मेहाई सतसई – नरपत आसिया “वैतालिक”

मेहाई सतसई

कवि नरपत आसिया “वैतालिक” कृत

अमर शबद रा बोकडा, रमता मेल्या राज।
आई थारे आंगणैं, मेहाई महराज॥
(शब्द रूपी अमर बकरा हे माँ आई मेहाई महराज आपरा मढ रे आंगण में रमता मेल रियो हूँ।)

» Read more

साँवरा!बाजी खेलो! चोपड़ ढाल़ी!

साँवरा! बाजी खेलो! चोपड़ ढाल़ी!
हारूं तो हरि दासी थोंरी, जीत्यां थें मारा वनमाल़ी!

नटनागर जाजम है ढाल़ी, बैठो आप बिचाल़े।
म्हूँ बैठूं चरणाँ रे नेड़ी, पीव पलांठी वाल़े।।
धवली कबड़ी रख धरणिधर, म्हनै दिरावो म्हारी काल़ी।।१

साँवरा! बाजी खेलो चोपड़ ढाल़ी!
हारूं तो हूं दासी थोंरी, जीत्यां थें मारा वनमाल़ी![…]

» Read more

🌺चाय🌺 🌻ग़ज़ल🌻

मीठी मिसरी वाली चाय!
या हो बिलकुल काली चाय!

दूध मिलाकर पीते जब भी,
लगती तभी निराली चाय!

लेमन वाली, अदरक वाली,
मन को दे खुशहाली चाय!

हरा पुदीना इसमें डाला,
नहीं फकत यह खाली चाय![…]

» Read more

श्री करनी सुख रूप

लाठी लोवड़ियाल़ री, काठी जिणरी मार।
लागै पण लाधै नहीं, वीसहथी रो वार।।
पग पग पातक पेखियौ, जगै जगै पर झूठ।
इण सूं धर जांगल़धणी, अंब अराधूं ऊठ।।
करनी! जरणी धरणि री, तरणी करणी पार।
दुखहरणी बरणी इहग, सुख करणी संसार।।
खेंचरनी भुचरनी मां, दलणी दुष्ट हजार।
करनी बरनी मुकुटमणि, सरणी-अशरण-सार।।[…]

» Read more

रंग रे दोहा रंग – सखी!अमीणो साहिबो

काव्य का सृजन एक निरंतर प्रक्रिया है जो अनवरत कवि के मस्तिष्क में चलती रहती है। अच्छे कवि या लेखक होनें की प्रथम शर्त यह है कि आप को अच्छे पाठक होना चाहिए। कई बार हम अपने पूर्ववर्ती कवियों को पढते है तो उनके लेखन से अभिभूत हुए बगैर नहीं रह सकते। आज मैं मेरे खुद के लिखे ही कुछ दोहे आपको साझा कर रहा हूं जो मैंने डिंगल/राजस्थानी के प्रसिद्ध कवि बांकीदास आसिया की अमर पंक्ति “सखी! अमीणो साह्यबो” से प्रेरणा लेकर एक साल पहले लिखे थे। बांकीदास ने अपने ग्रंथ सूर छत्तीसी में “सखी! अमीणों साह्यबो” में उस काल के अनुरूप नायिका से वीर पत्नी के उद्गार स्वरूप वह दोहै कहलवाये थे।

मैं अपने बनाए दोहे यहाँ पर आप को साझा करूं उससे पहले कविराजा बांकीदास आसिया जिनकी एक अमर पंक्ति ने मुझ जैसे अकिंचन को लिखने का एक नया विषय दिया उनके दोहै साझा करता हूं।

सखी! अमीणों साह्यबो, बांकम सूं भरियोह।
रण बिगसे रितुराज में, ज्यूं तरवर हरियोह।।
वीर योद्धा की नायिका अपनी सहेली से कहती है “हे सखी मेरा प्रियतम वीरत्व से भरा हुआ है। वह युद्ध में इस प्रकार विकसित(खुश)होता है, जिस प्रकार बसंत रितु के आगमन पर पेड हरा भरा हो जाता है।[…]

» Read more

🌺हनुमान वंदना🌺

🌺छंद मोतीदाम🌺
असीम! नमो वपुभीम! अनंत!
सुसेवित-सिद्ध-रू-किन्नर संत!
महा वरवीर! महारणधीर!
सदा अनुरक्त-सिया रघुवीर!
कराल! नमो वपु-बाल! कृपाल!
महाभड़! मानस-मंजु-मराल!
महागुणवान! कपीश! महान! नमो हड़ुमान नमो हड़ुमान! १[…]

» Read more

🌺કાગળ પર🌺

લૂ ની જેવા લખું નિસાસા કાગળ પર!
હરપળ નાટક રોજ તમાશા કાગળ પર!

