यह मंदिर मंदिर नहिं केवल, यह गौरव सौगात है

 आज प्रफुल्लित अवध धरा है, पूर्ण अधूरे काम हुए पुनः प्रतिष्ठित नव मंदिर में, भारत गौरव राम हुए सदियों की काली अंधियारी, जैसे बीती रात है। यह मंदिर मंदिर नहिं केवल, यह गौरव सौगात है।।01।। आज उल्लसित कण-तृण सारे, स्वयं पधारे रघुनंदन। लेत बलैयां झुकी लताएं, करते पादप अभिनंदन। मधुर मधुर स्वर छेड़ विहंगन, सबका हिय हरखात है। यह मंदिर मंदिर नहिं केवल, यह गौरव सौगात है।।02।। मंदिर की क्या बात राम के, मंदिर हर इक ग्राम मिले। घर घर में मंदिर भारत के, हर मंदिर में राम मिले। हर हिन्दू के स्वाभिमान का, नाता इसके साथ है। यह […]

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ओ कोरोना पाछो आयो

ओ कोरोना पाछो आयो।
टाबरियां मिल ढोल घुरायो।
नव्वीं तक की छुट्टी होगी,
दसवीं वाळां मुँह लटकायो।
निर्देशकजी सिर खुजलायो।
ओ कोरोना पाछो आयो।।01।।[…]

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नाथी का बाड़ा के निमित्त

किसी भी भाषा के मुहावरे एवं कहावतें उस भाषा के सांस्कृतिक इतिहास एवं सामाजिक विकास की कहानी के साक्षी होते हैं। इन कहावतों में उस क्षेत्र के लोगों की मानसिकता भी परिलक्षित होती है। हमारे यहां पुरुष प्रधान मानसिकता हावी रही है अतः बहुधा उसके प्रभाव से कहावतों के निर्माण को देखा समझा जा सकता है। पापां बाई रो राज,  नाथी रो बाड़ो, खाला रो घर, पेमली रा परचा आदि कहावतों के पीछे भी कहीं न कहीं हमारी कुंठाओं का हाथ है।[…]

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चुगलखोर री चावना

सजन सबै संसार नैं, चुगली हंदो चाव।
गजादान चुगली बिना, बंतळ बेरस साव।
बंतळ बेरस साव, हुई बिन हुई हथाई।
भरै पेट में गैस, रंच नहिं रितै रिताई।
निंदा-रस निठतांह, रस-नौका मझधार में।
शोध-बोध-संबोध, सुकवि कहै संसार नैं।।01।।[…]

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राजस्थानी साहित्य रा आगीवाण – डॉ. शक्तिदान कविया – विनिबंध

डिंगल काव्यशैली रा मर्मज्ञ अर राजस्थानी रा चावा-ठावा साहित्यकार डॉ. शक्तिदान कविया रो जलम 17 जुलाई 1940 (सरकारी कागजां रै मुजब) नै जोधपुर जिलै री शेरगढ तहसील रै गांव ‘बिराई’ में हुयो। आपरै पिताजी रो नाम गोविन्ददानजी कविया अर माताजी रो नाम फूलांबाई हो। गोविन्ददानजी डिंगल अर पिंगळ रा नामी विद्वान हा। काव्यपाठ रा मर्मज्ञ, सतोगुणी अर विलक्षण स्मृति रा धणी हा। चौखळै में आछी प्रतिष्ठा ही, पंच पंचायती में सखरी पैठ ही, छत्तीस ई कौम रा लोग वां री बात मानता। आपरी ग्राम पंचायत रा निर्विरोध उपसरपंच रैया। पंचायत समिति-बालेसर में सहवृत्त सदस्य रै रूप में लब्धप्रतिष्ठ व्यक्ति रै रूप में सर्वसम्मत मनोनीत हुया। 85 बरस री उमर ताई डिंगल-काव्यपाठ सारू आकाशवाणी आवता-जावता।[…]

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राजस्थानी लोक मानस में गाँधी

राजस्थानी लोक जीवन में एक लोकोक्ति प्रसिद्ध है कि ‘‘ज्यांरी सोभा जगत में, वांरो जीवण धन्न’’ अर्थात इस संसार में उन्हीं लोगों का जीवन धन्य माना जाता है, जिनकी सुकृति की शोभा लोकजिह्वा पर विराजमान रहती है। इस दृष्टि से विचार किया जाए तो विगत एक सदी में लोककंठ पर किसी एक व्यक्ति की सर्वाधिक शोभा विराजमान रही है तो वह नाम है- श्री मोहनदास कर्मचंद गाँधी। राष्ट्रपिता के विरुद से विभूषित महान व्यक्तित्व के धनी महात्मा गाँधी अपनी रहनी-कहनी की एकरूपता, उदात्त जीवन-दृष्टि, मानवीय मूल्यों के प्रति दृढ़ निष्ठा, सत्य में अडिग विश्वास, आत्मबल की पराकाष्ठा, राष्ट्र के प्रति अनुराग, वक्त की नजाकत को पहचानने के कौशल, अन्याय के प्रबल प्रतिकार और अहिंसा के सबल समर्थन इत्यादि वैयक्तिक विशिष्टताओं के कारण भारतीय लोकमानस पर अपनी अमिट छाप छोड़ने में साफल्यमंडित हुए। […]

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राजस्थानी लोककथाओं के आधुनिक रूपांतर का पर्याय: श्री बिज्जी

जब हम राजस्थानी कथा साहित्य एवं लोक साहित्य की बात करते हैं तो पद्मश्री विजयदान देथा का नाम अनायास ही हमारी जुबां पर आ जाता है। अेक व्यक्ति जिसने अपनी श्रमनिष्ठ साधना के बल पर राजस्थानी लोक साहित्य को वैश्विक ख्याति दिलाने का श्लाघनीय कार्य किया। इतिहास इस बात का साक्षी है कि कवीन्द्र रवीन्द्र नाथ ठाकुर के बाद हिंदुस्तान के किसी साहित्यकार को साहित्य के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार नहीं मिल पाया। यद्यपि श्री विजयदान देथा जी भी नोबल पुरस्कार प्राप्त नहीं कर पाए लेकिन उन्होंने अपने रचना कर्म के बल पर नोबल पुरस्कार प्रदात्री समिति का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया। जिसका सुखद परिणाम यह हुआ कि राजस्थानी भाषा के किसी साहित्यकार का नाम नोबल पुरस्कार हेतु नामित हुआ और वह नाम और कोई नहीं श्री बिज्जी का नाम था।[…]

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ग़ज़ल – ख़ामख़ा ही क्यों किसी से वैर पाला आपने

ख़ामख़ा ही क्यों किसी से वैर पाला आपने,
क्यों किसी की आबरू पे कीच डाला आपने

बेवजह ही वहम पाला या अहम में पड़ गए,
खून अपना व्यर्थ में ही क्यों उबाला आपने

आपका ही का ‘हेड’ था ओ ‘टेल’ भी थी आपकी,
क्यों मगर हर बार फिर सिक्का उछाला आपने

छाँह में जिनके पली हैं पादपों की पीढियां,
प्रेम के उन बरगदों को ना संभाला आपने[…]

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भूल न करणी भूल

बोयां कांटा बापजी, फळै न लागै फूल
जगबरती नैं जाणतां, भूल न करणी भूल
भूल न करणी भूल, इयां मत काढ़ो आंटा
बणी बणाई बात, बिगड़सी बोयां कांटा।[…]

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