बाईजी को बोलणो अर भलै घरां की राड़

chopalमिनखाजूण रै फळापै अर फुटरापै सारू आपणां बडेरां, संत-साहितकारां अर लोकनीत-व्यवहार रो ज्ञान करावणियां गुणीजणां खास कर इण बात पर जोर दियो है कै आ जीभ जकां रै बस में है, वां रो ई जीवण धन्य है। ‘बाई कैवतां रांड’ कहीजै जकां नैं जस री ठौड़ जूता ई पानै पड़ै। वाणी तो व्यक्तित्व री आरसी मानीजी है। आदमी नीं बोलै जितरै उणरो ठा नीं पड़ै पण जियां ई बोलै उणरो कद आपणै सामी आवणो सरू हुवै। बोली में मिनख रा संस्कार, व्यवहार, ग्यान अर सभाव रो अेकै सागै खुलासो हुवै। आदमी री ठीमरता, धीरज अर संयत व्यवहार री सूचना उणरी वाणी ई दिया करै। जियां ई मिनख बोलै आ ठा पड़ ज्यावै कै ओ कुणसी संगत अर संस्कारां में रैवणियो आदमी है। आपणै अठै कैबत है कै ‘बाबा बोलूं कै बोवूं’ मतलब ओ कै नीं बोलै जितरै तो मिनख रो खोळियो है जणां मिनख जिसो लागै ई है अर जियां ई बोलै जणां सगळो पोत चोड़ै आ ज्यावै। बोली रै कारण कई बार भोळा अर भोंदू मित्र हुवै जका दुस्मणां सूं ई बत्तो काम करज्यावै। महात्मा गांधीजी रो मानणो हो कै आदमी नै चुप रैय’र इत्तो पछताणो कोनी पड़ै  जित्तो कै गड़बड़ बोल’र पछताणो पड़ै। ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ री कैबत इणी कारण बणी है। घणां मिनख इयांकला मिलै जका अपणै आपनै ‘बूझबूझाकड़जी’ समझै अर हरेक बात रा जाणीजाण बण्योड़ा फिरै। बां नै ठा कोनी कै ओ संसार सागर है अठै तो बडाबडी रा डेरूं बाजै। भाखर पर तो सगळा ई भोमिया है, कुण छोटो अर कुण मोटो। इण वास्तै घणां ग्यानचंद (बात-बात में ग्यान बघारणियां) अर रायचंद (बात-बात में बिना मांगी राय देवणियां) बणण री दरकार कोनी, आदमी जित्तो जरूरी हुवै बित्तो ई बोलै जणां ठीक रैवै।

बोली में लहजै रो घणो असर हुया करै। अेक आदमी बोलै जणां लागै इमरत झरै अर दूजो बोलै जणां लागै कै कानां में कील चुभोवै। बोलणो अर बोबीड़ मारणो दोनूं न्यारी-न्यारी बातां है। इण सारू आपणै अठै कैबत है कै ‘बाईजी रा बोलणां अर भलै घरां की राड़’। राड़ नाम लड़ाई-झगड़ै रो है। लड़तां तो बोली तीव्र अर कर्कश ई रैया करै। लड़ाई में तो गाळ्यां ई काढीजै कोई लाडू तो बांटीजै कोनी। इण खातर लड़ाई झगड़े में बोली रै आदर्श रूप री कोई अपेक्षा नीं करीजै। अठै तांई कै साहित्य सिरजण मांय भी युद्ध आद रै चित्रण में इण बात नैं स्वीकारीजै। पण कई लोगां री तो आदत ई पड़ ज्यावै कै बै बोलै जणां इयां लागै जाणै लड़ाई ई करै। इणी कारण कोई टेम में स्याणी समझदार भाभी आपरी नणद नैं समझावतां कैयो हुवैला कै बाईजीराज थांरी सामान्य बोली ई इयांकली है जाणै भलां घरां में राड़-झगड़ो हुवै। इणनैं कीं सुधारो नीं तो आगलै घरां जावोला तो फोड़ा ई फोड़ा पड़णा है। वाणी री तीव्रता, आपणां हाव-भाव, बात कैवण रै लारै जिम्मेदारी रो भाव, श्रोता रै साथै आपरा संबंध, सबद चयन आद आपणी बात री परख रा आधार है। बाकी तो बात-बात तो सगळी अेक ई है, कैवण रो ई फरक है। जियां सागण ई काजळ आंख में घालै तो आंख री सोभा बढै अर बो ई काजळ घड़ै का ठीकरी पर लगावै तो अपरोगो लागै –

