बहू ढक्यां परिवार ढकीजै

BahuDhakyan

च्यारां कानी धमा-धम बाजै। हेलाहेल कर्यां ई कोई नै सिवाय बीं धमचक रै कीं नीं सुणीजै। भयंकर तावड़ै में बळती चामड़ी पर पसीनो भी भाप बण’र उडज्यावै। अैड़ै-छेड़ै हेल्यां ई हेल्यां। कठै ई कोई खाली जाग्यां रो नाम ई कोनी। हरखियो बोल्यो भाइड़ा ईं शहर री गळ्यां-गूंचळ्यां में तो इत्ता फेर है कै आदमी तो कांई बापड़ी हवा नै ई गेलो कोनी मिलै। ईं वास्तै ई अठै इत्ती गरमी है। हरखियै री बात सुण’र अेकर सी सगळा मजदूरड़ा हँस्या पण ठेकेदार नैं आंवतो देख’र कीं बोल्यां बिनां ईं पाछा आप आपरो काम सळटावण में पिल पड़्या। ठेकेदार रो नांम भगवानो हो। बो बात रो पक्को अर खानदानी आदमी हो। ईं खातर बो फालतू री बाखाजाबड़ पसंद नीं करतो। बो तो सगळां नै आ ई कै राखी है कै जित्तो काम करो बित्ता दाम लेवो। काम नहीं तो दाम नहीं।

अेक मजूरियो नूवो ही आयो हो। बीं नै आळटेळ करतां भगवानै ठेकेदार देख लियो। देखतां ई तो भाभड़ाभूत हुय’र सीधो-सीधो बोल्यो भाई तूं जा नरेगा रै फेमन पर लाग। हराम रो खाणो है तो सरकार री योजनावां सूं सीधा जुड़ो। मैणत मजूरी करणी थारै बस री कोनी। भगवानियैं ठेकेदार रै काम बो ई करसी जको राम सूं डरै। जकां रो राम निकळग्यो का खुदोखुद राम नै निकाळ फेंक्यो बां खातर नरेगा री नाड्यां ठीक है, बठै पधारो। भगवानो आयै हप्तै अेक-दो मजूरां नै इयां फटकारतो अर काम सूं निकाळ देतो। पछे होळै सी कहतो अठै सूं जावो, बठै पधारो / जी सोरो म्हारो अर जी सोरो थारो / अठै रैयां म्हारो बिगड़सी ढारो / बठै जास्यो तो बण्यो रैसी सरकारी धारो। भगवानै री काव्यात्मक शैली देख’र हरखियो अपणै आपनै रोक को सक्यो नीं अर बोल्यो वाह! ठेकेदारजी थे तो आशुकवि हो। कांई जोरदार कविता खळकाई है। भगवानै री रीस मोळी पड़गी अर बोल्यो बावळा म्हारै हिंदी अर राजस्थानी दोन्यूं साहित्य रैयोड़ा है। ओ तो घर कैयोड़ो को कर्योनी ईं वास्तै आं ठूंठां सूं माथो लगावां नीं तो कोई आॅफिस में मखमल री कुरसी पर बैठ्ता। अर अेक और बताऊं जे म्हारी ड्यूटी आं नरेगा’ळां पर लाग ज्याती तो सगळां री हरड़ै पैं करा देता। पण हूणी रै हजारूं हाथ है रे भाई, किसै-किसै नै पकड़ां।

भगवानो ठेकेदार बात-बात में आदर्शवादी बणतो हरखियै नै पूछ्यो छोरा तूं कीं पढ्योड़ो लागै। पहली कठै काम करतो हो। कीं लिखा-पढी आवै है के ? हरखियों बोल्यो दसवीं 80 प्रतिशत सूं पास करी पण बापू बीमार हुग्यो जणां पढाई छूटगी। पढाई री बात याद आतां ई हरखियो चिंता रै महासागर में डूबतो सो लाग्यो। विवशता री सुनामी में बरबाद हुयोड़ी आपरी जिंदगाणी बीं री आंख्यां सामी नाचण लागी। पण हरखियै नै आपरै बापू रा सपना अर गुरुवां री बातां याद आवण लागी। बीं रो बापू कैंवतो म्हारो हरखियो तहसीलदार बणसी अर आं पटवार्यां नैं ड्यूटी करणी सिखासी। स्कूल रा गुरुजन आपस में बात करतां, प्रार्थनासभा में अर कोई पर्व पर हरखियै नैं इनाम देवता जणां कैया करता कै ओ छोरो एक दिन गांव रो नाम रोशन करसी। लारली बातां याद कर’र बीं रो मूंढो रूंआंसो हुग्यो। ठेकेदार अर सगळा मजूरियां नै भी हरखियै पर दया अर बेमाता पर रीस आई पण जोर के करता। उणमणै मन सूं भी सही पण हरखियो आपरै काम लाग्यो रैयो अर ठेकेदार थोड़ी ताळ पछै गाडी में बैठ’र दूजी साइड कानी ब्हीर हुयो।

