चार लाख रु. का लालच भी नहीं भुला सका मित्र की यादें

जैसलमेर के रावत लूणकरणजी की पुत्री उमा दे का विवाह जोधपुर के राव मालदेव से हुआ था। दहेज में उमा दे के साथ उनकी दासी भारमली भी जोधपुर आ गयी। भारमली रुप-लावण्य तथा शारीरिक-सौष्ठव में अप्सराओं जैसी अद्वितीय थी।  विवाहोपरान्त मधु-यामिनी के अवसर पर राव मालदेव को रंगमहल में पधारने का अर्ज करने हेतु गई दासी भारमली के अप्रतिम सौंदर्य पर मुग्ध होकर मदमस्त राव जी रंगमहल में जाना बिसरा भारमली के यौवन में ही रम गये। इससे राव मालदेव और रानी उमा दे में “रार” ठन गई, रानी रावजी से रुठ गई। यह रुठन-रार जीवनपर्यन्त रही, जिससे उमा दे “रुठी राणी” के नाम से प्रसिद्ध हुईं।

उमा दे की माता व जैसलमेर के रावत लूणकरणजी की रानी राठौड़ीजी को जब यह पता चला तो उन्होंने दासी भारमली को जैसलमेर से वापस ले आने के लिए अपने भाई कोटड़ा के स्वामी बाघ जी को बुलवा भेजा। बहन के कहने पर बाघजी भारमली को चुपके से उठाकर अपने गांव कोटड़ा ले तो आये परन्तु वे भी उसके अनुपम रुप-यौवन पर मोहित हो उसके प्रति स्वंय को हार बैठे।

भारमली के बिना जोधपुर के मालदेव को भी चैन नहीं था पर बाघ जी से भारमली को छीनना भी कोई आसान नहीं था, क्योंकि राव मालदेव जानता था कि ऐसी हालत में बाघजी पहले भारमली को मारेगा फिर युद्ध करते हुए खुद मर जायेगा। एक दिन राव मालदेव ने कवि आसाजी चारण को बुलाकर कहा “मेरी छाती में एक तीर अटका हुआ है उस तीर को आप ही निकाल सकते है” और राव मालदेव ने आसाजी चारण को पूरी कहानी बताई और कहा कि – आपकी कविता की शक्ति ही मेरी छाती से ये तीर निकाल सकती है आप कोटड़ा बाघजी के पास जाइए वह कविता का बहुत बड़ा रसिया है और आपकी कविताएँ सुनकर वह खुश होकर जब आपको कुछ मांगने के लिए कहे तो आप उसे वचन बद्ध कर मेरे लिए उससे भारमली मांग लायें।

कवि आसाजी बारहट ऊंट लेकर कोटड़ा बाघजी के पास पहुँच गए। कोटड़ा पहुंचने पर बाघ जी तथा भारमली ने उनका इतना आदर-सत्कार किया कि वे अपने आगमन का उद्देश्य भूल वहीं रहने लगे। उसकी सेवा-सुश्रूषा एवं हार्दिक विनय-भाव से अभिभूत आसाजी का मन लौटने की बात सोचता ही नहीं था। आसाजी की बाघजी से इतनी गहरी मित्रता हो गई कि एक दुसरे के बिना जीना भी दुश्वार लगे। उनके भाव विभोर चित्त से प्रेमी-युगल की हृदयकांक्षा कुछ इस प्रकार मुखरित हो उठी-

जहं तरवर तहं मोरिया, जहं सरवर तहं हंस।
जहं बाघो तहं भारमली, जहं दारु तहं मंस।।

समय को शायद कुछ ओर ही मंज़ूर था, कुछ ही वर्षों पश्चात बाघजी की अकस्मात मृत्यु हो गई और भारमली उनके साथ सती हो गयी। कवि आसाजी बारहट को जीवन अब अपने मित्र बाघजी के बिना शून्य लगने लगा, बाघजी की स्मृति ने उन्हें बैचेन बना दिया। कवि तो थे ही सो अपने उद्गार पीछोलों के माध्यम से व्यक्त किये।

बाघे बिन कोटड़ो, लागै यों अहडोह।
जानी घरे सिधावियाँ, जाणे मांढवड़ोह।।
बाघजी के बिना यह कोटड़ा एसा लगता है जैसा बारातियों के चले जाने पर विवाह मंडप।

