मनसुध पढियो मातरो, गिरधर रतनू गीत।।

~~गिरधर दान रतनू “दासोड़ी”

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