पंद्रह दिन रो पखवाड़ो पूरो हुयां ठेकदार मजूरां री मजूरी चुकावतो। आज सगळां नै रिपिया मिलसी। सगळां आप-आपरी जरूरतां मुजब योजनावां बणा राखी है। आटै-लूण रा चुकायां पछै टाबरां, माईतां अर बहन-सुवासण्यां खातर भी कीं खरीदण री सोची है। सगळा बातां करै कै अबकाळै काम आछो चाल्यो, ईं वास्तै रिपड़िया सावळ मिलसी। हरखियो भी आपरै मन-मन में हिसाब लगावै। बण जोड़्या कै पंद्रह दिनां रा रिपिया तीन हजार पक्का मिलसी। बाकी जग्यां लगोलग पंद्रह दिनां ताणी काम मिलै कोनी अर रोजीनां ओ डर कै केठा आज कोई काम मिलसी का कोनी। कई ठेकेदार मजूरी टिं’गा-टिंगा’र देवै पण भगवानो तो खांतिलो मरद। बात रो पक्को, अेक-अेक नै बुलावै अर करड़ा-करड़ा नोट गिणावै। हरेख नै नोट देवतां बोलै- नगदी नाणां अर बींद परणीजै कांणा। पावली पल्ले तो खोड़ मां ईं चल्ले। सागै-सागै कैवै काका सावळ गिणल्यो। अै नांव-नौ’रै रा कोनी, पूरी खाल बांठा लागगी जद मिल्या है। सावळ संभाळ’र लेज्यावो अर धीरज सूं बरतो। हरखियै भी आपरी बारी आई जद पूरा तीन हजार रिपिया गिण लिया। बीं नै ठेकेदार कैयो- बेटा सावळ गिण लिया। पछै ठेकेदार बोल्यो- हरखिया काम छोड्यां पछै जे दो घंटा कीं कागजिया काळा करै तो पांच सौ रिपिया न्यारा मिलसी। हरखियै नै ठेकेदार भगवानो भगवान जियां लाग्यो अर बण राजी-राजी हां करली।

तीन हजार रिपियां में सूं हरखियै राशन-पाणी रो जुगाड़ कर्यां पछै मकान रो किरायो चुकायो, दूध, दवाई रो हिसाब कर्यो। छेकड़ पांच सौ रिपड़िया बच्या। पूरा पंद्रह दिनां पछै पाछो रिपियो आंख दीखसी, हारी-बीमारी, आणै-टाणै, गांव-गांवतरै में अड़ी-मौकै खातर बण तीन सौ रिपिया आपरी माऊ नै दे दिया अर बोल्यो सावळ संदूक में राखद्यो। अब हरखियै कनै दो सौ-सौ रा नोट बच्या। हरखियै मन में सोची आं रा गाभा ल्यास्यां। गरमी रा दिन हा। दिन रा कोई सात बज्या हुवैला। ओज्यूं घंटै खंड दिन खड्यो हो। हरखियै गाभा खरीदण री सोची तो अेकर तो बीं रो चेहरो चमक्यो पण अगलै ई पल बो कीं गतागम में फंसतो सो लाग्यो। बो मन ई मन सोचण लाग्यो कै दो सौ रिपियां रा गाभा ल्यावणां है अर रिपिया भी कनै है पण गाभा पैली कीं रै ल्याऊं। घर में मा, बापू, बीं री घरा’ळी रुकमा, बो खुद अर बीं रो बेटो चींटिया कुल मिला’र पांच जीव हा अर पांचां रै ई कपड़ा फाट्योड़ा सा ही हा। अेक-अेक कर’र घर रा सगळा सदस्य बीं री आंख्यां सामी आवण लाग्या। बीं देख्यो कै बाबै रै अेक ई धोती है अर बा झीणो न्यातणो हुवै ज्यूं हुगी। बीं सोची ईं धोती रै दुख स्यूं ई बाबै घर स्यूं बारै जावणो छोड़ दियो। अेकर लाग्यो कै अबकाळै तो बाबै री धोती ई ल्यावणी चाईजै। इत्तै में तो बखत री करड़ी मारां झेलती-झेलती दोवड़िज्योड़ी कमर लियां बीं री माऊ दिखी, जकी रै ओढणै रै बीसूं गांठ्या लाग्योड़ी। बो जाणतो कै जद ओढणी चिळज्यावै तो माऊ बीं नै भेळी कर’र गांठ लगाल्यै। जकै स्यूं बा ज्यादा को फाटै नीं। पण अब तो गांठां लागतां-लागतां ओढणी साव छोटी सी अर ओढणी रो नामून जियां ई रैयगी ही, बाकी कपड़ां री भी आ ई हालत ही। हरखियै खुद नै धिक्कार्यो कै देख म्हारै जिसी औलाद नै जलम दे’र बापड़ी मां री आ हालत है। अब बीं सोच्यो पैली मां रै गाभा ल्याणां जरूरी है।

इयां सोचतै हरखियै नै तोतली बोली में पा पा पा पा करतै चींटियै चंचेड़्यो। चींटियो हरखियै रो इकलोतो बेटो हो अर पगां चालणो सीखग्यो हो। हरखियै री नजर मां सूं हट’र चींटियै पर पड़ी अर चींटियै सागै ई चींटियै री मम्मी रुकमा दीखी। हरखियै देख्यो कै बीं रा गाभा तो साव ई लीरा-लीरा हुयग्या। बा धीमै सी बोली थांरै ईं लाडेसर राजकुमार खैंच-खैंच’र म्हारा सगळा गाभा फाड़ न्हाख्या। बा हरखियै सूं मजाक करती सी बोली कै सागण बाप वाळा सा ई लखण है। थांरै दांई ई खींचताण करै अर थां जित्तो ई अचपळो है। चींटियै री मम्मी चींटियै रा लाड करती हरखियै सूं सिकायतां करै ई पण हरखियो तो सांतर-बांतर हुग्यो। बीं रै सामी धरमसंकट हो कै पैली गाभा कीं रै ल्यावै। बापू, मां अर चींटियै री मम्मी तीनां रै गाभां री आज ई खास दरकार लागै। ओज्यूं खुद अर चींटियै री तो बण सोची ही कोनी। हरखियो एकलो ई मन मन में विरोळ करै, नां तो घर रो कोई बीं नै कीं कैवै अर ना ही बो कीं नै ई कीं पूछै। मां अर बापू आपरी बातां में लागग्या, चींटियो अर चींटियै री मम्मी रसोई में जाता रैया।

हरखियो मांचली पर आडो हुयोड़ो आकास में आंख्यां गड़ायां देखै अर लगातार सोचै पण कीं गेलो लाध्यो कोनी। घणी मोटी बात भी कोनी ही बस तीनां में सूं अेक खातर गाभा ल्यावणा हा क्योंकै रिपिया इत्ता ई हा। बो मन में विचार करै जे चींटियै री मम्मी खोड़ली हूंती जणां तो पैली बीं रै ई ल्यावणां हुता, दूजां री बात ई कठै ही पण बा तो बापड़ी रामगाय है, कदै ही कोई अड़ो-ईसको जाण्यो ई कोनी। अर जे माऊ राड़ैगारी हुती तो पैली बीं रै ल्यावणी पड़ती पण माऊ तो माऊ ई है, भूखी सो’गी पण पड़ोसी नै ईं भणक को लागण दी नीं। चींटियै री मम्मी नैं आपरी बेट्यां सूं बेसी मानै अर सारै दिन बीनणी बेटा-बीनणी बेटा करै। चींटियै री मम्मी नै सगळो घर रो काम माऊ अठै आयां पछै सिखायो है पण गांव रां नै कैवती फिरै कै म्हारी बहू काम री तो राछ है। हरखियै री भी बा घणी बडाई करै अर घर रो सगळो काम कणां करल्यै ठा ई को पड़ण द्यै नीं। पण अब तो बापड़ी कीं बूढी हुगी अर कीं नूंवै शहर में आग्या जणां पोळी रैवै नहीं तो गूदड़ां में डोरा घाल’र ही मजूरी कर लेवती। इयां करतां बीं नै आपरै संगळियै नथियै रो बापू याद आग्यो जको रात-दिन दारू पी’र रोळो करतो। नथियै नै अर बीं री मां नै गाळ्यां बकतो। बीं मन ही मन भगवान रो आभार मान्यो अर सोचण लाग्यो कै म्हारो बापू तो गाय रा उपरला दांत है, कदैई जोर सूं बोलेड़ो ई को सुण्यो नीं। ना राव की अर नां देव की। आपरै काम सूं काम राख्यो। पण तकदीर रूसगी जणां बीमारी लागी। बो पाछो रूंवासो हुग्यो अर मन ई मन सोचण लाग्यो कै बापू री तकदीर कांई रूस्योड़ी ही तकदीर तो म्हारी रूसी जको बापू बीमार हुयो’र म्हारी पढ़ाई छूटी।

