आवड मां रा रास रमण रे भाव रा दुरमिल सवैया

।।दोहा।।
माडेची उछरंग मंडै, सझि पोशाक सुढाळ।
बोलत सह जय जय विमळ, बाजत राग विशाळ॥ 1 ॥

।।छंद – दुरमिला।।
बहु राग बिलावल बाजहि विम्मळ राग सु प्रघ्घळ वेणु बजै।
मिरदंग त्रमागळ भेरिय भूंगळ गोमस सब्बळ वोम गजै।
बहु थाट बळोबळ होय हळोबळ धुजि सको यळ पाय धमै।
शिणगार सझै मुख हास सुशोभित रास गिरव्वर राय रमै॥ 1 ॥

घण बज्जत घुंघर पाय अपंपर लाखूं ही दद्दर पाय लजै।
घण मंडळ घूघर बास पटंबर बोलत अम्मर मोद बिजै।
अति बासव अंतर धूजि धरा जोगण जब्बर खेल जमै।
शिणगार सझै मुख हास सुशोभित रास गिरव्वर राय रमै॥ 2॥

कडियां कटि मेखळ उज्जळ ओप सु दोळ दधि जळ भोम दिपै।
अति रुप असंकळ शोभत सक्कळ तेज भळाहळ भांण तपै।
बण जोत बळोबळ वाच सु विम्मळ भैरव सब्बळ साथ भ्रमै।
शिणगार सझै मुख हास सुशोभित रास गिरव्वर राय रमै॥ 3॥

भुज चूड बिहू कर शोभित सुध्धर कांति चमंकत सूर कळा।
सर माणिक नौसरु हार शुशोभित ओप महावर सो उजळा।
सुर शंकर आदि प्रणाम करै सह साझत सुत्थरु मोद समै।
शिणगार सझै मुख हास सुशोभित रास गिरव्वर राय रमै॥ 4 ॥

जुग राजत कुंडळ कांन नगां जुत शोभ सु लाजत मीन सही।
शशि पास विराजत सूर उभै तसि तीख सी राजत राज तही।
बहु बाजत दुंदुभि फूल बरख्खत दैत समा जत खाग दमै।
शिणगार सझै मुख हास सुशोभित रास गिरव्वर राय रमै॥ 5 ॥

नक बेसर कुंडळ घाट वळै निज शोभित घाट सुघाट सरै।
मधि अंबुज रुप विराट अमोलख क्रीत महीं शशि थाट करै।
महकै बहु माट सुबास सुधामय बाट छिडक्कत कुंम्म कुमै।
शिणगार सझै मुख हास सुशोभित रास गिरव्वर राय रमै॥ 6॥

बणि भाल तिलक्क विशाल महावर जोति दिपै जिण जोत जई।
खट मेक बहन्न घणूं घण खेलत मोद महा जिण चित्त दई।
अलकां जुग शीश ज बेणि अदभ्मुत नागणि चप्पळ जेम नमै।
शिणगार सझै मुख हास सुशोभित रास गिरव्वर राय रमै॥ 7॥

~~कवी का नाम अज्ञात (यदि किसी को जानकारी हो तो कृपया admin@charans.org पर सूचित करें या कमेन्ट में लिखें)

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