गीता रौ राजस्थानी में भावानुवाद – कवि वीरेंद्र लखावत

गीता रौ राजस्थानी में भावानुवाद (चौपाई छंद अर गद्य)

।।श्लोक।।
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सुव:।
मामका: पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय।।१।।

।।चौपाई।।
भाळ धरा कुरुखेत धुजाई, लड़ण भिड़ण री लोय लगाई।
मम सुत अर पाण्डव रा जाया, संजय हुय की देख बताया।।१।।

।।भावार्थ।।
संजय सूं धृतराष्ट्र कैवै-हे संजय! म्हनै आ बता कै धर्म री धरा कुरुक्षेत्र में म्हारा अर पाण्डव रा बेटा युद्ध करण खातर गया है उण ठौड़ इण बगत कांई होय रह्यौ है थारी दिव्य दीठ सूं देख ‘र बता। […]
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वेलि क्रिसन रुकमणी री – महाकवि पृथ्वीराज राठौड़

महाकवि पृथ्वीराज राठौड़ रचित अनुपम प्रबंध काव्य।
भावार्थ – श्री मातु सिंह राठोड़
छंद वेलियो

।।मंगलाचरण।।
परमेसर प्रणवि, प्रणवि सरसति पुणि
सदगुरु प्रणवि त्रिण्हे तत सार।
मंगळ-रूप गाइजै माहव
चार सु एही मंगळचार।।1।।

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कान्हड़दे सोनगरा – डॉ. गोविन्द सिंह राठौड़

[…]कान्हड़दे के कठोर और साहस भरे जवाब को पाकर अलाउद्दीन भली प्रकार समझ गया कि वह मेरी सेना को उसके राज्य में से सही-सलामत आगे नहीं जाने देगा। अत: उसने अपनी सेना को मेवाड़ के मार्ग से गुजरात भेजी। अलाउद्दीन की सेना जब गुजरात से वापस दिल्ली की ओर लौट रही थी तब अलाउद्दीन ने एक सेना उलूगखाँ के नेतृत्व में कान्हड़दे के द्वारा मार्ग न दिये जाने के कारण उसे दण्डित करने के लिये भेजी।[…]

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मृगया-मृगेन्द्र – महाकवि हिंगऴाजदान जी कविया

।।मृगया-मृगेन्द्र।।

।।रचना – महाकवि कविया श्रीहिंगऴाजदानजी।।

अथ मृगया-मृगेन्द्र लिख्यते

।।आर्य्या।।
गंडत्थल मढ लेखा, रजत रोलंभराजि गुंजारन
शोभित भाल सुधान्सु, नमो मेनकात्मजा वन्दन।।1
पर्वतराज की पुत्री के पुत्र गणेश को नमस्कार है जिनके कपोलों पर बहते मद की सुगंध से आकृष्ट हुए भौरों की गुंजार सदा रहती है और जिनके ललाट पर चन्द्रमा सुशोभित है।

।।दोहा।।
गनपति गवरि गिरीश गुरु, परमा पुरुष पुरान।
श्री सरस्वती करनी सकति, देहु उकति वरदान।।2
गणेश, गौर(पार्वती), महादेव, लक्ष्मी, विष्णु, सरस्वती, करणी माता, शक्ति मुझे उक्ति (काव्य रचना) का वर दान दे।
[…]

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ફેંસલો (फैसलो) – કવિ દુલા ભાયા કાગ (कवि दुला भाया ‘काग’) – छंद झूलणा

॥ ઝુલણાં છંદ ॥

લેખ કાગળ લખ્યાં તાત પ્રહલાદ ને, કાળ ને જીતવા કલમ ટાંકી ;
વર્ષો ના વર્ષ વિચાર કરીને લખ્યું, માંગતા નવ રહ્યું કાંઇ બાકી.
દેવ સૌ પાળતા સહી વિરંચી તણી, દેવ નો દેવ એ જગત થાપે ;
રદ બન્યા કાગળો એક એવી ગતિ, ફેંસલો નાથ નરસિંહ આપે. ૦૧[…]

