बाजीसा! आप तो म्हांरी भली रा चाऊ हो!! ओ कांई….

जैसलमेर माथै महारावल़ गजसिंहजी (सन 1820-45) रो शासन। सालमसिंह मेहता उणां रो दीवाण। उण बगत राज री पौची हालत। दीवाण रै घालियो लूण पड़ै। उणरी अज्ञा बिनां पत्तो तक नीं हिलै। मेहतो अन्याय, अत्याचार, अर अनाचार रो साक्षात पूतलो। उण बगत उणरो विरोध करण रो मतलब हो मोत नै बुलावणो। महारावल रो एक ब्याव उदयपुर महाराणा भीमसिंहजी री बेटी रूपकंवर साथै होयो। उण बगत सालमसिंह आपरै रचियै तोतक अर आतंक सूं महारावल़ री जान उदयपुर में छव महीणा रोकाय राखी अर लारै सूं आपरी विश्व विख्यात ‘सालमसिंह री हवेली’ लूट लूट र भेल़ै कियै धन सूं चिणाई। ओ बो ई सालम सिंह हो जिणरै अत्याचार सूं आंती आय जैसाण धरा रै पालीवाल़ां एक ई रात म़े उछाल़ो (उचाल़ो) कियो। ओ ऐड़ो नीच आदमी हो जिको आपरै स्वामी रै प्रति किणी ई प्रकार सूं समर्पित नीं हो बल्कि उणरी कुदीठ कदै कदै ई गढ री मरजादा नै ई लांघण नै जावती परी। उणरी ऐड़ी नीच हरकतां सूं तंग आयर महाराणीजी आपरै विश्वसनीय सिरदारां नै बुलाया अर इण नीच रो काम तमाम करण रो निवेदन कियो पण सालमसिंह नै जाणणियां री उणरै डर स़ू जाड़ां चिपगी, चूंकारो ई नीं होयो। जैसाण रै मोटै अर मोजीज सिरदारां री ऐड़ी दयनीय स्थिति देख उठै ऊभै भाटी अन्नै पूगल़ियै (खिंया भाटी) महाराणीसा नै निवेदन कियो कै “म्हारै माथै आपरा हाथ होवै तो आ तरवार पछै कांई काम आवैली!” एक साधारण राजपूत री असाधारण बात सुण महाराणी आदेश दियो कै अन्ना ओ काम पार पटक नीतर किणी दिन “कुतड़ी बाद खा जावैली”।

अन्नजी भाटी एक दिन सालमसिंह रै तरवार बाही पण जोग सूं उणरी नस नीं बढर कांधै मांकर बुई ! घाव अराड़ो होयो पण सालमसिंह मरियो नीं। दूजो घाव अन्नजी सूं ई नीं होयो। सालमसिंह रा आदमी इणनै उखण हवेली लाया। पाटा करावण री तैयारी होई। उण बगत पूरै जैसलमेर में पाटा करण में सबसूं माहिर अर जाणकार हा रतनू मनरूपजी सूमलयाई। आदमी गया। मनरूपजी तेड़ र लाया। मनरूपजी, सालमसिंह रै पाटा किया। जाणै दीयै में तेल घातियो है! सालमसिंह साजो होवण लागो। गढ में आ खबर पूगी तो एकर तो सरणाटो छायग्यो ! पछै महाराणीसा पूछियो वैद्य कुण है? किणी बतायो “हुकम मनरूपो रतनू सायबदान रो!” महाराणीसा किय़ो “रतनू है!! तो म्हारै कन्नै कीकर ई बुलायर लावो।” कोई आदमी गयो अर कोई तजबीज लगायर मनरूपजी नै बुलायर गढ में लायो।

महारावल़ गजसिंहजी री महाराणी रूपकंवर पूछियो, आप मनरूपजी हो ?

हां हुकम ! हूं मनरूपो सायबाणी!

आप रतनू हो बाजीसा! महाराणीसा भल़ै पूछियो।

हां हुकम ! हूं रतनू !

तो पछै बाजीसा ! आपरो कुल़ तो म्हांरो रुखाल़ो रैयो है-

रावल़ सरणै राखिया, पाया लाख पसाव।
वरण सारै ई भाखियो, रतनू साचा राव!!

तो कांई आपनै बापजी देवराजजी ‘राव रुखवाल़’ रो विरद इंया ई दियो?
कांई आपरा वडेरा आसराव, चंद्रभाण, चिराई जैसलमेर रै कारण इंया ईं पचिया हा!
कांई आप आपरै वडेरां सूं सामधरम रो पाठ नीं पढियो-

करता अपणै हाथ सूं, तोलै सबै करम्म।
सौ सुक्रत इक पालणै, एकै सामधरम्म!!

“बस बस!! हुकम ! ओ मनरूपो तन-मन सूं हाजर है! आ काया आपरी ! आपरै इसारै साथै निछावर करदूं। अजै रतनै रां री आंख्यां रो पाणी मरियो नीं है हुकम! आप आदेश दिरावो कै ओ नाचीज मनरूपो आपरै कांई काम आ सकै है?”

महाराणीसा कैयो “बाजीसा! ओ दूठ सालमसिंह अन्याय रो पूतल़ो अर अत्याचार रो कोठार है, आपनै ठाह है कै अन्नै खिंयै किणरै आदेश सूं घाव कियो ? पछै ई आप उणनै बचावण में लागोड़ा हो! रतनू ई ओ काम करैला तो पछै इण गढ री मरजाद सुरक्षित कीकर रैवैला?”

“माफी हुकम! वैद्य रो काम रोगी रो इलाज करणो है ! पण आपरो आदेश सिरोधार्य है। म्है सवार री वेल़ा हवेली सूं निकल़तो अंगोछियै सूं फररी करूं उण बगत दो तोपां छोडा दिया। आपांरो काम मा तेमड़ाराय करैला।”

दूजै दिन रतनू मनरूपजी सालमसिंह री हवेली पूगिया। सालमसिंह पूछियो “मनरूपजी हमें कितरा पाटा भल़ै करणा पड़ेला?”

मनरूपजी कैयो “बस ओ छेहलो पाटो है दीवाण साहब।”

नीं जाणै मनरूपजी कांई चीज रो पाटो कियो, पाटो करतां रै थोड़ी ताल़ पछै ई दीवाण रै अंग में बल़त लागगी।
पाटो करतां ई मनरूपजी हवेली सफड़ाक निकल़ आपरै घोड़ै चढ अंगोछियो लहरायो! अठीनै सालमसिंह आपरै आदम्यां नै कैयो “कोइ पकड़ो हरामखोर मनरूपियै नैं! कांई लगाग्यो म्हारो शरीर बल़ै!” आदमी लारै नाठा अर उठीनै गढ सूं तोपां छूटी जिणरै धमाके री आवाज सूं सालमसिंह सांधा पाछा खुलग्या अर उणी घड़ी एक अत्याचारी अध्याय रो अंत होयग्यो।

मनरूपजी री स्वामीभक्ति अर चारणापणै नै सरावतां किणी समकालीन कवि कितरो सतोलो दूहो कैयो.है-

इणियो भँवर औनाड़, सायबावत दीठो सकव।
मानो चंदहर माड़, रतनू छोगो रेणवां।।

~~गिरधर दान रतनू “दासोड़ी”

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