अपने चारों धाम खेत में

तीर्थ-स्नान तमाम खेत में।
अपने चारों धाम खेत में।।

श्रम की पूजा सांझ-सकारे।
और न दूजा देव हमारे।
जस उसका उसके जयकारे।
सच्चे सात सलाम खेत में।
अपने चारों धाम खेत में।।

रामभणत रुणकारें वंदन।
श्रम-प्रस्वेद महकता चंदन।
श्रमदेवी का नित अभिनंदन।
शाश्वत ये सद्काम खेत में।
अपने चारों धाम खेत में।।

कृषक विरंचि धरा कागज पर।
हल से लिखते सुंदर अक्षर।
पढ़ पढ़ खुद रीझे करुणाकर।
लय सुर भाव ललाम खेत में।
अपने चारों धाम खेत में।।

गंगाजल बादल बन बरसे।
अमृत-पय पी तृण-तृण हरसे।
धरती सुखी सुखी सब करसे।
पावन कर्म-कलाम खेत में।
अपने चारों धाम खेत में।।

ना पंडों का रेलमपेला।
भिखमंगों का नाहिं झमेला।
ना गुरु कामी न कपटी चेला।
रमे रास घनश्याम खेत में।
अपने चारों धाम खेत में।।

जाति-पांति जंजाल नहीं है।
ऊंच-नीच का जाल नहीं है।
यहां सियासी चाल नहीं है।
समता सालिगराम खेत में।
अपने चारों धाम खेत में।।

ना हीं छलावा ना आडम्बर।
नीचे धरती ऊपर अम्बर।
है ये करसे असल दिगम्बर।
पावन परम पैगाम खेत में।
अपने चारों धाम खेत में।।

प्रजातंत्र का सुख है भारी।
हम जमींदार जमीन हमारी।
हमीं देवता हमीं पुजारी।
ठाढ़े ठाकुर राम खेत में।
अपने चारों धाम खेत में।।

आशा नेक है नेक इरादा।
सबकी है अपनी मर्यादा।
कोई कम ना कोई ज्यादा।
अटल सत्य अभिराम खेत में।
अपने चारों धाम खेत में।।

सींव उलांघे, सो सैताना।
ले के न देना, तगड़ा ताना।
सुख अरु दुख में साथ निभाना।
व्रत ऐसा वरीयाम खेत में।
अपने चारों धाम खेत में।।

~~डाॅ. गजादान चारण “शक्तिसुत”

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