जियां ई पढ़ाई री बात याद आई’र बींनै आपरी स्कूल रा दिन पाछा चेतै आया। आपरा संगी-साथी, गुरुजन अर अैढै-मौकै आवणियां मेहमानां री बातां याद आई। ईं बीचै बींनै दसवीं कक्षा में पढतां सुण्योड़ी राजस्थानी री अेक कहावत याद आई। कहावत ही- बहू ढक्यां परिवार ढकीजै। बीं नै याद आयो कै गुरुजी बतायो हो कै जकै घरां री बहुआं ओढी-पहरी रैवै, काण-कायदा राखै, बूढ़ै-बडेरां रै आयां घूंघटै रो ओ’लो करै, बां परिवारां री इज्जत कदैई ऊघड़ै कोनी। हरखियै नै आपरी समस्या रै समाधान रो सूत्र हाथ आयो। बो विचार करण लाग्यो कै बहू ढक्यां परिवार ढकीजै ईं बात नै साची मानूं जणां तो पैलपोत गाभा चींटियाळी मम्मी रै ल्यावणा चाईजै। पण बीं नै ओ भी डर हो कै कठै ई जे माऊ अर बापू नै बुरो लागग्यो तो। बो इयां सोचै हो इत्तै में बीं री माऊ कैयो बेटा- सुणां आजकाल दवाई तो मुफत में ई मिलै जणां थारै बापू री दवाई तो सरकारी सफाखानै सूं लियास्यां अर बाकी तूं कैवै कै दुकानां रा उधार रिपिया चुका दिया जणां थारै जे और कोई उळझाड़ नीं हुवै जणां तो बीनणी रै अेक सावळ सो बेस ल्या दै। बापड़ी परण्यां पछै ही आपणै घर री तो कांचळी ई को पैरी नीं। अबकाळै थारै मजूरी ठीक चाली है अर आज तो छोरै बापड़ी रा गाभलिया सफा ई फाड़ दिया। म्हारो तो के है ऊंचा-नीचा कर करा’र धिका लेस्यां पण बापड़ी न्हानी-ल्होड़ी बीनणी फाट्यै कपड़ां अपरोगी लागै। अबार ई अै तीन सौ रिपिया लै अर ईं रै अेक सावळ सौ बेस लिया। सौ-पचास कम पड़ै तो सेठां रै लिखा देई आगलै हप्तै दे देस्यां।

मां री बात सुण’र हरखियै री हिम्मत बढगी पण बो बोल्यो माऊ ! बापू री धोती सफा फाटगी, मैं तो सोच्यो दो सौ रिपियां में बापू री धोती ल्यास्यूं, ईं वास्तै दो सौ मैं पैली ई राख लिया हा। थां नै दिया जका तीन सौ न्यारा है। डोकरी बोली बेटा थारै बापू रै तो कोई पछै ई देखस्यां पैली तूं रुकली रै ल्या अर कीं सावळ ल्याई दो सौ में पार कोनी पड़ै कम सूं कम तीन-साढी तीन सौ तो लागसी ई लागसी। हरखियै माऊ रै हाथ सूं दो सौ रिपिया और ले लिया अर सौ छोड़ दिया, बोल्यो च्यार सौ में तो बेस-बागो आज्यावैलो। इयां कैय’र बो खड़्यो ई बाजार कानी टुरग्यो। चींटियै री मम्मी खातर पीळी साटण रो घाघरो अर सूती ओढणी खरीदली। कीं गोटा-किनारी भी बठै ई मिलै हा जणां ले लिया। पचास रिपिया बच्या जकां नै सावळ जेब में घाल’र घर कानी चाल्यो। अेक दुकान रै आगै लटकता खेलणियां देख’र बो रुकग्यो। दस रिपियां री अेक गाडी चींटियै खातर खरीदली। दस रिपियां रा केळा ले लिया अर बाकी बच्या जका आपरी जेब में घाल’र घरां आयग्यो।

आतां ई गाभा देख्या’र माऊ घणी राजी हुई, चींटियै री मम्मी तो मन ई मन महाराणी बणगी। माऊ बोली बेटा अबकाळै कीं रिपिया बचै तो थारै बापू रै धोती अर गंजी ल्यावणी जरूरी है। कुड़तो तो आं रै कदै ई फाटै ई कोनी। धोतड़ी सफा जबाब दे’गी अर गंजी ई पसीनै में जाबक गळगी। सगळै घर रा लोगड़ा अेक-अेक केळो ले लियो’र खावण लाग्या। चींटियो केळो खांवतो गाड़ी चलावै अर किलकार्यां मारै।

