शरणागत की रक्षार्थ प्राण अर्पित किए- (मा पुनसरी एक परिचय)

हमारी संस्कृति के मूलाधार गुणों में से एक गुण है शरणागत की रक्षा अपने प्राण देकर भी करना। ऐसे उदाहरणो की आभा से हमारा इतिहास व साहित्य आलोकित रहा है, जिसका उजास सदैव सद्कर्मों हेतु हमारा पथ प्रशस्त करता है।

जब हम अन्य महापुरूषों के साथ-साथ चारण मनस्विनियों के चरित्र का पठन या श्रवण करते हैं तो ऐसे उदाहरण हमारे समक्ष उभरकर आते हैं कि हमारा सिर बिना किसी ऊहापोह के उनके चरणकमलों में नतमस्तक हो जाता है।

ऐसी ही एक कहानी है गुजरात के कच्छ प्रदेश की त्याग व दया की प्रतिमूर्ति मा पुनसरी (पुनश्री) की।[…]

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सबै मिनख है एक सम (मा जानबाई एक परिचय)

…जब हम चारण देवियों का इतिहास पढ़ते हैं अथवा सुनते हैं तो हमारे समक्ष ऐसी कई देवियों के चारू चरित्र की चंद्रिका चमकती हुई दृष्टिगोचर होती है जिन्होंने साधारणजनों तथा खुद की संतति में कोई भेदभाव नहीं किया।

जिस छुआछूत को आजादी के इतने वर्षों बाद भी अथक प्रयासों के बावजूद हमारी सरकारें पूर्णरूपेण उन्मूलन नहीं कर सकी उसे हमारी देवियों ने पंद्रहवीं सदी व अठारहवीं सदी में ही अपने घर से सर्वथा उठा दिया था।

ऐसी ही एक देवी हुई है जानबाई। जिन्होंने छूआछूत को मनुष्य मात्र के लिए अभिशाप माना तथा उन्होंने इस अभिशिप्त अध्याय का पटाक्षेप अपने गांव डेरड़ी से किया।…

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श्री करनीजी ने दी #महराणगढ़ की नींव

…यही नहीं ऐसे इतिहासकारों ने ऐतिहासिक व सांस्कृतिक संदर्भों को भी जनमानस की स्मृति से हटाने हेतु अपने इतिहास ग्रंथों में शामिल नहीं किया।

ऐसा ही एक सांस्कृतिक गौरव बिंदु है जोधपुर गढ़ की नींव करनीजी के हाथों निष्पादित होना।

डिंगल काव्य सहित कई जगह इस बात के संदर्भ मिलते हैं लेकिन आधुनिक इतिहासकारों में केवल किशोरसिंहजी बार्हस्पत्य को छोड़कर अन्य किसी ने इस महनीय बिंदु को उल्लेखित नहीं किया।[…]

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मातृ रूपेण संस्थिता

स्त्री की संपूर्णता व साफल्यमंडित जीवन का सारांश है मातृरूप का होना। जरूरी नहीं है कि मा जन्मदात्री ही होती है, मा वो भी होती है जो अपने ममत्व की सरस सलिला से दग्ध हृदय का सिंचन करती है तथा अपने स्नेह के आंचल में व्यथित व व्याकुल हृदयों को निर्भय होकर विश्रांति की शीतल छाया उपलब्ध करवाती है।
जब हम मध्यकालीन चारण काव्य का अध्ययन करते हैं तो निसंदेह हमारे सामने मानवीय मूल्यों के रक्षण तथा जीवमात्र के प्रति असीम दया के उदात्त उदाहरण मिलते हैं।
ऐसी ही एक दया, समर्पण, स्नेह व ममत्व की चतुष्टय दृष्टिगोचर होती है बाईस बाइयां की कथा।[…]

