गायें हारमोर नहीं करने दूंगी

जिनके घर सदाचार, शिष्टाचार, मानवता, उदारता और परोपकार के भावों की सरिता सतत प्रवहमान रहती है, उसी घर में देवी अवतरण होता भी है तो कुलवधु के रूप में भी उस घर को पवित्र करने हेतु देवी आती हैं-

देवियां व्है जाके द्वार दुहिता कलत्र हैं।

आलाजी बारठ जिन्हें मंडोवर राव चूंडाजी ने भांडू व सिंयाधा नामक गांव इनायत किए थे के घर एक ही समय में दो महादेवियों का जन्म हुआ है। उनके पुत्र गोरजी के घर सूरमदे का जन्म वि.सं. 1451 में हुआ-[…]

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इनसे तो देव ही डरते हैं तो फिर

स्वमान व सत्य के प्रति आग्रही जितने चारण रहे हैं उतने अन्य नहीं। इनके सामने जब सत्य व स्वमान के रक्षण का संकट आसीन हुआ तब-तब इन्होंने निसंकोच उनकी रक्षार्थ अपने प्राण अर्पण में भी संकोच नहीं किया। चारणों ने सदैव अपने हृदय में इस दृढ़ धारणा को धारित किया कि सत्य सार्वभौमिक, शाश्वत, व अटल होता है। यही कारण था कि इन्होंने कभी भी सत्य के समक्ष असत्य को नहीं स्वीकारा। यही नहीं इन्होंने तो सदैव लोकमानस को यह प्रेरणा दी कि- ‘प्राणादपि प्रत्ययो रक्षितव्य’
यानी प्राण देकर भी विश्वास बनाए रखना चाहिए।[…]

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मेरे कानों के लोल़िये तोड़े तो तोड़ लेना

जब-जब सत्ता मदांध हुई तब-तब जन सामान्य पर अत्याचारों का कहर टूटा है। राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास के गर्द में ऐसी अनेक घटनाएं दबी पड़ी है जिनका उल्लेख इतिहास ग्रंथों व ख्यातों के पन्नों से ओझल है परंतु लोकमानस ने उन घटनाओं का विवरण अपने कंठाग्र रखा तथा पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित करता रहा है। यही कारण है कि उक्त घटनाएं लोकजीव्हा पर आसीन रहकर भूत से वर्तमान तक की सहज यात्रा करती रही है।
हालांकि बीकानेर के शासकों के अपनी जनता के साथ मधुर संबंध रहें थे लेकिन दो-तीन शासकों के समय में इन संबंधों में कड़वाहट तब आई जब कान के कच्चे शासकों ने कुटिल सलाहकारों की सलाह अनुसार आचरण किया। ऐसे में उस सलाह के भयावह परिणाम आए तथा शासक अपयश के भागी बने।
ऐसी ही एक घटना बीकानेर महाराजा रतनसिंहजी के समय सींथल गांव में घटी।[…]

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मैंने तुझे स्तनपान करवाया है!

…जब हम मध्यकाल का इतिहास खंगालते हैं तो ऐसे क्रूर अध्याय हमारे सामने आते हैं जिन्हें पढ़कर या सुनकर हमारा हृदय द्रवित हो उठता। पश्चिम राजस्थान में ऐसे छोटे-मोटे कई सामंत हुए हैं, जिन्होंने अपने पूर्वजों की पुनित परंपराओं को तिलांजलि देकर ऐसे कलुषित अध्याय सृजित किए जिनका कलंक अभी तक नहीं मिट पाया है।

ऐसा ही एक किस्सा है झांफली गांव की रांणां माऊ व कोटड़ा के राणा दुर्जनसाल का।…

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मेघवाल़ बिनां धण्यां रो नीं है

[….]जब हम मध्यकालीन राजस्थान के मौखिक इतिहास का श्रवण करते हैं तो तत्कालीन सत्ता और सत्ता के कारिंदों के अत्याचारों की ऐसी-ऐसी घटनाएं सुनने को मिलती है कि सुनकर हमारा हृदय करुणार्द्र हो जाता है।
ऐसी ही एक घटना है झांफली गांव की गोमा माऊ की।
गोमा माऊ का जन्म बाल़ेबा के पूनसी बारठ जसराजजी के घर उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में हुआ था। यहां यह उल्लेख्य है कि जसराजजी को संतान प्राप्ति प्रौढावस्था में हुई थी। इस खुशी में उन्होंने तमाम स्थापित परंपराओं को त्यागते हुए बेटी के जन्म पर न केवल गुड़ बंटवाया अपितु ढोलियों को बुलाकर मंगल गीतों के साथ खुशियां भी मनाई।[…]

