अर्गलास्तोत्रम् का भावानुवाद

( मेहाई सतसई – अनुक्रमणिका )

IMG-20150104-WA0009
अजब अर्गला स्तोत्र रा, कथूं कवित मँह राज।
सबद समप सुभकारिणी, मेहाई महराज।।३०४
काळी भद्र कपालिनी, स्वाहा स्वधा शिवा ज।
सचर अचर संचालिनी, मेहाई महराज।।३०५
छिमा, मंगला धातरी, जयँती अर दुरगा ज।
सूर चंद्र कोटि प्रभा, मेहाई महराज।।३०६
दे जय देवी चामुँडा, हारी वपु पीडा ज।
काळरात सब दिश-गता, मेहाई महराज।।३०७
मधु कैटभ ने मारणी, विरंचिनी वरदा ज।
जय, जस, रुप, समपण जयो, मेहाई महराज।।३०८
महिखासुर नें मारणी, भगत भरण सुख साज।
जय, जस, रुप, समपण जयो, मेहाई महराज।।३०९
चंड मुंड मदचूरणी, रगत बीज री गाज।
जय, जस, रुप, समपण जयो,  मेहाई महराज।।३१०
शुंभ निशुंभ सँहारिणी, घुम-अख हणणी मां ज।
जय, जस, रुप, समपण जयो, मेहाई महराज।।३११
पद जुग वंदन जोगणी, सकळ सुभग दाता ज।
जय, जस, रुप, समपण जयो, मेहाई महराज।।३१२
रूप अचिंतन चरित तव, सकळ हणण शत्रां ज।
जय, जस, रुप, समपण जयो, मेहाई महराज।।३१३
चूर पाप किय चंडिका, नमन किया जिण मां ज।
जय, जस, रुप, समपण जयो, मेहाई महराज।।३१४
भगत सेवतां भावसूं, व्याधि विनासण मां ज।
जय, जस, रुप, समपण जयो, मेहाई महराज।।३१५
अरचन वंदन अंब रा, जिण कर कोड किया ज।
जय, जस, रुप, समपण जयो, मेहाई महराज।।३१६
सौभाग्यं आरोग्य सह, मन आणंद दे मां ज।
जय, जस, रुप, समपण जयो, मेहाई महराज।।३१७
दोखी जन नें खाख कर, बुधि बळ मोर बढा ज।
जय, जस, रुप, समपण जयो, मेहाई महराज।।३१८
करो मात कल्याण मम, समपौ संपत साज।
जय, जस, रुप, समपण जयो, मेहाई महराज।।३१९
चरण असुर सुर चंपता, मुकट झुकायर मां ज।
जय, जस, रुप, समपण जयो, मेहाई महराज।।३२०
विद्या यश लिछमी बधा, जो जन भजतां ता ज।
जय, जस, रुप, समपण जयो, मेहाई महराज।।३२१
दलणी दैतां रा दरप, नमन चंडिका मां ज।
जय, जस, रुप, समपण जयो, मेहाई महराज।।३२२
चौभुज सेवित चौमुखी, जननी जग री राज।
जय, जस, रुप, समपण जयो, मेहाई महराज।।३२३
विष्णु वंदीत पार्वती, भगती युत माता ज।
जय, जस, रुप, समपण जयो, मेहाई महराज।।३२४
हेमाळा री दीकरी, नमन शंकरी मां ज।
जय, जस, रुप, समपण जयो, मेहाई महराज।।३२५
सचिपति वंदित सुंदरी, वड देवी वसुधा ज।
जय, जस, रुप, समपण जयो, मेहाई महराज।।३२६
परचंड- भुजदंड-दंडिणी, खंड-गरव खल रा ज।
जय, जस, रुप, समपण जयो, मेहाई महराज।।३२७
आणँद अनहद अरपणी, भगतां मात भवा ज।
जय, जस, रुप, समपण जयो, मेहाई महराज।।३२८
पतनी दीजो पार्वती! मन वृत्तिसम म्हां ज।
भव जल तारण कुळ उजळ, मेहाई महराज।।३२९
पाठ करंता प्रेम सूं, संपत समपै मां ज।
जगचावी जगदंबिका, मेहाई महराज।।३३०

~~नरपत आसिया “वैतालिक”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *