अपभ्रंश साहित्य रो सिणगार वर्णन

सिणगार तो हर भाषा रै लिखारां रो प्रिय विषै रैयो है। अपभ्रंश साहित्य रा थोड़ाक सिणगार रस प्रधान दूहा आप विद्वानां रै सामी प्रस्तुत है। अपभ्रंश भाषा में मोकळा पण्डित कवि होया है पण जिण दूहां री चरचा आगै होवणी है, वै इण भांत रै पंडितां रा लिखेड़ा नीं लागै। हां हो सकै कै आं दूहां रा लिखारा पारंगत पंडित हा पण दूहां रै सिरजण रै समै वै पंडिताई सूं ब्होत ऊपर उठेड़ा हा। सहज भाव ब्होत कठोर साधना सूं मिलै। कीं दाखलां सूं बात स्पष्ट होवैला।

अेक विरह-व्याकुळ प्रिया कैवै कै “जियां-कियां ई जे मैं म्हारै प्रिय नैं पा लेवती तो अेक इसो खेल रचती, जिसो आज लग नीं रचिजियो। प्राणपीव रै रूं-रूं में इयां रम जावती जियां माटी रै नयै सिकोरै में पाणी पैठ जावै अर उणरै अंग-प्रत्यांग नैं भीनो कर जावै“-
जइ केबइं पावीस पिउ, अकिआ कुड्डु करीसु।
पाणिउ नवइ सरावि जिबं, सब्बंगे पइसीसु।।

प्रेम में परबस हुई वधू कैवै- हे मां! जद मन साजो होवै तो माण री सुध लीरीजै। अठै तो बात ई बीजी है। मैं जियां ई पीव नैं देखूं, इसी हड़बड़ी माचै जिणमें मैं आपो बिसर जावूं। तूं ई बता इसी हालत में स्याणी अर सलोनी सूझ-बूझ नैं कुण चितारै! सगळी सोच-समझ किनारो करती निगै आवै-
अम्मीउ सत्थावत्थहिं, सुधिं चिंतिज्जइ माणु।
पिउ दिट्ठे हल्लोहलण, को चेअइ अप्पाणु।।

प्यारी धण सूं रूसणो करण वाळै बींद नैं समझावतां उणरी स्याणी परणेतण कैवै- हे ढोला! मैं थनैं बोहळी बार बरज्योे है कै आपोसरी रो रूसणो घणी ताळ नीं राखणो। हे करुणाहीण कंत! इण रूसण-मनावण री बेरथी बातां में सोवणी रात तो बिना बात बीत जासी अर दड़बड़तो दिन ऊग जासी-
ढोल्ला मइं तुहुं बारिआ, मा कुरु दीहा माण।
निद्दए गमिही रत्तड़ी, दड़बड़ होइ विहाणु।।

अेक स्याणी सखी बांकै चितवण वाळी आपरी जोबन-छकी सौणी साथण सूं मसको मारती मसखरी करै कै “बाला! मैं थनैं कितरी बार समझाई है कै थूं थारी इण दीठ नैं बांकी मत किया कर। जियां कानवाळी बरछी सामलै रै हिवड़ै में जोराजोरी बड़ै अर उणरा आंतड़ा-ओझरा बारै ल्या पटकै बियां ई थारा अै बांका चितवण सीधा सामलै रै काळजै में कोचरा करै-
बिट्टिय मइं भणिय तुहुं, मा कुरु बंकी दिट्ठि।
पुत्ति सकण्णी भाल्लि जिवं, मारइ हियइ पइट्ठि।।

कवि बांकै चितवण रै तीखैपण नैं इण भांत बखाणै- जियां-जियां वा सांवळी सलोणी आपरै बांकै नैणां नैं नचावणो सिखावै, बियां-बियां रूप रो राजा मन्मथ यानी कामदेव आपरै बाणां नैं खरै पत्थरां पर घिस-घिस’र तीखा कर लेवै। (अै बाण फूलां रा नीं होय लोह रा होवैला)
जिबँ-जिबँ बँकिम लोअणहं, णिरु सामलि सिक्खेइ।
तिबँ-तिबँ बम्महु णिअअ-सरु, खरि पत्थरि तिक्खेइ।।

विरहण ग्राम-वधू रो अब काग उडाय सूण मनावण सूं मन फाटग्यो। क्यूंकै इण कागै री कांव-कांव सुणतां-सुणतां विजोगण रा कान पाकग्या पण उणरो पीव घरै नीं आयो। पछै ई ओ बडबोलो बायसियो बोलतो ई जावै! बोलतो ई जावै! इण कूड़ै कागलै नैं वा विजोगण हाथ रै फटकारै सूं उडावणो चावै। विरह री पीड़ सूं पतळी पड़ी धण री दूबळी कळाइयां सूं झटको लागतां चूड़ी छंटै अर धरती माथै गिर पड़ै। पण इण बीच कागै री बोली फळै, सुगन साचा होवै अर अचाणचकै ई विरह में झुलसती व्हाली धण नैं आपरो मनमेळू कंतो आंगणै बड़तो दीखै। धण री आधी चुड़ियां तो पैली ई धरती माथै पड़गी ही पण अचाणचकै पीव रा दरसण होवै, इण कोड में वा इतरी फूलै कै पूछो मत। पीव पधारण री खुसी रै कारण उणरी दूबळी कळाइयां फूल’र इतरी मोटी हुई कै हाथां में बचेड़ी आधी चूड़ियां तड़ाक-तड़ाक तीड़गी
वायसु उड्डावंतिअय, पिउ दिट्ठउ सहसत्ति।
अद्धा वलया महिहि गय, अद्धा फुट्टु तड़त्ति।।