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मोरवड़ा मे सांसण की मर्यादा रक्षार्थ गैरां माऊ का जमर व 9 चारणों का बलिदान (ई. स.1921)

प्रसंग: सिरोही राज्य पर महाराव केशरीसिंह का शासन था। राज्य आर्थिक तंगी से गुजर रहा था। राज्य की माली हालात सुधारने के नाम पर खजाना भरने की जुगत में दरबार ने कई नये कर लगाकर उनकी वसूली करने का दबाव बनाया। जिन लोगों को कर वसूल करने की जिम्मेदारी दी उन्होंने पुरानी मर्यादाओं और कानून कायदों की धज्जियां उड़ाते हुए उल्टी सीधी एवं जोर जबरदस्ती से कर वसूल करना शुरू कर दिया।

इसी कर-वसूली के लिए एक जत्था मोरवड़ा गाँव मे भी आया। मोरवड़ा गाँव महिया चारणों का सांसण मे दिया गाँव था। सांसण गांम हर प्रकार के कर से एवं राजाज्ञा से मुक्त होता है। ये बात जानते हुए भी दरबार के आदमियों ने आकर लोगों को इकठ्ठा किया और टैक्स चुकाने का दबाव बनाया। गाँव के बुजुर्गों ने उन्हे समझाया कि ये तो सांसण गांव है! हर भांति के कर-लगान इत्यादि से मुक्त, आप यहाँ नाहक ही आए! यहाँ सिरोही राज्य के कानून नहीं बल्कि हमारे ही कानून चलते हें और यही विधान है।[…]

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श्री मोरवड़ा जुन्झार जी – कवि रामदान जी

।।श्री जुन्झार जी।।

सिरोही राजा सोखियो, दुश्मण लीधो देख।
जद्ध किधो महियों जबर तन मन दही न टेक।।

अहि भ्रख भूपत आदरयो, कीध भयंकर कोम।
केशर नृप उन्धी करी, सिरोही रे सोम।।[…]

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स्वातंत्र्य राजसूय यज्ञ में बारहठ परिवार की महान आहूति – ओंकार सिंह लखावत

आज हम स्वतंत्र हैं, मौलिक अधिकारों के अधिकारी हैं और चाहे जब चाहे जो बनने और करने का रास्ता खुला है, परंतु यह हमारे कारण नहीं। जरा सोचिये, कुछ रुकिये, बुद्धि पर जोर लगाइये तब पता चलेगा कि यह सब उन स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और बलिदान की बदौलत है।

अपने और अपनों के लिये तो सब कुछ ऐसे और वैसे करने को तत्पर रहते हैं, क्या कभी इनके बारे में सोचने की फुर्सत भी निकाली है ? यदि हां तो ठीक है, नहीं तो स्वतंत्रता आंदोलन और विप्लव की आंधी के शताब्दी वर्ष में थोड़ा समय निकालिये। दादा-दादी, माता-पिता, पति-पत्नी, बेटी-बेटा, पौता और पौती में आप जो भी हो बैठकर स्वतंत्रता सेनानियों की माला के मणिये बने स्वातंत्र्य वीर श्री केसरी सिंह जी बारहठ, श्री जोरावर सिंह जी बारहठ और श्री प्रताप सिंह जी बारहठ की संक्षिप्त जीवनी पढ़ डालिये।

बारहठ परिवार की स्वतंत्रता के राजसूय यज्ञ में महान् आहूति हमें स्वतंत्रता का महत्व बताती है। जीवन जीने की सार्थकता का भान कराती है।[…]

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‘थळवट बत्तीसी’ बनाम ‘थळवट रौ थाट’ – कविराजा बांकीदास आशिया / डॉ. शक्तिदान कविया

थळवट बत्तीसी (बांकीदास आशिया)
जेथ वसै भूतां जिसा, मानव विना मुआंह।
ढोल ढमंकै नीसरै, पांणी अंध कुआंह।।
थळवट रौ थाट (शक्तिदान कविया)
थळ रा वासी थेट सूं, हरी उपासी होय।
अष्ट पौर तन आपरै, कष्ट गिणै नंह कोय।।[…]

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