आखिर राख हुवै फुररै

bhakti

भजरै रघुनाथ मनां दिन रात रु
कूड़ कपट्ट सदा तजरै।
लजरै बकवाद विवाद करै नित
नेक नहीं तुझ ओ कजरै।
सजरै परमारथ को करबा धुर
छांनरु नेह तणी छजरै।
नजरै कवि गीध करै जग रु मग
ओट गहै हरि की धजरै।।१

कररै हरि जाप रिदै निस वासर
आसर एक थिरू घररै।
धररै डग नीत तणी धर ऊपर
नाय अनीतन में फिररै।
दुररै कर धूरत मूरत को झट
भाव भला घट में भररै।
नररै सुण गीध कहै सत सांभल़
आखिर राख हुवै फुररै।।२

भणरै भगवान तुं मान कयो नर
सार सँसार कहै तणरै।
खणरै मन झाल तु एक सदा द्रिढ
बेज मती उलटा बुणरै।
छणरै-छणरै तन जाय रयो नित
जोबन ओ छिणरै-छिणरै।
सुणरै कवि गीध अचेतन को तज
नाम रिदै हरि को पुणरै।।३

किण कारण जाल़ पँपाल़ रचै घण
एक नहीं थिर को सथरै।
जतरै निज मान रयो मन मूरख
पेख वही ठग है अतरै।
बतरै इक सार भर्यो सब ग्रंथन
राम सलाम हुवो नतरै।
कथरै कवि गीध कहै मनकूं मन
खोय समै विरथा मतरै।।।४

रटरै रघुनाथ अहो दिन रातरु
भूल मती सुणरै झटरै।
सठरै भरमाय रह्यो किण कारण
चूक रह्यो सत री वटरै।
घटरै घड़ खोट मती तिल सांप्रत
ओट ढहै इल़ रा चटरै।
फटरै कवि गीध कहै सुण सावल़
नीतर जूत लगै जटरै।।५

थमरै गल सांभल़ सैण जरा सत
नैणन त्याग भर्यो तमरै।
खमरै-खमरै खल़ देख दुनी नित
बात पुराणन री गमरै।
दमरै-दमरै भण नाथजु कीरत
फेर भलां निरभै रमरै।
समरै कवि गीध सदा सरणागत
दूर हुवै जिण सूं जमरै।।६

गलरै इण भांत सुणी नित जीवण
कीरत काज करो भलरै।
कलरै विश्वास रि आस नहीं तिल
आज अबार पलो झलरै।
हलरै-फलरै सब छोड मना सुण
मोत रि मार मरै मल्लरै।
ललरै कवि गीध लगै इण बातन
ओट सदा हरि री झलरै।।७

धनरै-धनरै ! नित कूक मती सठ
जाय रिया गिणिया दिनरै।
तनरै सिंणगार हुवो मगरूररु
भोग में लाग रियो मनरै।
भनरै-भनरै भगवान नु जाहर
जोर कहै हरि रा जनरै।
खनरै कवि गीध नहीं निकसै गल
नाय करै जद ही कनरै।।८

मन भावण बात करै नित मूरख
नाम नहीं प्रभु गावण नै।
मुख सावण स्वाद चखै नवला नित
भोज छत्तीसुंय खावण नै।
मन चावण रोज बधै बिन मातर
नीत सँगीत नचावण नै।
थिर ठावण ठौड़ खसै कवि गीधरु
भूल गयो अग जावण नै।।९

~~गिरधर दान रतनू “दासोड़ी”

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