ग़ज़ल – ख़ामख़ा ही क्यों किसी से वैर पाला आपने

ख़ामख़ा ही क्यों किसी से वैर पाला आपने,
क्यों किसी की आबरू पे कीच डाला आपने

बेवजह ही वहम पाला या अहम में पड़ गए,
खून अपना व्यर्थ में ही क्यों उबाला आपने

आपका ही का ‘हेड’ था ओ ‘टेल’ भी थी आपकी,
क्यों मगर हर बार फिर सिक्का उछाला आपने

छाँह में जिनके पली हैं पादपों की पीढियां,
प्रेम के उन बरगदों को ना संभाला आपने[…]

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भूल न करणी भूल

बोयां कांटा बापजी, फळै न लागै फूल
जगबरती नैं जाणतां, भूल न करणी भूल
भूल न करणी भूल, इयां मत काढ़ो आंटा
बणी बणाई बात, बिगड़सी बोयां कांटा।[…]

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अड़वाँ नैं ओळमा

हा रूप रूपळा रूंख रूंख री, डाळी डाळी हेत भरी।
हो हरियो भरियो बाग बाग में, बेल लतावां ही पसरी।
खिलता हा जिणमें फूल, फूल वै रंग रंग रा रळियाणां।
पानां पानां पर पंछीडा, मंडराता रहता मन भाणां।
बो बाग दिनो दिन उजड़ै है, सो कहो कठै फ़रियाद करां।
(म्हे) लिखां ओळमा अड़वाँ नैं, या खुद माळी सूं बात करां।।[…]

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भारत री छत्राणी

थारै मन री बात लाडेसर, म्हारै सूं अणजाणी के।
जे आँख्यां में पाणी ल्याऊं, भारत री छत्राणी के।

कन्त हजारी बाग जेळ में, बेटो जेळ बरेली में।
देवर जी जंगळ में भटकै, गोरा घुसिया हेली में।
जामाता जूझै गोरां सूं, सगळां मन में ठाणी के।
जे आँख्यां में पाणी ल्याऊं, भारत री छत्राणी के।[…]

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बीज अर माटी री बंतळ

जद बीज जमीं में गाडीज्यो,
अंतस अकुलायो दुख पायो।
बचबा रा गेला बंद देख
रोयो घबरायो पछतायो।
तद माटी उण सूं यूं बोली
रे बीज मती ना घबरावै।
जो जुड़ै जमीं सूं जड़ उणरी
कोई पण काट नहीं पावै।[…]

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वाह रे कळजुग रा कंवरां

वाह रे कळजुग रा कंवरां
थांरा वारणा लेऊं कै लत्ता
बेटी रा बापां!
कांण कायदां री बेकुंटी ई काढ़ दी
कीं तो राम नैं माथै राख्यो हुतो
सगळा ई बैठ’र सोवै पण
थे तो ऊभा रा ऊभा ई सोयग्या
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मज़दूरां री पीड़

मज़दूरां री पीड़ पिछाणै इसड़ी आँख बणी ही कोनी
इण पीड़ा नै तोल दिखाद्यै इसड़ी ताक तणी ही कोनी

मज़दूरां री आ मजबूरी हर मजबूरी सूं मोटी है
म्हांरै चीज असंभव जग में, वा राम नहीं, बस रोटी है[…]

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नवसंवत्सर की शुभाकांक्षा

कुशल-क्षेम रह कुटुंब में, नेम-फेम नित-नित्त।
हरख-हेम हर घर हुवै, चैन-प्रेम हर चित्त।।

नव संवत्सर नेह रो, गेह-गेह ह्वै गान।
रोग देह सूं दूर रह, दखै एह गजदान।।

मही कोरोना मुक्त व्है, सुखी हुवै संसार।
अन्न-धन्न हर आँगणै, भरिया रहै भंडार।।[…]

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पुस्तक समीक्षा: जीवटता री जोत जगावतो अंजसजोग उल्थौ: चारु वसंता

साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली रै अनुवाद पुरस्कार 2019 सूं आदरीजण वाळी काव्यकृति ‘चारु वसंता’ मूळ रूप सूं कन्नड़ भासा रो देसी काव्य है, जिणरा रचयिता नाडोज ह.प. नागराज्या है। इण काव्य रो राजस्थानी भावानुवाद करण वाळा ख्यातनाम साहितकार है-डाॅ. देव कोठारी, जका आपरी इतियासू दीठ, सतत शोधवृत्ति अर स्वाध्याय प्रियता रै कारण माड़ भासा राजस्थानी रा सिरै साहितकारां में आपरी ठावी ठौड़ राखै। डाॅ. कोठारी प्राचीन राजस्थानी साहित्य, खास कर जैन साहित्य रा उल्लेखणजोग विद्वान है। हर काम नैं पूरी ठिमरता अर दिढता सूं अंजाम देवण री स्वाभाविक आदत रा धणी डाॅ. कोठारी ‘चारु वसंता’ काव्य रो उल्थौ ई घणै धीरज सूं कियो है।[…]

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आसै बारठ रै चरणां में

मधुसूदन जिण सूं रीझ्यो हो,
वरदायी जिणरी वाणी ही।
बचनां सूं जिणरै अमर बणी,
ऊमा दे रूठी राणी ही।
कोडीलै बाघै कोटड़ियै,
सेवा जिण कीनी सुकवि री।
मरग्या कर अमर मिताई नैं,
परवाह करी नीं पदवी री।

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