चारण साहित्य का इतिहास – डॉ. मोहन लाल जिज्ञासु

| कड़ी – १३३ | छटा अध्याय – आधुनिक काल (प्रथम उत्थान)
| धारावाहिक श्रंखला – प्रत्येक मंगल, शुक्र एवं रविवार को प्रेषित
| सन्दर्भ – पद्य साहित्य – प्रशंसात्मक काव्य

राजा-महाराजाओं की प्रभुता का वर्णन करने वाले कवियों में रामदान, नाहर एवं चिमनदान के नाम उल्लेखनीय हैं। रामदान ने गणगौर के शुभ दिवस पर महाराणा भीमसिंह (उदयपुर) के राजसी ठाट-बाट का वर्णन इन शब्दों में किया है-[…]

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वैवाहिक गीत – बनासा री मदील मिजाज करे छै – भक्तिमति समान बाई

बना सा री मदील मिजाज करै छै।
सिया निरखत मोद भरै छै, रघुवर री मदील मिजाज करै छै।।

सबहि सहेल्यां चढत महल में, सबहि झरोकाँ झुकै छै।
या छबि देखी राम बना री, चंदा री ज्योत छिपै छै।।
बना सा री मदील……………

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बैश कीमती बोट – कवि मोहनसिंह रतनू (चौपासनी)

आगामी दिनो मे पंचायत चुनाव होने जा रहे हैं, मतदान किसको करना हे इसके लिए कवि ने एक गाइडलाइन बनाई है। शांत सम्यक भाव से सही निष्पक्ष स्वंतत्र होकर मतदान करें।

दिल मे चिंता देश री,मनमे हिंद मठोठ।
भारत री सोचे भली,बी ने दीजो बोट।।

कुटलाई जी मे करै,खल जिण रे दिल खोट।
नह दीजो बी निलज ने,बडो कीमती बोट।।[…]

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जिंदगी

कर रहा हूँ यत्न कितने सुर सजाने के लिए
पीड़ पाले कंठ से मृदु गीत गाने के लिए
साँस की वीणा मगर झंकार भरती ही नहीं
दर्द दाझे पोरवे स्वीकार करती ही नहीं
फ़िर भी हर इक साज से साजिन्दगी करती रही
ऐ जिंदगी ताजिंदगी तू बन्दगी करती रही।[…]

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बीसहथ रा सौरठा – रामनाथ जी कविया

उभी कूंत उलाळ, भूखी तूं भैसा भखण।
पग सातवै पताळ, ब्रहमंड माथौ बीसहथ।।१
सौ भैसा हुड़ लाख, हेकण छाक अरोगियां।
पेट तणा तोई पाख, वाखां लागा बीसहथ।।२
थरहर अंबर थाय, धरहरती धूजै धरा,
पहरंता तव पाय, वागा नेवर बीसहथ।।३
पग डूलै दिगपाळ, हाल फाळ भूलै हसत।
पीड़ै नाग पताळ, बाघ चढै जद बीसहथ।।४
करनादे केई वार, मन मांही कीधो मतो।
हुकुम बिनां हिकवार, देसाणों दीठौ नहीं।।५[…]

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भैरवाष्टक – डॉ. शक्तिदान कविया

।।छंद – त्रिभंगी।।
नाकोडा वाला, थान निराला, भाखर माला बिच भाला।
कर रुप कराला, गोरा काला, तु मुदराला चिरताला।
ध्रुव दीठ धजाला, ओप उजाला, रूपाला आवास रमा।
भैरु भुरजाला, वीर वडाला, खैतर पाला दैव खमा।
जी खेतर पाला घणी खमा…।।1।।[…]

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लखमण जी ना छन्दों – कवि आसाजी रोहड़िया “भादरेश”

।।छंद – रूप मुकुंद।।
लखणेश महाभड़ लाज रो लँगर, धन्य धरा धर शेष धणी,
अम भार अपार उतारिय आवण, मानव देह अमूल मणी,
तात दशरथ मात सुमित्रण, ठीक अजोधाय धाम ठवा,
कुळवन्त कळाधर काशपरा भड, तोय समोवड कुण तवा,
जीय तोय समोवड कुण तवा।।1[…]

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राष्ट्रवादी चिंतन के कवि बांकीदास जी आशिया – राजेन्द्रसिंह कविया

जोधपुर महाराजा श्री मानसिंह जी के कविराजा व भाषागुरू श्री बांकीदास जी आशिया बहुत ही प्रखर चिंतक व राष्ट्रवादी कवि थे। उस समय आज से लगभग दो शताब्दी पूर्व जब संचार के साधनों का अभाव था, उस समय में ही कवि भारतवर्ष मे घटित घटनाओं पर अति सूक्ष्मदृष्टि रखता था, साथ ही अपनी कलम व कविता से राष्ट्र के साथ विश्वासघात करने वाले व्यक्तियों की पूरजोर भर्त्सना भी करता था।
भरतपुर महाराजा व अंग्रेजों के बीच हुये युध्द में जब भरतपुर के साथ रह रहे नागा साधू अंग्रेजों के साथ मिलकर भरतपुर राज्य से दगाबाजी कर धोखे से किले के दरवाजे खुलवा कर भरतपुर की प्रत्यक्ष हार के कारक बन गये, तब जोधपुर मे बैठै कवि का ह्रदय अति क्षुब्ध व कुंठित हुआ और कवि ने उनकी काली करतूत का कविता के माध्यम से विसर काव्य लिखा।[…]

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कांकरी – दुला भाया “काग”

(झूलणा छंद)
कुळ रावण तणो नाश किधा पछी
ऐक दी रामने वहेम आव्यो
मुज तणा नामथी पथर तरता थया
आ बधो ढोंग कोणे चलाव्यो ?
ऐ ज विचारमां आप उभा थया
कोईने नव पछी साथ लाव्या
सवॅथी छुपता छुपता रामजी
ऐकला उदधिने तिर आव्या…

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गोरखनाथजी रा छंद – मेहाजी वीठू

।।छंद त्रिभंगी।।
भोमे वरसंता अंबर भरता, अजर जरंता अकलंता।
जम रा जीपंता आप अजीता, अरि दळ जीता अवधूता।
उनमना रहंता लै लावंता, पांचूं इन्द्री पालंता।
माछंदर पुत्ता जोग जुगत्ता, जागै गोरख जग सुता।।1।।[…]

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