दूजै ई दिन हरखियै री माऊ रुखली नै सागै लेय’र गाभा सींवण नै दे दिया। हाथोहाथ सींवण रो कैय’र घरां आयगी। काम सूं आंवतो हरखियो सींवाई रा रिपिया तीस दे’र गाभा ल्या दिया। रुखली रै थ्यावस कठै, ल्यातां ही पहर’र आयगी। गोरो-निचैर रंग, मोटी आंख्यां, लांबी नस अर ओपतै शरीर पर पीळा कपड़ा अणूंता फूटरा लाग्या। सासू-सुसरै दोन्यां थुथकी न्हाखी। हरखियो भी पहरी-ओढी रुकली नै देख’र खासा राजी हो। सुसरो आसीसां देवतां बोल्यो – कैवणियां साची कैयी है कै – बहू ढक्यां परिवार ढकीजै। परिवार री लिछमी ही परिवार री लाज राखै। डोकरो आसीसां देवै- बेटा दूधां न्हावो अर पूतां फळो, भगवान थांरो भो-भो भलो करै। रुखली होळै सी सासू नै कैयो- बहू ढक्यां परिवार कियां ढकीजै सासू मां ? मैं तो कीं समझी कोनी। परिवार तो सगळां रै गाभा ल्यायां ढकीजसी। अेकली बहू नै ढक्यां परिवार कियां ढकीज्यो। सासू थोड़ी सी हंसी पण कीं बोलती ईं सूं पैली ही सुसरोजी बोलणां सरू हुग्या।

हरखियै रो बापू आपरी हांपीजती सांसां नै सावळ सी संभाळतो बोल्यो बेटा रुकमां ! बहू घर री लिछमी हुवै अर लिछमी पैरी-ओढी ई आछी लागै। जियां गांव री बात बाड़ा बताद्यै बियां ही किस्यै ई घर री साख बीं घर री बीनणी नैं देख’र ई ठा पड़ ज्याया करै। अबार तूं बारै आती-जाती लोगां नै दीखसी जणां थारां नूवां गाभा अर ओपतो शरीर आपणै घर री इज्जत बढ़ासी अर जे थारै तन पर फाट्योड़ा कपड़ा हुवै, मूंढो उतर्योड़ो, पगां में टूटेड़ा लीतरा हुवै जणां देखसी जको ई कैसी देख बापड़ी रा भाग फोरा है जको इयांकला सासरला मिल्या है, जकां कनै कपड़ै-लत्तै रो ई थळ कोनी। अर आ बात भी साची है कै कमाण-खावण री औकात नीं हुवै तो कोई पराई जाई नै क्यों घर छुड़ावै। इयांकली औलाद नैं तो इयां ई फिरण द्यै तबड़का मारती, कोई ब्याव करणो न कोई सगाई पण म्हारो हरखू बेटो तो लाखां में एक है।

हरखियो बोल्यो बापू आज तो महर्षि वेदव्यासजी दांई उपदेश दे रिया हो। पण म्हारो अेक सवाल है कै बहू रै ढकण रो मतलब फकत कपड़ां सूं तन ढकणो का घूंघटो सारणो तो नहीं हुवणो चाईजै। सायरां री बातां इत्ती सीधी कद हुवै, बापू ईं में कीं न कीं पेच जरूर है पण थे तो चींटियै री मम्मी रै गाभा खरीदण नैं म्हारी समझदारी बतावण खातर ईं बात नै अठै फिट बैठा न्हाखी। डोकरो कीं ऊंचो-नीचो हुयो’र बोल्यो – हरखिया बेटा! थारी बा कैबत सुण्योड़ी है कै ”परणीज्या तो कोनी पण, जानां घणी साज्योड़ी है” कीं समझयो ? खैर सुण ! म्हे पढ्या-लिख्या तो कोनी पण स्याणां मिनखां री संगत में रैया, आछी बातां नै सुणी, गोखी अर बां पर चालण री खेंचळ करी। तैं पूछ लियो जणां बताऊं- थे सगळा सुणो अर म्हारो तो के भरोसो है कित्ता दिनां रो हूं पण थांनै आज कीं ग्यान-पारी री खुरचण चटाऊं। जे चाट सको तो चाटो।

