अपभ्रंश साहित्य में वीररस रा व्हाला दाखला

आचार्य हेमचंद्र आपरी व्याकरण पोथी में अपभ्रंश रा मोकळा दूहा दाखलै सरूप दिया है। आं दूहाँ में वीर रस रा व्हाला दाखला पाठक नै बरबस बाँधण री खिमता राखै।आँ दूहाँ रो सबसूं उटीपो पख है -पत्नियां रो गरब। आपरै पतियां रै वीरत री कीरत रा कसीदा काढ़ती अै सहज गरबीली वीरबानियां दर्पभरी इसी-इसी उकतियां री जुगत जचावै कै पाठक अेक-अेक उकत पर पोमीजण लागै। ओ इसो निकेवळो काव्य है, जिणमें मुरदां में नया प्राण फूंकण री खिमता है।

आप-आपरै वीर जोधार पतियां री बधतायां गिणावती वीरबानियां में सूं अेक बोलै-“हे सखी! म्हारो सायबो इण भांत रो सूरमो है कै जद बो आपरै दळ नैं टूटतो अर बैरी-दळ नैं आगै बढतो देखै तो चौगणै उछाह रै साथै उणरी तलवार तण उठै अर निरासा रै अंधकार नैं चीरती ससीरेख दाईं पिसणां रा प्राण हर हरख मनावै-
भग्गिउ देक्खिवि निअअ वलु, वलु पसरिअउ परस्सु।
उम्मिल्लइ ससिरेह जिंव, करि करवालु पियस्सु।।

देख-देख! म्हारो बालम बो है, लोग जिणरी सैंकड़ां संग्रामां में दिखायोड़ी वीरता रा वारणा लेवै अर बध-बध बखाण करै। देख वो किण भांत आंकस सूं छूटेड़ा मतवाळा हाथियां री विसाळ सूंडां नैं आपरी तीखी तलवार रै प्रहार सूं बाढतो आगै बधै-
संगर सएहिं जु वण्णिअइ, देक्खु अम्हारा कंतु।
अहिमतहं चत्तंकुसहं, गयकुंभइं दारंतु।।

हे सखी सुण! म्हारो रणरसियो समहर रो इसो फुरतीलो खिलाड़ी है कै अणगिण वीरां री उण घणघोर-घटा मांय सूं आपरो मारग निकाळ ल्यै, जठै बाण सूं बाण टकरावै अर कटै, रीठ सूं रीठ भिड़ै अर छीजै। इयांकली भयंकर रण-कांठळ में वो जंगी-जोधो आपरो मारग बणा लेवै-
जहिं कप्पिजइ सरिण सर, छिज्जइ खग्गिण खग्गु।
तहिं तेहइ भड़ घड़ निवहि, कंतु प्यासइ मग्गु।।

अरे भला माणस! जे थूं मोटै मिनखां रा मोटा महलां री पूछै तो देख, बै मोटा महल सामी ऊभा है। पण जे थूं इस्यै महान मिनख रो घर पूछै, जिको सांसै रा सतायोड़ा लोगां नैं सौरी-सांसां बगसावण री खिमता राखै तो देख, बा झूंपड़ी, जिणमें म्हारो कोडीलो कंत बसै-
जइ पुच्छइ घर बड्डइ, तो बड्डा घर ओइ।
बिहलिअजण-अब्भुद्धरणु, कंतु कुडीरइ जोइ।।