बात-बात सब अेक है, कहणै में कदु बैण।
बो ही काजळ ठीकरी, बो ही काजळ नैण।। 

बात अर उठाव (कमठाण) जित्ता चावो बित्ता ई बधै। बात अर भाटो तो बैठावै ज्यूं ई बैठै पण बैठावणियैं री ऊरमा तो चाईजै। कई बार बोलणो गुनैगारी हुज्यावै तो कई बार बोलणो वरदायी सिद्ध हुवै। बात कर्यां ई मिनख री खरी पिछाण हुवै पण बिनां सोच्यां समझ्यां कर्योड़ी बात घांदा कर न्हाखै। राजस्थानी लोकजीवण में बात री सीख रा घणां दूहा प्रचलण में है-

बातड़ल्यां बिगताळल्यां, जे कोई कहै बणाय।
बातां (तो) हाथी पायबो, बातां (ई) हाथी पाय।।

मतलब ओ है कै बात करणी अर कोई नैं कीं समझावणो है तो उणरो कायदो आयां ई फायदो हुवै नीं तो है जिसी इज्जत रा ई कांकरा हुज्यावै। कोई टेम री बात है कोई राजा हाथी रै होदै किणी मारग पर आवै हो। सामनै कोई कवि आयो अर उण राजा नै इयांकली बात कैई जकी सूं राजा रीझग्यो अर उण कवि नैं आपरो हाथी बगसीस में दे दियो। इणनै कैवै ‘बातां हाथी पायबो’ मानै बात-बात में हाथी प्राप्त कर लियो। इण दरसाव नै देख’र अेक दूजै मिनख सोच्यो इयांकली बात तो आपां ई कैय सकां अर बो तैयार हुग्यो। दो-च्यार महीनां पाछै कोई दूजो राजा हाथी रै होदै निकळ्यो। बो देखादेखी कवि बण्योड़ो मिनख मारग में सामै आयो अर जियां लारलै कवि कैई बियां ई राजां नै बात कैयी पण टेम बदळग्यो हो, लारली उपमावां रा अरथ बदळग्या। राजा नै रीस आई अर राजा उण धिंगाणियै कवि नैं मारग पर चित्त न्हाख’र हाथी रो पांव उणरी छाती पर टिका दियो, जिणसूं बो मरग्यो। ओ है ‘बातां हाथी पाय’। सागो देख’र सासरो करणियां रा घर बस्योड़ा देख्या कोनी। बै तो इयां ई बारां घालता टेम बितावै। इणरो कारण ओ है कै भासा री विविधतां अर क्षेत्र रै प्रभाव सूं कई बार सबदां में मोकळो फरक निगै आवै, इण वास्तै पराई जाग्यां जावां तो आपणां स्थानीय सबदां नैं सावळ सोच समझ’र बोलणां चाईजै।

आपणै अठै सामान्य रूप सूं बोलीजण वाळो कोई सबद किणी क्षेत्र विशेष का जात-समाज विशेष मांय असंसदीय हो सकै। जियां राजस्थानी सामान्य लोकजीवण मांय मारण, पीटण, डरावण सारू आम सबद है – ठौकणो। लोगां रै घरै, परिवार में, लुगायां-पतायां तकात टाबरां नैं डांटै फटकारै तो ई बोलै कै ‘ठोकूंली, ठोकूंला’। टाबर ओळमो देवै तो बो ई आ ई कैवै कै म्हनैं फलांणै छोरै ठोक्यो। पण ओ ई ‘ठोकणो’ पिछमियै राजस्थान में अर खासकर राजपूत अर चारण समाज में असंसदीय अर सश्लील सबद मानीजै। आं रै घरां मांय इण सबद रो कदै ई सार्वजनिक उच्चारण नीं करीजै। इण वास्तै देस, काळ अर परिस्थितियां नैं देख’र ई बोलणो अर सबदां रो चयन करणो जरूरी है। इण बात री साख रो अेक दूहो देखो-

बात-बात रो आंतरो, बात-बात रो फरक्क।
थे तो कैवो फरिस्तो, (अर) म्है कैवां हां जरक्ख।।