डोकरो खंखारो कर’र बोलण लाग्यो- बहू रै ढक्यां परिवार ढकीजण रो मतलब ओ है कै लारला दिनां आपणै परिवार पर दुखां रो पहाड़ टुट्यो। म्हारी बीमारी रै कारण घर में गरीबी रो साम्राज्य हुग्यो। दाळ-रोटी रा लाला पड़ग्या। मजबूरी में थारी पढ़ाई छूटगी। अर घणी बातां के बताऊं घर-बार अर गांव तकातक छोड’र अठै पराई भोम में आणो पड़्यो। थारी माऊ मांदी पड़गी अर मांचो सेयो, मैं सारै दिन मूंढो उबा-उबा’र सांस लेवूं’र खंखार थूकूं। म्हां दोन्यां रो हीड़ो करण में रुकली दिन-रात ऊभी सूकी है पण कदै ई चैंकारो ई नीं कर्यो। ईं वास्तै आज भूख-तिस तो करमां री है पण कोई अेरो-गेरो आ’र आपणी घरबीती बातां रा चासा कोनी ले सकै। अब बता परिवार री इज्जत नैं ढकीढूमी कुण राखी ? बहू राखी नीं।

आ जे ऊत उड़ावणी चा’वती तो म्हां दोन्यां नैं गांव में छोड़’र थारै सागै अेकली शहर में आज्याती अर म्हे तो दोन्यां चला’र कैयो ई हो कै म्हे गांव में ई ठीक हां पण आ जिद कर’र म्हांनै सागै ल्यायी। बियां तो हरेक मा-बाप आपरी औलाद सागै ई रैवणां चा’वै अर म्हे भी थां सूं अेक पल भी न्यारा कोनी हुवणां चा’वां पण जगत नै देख’र जीवां बेटा। जका मां बाप बेटै री घणी धणियाप करै बां री गत माड़ी हुया करै। बेटो माईतां सागै रैवै अर बहू का तो पीहर जा बसै अर का बठै ई कोई न्यारो बारणो काढ’र चुल्हो जगाल्यै। बा सासरा’ळां नै माड़ा बतावै अर सासरा’ळा बीं नै भांडता फिरै। बेटै री धणियाप में बहू तो जावै ई जावै, बेटो भी कठीनलो ई कोनी रैवै। ईं वास्तै माईतां रो भी धरम बणै कै बै आपरै बहू-बेटां नै सावळ परोटै अर अफसराई कीं कम ई करै तो ठीक रैवै। खौ’ड़लै सुभाव रा माईत हुवै जका आपरो सुख-चैन तो खोवै ई खोवै सागै-सागै आपरै बेटै-बहू री गृहस्थी में भी जहर घोळ देवै। बात’बात में थारी-म्हारी अर आपसी खींचाताणी में सगळा रिश्तां रो नाश हुयो जा रैयो है।

डोकरो बोल्यां गयो- च्यारां-कांनी राफळरोळ मच्योड़ी है अर रोजीनां घर-घर भांड-बिगौवा देखां जणां सोचां टाबरां सागै बोलचाल बंद हुवै, ईं बिचै तो कियां ई जापड़-थापड़ पड़्या रैवां तो ठीक है। बुढापै में माईत आपरै टाबरां रो स्नेह चा’वै। ईं सिवाय और बां नैं कीं कोनी चाईजै अर जे टाबर बां री उपेक्षा करै का बां सूं बोल-चाल बंद करद्यै, ईं सूं बेसी माईतां सारू कोई दुख कोनी हुवै। ईं वास्तै म्हे तो डरतां पाणी आडी पाळ बांध’र चला’र कैयो कै भाई म्हे गांव में ठीक हां, थे दोनूं शहर सर जा’र कमाओ-खाओ। पण रुकमा इकलखोरड़ी कोनी अर भलै घरां रा संस्कार सिख्योड़ी है जणां म्हांनै न्योरा काढ’र सागै ल्यायी है। आज आपां सगळा सागै हां, अब बता परिवार बहू ढक्यो का और कुण ईं ढक्यो ?

हरखियो, बीं री मां अर रुकमा तीनूं डोकरै री अेक-अेेक बात नै मोत्यां दांई चुगै। चींटियो आपरी गाडी सूं खेलण में मस्त हुयोड़ो किलकार्यां मारै। डोकरो बोल्यो – ईं सूं आगे कीं बात हुवै तो थे बता द्यो। हरखियो कीं सोच’र बोल्यो बियां तो थांरी बात ठीक है बापू पण अेकली बहू तो के करै ही, आपां जाणां कै घर-घर में सासू अर बहू रा रगड़ा हुवै अर बां सूं ई सगळो खेल बीगड़ै। आपणै घर में माऊ थांरी बीनणी नैं आपरी बेटी दांईं राखै, जणां आ बात पार पड़ी है। माऊ खोड़ली हूंती तो अबार आं गाभां री अर म्हांरी तो तूड़ी हुयोड़ी पड़ी रैंवती। अर रोळै-रब्बै में घाणी बिगड़ ज्यांती तो ओ बैस मौत रो सामान बण ज्यांवतो। ईं वास्तै आज सूं थे ईं कैबत नै बदळ’र इयां करो कै ”सासू अर बहू दोनूं ढक्यां परिवार ढकीजै।” अेकली बहू नै घणी माथै मत चाढ़ो। इयां कैंवतो बो आपरी मा अर रुकमां कानी देख’र कीं मुळक्यो। हरखियै री मां अर रुकली दोनूं हरखियै री बात सूं सहमत ही। हरखियो आपरी तर्कशक्ति पर कीं इतरायो। डोकरो माथो हिलावतो बोल्यो- भाईड़ा म्हारी सरदा कोनी अर थे मां-बेटा ग्यान बघारण लागग्या। और तो और थे तो बडेरां री कथ्योड़ी कैबतां नै बदळण री हिम्मत भी कर ली।

