आखर दे मुझ मात अमामी

adishakti

।।दूहा।।
जग जणणी सुणजै जरू, सुज हेलो सुरराय।
ऊजल़ गेलो आवड़ा, मुदै बताजै माय।।

पूजा विध परमेसरी, सगत न जाणूं साव।
अरपूं केवल़ आपनै, भगवती मन्न भाव।।

आखर उकती ओपती, मूझ व्रवो महमाय।
कालै-मन तव कीरती, सहज अखूं सुरराय।।

जड़त घड़त री जोड़-कल़, है ज नको मुझ हाथ।
उकल्या आखर आपनै, मन शुद्ध समपूं मात।।

।।छंद।।
वरदा रूप कवि मुख वाणी।
जुगत उगत सगल़ै जग जाणी।
अनड़ां शिखर तुंही उमँगाणी।
छिती तरां पत छाया छाणी।।

आखर दे मुझ मात अमामी।
सहज समापै सदबुद्ध सामी।
भगवती त्रिलोक ही भामी।
निरमल़ सुजस पढै जग नामी।।

चाढ्या चकर चंडादिक मुंडा।
खल़ दल़ किया किता रण खंडा।
नवल़ सुजस पसर्यो नवखंडा।
जय जय कीध सुरां तल़ झंडा।।

अवनी निरभै कीधी अंबा।
थिर असमान कियो बिन थंभा।
सकड़ं दल़िया शंभ-निशंभा।
जगत जपी जय-जय जगतंबा।।

कितरा काज किया करुणाल़ी।
नितप्रत नेह निजर नेजाल़ी।
खीजी खल़ां खार खांडाल़ी।
दल़िया दैत दा’ड़ दाढाल़ी।।

मेखासुर मार्यो महमाई।
अमरां भीर अग्राजत आई।
गयण धरा गूंजी गणणाई।
सबल़ा सगत किया सरणाई।।

ब्रह्मा गा गुण वेद वचेरो।
रुचिर रमापति राग रचेरो।
सिव सनकादिक आप सचेरो।
नारद निरखी माण नचेरो।।

देवी वडा निसाचर दंडी
खपराल़ी खुसटां खग खंडी।
चाड सुणी अमरां री चंडी।
मया राख मघवा नैं मंडी।।

सिव रै साथ सदा सुरराई।
जोगण कंदरां जोग जगाई।
रास गिरां सुखदात रचाई।
रंग धर भोल़ो नाथ रीझाई।।

गिरा गरिमा शिव पद गामण।
रोल़वियो सीता बण रामण।
सलिला रूप उमंगती सामण।
दहै कड़ाका नभ में दामण।।

मानवलोक रची ऐ माया।
चारण विमल़ ऐम कुल़ चाया।
सदन जेण प्रगटी सुरराया।
हेर हियै हेतव हरसाया।।

बुद्धबल़ मात दीवी तैं वाणी।
अनुपम उगत उरां उपजाणी।
जुगत जिकै बल़ तोनै जाणी।
अडग भरोसो अंतस आणी।।

हिव पिछमाण धरा हिंगल़ाजा।
राज! सगतियां सबरी राजा।
कीरप कर कीधा कव काजा।
सरस मनां रखणी तन साजा।

मही ऊपर खूबड़ माधाई।
इल़ पर रूप तिहाल़ो आई।
रढियाल़ी जगड़ू रीसाई।
पूत लेय वानो पल़टाई।।

खूबड़ बणै भीर पुल़ खोटी।
कीरत कंठ जपै नर कोटी।
माधाई महमा इम मोटी।
रीझ जिमावै दूधा रोटी।।

दया कीध मामड़ पर दाता।
सगत रूप धरिया तन साता।
रोल़विया राकस चख राता।
मनरँगथल़ रमणी नित माता।।

गलवै मधुर धोरड़ियां गाती।
जोगण जाहर रात जगाती।
मनरंगथल़ बैठी मदमाती।
चाल़कियो मार्यो चढ छाती।।

जंग विकट नाहर अग झोखै।
रढियाल़ी सूरज नभ रोकै।
समंद अताल़ी अंजल़ी सोखै।
पड़ियां चरण शरण ले पोखै।।

गिरां जेथ राजै गिरराणी।
धोरां पर राजी धणियाणी।
मगरां डगरां आणद माणी।
जोगण सकै कूण तो जाणी।।

सोभा नगां तुंही साचाणी।
रसा मगरियां तो रल़ियाणी।
कर कर कोड रमै किलकाणी।
भिल़ दल़ साथ रमै सत भाणी।।

बोरड़ियां बैठी विरदाल़ी।
जामण थल़ री जाल़ी-जाल़ी।
टूल़ां री तूं टाल़ी-टाली।
खमा थान थपियो खोखाल़ी।।

भाव तुंही भगतां रा भाल़ै।
रीझ जिकां घर आणद राल़ै।
प्रीत जुगादी अजतक पाल़ै।
गुण दे,घट रा ओगण गाल़ै।।

बोछरड़ा बाल़क बण जावै।
पामर बै मन मांय पोमावै।
अंतस नह तुंह रीस अणावै।
अमणा जाण सदा अपणावै।।

कर हठ बाल़ जचै ज्यूं कै दे।
सायल़ सुण सुरराई सै दे।
देख दुरस दिल,चायो दे दे।
छल़ियां रा तूं काल़ज छैदे।।

गुण हद गाय गया मुनी ग्याना।
धुर तो जोत लगायर ध्याना।
दाख गया कवि कितरा दाना।
छिती चरित रहिया सब छाना।।

विसर मती हे मामड़-बाया।
गिरधर कहै संभल़ गिरराया।
जोगण नमो तनै जगराया।
काट विघन रख साजी काया।।

भू धिन माड देवल भलियाई।
साख संढायच सगत सवाई।
उदर वीरां रै हिंगल़ा आई।
परवाड़ा प्रभता पसराई।।

धाट सुरंगी तुंही धजाल़ी।
खारोड़ै बैठी खांडाल़ी।
असुर विरम नैं दियो उथाल़ी।
वीसो नृप थपियो विरदाल़ी।।

ईहग जो जो चूंथण आया।
भगवती वांनै भूंचाया।
छत्राल़ी नेसां की छाया।
उर सिहरन धूतां उपजाया।।

थल़वट में थानग हद थाई।
गढवाड़ां प्रभता गोराई।
मेहाजल़ मार्यो महमाई।
मरजादा पातां थप माई।।

जयो जयो सूरमदे जरणी।
हाथां दरद जोध रो हरणी।
भूपत रै उत्साह उर भरणी।
धरपत दी चांचल़वै धरणी।।

ग्यान ध्यान बिन तव गुण गाता।
नितप्रत पाल़ बाल़का नाता।
दास गीधियो दाखै दाता।
म्हारी शरम राखजै माता।।

आई मुझ घर करै अनंदू।
दया धार मेटे दुख द्वंदू।
बीसहथी पगला तो वंदू।
चरण आसरो दीजै चंदू।।

जपै सुजस गिरधर कर जोड़ी।
देवी जांगल़ तूं दासोड़ी।
कीरत कज कीधा धर कोड़ी।
वैरी दल़ विदगां रा बोड़ी।

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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