अबै बताओ फरिस्तै अर जरख नै अेक बताओ जणां खीर तो कुण जिमावै पछै तो डांगां ई बाजै। अेकर री बात है अेक गांव में गुवाड़ री हथाई चालतां बात चाली कै ठाकरां रै बेटै री बहू फलाणै आदमी रै झोळ्यां घाल्योड़ी है। झोळ्यां घालणै नै बीकानेरवाटी में खोळ्यां घालणो कहीजै। बारै सूं आयोड़ै अेक आदमी पूछ्यो कै थांरै ओ खोळ्यां घालणो कांई हुवै। हथाई में अेक बाताळ बैठ्यो हो, जाणै तो बो ई कोनी हो पण बोलणो जरूरी हो इण वास्तै बोलग्यो कै ‘थांरै तो नातो कैवै अर म्हांरै खोळो कैवै’। अबै बताओ खोळ्यां घालणो अर नातै भेजणो अेक कियां है। हाथोहाथ ई बाताळ रै जूतां री जुंवारी हुगी। बात अेकर गुडै उतरगी तो उतरगी पछै सागण चीलां ल्यांणी बेजां दौरो काम है। बात बीगड़्यां पछै सिवाय पिछतावण रै कीं नीं बचै। जणां ई तो कैवै बातां रा टक्का लागै।  बात नीं बात री मरोड़ देखणी चाईजै। उचित अवसर हुवै तो फीकी बात ई नीको फळ देज्यावै अर जे अवसर ठीक नीं हुवै तो नीकी बात भी फीको फळ देवै। बातां नै छमकणी तो सौरी है पण पार घालणी बेजां दौरी हुवै। बातां में मजाक मसखरी साग में लूण जियां सुवाद अर रस रो काम करै पण कई बार मसखरी महंगी पड़ ज्यावै। अेकर अेक साप समदर में पड़ग्यो। पाणी में दौरो-सौरो तिरतो किनारै पूगण री आफळ करै। उण बगत अेक मेंढकियो साप रै आजू-बाजू उछळतो साप सूं मसखरी करतो बोल्यो ‘साप म्हनैं हथाई रो घणो कोड है, थोड़ी देर हथाई करां’। साप नैं ठा पड़्ग्यो कै मेंढकियो उणरा मजा लेवै। साप जाणै हो कै अबार रीस कर्यां भी कीं कोनी हुवै क्योंकै पाणी में मेंढकियो ताबै आवै कोनी। साप आपरी रीस नैं संभाळ’र मेंढकै नैं उत्तर दियो-

आवै न कोई ऊपजै, सरवर मज्झ थयांह।
बातां करस्यां डेडरा, तिरनै तीर गयांह।।

साप बोल्यो डेडरा भाई अबार ई समदर रै बिचाळै तो म्हनैं कोई बात ऊकलै ई कोनी। तिर’र किनारै पूग्यां पछै आपां हथाई करस्यां। साप होळै सी संकेत कर दियो कै जे किनारै रै सारै आयग्यो जणां स तो थारी जड़ में आक दे देस्यूं, थूं ई याद राखसी कै कोई नै बिनां बात तंग कियां कर्या करै। डेडरियै जाण बूझतै पंगो ले लियो। जियो जितरै ई समदर रै किनारै आवण में डरतो ई रैयो हुवैला। इण वास्तै ई कईजै कै बाताळ (वाचाल) रो घर पाताळ में जावै। घणो बोलणो, बिना सोच्यां-समझ्यां बोलणो, बिना मतलब बोलणो, बिन बतळायां बोलणो ज्यादातर फोड़ा ई घालै। जरूरी हुवै बठै बोलणो ई चाईजै। साच नै साच कैवण री हूंस अर हिम्मत राखणी चाईजै। चौराई लाख जूणियां मांय भटक्यां पाछै आ मिनखा जूण मिली है। मिनख री जीभ तो जगदीस अर जगदम्बा रा जसगान करण सारू है। भगवान रो नाम जपण सारू जीभ मिली है। इणसूं निकळण वाळो अेक अेक आखर अणमोल हुवै इण वास्तै तोल्यां बिनां नीं बोलणो चाईजै। आगली च्यार ओळियां साथै इण चर्चा नै इण आसा अर विस्वास रै साथै विराम देवां कै नयी पीढी आपरी जुबान नै सावळसर बरतण री हूंस लेवैली-

लाख असी-चव जोनिय मांझल, जानिय मानव श्रेष्ठ जमारो। 
धीर विवेक तुला पर तोल, अमोल, सतोल, सुबोल उचारो।
तारन या भवसागर सौं गजराज न दीखत और सहारो।
बार हि बार उचार अलौकिक अंब सुनाम उबारन वारो।। ‘‘शक्तिसुत’’

~~- डॉ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’

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