अरे अै म्हारी व्हाली भायली! थूं उणरी (म्हारै भरतार री) सूर-वीरता अर वदान्यता री इतरी कांई बडाई करण लाग गी। बेरथी बकवाद मत कर। म्हैं चोखी तरियां जाणूं कै म्हारै मोट्यार में दो मोटा औगण है- वो दान देवण लागै तो ख़ज़ानै नैं थल्लै ताणी उळींच देवै पण छेवट म्हनैं बचा’र राख लेवै। इयांई जद झगड़ै में जूझै तो सौक्यूं दांव पर लगा देवै पण आपरी समसीर नैं सलामत बचा लेवै। किणी पण वीर अर दानी सारू ‘बचावणो’ तो दोष मानीज्यो है। बचावणो कंजूस रो लखण है। हे सखी थूं इस्यै कंजूस री बडाई करै, ओ सब झूठ है, फगत झूठ-
महु कंतहु बे दोसड़ा, हेल्लि म झंखहि आलु।
देन्तहो हउं प उब्बारिअ, जुज्झन्तहो करवालु।।

कुंवारी कन्या गौरी सूं अरदास करै- हे गौरी! इण जलम अर आगलै जलमां में हर बार म्हनैं इसड़ो वर दीजे, जको आंकस तोड़ उतपात करता मतवाळा हाथियां सूं हंसतो-हंसतो भिड़ जावै-
आएहिं जम्मेंहिं अन्नेहिं वि, गवरि सु दिज्जइ कंतु।
गयमत्तच्चत्तंकुसहं जो, अब्भिडइ हसंतु।।

किणी पिसण-पखी सूरमै री बडाई सुण’र वीरबाळा री आ आंटिली उकत देखो- जद ताणी कुंभतट पर केहर री चपेट वाळी चाटक नीं पड़ै, उण टेम ताणी आं मतवाळा गजां रै पग-पग पर ढोल बाजै-
जाम न निबडइ कुंभयडि, सीह चवेड चडक्क।
ताम समत्तहं मयगलहं, पइ पइ बज्जइ ढक्क।।

जिणरै पगां में बैरी-दळ रै जोधारां री आंतड़ियां उळझेड़ी है, खुद रो माथो कट’र कांधै सूं झूलै, तो ई हाथ कटारी पर जमेड़ो है, इसड़ै आंटीलै कंत पर व्हाली धण वारी जावै-
पाइ विल्लगी अंतड़ी, सिरु ल्हसिअउं खन्धस्सु।
तो वि कडारइ हत्थडउ, बलि किज्जउं कंत्तस्सु।।

दुसमणां री सेना सूं चौफेर घिरियोड़ो आहंस वाळो ओनाड़ उर में ऊफण भरतो आपरै मन नैं धीज बंधावतो बोलै- अरे ओ हिड़दा! सुण, जे बैरी बोहळा है तो कोई आभै में का बादळां पर थोड़ोई चढूं? म्हारै ई दो सावजोग हाथ है। आं कळाइयां में कोई चूड़ियां थोड़ी ई पैरेड़ी है। जे मरणो है तो मोकळां नैं मार’र मरूंला-
हिअडा जइ वेरिअ घणा, तो किं अब्भि चडाहुं।
अम्हाहिं वि बे हत्थड़ा, जइ पुणु मारि मराहुं।।

सिणगार अर सूरता रो ओ विरळो लोक है। अठै डर अर आशंका सारू कोई ठौड़ नीं है। भविस री बाट पर बुहार-बुहार पग मेलणियां री पदचाप अठै नीं सुणीजै। इसै पूत रै पैदा होवण सूं कांई लाभ अर जे मर जावै तो कुणसो घाटो, जिणरै जीवतां थकां उणरै बाप री जमीन दूजा भोगै-
पुत्ते जाए कवणु गुणु, अवगुणु कवणु मुवेणु।
जा बप्पीड़ी भूंहड़ी, चंपिज्जइ अवरेण।।