जिसके घर कभी बारात आई हो और विवाह मंडप को बारातियों के चले जाने पर देखा हो वही अनुमान लगा सकते है या बाघजी जैसे मित्र के बिछुड़ने पर आसाजी बारहट जैसे कवि ही अनुमान लगा सकते है कि शुन्यता क्या होती है ? सच पूछो तो इस विवाह मंडप को शुन्यता का साकार रूप कह सकते है। दोहे की थाह ली जाये तो इसमें उपमा मात्र का ही लालित्य नहीं है बल्कि इसमें ह्रदय की सच्ची उथल-पुथल अन्तर्निहित है।

मारग मंडी चणाय, पंथ जोऊं सैणा तणों।
कोई बटाऊ आय, (म्हनै)वातां कहो नी बाघरी।।
राह पर मठ बनाकर अपने मित्र की राह देख रहा हूँ। कोई तो मुझे बाघजी की बातें कहो न।

निर्दोष और स्वच्छ हृदय की यह जिज्ञासापूर्ण आहें राजस्थानी साहित्य की अमर संपत्ति है। कल्पना को कितना मृदु रूप प्रदान किया है। “मारग मंडी चणाय, पंथ जोऊं सैणा तणों” में कवि हृदय का भावुक प्रेम किस विशेषण से चित्रित है और “म्हनै वातां कहो नी” कितनी मर्मस्पर्शी अभिलाषा है। अपने प्रिय की बातें सुनकर कभी मन तृप्त नहीं होता।

लाखों बाळद लाय, कीरत रो सोदो करे।
एकरस्यां घिर आव, विणजारो व्है बाघजी।।
लाखों बैलों को लाकर कीर्ति का सौदा करना है। हे बाघजी बंजारा बनकर एक बार तो वापस फिर आना।

प्रेमी के लिए “एकरस्यां घिर आव” में कितना ललित आव्हान चित्रित है। एक बार फिर, प्रत्येक असफल और प्रत्येक अनुरक्त की अभिलाषा बनी रहती है। एकरस्यां के भविष्य में एक नए लोक की सृष्टि है और एक निश्चित आनंद की प्राप्ति की आशा है। बाह्यावरणों की कोई चिंता नहीं, चाहे वह “बिणजारो” होकर अथवा अन्य रूप में। उसे तो पुराना हृदय चाहिए। कितना आदर्श भाव सोरठे में व्यक्त किया गया है।

हाटे पड़ी हठताल, चतरंगिया चाले रह्या।
करसण करै कलाळ, विकरो भागो बाघजी।।
रसिक बाघजी के चले जाने से हाटों में हड़ताल हो गई। कलाल (दारू बेचने वाला) की तो बिक्री ही टूट गई, वह अब खेती करने लग गया है।

आसाजी बारहट अपनी प्रतिभा से विश्व व प्रकृति के समस्त व्यापारों में बाघा के बिछुड़ने का परिणाम देखते है। कलाळ के खेती करने का पेशा भी उन्हें इसी बात का सूचक प्रतीत होता है कि बाघाजी के न होने से उनका पेशा टूट गया है।

कूकै कोयलियांह, मीठा बोलै मोरिया।
राचै रंग रलियांह, बागां विच्चे बाघजी।।
हे बाघजी ! आज कोयल कुक रही है और मोर मृदु ध्वनि से बोल रहे है। बाग़ में सुन्दर बहार है (फिर तो आ जावो) अपने प्रेमी को बुलाने के कितने बहाने ढूंढ़ लाते है।

बाघा आव वलेह, दुःख भंजण दूदा हरा।
आठुं पहर उदेह, जातां देगो जेतरा।।
हे बाघ जी !(जैतसिंह के पुत्र) तेरे विरह से उत्पन्न दुःख आठों पहर बना रहता है। अब हे दादू के वंशज ! एक बार फिर आकर उसे मिटाजा।

कस्तूरी झंकी भई, केसर घटियो आघ।
सब वस्तू सूंघी थई, गयो वटाऊ बाघ।।
कस्तूरी सस्ती हो गई है और केसर का भाव भी गिर गया है। सब वस्तुएं सस्ती हो गई लेकिन पथिक बाघजी चले गए।

इस तरह आसाजी बाघजी के चले जाने का दुःख सहन नहीं कर सके, वे बाघजी के विरह में पागल से हो गए वे जिधर भी देखते उन्हें बाघजी की सूरत ही नजर आती और वे बाघा बाघा चिल्लाते हुए उनके विरह में ही दोहे व कविताएँ बोलते रहे।