डोकरियो जोर सूं बोल्यो-अरे डफोळ थारी माऊ भी तो ईं परिवार री बहू ही है। असल में सगळी राड़ री जड़ ई ओ नासमझपणो ई है कै घर में बहू आतां ई सासू आपरै बहूपणै नै अेकदम भूलज्यावै। घर में नयी बहू आतां ई पैलड़ी बहुवां आपरी मतोमती पदोन्नति करल्यै अर मनोगत दरबार बणा’र आपरी अधिकार पंजिकावां बणा लेवै। नयी आवै बीं रै तो सासरै में सगळा ई अणसैंधा हुवै। बा नां तो कोई री आदत जाणै अर नां ई कोई री खोड़लायां’र भलायां रो बीं नै ठा हुवै। सरकारी आॅफिस हुवो भलांई कोई सेठ-साहुकार रो काम बठै भी नयै आदमी नै महीनै दो महीनै कोई अनुभवी आदमी सागै सहयोगी रै रूप में लगाइजै। बो अनुभवी बीं काम सूं जुड़्योड़ी खारी-मीठी सगळी बातां, काम री सौ’राई-दौ’राई सूं बीं नै परिचित करवावै अर पछै बीं नै पूरो काम सौंप’र पुराणो आदमी बीं पद सूं सेवानिवृत्त हुज्यावै।

पण आपणै घरां में ज्यादातर मामलो उळटो हुवण लागग्यो। नां तो सासुवां बहू नै सहयोगी मानै अर नां ही खुदोखुद कदैई सेवानिवृत्त हुवण री सोचै। सासुवां तो आजकाल रै नेतावां दांई बीं कुरसी रै चिप्योड़ी ई रैवणी चावै। नेतावां नै अर सासुवां नै तो कुरसी सूं दूर करण खातर दूसरां नै धक्का देर बां नै अळगा करणा पड़ै।

डोकरै नैं खांसी आवण लागगी, हरखियो भाज’र गिलास में पाणी ल्यायो। डोकरियै पाणी पियो’र पूछ्यो थां मां-बेटां रै कीं समझ में आई का हूं इयां ईं बक्कूं हूं ? हरखियै री मां बोली- के समझ में आवै हो, बात तो बहू री करै हा अर बिचाळै ही सरकारी दफ्तर आयग्या, सेठां री दुकानां आयगी, बात सगळी रोळ-गिदोह हूगी। हरखियै री माऊ बात नै समझै तो ही पण आपरै घरधणी नैं लारलै बारह महीनां में राजी मन सूं बोलतां आज ई सुण्यो है, बाकी तो गहरी चिंता में डुब्योड़ै उदास चेहरै सामी देखतां-देखतां बा घणी दुखी ही। जणां बा सोचै ही कै आज डोकरो कई ताळ और बोलै तो ठीक है, ईं वास्तै जाणबूझती बात नैं घुमाई। ईं रै अलावा दूजी बात आ भी ही कै डोकरी री अर डोकरी रै पूरै परिवार री बड़ाई रो प्रसंग चालै हो जणां बताओ आपरी अर आपरै कडूंबै री बड़ाई कीं नै आछी नीं लागै। भलांई कित्तो ई उजाड़ हुवो, आपरी प्रशंसा सुणन खातर आदमी बीं नै सहन कर लेवै। रोट्यां नै तो मोड़ो हुवै हो पण डोकरी रुकली नै होळै सी कैयो बेटा! बैठी रह आज चावळ अर मूंगांरी दाळ ल्यायोड़ी है जको खीचड़ी बणा लेस्यां। कोई मोड़ो को हूवै नीं, पैली कीं ग्यान री बातां सुणां। इयां कैंवती डोकरड़ी रुकली रै गोडै पर होळै सी हाथ री थपकी मारी।