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ऊभी आई हूं अर आडी निकल़ूंली

राजस्थानी साहित्य में आपां विशेषकर चारण-काव्य पढां या उण माथै लिख्योड़ी समीक्षावां या टिप्पणियां पढां तो आपांरै साम्हीं एक बात अवस आवैली कै चारण-काव्य में फखत अतिशयोक्ति अर ठकुरसुहाती ई मिलैला।
इण विषय में म्हारो ओ विनम्र निवेदन कै ऐड़ो कुणसो काव्य या कवि हुयो है जिकै आपरै काव्य-नायक रो चरित्र चित्रांकन करती वल़ा इण अलंकार रो प्रयोग नीं कियो हुव ? अर ठकुरसुहाती रै विषय में म्हारो निवेदन है कै एकर ऐ चारण कवियां रो विसर काव्य अवस पढै। जिण लोगां माथै उणां लिख दियो पण आपां आज रा तथाकथित निडर आलोचक उणां री संतति नै सुणावता ई थरका करां।
ऐड़ी ई एक बात नाणै ठाकुर चिमनसिंह अर उणरै कुंवर लालसिंह री है, पण असल में ऐ बात नायक नीं है। बात नायिका री है अर उवा है लालसिंह री जोड़ायत अगरां।[…]

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रंग रै बादरिया

जोधपुर माथै महाराजा मानसिंहजी रो राज। मारवाड़ मोटी रियासत ही सो सीमावां री चौकस निगै राखणो आंझो काम हो, क्यूंकै मानसिंहजी रो घणकरोक बखत दोघड़चिंता अर आपरां सूं ई इज सल़टण अर खसण में बीतो।
आदमी दूजां सूं जोरदार राटक बजाय सकै पण घर रां सूं सल़टणो अबखो काम हुवै। भाई खाली बेटी नीं परणीजै बाकी वै सगल़ा थोक करै जिणसूं आदमी चिंता अर रीस री झाल़ में झुसल़ीजतो रैवै।
कविवर करमाणदजी मीसण सही ई कह्यो है कै संप जैड़ी कोई बीजी चीज नीं है। जे संप नीं है, मनां में तेड़ां है तो लंप जैड़ो कमजोर घास ई भाखर रो माथो भांग आपरी जड़ां लोप लैवै-

करमाणद आणद कहै, सबसूं प्यारो संप।
राय पड़ै सिर पत्थरां, जद जड़ लोपै लंप।।[…]

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बीकानेर-बखांण

।।छंद-त्रोटक।।
इल़ जंगल़ मंगल़ देश अठै।
जुड़ दंगल़ जीपिय सूर जठै।
थपियो करनी कर भीर थही।
सद बीक नरेसर पाट सही।।1
जगजामण आप देसांण जठै।
उजल़ी धर थान जहान उठै।
गहरा जल़ धूंधल़ धोर घणा।
तर बोरड़ कैरड़ जाल़ तणा।।2[…]

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जस री नदियां जगत में।

दातार अर दातारगी री बातां सुणां तो मन मोद सूं भर जावै कै इण धरती माथै एक सूं बधर एक दातार हुया है। जिणांरी उदात्त मानसिकता अर ऊजल़ चरित्र री ओट लेय ईश्वरीय शक्ति नै ई आपरो काम कढावण सारू इणांनै आदेश दैणो पड़्यो अर इधकाई आ कै इणां उण आदेशां री पाल़णा में रति भर ई ढील नीं करी।

ऐड़ी ई एक गीरबैजोग बात उण दिनां री है जिण दिनां जामनगर माथै जाम सत्रसालजी रो राज हो। सत्रसालजी, जाम रावल जैड़ै मोटै दातार री परंपरा में हुया। जिणां रै विषय में किणी कवि कह्यो है–

हाल हिया जा द्वारका, करां ज उत्तम कांम।
जातां जादम भेटसां, वल़ता रावल़ जांम।।

सत्रसालजी ई वीर, साहसी अर दातार नरेश हा।[…]

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जोगमाया रो जस

।।छद – भुजंगी।।
नमो हींगल़ा मात प्रख्यात नामी।
पुणा मातरी ख्यात नै कूण पामी।।
रसा देवियां देव सिर्ताज राजै।
भणै जाप प्राणी तणा पाप भाजै।।१।।

मही थान बीलोचिसथान मंडै।
खमा कोपियां केवियां सीस खंडै।।
वसू वीदगां जात चित्तार आई।
अगै धार ओतार हजार आई।।२।।[…]

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नीतिपरक सवैया

सठ बेच बजारन हीरन को,
मन मोल कथीर करावत है।
अस के बदले मुढ रासभ ले,
निज भाग अथाग सरावत है।
तड गंग सुचंग सों नीर तजै,
धस कीचड़ अंग पखारत है।
कवि गीध अमोलख मानव जीवन,
झेडर झुंड गमावत है।।[…]

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