તને પામવા લઉં સહારો પેન પત્ર નો,
ને સરવાળે મળે નિરાશા કાગળ પર!

ડરી ગયો છું નથી હવે જીવવાનો આરો,
કોણ મોકલે અમને જાસા કાગળ પર![…]

» Read more

🌺रंग रे दोहा रंग – हंस और बगुला🌺

हंस और मानसरोवर का लोभ संवरण करने से ज्यादातर साहित्यकार खुदको रोक नहीं पाए है। आज मैं भी हंस, सरोवर, तरूवर और बगुला आदि पात्र/प्रतीकों से रचे गढे पुराने कवियों के कतिपय दोहे रूपी मौक्तिक आप सभी गुणीजन-पाठक-मराल के लिए राजस्थानी साहित्य/लोक साहित्य के मानसरोवर से चुन चुन कर प्रस्तुत कर रहा हूं।

सुण समदर सौ जोजना, लीक छोड़ मत जाह।
छोटा छीलर ऊझल़ै, तै घर रीत न आह।।
हे! सौ योजन तक फैले समुद्र तू अपनी सीमा मत लांघ। अपनी लीक से आगे मत जा। छोटे पोखर तालाब ही छलकते है क्योंकि वह अधूरे है। छलकना तुम्हारा स्वभाव नहीं। घर तुम्हारे घर की रीति या परंपरा नहीं है।

हीलोल़ा दरियाव रा, झाझा हंस सहंत।
बुगला कायर बापड़ा, पहली लहर पुल़ंत।।
समंदर की अनगिनत लहरें तो हंस ही झेल सकता है। बगुले जैसे कायर तो पहली लहर में ही धराशायी हो जाते है। यह बगुलों के बस की बात नहीं है।[…]

» Read more

रंग रे दोहा रंग – जोगमाया को रंग

शक्ति की भक्ति का पर्व चैत्र नवरात्र अपने चरमपर है। और अभी अभी ही फागुन और बसंत बीता है। लगता है फागुन के पलाश का रंग हमारे तन मन से अभी उतरने का नाम ही नहीं ले रहा है। जैसा कि पहले ही बता चुका हूं। राजस्थानी दोहा साहित्य में रंग के दोहों की एक भव्य परंपरा रही है। यह परंपरा आज भी आप किसी सुदूर थली थार के रेगिस्तान में गांव, चौपाल, ढाणी आदि के सुबह सुबह के मेल मिलाप (रेयाण)आदि में आप को ढूंढने पर जरूर दिखाई पडेगी।[…]

» Read more

🌺रंग रे दोहा रंग – हंस और काग🌺

हंस को प्राचीन काव्य में, खास कर लोक साहित्य में खुब महिमान्वित किया गया है। हंस को आत्मा के प्रतीक रूप में भी कई संत कवियों ने प्रयुक्त किया गया है। पुराने जमाने में साधु संतो फकीरों और दिव्यगुणों से युक्त औलिया पुरूषों के आगे परमहंस बिरूद लगाया जाता था। जैसे कि रामकृष्ण परमहंस। आज भी बड़े बड़े संत महात्मा और महामंडलेश्वर अपने आगे परमहंस का बिरूद लगाते हुए आप को मिल जाएगें।

हंस के संबोधनी-काव्य दोहा, अन्योक्तियां, प्राचीन भजन, संस्कृत सुभाषित आदि से भारतीय साहित्य भरा पड़ा है। हंस में नीर क्षीर को परखने की द्रष्टि है, कला है, जो उसे अन्य पक्षीयों से अलग करती है। हंस मां सरस्वती का वाहन है। कवि नाथू सिंह महियारिया ने अपने ग्रंथ “वीर सतसई” में हंस जो कि सदैव मोती का चारा चुगता है उस को आधार बनाकर सरस्वती की श्रेष्ठता सिद्ध करने की कोशिश करी है। दोहा कुछ यूं है।

सुरपति वाहण तरु भखै, नरपति वाहण नाज।
तौ वाहण मोती चुगै, थूं सारां सिरताज।।[…]

» Read more
1 2 3 4 5 29