आपरी घरवाळी रै मूंढै ठोठ बातां सुण’र डोकरियो बोल्यो ठा-ठू तो थांनै सौ है पण आज मन्नै पूरो मास्टर बणा’र छोडस्यो। डोकरै थोड़ो सो’क जरदो मूंढै में न्हाख्यो’र पछै बोल्यो- सरकारी दफ्तर अर सेठां’ळी बात तो मिसाल ही। खराखरी सुणो जणा आ है कै थारी उमर वाळी सासुवां बहू आतां ईं बीं रो लाड करण री बजाय बीं रो छै लेवणो सरू करद्यै। बापड़ी बीस बरसां ताणी जकै घर-परिवार अर लोगां सागै हेत-प्रीत सूं रैयी, बां नै तो रातोरात पराया मान’र अणदेख्या-अणपिताया लोगां नै आपरा मानती सासरै आवै। पसु-पंछी भी आपरी जाग्यां छोड़तो दुखी हुवै जणां बताओ बीं लड़की रै दुख रो कांई पार पण समाज री व्यवस्था नै स्वीकारती बा बीं दुख में ई सुख रा सूत्र पकड़ै अर रूपरूपाळा सपना संजावै। बीं नै नयी जाग्यां आयोड़ी नै हिंवळास’र काळजै लगावण रो कायदो सासरा’ळां रो बणै। अर सासरै में भी सासू अर नणद रो फर्ज पहली बणै क्योंकै घर में बीं रो सै सूं बेसी काम बां सागै ई पड़ै अर जका काम आज ताणी सासू करती बै आज सूं बीं नै करणा है। पण सासू नां तो बीं नै हिंवळास’र काम समझावै अर नां ही बीं काम री कूंची बीं नै देय’र खुद रिटायर हुवै। डोकरै हरखियै नै कैयो कै देखलै थारड़ी माऊ भी ओज्यूं कूंच्यां लटकायां फिरै मालकण बण्योड़ी। कायदो ओ है कै अब अै कूंच्यां रुकमा नै भोळावणी चाईजै पण ईं ओज्यूं काठी पकड़ राखी है। डोकरी भड़क’र बोली म्हारै तो कोई सौख नी कूंच्यां रो, अबार ई सांभो भलांईं। बण कूंच्यां कणकती सूं खोल’र रुकली सामी करी। लै भाई संभाळ ओ भार म्हारै क्यांनै चाईजै। रुकली बोली नां नां म्हारै कोनी चाईजै कूंच्यां। बापूजी तो इयां ई थांनै चिड़ावण नै करै। सगळा हंसण लागग्या।

डोकरी बोली कीं हुवो भलांई आज पाछो जी में जी आयो है, डावड़ां लारला बारह महीनां कियां काढ्या है, म्हारो जीव जाणै। थे बोलणो-बतळावणो बंद कर’र रातदिन चिंता में झूलण लागग्या, छोरो काम-धंधो ढूंढतो-ढूंढतो काळो पड़ग्यो, रुकली बापड़ी सासरै में मौज-मस्ती रा दिनां में अणूंती भूख काढी पण लाण भलै घरां री है जणां आपणै घर री कमी-बेसी रो आपरी मां नै ई कोनी बतायो। बापड़ी आपणां ढाका ढकती-ढकती आखती हूगी। रुकली धीमै सी बोली – मां इस्सी बातां क्यूं करो। अब तो म्हारी मां अर बापूजी थे ई हो अर थे मन्नै आपरी बेटी सूं बढ’र मानो। अब भूख-तिस तो भेळी है। सगळा मिल’र सामनो कर लियो जणां आज सौक्यूं ठीक हूंतो दीखै। अब तो चींटियो भी बडो हुग्यो। ओ थां कनै रैज्यासी जणां मैं भी आं सागै काम पर जा’ण लागज्यास्यूं। पछै सौक्यूं जचा लेस्यां। हरखियो बोल्यो बापू बात तो थांरी सौळा आनां साची है परिवार तो बहू ढक्यां ई ढकीजै।

हरखियो बापू री कमर में आइडेक्स मसळतो बोल्यो- बापू-माऊ ! ठेकेदार आज सूं मन्नै दो घंटा लिखा-पढी रै काम खातर कैयो है अर पांच सौ रिपिया महीनै रा ज्यादा देसी। भगवान कर्यो तो सब ठीक-ठाक हुज्यासी। सगळै घर वाळा खुश हुया अर भगवान अर भगवानै ठेकेदार दोन्यां रो आभार मान्यो।
~~डा. गजादान चारण “शक्तिसुत”

 

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