एक दिन कविराज आसाजी के बारे में अमरकोट के राणा जी ने सुना तो उन्होंने कहा कि कविराज को मैं अपने पास रखूँगा और उनका इतना ख्याल रखूँगा कि वे बाघजी को भूल जायेंगे। और आसाजी को राणा ने अमरकोट बुलवा लिया।

एक दिन राणा जी ने कविराज आसाजी की परीक्षा लेने के लिए सोचा कि क्यों न कविराज को लालच दिया जाय फिर देखते है वे अपने मित्र को भुला पाते हैं या नहीं। यही सोचकर एक दिन राणा जी ने कहा कि आपके दोस्त बाघजी से मेरा पुराना बैर है और मैं चाहता हूँ कि आप कम से कम एक रात्री उनका नाम नहीं लें। कविराज को प्रलोभन देते हुए राणा जी ने कहा कि आप सिर्फ एक रात्री बाघजी का नाम न लें तो मैं आपको रात्रि के चारों प्रहरों के हिसाब से चार लाख रूपये इनाम दूंगा। इतना कह कर राणा वहां उपस्थित सिपाहियों को इशारा करके चले गए।

राणा की बात सुनकर कविराज के पुत्र ने उन्हें खूब समझाया कि हे पिता श्री ! कम से कम एक रात तो आप मेरे लिए ही सही अपने मित्र बाघजी को भूल जाये और एक रात्रि उनका नाम लिए बिना काट दें। ताकि मैं इन मिलने वाले चार लाख रुपयों से अपना जीवन ढंग से काट लूँ आखिर एक ही रात की बात है फिर भले आप रोजाना अपने मित्र बाघा को याद करते रहना। कवि आसाजी ने अपने पुत्र की विशेष इच्छा पर हृदय पर पत्थर रखकर कुछ रात्री निकाली। पर सच्चे प्रेमी जब बिछुड़ते है तो उन्हें नींद आना भी तो कठिन है। एक प्रहर रात के बीतते ही अपने मित्र बाघजी की यादें शूल की भांति कवि आसाजी के हृदय को भेदने लगी। और इतनी देर से दबा हुआ भावों का प्रवाह पुन: तीव्र हो गया और वे आखिर बोल पड़े –

बाघा आव वलेह, धर कोटडै तूं धणी।
जासी फूल झड़ेह, वास न जासी बाघरी।।
हे कोटडे के स्वामी बाघजी ! एक बार फिर आ जावो फूल झड़ जाते है लेकिन उनकी सुगंध नहीं जाती (तुम्हारी कीर्ति भुलाई नहीं जा सकती)।

“बाघा आव वलेह” कितना मीठा निमंत्रण है। “वास न जासी बाघरी” वास्तव में ठीक है कि प्रेमी की स्मृति प्रेमी की मृत्यु होने पर मिट थोड़े ही सकती है। वह तो उल्टी और तीव्र होगी। कवि ने अनुभूति का पुट देकर जीवन के इस महान सत्य को कितने थोड़े शब्दों में किस कौशल से व्यक्त किया है।

इस दोहे को सुनकर सिपाही ने पूछा कि आसाजी जाग रहे हो या नींद में कह रहे हो। कवि ने कहा – मित्र बाघजी बिना नींद ही नहीं आती और एक नि:श्वास खींचते हुए कहा-

ठोड़ ठोड़ पग दौड़ करस्यां पेटज कारणे।
रात दिवस राठौड़ वीसरसूं नह बाघ नै।।
पेट के लिए जगह जगह भटकता फिरूंगा लेकिन मित्र बाघजी को कभी भी न भूल सकूँगा।

सिपाही ने कहा – अपनी मस्ती में अपने पुत्र पर हृदय-हीनता क्यों करते है ? दो लाख रूपये तो आपने बाघजी के लिए दो दोहे बोलकर खो दिए अब भी समय है दो लाख तो बचाइये। सिपाही की बात सुनकर कविराज आसाजी गंभीर हो चुप हो गए।

लेकिन एक सच्चे प्रेमी की विकल हूक दबी कैसे रह सकती थी। तीसरे प्रहर का प्रभात होते मुर्गा बोला। प्रभात के शांत वातावरण में हृदय के समस्त वेग से मुर्गे के उस दुखी क्रन्दन में क्या भाव होते है यह एक विरही ही बता सकता है। कविराज के हृदय का प्रसुप्त प्रवाह विकल हुआ और बह उठा –

कूकड़ला क्यों कूकियो, ढळती मांझल रात।
(कै) तनै बिल्ली संतायियो, (कै) बाघा तणों विराग।।
हे मुर्गे ! तू इस बीतती हुई निस्तब्ध रात्री में क्योंकर क्रन्दन कर उठा ? क्या तुझे बिल्ली ने सताया है अथवा तुझे भी मेरी ही भांति बाघजी का विरह सता रहा है ?