कांई सहज अभिव्यक्ति है! कोई बणाव-सिणगार नीं, कोई आडंबर नीं, सहज हुलास रो सहज प्रकासण। ‘रूसणो’ (मान) करण वाळै प्रेमी सूं बतळावती उणरी प्राणप्रिया समझावै कै “हे गाढामारू! ओ जीवण चंचळ अर मरण अटल है। मतलब आ जिंदगाणी तो आणी-जाणी है। इणरो कोई ठौड़-ठिकाणो नीं है अर मरणो अेक सूं लाख टळै नीं। तो पछै इण छोटी-सी जिंदगाणी में रूसणो किण बात रो? वा आपरै व्हालै मनमेळू नैं चेतावै कै देख, जे थूं इण भांत रूसणो करैलो तो बिछोह अर विजोग री घड़ियां बीतणी दौरी व्है जावैला। विजोग रो अेक-अेक दिन देवतावां रै सौ-सौ सालां रै बरोबर हो जावैला-
चंचळ जीवण धुवु मरण, पिअ रूसिज्जई काइं।
होसिहिं दिअहा रूसणा, दिब्बइ बरिस सयाइं।।

सीधो सो साच है पण धण रो तर्क कितरो सतोल है। काव्य-शिक्षा रा सिद्ध कवेसर सुहावणै सिणगार रा चावा चितराम उकेरण में कोई कसर नीं राखता पण वांरै मन में कठै न कठै अेक चोर बैठेड़ो होवतो। वो जाणतो हो कै लोग इण बात नैं उचत अर आछी नीं मानैला। आं दूहां नैं रचणियां में इण भांत री कोई झिझक कोनी ही। राधा रै पयोधरां री वधताई अर प्रभाव रो बरणाव करतां वो लिखै कै “बां यानी राधा रै करड़ै कुचां रो कमाल देखो कै वां श्री कृष्ण नैं आँगण में नाचण सारू मजबूर कर दियो। हरि इण भांत नाच्या कै देखणियां लोग इचरज में पड़ग्या। कवि आगै लिखै कै आं चित्तचावा पयोधरां री तो आ ही बाण है, अै सामलै नैं नचा’र मानै पछै भलां ई आं रै खुद रै साथै जो होणो हो सो होय-
हरि णच्चाविय पंगणइ, विम्हइ पाडिउ लोउ।
एम्बहिं राह पओहरहं, जं भावइ तं होउ।।

संदेशरासक रा रचेता अब्दुल रहमान पण विरह री अभिव्यंजना करतां आम जीवण में मिलण वाळै सहज उपमानां रो स्सारो लियो है। विरह री आग में तपती विजोगण आपरा अनुभव बांटती बतावै कै “म्हारो कंत तो सुनार है अर हिवड़ो लोह है। जिण भांत सुनार पैली तो लोह नैं आग में जोरदार तपावै अर पछै उण पर ठंडा छांटा देय पाछी आस जगावै उणी गत म्हारो बालम पैली तो म्हनैं विरह रै ताप में तपावै अर पछै आसा रै जळ रा छांटां सूं सींचै-
सुन्नारह जिम मह हियउ, पिअ उक्ंिकख करेइ।
विरह हुयासि दहेवि करि, आसा जलि सिंचेइ।।

आगै रात नैं ओळमो देवती मगेजण री बात तो पाठक रो मन बरबस ई मोवै। वा कैवै कै हे रात! थनैं ओळमो ई कियां अर कितरो देवूं? ओ ओळमो इतरो मोटो है कै तीनूं लोकां में ई नीं मावै। रात रो रगड़ो ओ है कै आ दुख रै दिनां में तो चौगणी हो जावै अर सुख-संगम रो समै आवै जद साव छोटी सी होय बेगी बीत जावै। इण अन्याय री कोई हद है?
जामिणि जं वयणिज्ज तुअ, तं तिहुयणि णहु माइ।
दुक्खिहि होइ चउग्गणी, झिज्जइ सुइ-संगाइ।। (संदेशरासक)

प्रबंध चिंतामणि अर पुरातन प्रबंध संग्रह में मुंज अर मृणालवती सूं जुड़ेड़ा दूहां में ई अेकदम सहज अभिव्यक्ति है। आपरी ढळती जवानी री चिंता में उणमणी होयोड़ी मृणालवती नैं संबोधित करतां मुंज कैवै-“अरे बावळी! थूं इण बात री क्यूं दैण पाळै कै थारी जवानी जाती रैयी। मिसरी जे चूर-चूर ई होज्यावै तो ई उणरो हर चूरो मिठास भरेड़ो होवै अर उतरो ई मीठो रैवै-
मुंज भणइ मुणालवइ, गउ जुब्बणु मति झूरि।
जो सक्कर सय खण्ड किअ, तो वि स मिट्ठी चूरि।।

फक्कड़ राजा मुंज, जको खुद मृणालवती रै प्रेम रै धोखै में पकड़ीज्यो अर लोगां उणनैं बांध’र दर-दर घुमायो। उण मुंज री आ उकत कितरी चुटीली है!

(म्हारी आवण वाळी नई पोथी ‘उजास उच्छब‘ सूं उद्धृत)

~~-डॉ. गजादान चारण “शक्तिसुत”

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