बखत आय ग्यो खोटो – स्व. श्री भंवरदान जी बीठू “मधूकर” (झणकली)

आजादी री घटा ऊमड़ी, बावळ दौट बजायो।
खोपा खड़े बिछैरा खावे, औ पड़पंच उडायो।।
कोट गढों रा झड़्या कूँगरा, पड़्यो विश्व परकोटो।
पकड़ पौळ ढाढै परजीवी, बखत आय ग्यो खोटो।।१।।

काळे धन री करामात सूं, होड लगी हद भारी।
झूंपड़ियों री जगा झुकाया, ऊँचा महल अटारी।
कौड़ी दास क्रोड़ ध्वज कीना, लागो लूंट खसोटो।
बिना बिचारे कहे बौपारी, बखत आय ग्यो खोटो।।२।।

बौंनी राख रगड़ बाबा जी, करता कठण कमाई।
बोंनो बदल गुरू बण बैठा, चेला करे चंपाई।।
चंनण तेल चौपड़्या चमके, ज्यों तैल्यों रो झोटो।
मुक्ता नंद जी ग्यान फरमावै, बखत आय ग्यो खोटो।।३।।

काढ पसीनो खेत कमाता, लूट जाता वो लाटे मों।
भूख मिटावण काज भैळता, आप तूस नित आटे मों।।
बेटा आज मिनिस्टर बणिया, तिण रै कींको तोटो।
केरा राम जाणतो कूके, बखत आय ग्यो खोटो।।४।।

घर घर खोपट जाय घुरड़ता, पलै नी पड़ता पैया।
चटपट झटपट ले चवनी, रटपट झपट रुपैया।।
गजब रेडियो चिरमी गावे, फरनीचर अर फोटो।
चिळम चाड़ चूनो जी चसके, बखत आय ग्यो खोटो।।५।।

खाथै पाव फेरता खड़ियो, एक सेर अंन आता।
बैध्यराज अध्यापक बणिया, पूरी तनखा पाता।।
चिकणा रोटा दाल चकाचक, घिसै भोंग नित घोटो।
पी लोटो माराज पुकारे, सखत आय ग्यो खोटो।।६।।

बागर चंद साटै बिलमाया, टाबर ल्यावै टीका।
जीमण होता खीच जठै, घेंवर रसगुल्ला घीका।।
खोखा बोर चणा नित खाता, चवनप्राश अखरोटो।
काबर चंद धींगड़ मल कैवे, बखत आय ग्यो खोटो।।७।।

कारीगर बैगारों करता, घर मों रैता घाटा।
दस कळदार दैनगी देवे, चाय चिळम नैं चाटा।।
धाप्या नोंढ देवता धौके, ओंगण ठाणो ओटो।
कातर चंद करौत जी कुरके, बखत आय ग्यो खोटो।।८।।

माटी खाय फुरळता माटो, ग्योंन गरीबी गाता।
झूंपड़ रांम तोंण कर झालै, छिंया करण ने छाता।।
एम एल ए सूं कहे अकड़, हूँ मोटो फाटक छोटो।
बादौ बाद तंदूरो बोले, बखत आय ग्यो खोटो।।९।।

जिण घर कदै नीं दीपक जळतो, जळै बल्ब बिजली को।
सास खदर नों मरती सिकती, बऊवड़ पेरे बैस जरीको।।
पाटंबर टेरीलींन पळके, गाज किनारै गोटो।
बुड़का करती कहे बूढकी, बखत आय ग्यो खोटो।।१०।।

माथै उखण ओंणती मटकी, बैती गरदन बंकी।
नणद भोजाईयों नित रो नावै, ट्रेक्टर ल्यावै टंकी।।
पकी प्रोळ पीसणो चक्की, फूस नीं गोबर फोटो।
सूँड सिकोड़े कहे सासूजी, बखत आय ग्यो खोटो।।११।।

शिवजी बळध गधे पर ईसा, पेगम्बर डाची पर।
भैरव श्वान शनिछर भैंसा, स्वार शोभता सुन्दर।।
बिना विवेक पोथियों बाचे, सटे राख मों सोटो।
ओंखे मींच सरौदिया आखै, बखत आय ग्यो खोटो।।१२।।

रैण सैण सुख चैन राज मों, स्वास्थ्य संचार शिक्षा मों।
च्यार जुगों सूं ऐ जुग चौखो, देखो सभी दिशा मों।।
सगळा कोंम मशीनों सौभ्या, मनखों रो सुख मोटो।
बारट भंवर मरम लख बोले, बखत खरो या खोटो।।१३।।

~~स्व. श्री भंवरदान जी बीठू “मधूकर” (झणकली)
प्रेषक: नवनीत करण रतनू

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