अम्बुद

उर में सुख उपजाए अम्बुद
अमृत-जल बरसाए अम्बुद
वसुधा की सुन अरज गरज कर,
उमड़-घुमड़ कर आए अम्बुद।

सूरज की निर्दयता लख कर
कहती धरती बिलख बिलख कर
सोया कहाँ अरे ओ सुखकर
धरती का सुन राग भाग कर,
छोड़ गगन छिति धाए अम्बुद।

बजा दुंदभी बोला जलधर
सुन ले आतप कान खोल कर
हिम्मत है तो आजा बाहर
ऊंचे स्वर में देय चुनौती,
घरर घरर घर्राए अम्बुद।
अमृत जल बरसाए अम्बुद।

हेत-हलों से खेत बुवाई
धीज धरा सुख-बीज उगाई
कृषकों के मन उमंग न माई
प्रिया पियारी पृथ्वी के हित,
हरियल धानी लाए अम्बुद।

इस अम्बुद का आना अद्भुत
वसुधा का सरसाना अद्भुत
कण-कण का हरसाना अद्भुत
दुःखनाशक सुखकारक सच्चा,
जन-जन के मन भाए अम्बुद
अमृत-जल बरसाए अम्बुद।

हरखे बाग उमंगित उपवन
जग ने जैसे पाया जीवन
मानो जड़ भी हो गए चेतन
नग नाचे घाटी मुस्काए
अचला शगुन मनाए अम्बुद
अमृत जल बरसाए अम्बुद।

निमिष मात्र में बदल नज़ारा
पल में सबका ठंडा पारा
जबरदस्त है जादूगारा
पत्ती-पत्ती को पुलकाए,
जाहर रँग जमाए अम्बुद
अमृत-जल बरसाए अम्बुद।

अब तक जो मुरझे-मुरझे थे
तन-मन जिनके बुझे-बुझे थे
पल में वो सब सजे-धजे से
सीधी दिल पे दस्तक देती
ऐसी राग सुनाए अम्बुद
अमृत जल बरसाए अम्बुद।

~~डॉ. गजादान चारण “शक्तिसुत”

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