आं दूहां में सिणगार अर वीर रस रै साथै-साथै नीति रा दूहा ई मोकळा है। परवरती साहित में आं सगळै अंगां रो सावळसर विगसाव होयो निगै आवै। परवरती साहित रै अध्ययन सारू ओ घणो महताऊ आधार मानीजै। अपभ्रंश में जठै अेकै छेड़ै लौकिक रस रा सहज अर सरल दूहां रो सिरजण होवै हो, बठै ई दूजी कानीं बीजै छंदां री सिरजणा ई सतत रूप सूं जारी ही। जैन कवियां आपरै अणगिण काव्यां में बडा-बडा छंदां रो प्रयोग कियो है। मुख्यतः वै कडबक-बद्ध होया करै। कडबक अपभ्रंश रै काव्य-रूपां रो पारिभाषिक सबद है। पज्झटिका, पद्धड़िया आद छंदां री कीं ओळियां लिख’र बाद में धत्ता, उल्लाला आद छंद लिखीजता, जका ब्होत कुछ तुलसी अर जायसी री चौपाई अर दूहां रो जूनो रूप है। इणनैं पद्धड़िया-बंध पण कहीजै। स्वयंभू अपभ्रंश रा जूना कवि चउम्मुह (चतुर्मुख) नैं पद्धड़िया-बंध रो राजा बतायो है। वां मोकळी श्रद्धा अर विनम्रता साथै इण बात नैं अंगेजी है कै वांनैं पद्धड़िया-बंध री प्रेरणा चउम्मुह सूं ई मिली है। होळै-होळै अपभ्रंश में रोला, उल्लाला, वीर, काव्य, छप्पय, कुंडलिया, रासक आद बडा-बडा छंद पण प्रचलित होया। वै ई उतरा ई सरस बणग्या, जितरा कै दूहा। अब्दुल रहमान रै संदेशरासक मांय अनेक भांत रा छंदां रो ब्होत सोवणो प्रयोग होयो है। ‘प्राकृत पैंगलम’ में कई कवियां रा मोकळा मनोहारी छंद दाखलै रूप दियोड़ा है। ‘प्राकृत पैंगलम’ में बब्बर, जज्जल, बिज्जाहर (विद्याधर) आद कई कवियां रा नाम ई मिल जावै। वांरी वीर अर सिणगार रस री कवितावां ब्होत ई ऊंची कोटी री है। काशी-कान्यकुब्ज रै महाराजा जयित्रचंद (जयचंद) री वीरता बतावण वाळी आ कविता कितरी उत्साहवर्द्धक है, जको डिंगळ रै त्रिभंगी छंद रो सावजोग दाखलो सो लागै-

भअ भज्जिअ वंगा भग्गु कलिंगा, तेलंगा रण मुक्कि चले।
मरहट्ठा ढिट्ठा लग्गिअ कट्ठा, सोरट्ठा भअपाअ पले।
चंपारण कंपा पव्वय झंपा, ओत्था ओत्थी जीव हरे।
कासीसर राणा कियउ पआणा, विज्जाहर भण मंतिवरे।

जज्जल री अै उल्लेखणजोग ओळियां ‘प्राकृतपैंगलम’ सूं ई उतारेड़ी है-(छप्पय छंद)

पिंधउ दिढ संणाह, वाह उप्पर पक्खर दइ।
बंधु समदि रण धसउ, सामि हम्मीर वअण लइ।
उड्डल णह पंह भमउ, रिउ सीसहि डारउ।
पक्खर पक्खर ठेल्लि, पेल्लि पव्वअ अप्फालउ।
हम्मीर कज्ज जज्जल भणइ, कोहाणल मुंह मह जलउ।
सुरताण सीस करवइ जलइ, दतेजि कलेवर दिअ चलउ।।

इण भांत और ई मोकळा दाखला दिया जा सकै पण दाखलां री संख्या बधावण में कोई लाभ कोनी। सौ मण धान री मुट्ठीभर बानगी दाईं ऊपर गिणायोड़ा छंद इण बात री पुख्ताऊ सूचना देवै कै किणी समैं में अपभ्रंश भासा में ब्होत ई उटीपै दरजै रो साहित उपलब्ध हो।

(प्रकाशनाधीन पोथी “उजास-उच्छब” सूं)

~~डॉ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’

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