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मैं जैसी तेरी मा वैसी ही जालमे की

ऐसी ही एक घटना है, लोकहितार्थ अपना तन अग्नि को समर्पित करने वाली अमरां माऊ की। अमरां माऊ का जन्म वि. की उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में कोडां गांव के रतनू हरदासजी धनजी रां के घर हुआ था। अमरां माऊ का ससुराल पुसड गांव में था। पुसड़ में मीसण जाति के चारण हैं। पुसड की सीमा धारवी गांव से लगती है और धारवी खाबड़िया राठौड़ों का गांव है। यहां के निवासी होने के कारण यह धारोइया कहलाते हैं।
पुसड के चारण धनवाल़ तो थे ही साथ ही खेती भी खूब करते थे लेकिन आए चौमासे सूरो और कलो धारोइयो इनके खेतों में उजाड़ कराते थे जिसके कारण हमेशा विवाद रहता था।[…]

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बेटी का अपमान असह्य है (कलू माऊ)

…कोडा गांव की धरती के रजमे का ही कारण है कि यहां आई और जाई दोनों में देवीय गुणों के समुज्ज्वल दर्शन होते हैं। इन्होंने अन्याय, अत्याचार, शोषण, और साधारणजन के हितार्थ जमर की ज्वालाओं में अपने प्राण समर्पित करते समय किसी भी प्रकार की हिचकिचाहट महसूस नहीं करके पश्चिम राजस्थान में ‘आ कोडेची है’ के गौरवपूर्ण विरुध्द से अभिमंडित हुई। इसी श्रृंखला में एक नाम आता है कलू (कल्याण) माऊ का।
कलू माऊ का जन्म वि. की अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में कोडा गांव के रतनू गजदानजी के घर हुआ था-
प्रसिद्ध डिंगल कवि कैलाशदानजी झीबा अपनी रचना ‘कलू मा रा छंद’ में उल्लेख करते हैं-

धन ऊजल़ कोडा धरा, दूथी धन गजदान।
धन्न धन्न कलु धीवड़ी, उण घर जनमी आय।[…]

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गीत भाटी तेजमालजी रांमसिंहोत रो

इमां अथग आतंक रो घालियो अवन पर, चहुवल़ घोर अनियाव चीलो।
बहंता जातरु घरां में बाल़ पण, हियै सुण बीहता नांम हीलो।।1
असुर उण हीलियै बीहाया अनेकां, कितां नै लूंटिया सीस कूटै।
घणां रा खोसनै मार पण गीगला, लखां नै उजाड़्या लियै लूंटै।।2[…]

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शरणागत की रक्षार्थ प्राण अर्पित किए- (मा पुनसरी एक परिचय)

हमारी संस्कृति के मूलाधार गुणों में से एक गुण है शरणागत की रक्षा अपने प्राण देकर भी करना। ऐसे उदाहरणो की आभा से हमारा इतिहास व साहित्य आलोकित रहा है, जिसका उजास सदैव सद्कर्मों हेतु हमारा पथ प्रशस्त करता है।

जब हम अन्य महापुरूषों के साथ-साथ चारण मनस्विनियों के चरित्र का पठन या श्रवण करते हैं तो ऐसे उदाहरण हमारे समक्ष उभरकर आते हैं कि हमारा सिर बिना किसी ऊहापोह के उनके चरणकमलों में नतमस्तक हो जाता है।

ऐसी ही एक कहानी है गुजरात के कच्छ प्रदेश की त्याग व दया की प्रतिमूर्ति मा पुनसरी (पुनश्री) की।[…]

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सबै मिनख है एक सम (मा जानबाई एक परिचय)

…जब हम चारण देवियों का इतिहास पढ़ते हैं अथवा सुनते हैं तो हमारे समक्ष ऐसी कई देवियों के चारू चरित्र की चंद्रिका चमकती हुई दृष्टिगोचर होती है जिन्होंने साधारणजनों तथा खुद की संतति में कोई भेदभाव नहीं किया।

जिस छुआछूत को आजादी के इतने वर्षों बाद भी अथक प्रयासों के बावजूद हमारी सरकारें पूर्णरूपेण उन्मूलन नहीं कर सकी उसे हमारी देवियों ने पंद्रहवीं सदी व अठारहवीं सदी में ही अपने घर से सर्वथा उठा दिया था।

ऐसी ही एक देवी हुई है जानबाई। जिन्होंने छूआछूत को मनुष्य मात्र के लिए अभिशाप माना तथा उन्होंने इस अभिशिप्त अध्याय का पटाक्षेप अपने गांव डेरड़ी से किया।…

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