कवि आसाजी मुर्गे के चिल्लाने में अपने दर्द की हूक पाते है “(कै) तनै बिल्ली संतायियो, (कै) बाघा तणों विराग” कितना भोला प्रश्न है। इस प्रश्न में एक कसक है। कहते है कसक का स्पष्टीकरण ही काव्य है। इस दोहे के समान कसक का इतना अच्छा स्पष्टीकरण और कहाँ पाया जा सकता है।

सिपाही ने सोचा, इस समय याद नहीं दिलाया तो कविराज का बचा हुआ एक लाख रुपया भी चला जायेगा। अत: प्रात:काल से कुछ पहले सिपाही ने कविराज से कहा – अब तो केवल आध घड़ी ही बची है सो धीरज रखिये इतने में महाराणा भी आ जायेंगे और बचा हुआ एक लाख रुपया तो मिल जायेगा। कविराज आसाजी का प्रेम इसी समय माया पर विजय स्थापना कर गर्व से खड़ा हुआ। मन ही मन अपनी कमजोरी पर रोष करते हुए सिपाही से कहा –

थडै मसांण थयांह, आतम पद पूगां अलख।
(म्हारा) गंगा हाड़ गयांह, (हूँ) वीसरसूं जद बाघ नै।।
मैं मित्र बाघजी को तभी भूल सकूँगा जब मेरा श्मशान भी बाघजी के स्मारक के पास ही बना दिया जावेगा, मेरी आत्मा परम पद को प्राप्त हो जाएगी और मेरी हड्डियाँ गंगा में प्रवाहित कर दी जाएगी।

सिपाही ने कहा – गजब कर दिया। आपने चारों लाख रूपये खो दिए। इतने में महाराणा भी आ गए और पूछा कि क्या बारहट जी चारों लाख रूपये खो चुके ? ऐसे प्रश्न का भावुक कवि ने उतर दिया –

मड़ा मसांण गयांह, अलल ले पोंछ्या अलख।
(म्हारा) गंगा हाड़ गयांह (हूँ) तोय न भूलूं बाघ नै।।
मेरा शव श्मशान भूमि को पहुँच जावेगा, मेरी आत्मा स्वर्ग दूत ले जावेंगे और मेरी हड्डियाँ गंगा में बहा दी जावेगी; तब भी मैं बाघजी को नहीं भूल सकता।

कवि ने इस दोहे में अपनी प्रतिभा और अपने व्यक्तित्व की पराकाष्ठा कर दी। भावुकता को चरम सीमा तक पहुंचा दिया “हूँ तोय न भूलूं बाघ नै” एक तीर सा प्रभाव करता है। यह वह काव्य है जिसे सुनकर “तन मन धुनत शरीर” की उक्ति ठीक बैठती है। उस धनुर्धर का तीर ही क्या और कवि की उक्ति ही क्या, जो लगकर हृदय को तिलमिला न दे।

चींघण चालवियांह, खीरां बाळ खखेरियां।
राणा राख यथांह, वीसरसूं न बाघ नै।।
चींघण से (मुर्दा जलाते समय खोपड़ी तोड़ने वाली लकड़ी से) जब कपाल क्रिया कर दी जावेगी और अंगारों में मुझे जलाकर उथलाया जावेगा तब भी मैं बाघे को नहीं भूल सकूँगा। इसलिए हे राणा ! अपनी थैलियों को अपने पास रखो।

प्रेमी की प्रेम स्मृति के आगे रुपयों का लोभ नहीं टिक सका। इसीलिए तो कहा है “राणा राख यथांह”। यहाँ राणा को भी उपेक्षा भरी दृष्टि से देखा गया है। अपनी थैलियाँ अपने पास रखो, मुझे नहीं चाहिए – मैं बाघे को नहीं भूल सकता। कितनी आहें भरी हुई है इस कथन में।

और उस ज़माने में (हुमायूं के समकालीन) चार लाख रूपये का लालच भी उन कविराज आसाजी बारहट को अपने मित्र बाघजी की स्मृति को भुला न सका।

उपरोक्त सभी दोहों का हिंदी भावार्थ व उनकी व्याख्या स्व. श्री तनसिंहजी, बाड़मेर द्वारा की गयी है।

~~Authored by Ratan Singh Ji Shekhawat on gyandarpan.com (Link)

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