आवड़ वन्दना – जोगीदान जी कविया सेवापुरा

।।छन्द नाराच।।
सुचित्त नित्त प्रत्ति व्है शिवा सकत्ति सम्भरै
सुधर्म कर्म ज्ञान ध्यान मर्म खोजते फिरै
तमाम रात दीह जाम नाम ले बितात है
सुपात मात आवड़ा जगत्त में विख्यात है।१।

बहन्न सात एक साथ व्योम पाथ ऊतरी
अछेह नेह देह मामड़ा सुगेह में धरी
कथा अशेष देश देश में विशेष गात है
सुपात मात आवड़ा जगत्त में विख्यात है।२।

असाध्य आधि व्याधियाँ उपाधियाँ उड़ाहई
कली कराल काल की कुचाल को छुड़ा दई
महान ज्योतिवान थान तेमड़ा सुहात है
सुपात मात आवड़ा जगत्त में विख्यात है ।३।

कनिष्ठ भ्रात गात पै कुघात सर्प घालियो
निदान प्रान हानि जान भानु छीर छालियो
सुधा प्रभात पूर्व स्वर्ग जात ला पिलात है
सुपात मात आवड़ा जगत्त मे विख्यात है।४।

विदारि सृष्टि तेमड़ो अरिष्ट सृष्टि को हर्यो
अपार भूमि भार को उतार दूर तें कर्यो
अरिन्द फन्द मेटके स्वच्छन्द तू लखात है
सुपात मात आवड़ा जगत्त में विख्यात है।५।

पदारविन्द पै मलिन्द भक्त वृन्द मोहते
उद्योत जोत प्रेम श्रोत मग्न होत जोहते
विपत्ति काल में तुहीज तात मात भ्रात है
सुपात मात आवड़ा जगत्त में विख्यात है।६।

अथाह सिन्धु हाकड़ो उमाह राह रोकियो
विलम्ब अम्ब त्यागि कै समस्त अम्बु सोखियो
विहीन नीर क्षीन हीन आज लों दिखात है
सुपात मात आवड़ा जगत्त मे विख्यात है।७।

मया विचार के दया मया अवश्य कीजिये
अज्ञान जोगीदान को महान ज्ञान दीजिये
भवा तने मुरारि को तनै विनय सुनात है
सुपात मात आवड़ा जगत्त में विख्यात है।८।

~~श्री जोगीदान जी कविया सेवापुरा कृत

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