बाजीसा बालुदान जी रतनू बोनाड़ा री बातां

बालुदानजी बाजीसा सूं आज आ बात सुणी

।।३।।
हमे माड़वै सरण लो!!

रुघजी फतेहसिंह रै रो बेटो ऊमजी (ऊमसिंह) भोमै रै तल़ै रै सिंधी भोमै रा ऊंठ खोस लायो। बात इयां बणी कै मंगल़िया अर जंज दोनूं सिंधी। एक मंगल़ियै अर एक जंज री लुगाई अरटियै माथै ऊंन कातती “कोठा कल़प्या” यानि आपरै पेट पड़्यै बेटे-बेटी री सगाई करी। दोनां कवल कियो कै दोनां रै आपस में भलांई जको ई होवो, बेटे-बेटी री सगाई करांला।

जोग ऐड़ो बणियो कै जंज री लुगाई रै बेटो होयो अर मंगल़ियै री लुगाई रै बेटी!! इयां तो दोनां रो निकास भाट्यां मांय सूं है। लंझै विजयराज री ऐल़ रा होवण सिंधियां में मंगल़िया अपणै आप नै जंजां सूं ऊ़चा मानता सो जंज रै डीकरै नै बेटी देवण सूं नटग्या।
भाट्यां रो झुकाव जंजां कानी हो सो उणां जोर दियो कै मंगल़िया आपरी बेटी रो ब्याव जंज रै डीकरै साथै करै। मंगल़िया नटग्या। भाट्यां जोर भरियो अर मंगल़ियां नै तंग कियो सो मंगल़िया जंजां री जागा छोड भोमै रै पाखती भोमै रै तल़ै बुवा ग्या।

भोमो सपूत अर वीर मिनख हो जद जैसलमेर माथै बीकानेरियां हमलो कियो उण बखत भोमै रो बेटो मीठो काम आयग्यो। किणी जाय भोमै नै कैयो कै – “मीठो मराणो!!” उण बखत भोमै जिण धीरज सूं जवाब दियो वो आज ई उल्लेखणजोग है। भोमै कैयो – “ई में विलिताप करै जैड़ी कांई बात ? जिणरै मीठो हो! उणरो मीठो मरियो अर जिणरै खारो होवतो तो उणरै खारो मरतो !! मरणा करणा सांई रै हाथ है थे तो लसकर करो अर बीकानेरियां सूं लड़ो।”

इण में बीकानेर री हार होई। आज ई लोक में विश्रूत है-बीका पड़ग्या फीका या

मेह न भूलै मेदनी, रुदन न भूलै राण।
पल़ी न भूलै पाडकी, वासणपी बीकांण।।

ओ वाद ऐड़ो बधियो कै राजगढ रा भाटी भोमै रै तल़ै ग्या अर उणरो ऊंठ ले आया।

भोमो राज मानेतड़ मिनख, उण शिकायत की अर दरबार आदेश दियो कै राजगढ नै बाल़दो अर भाट्यां नै कूट काढो।

लसकर राजगढ माथै आयो अर गांम बाल़ण री त्यारी करी। बसी डरी कै अबै कांई करणो रैयो। जितै इण इलाकै रै गांम ओलै रो मोतबर सेठ गंगाधर आयग्यो। उण लसकर रै मौजीज मिनख नै कैयो कै –
“‘रे भलै मिनखां! होयोड़ा आसरा क्यां बाल़ो? भाट्यां नै अठै सूं काढो अर टापरा मत बाल़ो। उबरिया तो थांरै ई काम आवैला!!टापरा नीं बाल़ो तो लो ओ म्हारो थई (कीमती समान रखने का एक छोटा मंजूसा) अर सजाई अर माल सैति ऊंठ!!”

तय होयो कै आसरा नीं बाल़ांला, बदलै में गंगाधर आपरो ऊंठ देवैला!! अर भाटी राजगढ छोड नीसरेला।

भाटी आपरो जको ई घर-ग्रहस्थी रो समान हो घाल ओड्यां में निकल़्या जको बोनाड़ै रतनुवां कनै आया।

रतनुवां कैयो कै अठै तो लसकर थांरो लारो छोडै नीं सो आंपै माड़वै चंदू रा झाड़ां हालां रा। उठै कोई नीं आवै। रतनू अर भाटी दोनूं ई माड़वै आय चंदू रै झाड़ां सरण ली।

अठीनै महारावल़ वैरीसालजी, राजगढ ग्या ऊवां नै पूछियो कै बसती बाल़ी कै नीं ? इणां डरतां कैयो – “सा घणी ई खेचल करी पण टापरा बल़िया नीं अर भाटी राजगढ छोड न्हाठा रा !! अर ऐड़ो लागै कै माड़वै आसरो लेवैला ! आ खबर है।”

दरबार कैयो – “जावो उठै ई बाल़ आवो!! बचणा नीं चाहीजै!!”

लोगां कैयो – “हुकम ! चंदू रै झाड़ां री मरजादा उलांगणी ठीक नीं है!” पण दरबार नीं मानिया अर तोपड़ी ले राज रा मिनख माड़वै आया।

आ ठाह पड़ी जणै हलचल मची पण चारणां कैयो कै हमें भार चंदू नै है थांनै नीं।

किंवदंती है कै तोपड़ी छोडै जद छोडणियो देखै कै एक लुगाई लोवड़ी रै झपटै सूं उणनै बुझा देवै। छोडणियो डरियो अर जिको मुदमुख हो उणनै कैयो कै – “अबै कांई करणो रैयो?”

जणै पंचायती होई अर जैसलमेरियां माड़वै रै चारणां नै बुलायर कैयो – “कै तो इणांनै अठै सूं काढो अर कै इणांसूं म्हारो हर्जानो भरावो!!”

आ सुण चारणां कैयो कै – “ऐ चंदू रा झाड़ है! चंदू री सरण आए नै म्हे काढणिया कुण?
रैयी बात हर्जाने री सो भाटी भरैला!!”

चारणां जाय भाट्यां नै कैयो – “थे राज सूं खेटा किया, जिणसूं राजधन रो नुकसांण होयो है, थे बो भरता होवो तो वाहर पाछी जावै नींतर नुकसांण होसी!!”

भाट्यां कैयो कै – “हणै म्हांरै कनै रुपियै रै नाम माथै अखत रो बीज ई नीं है ! हमे आ लाज चंदू रै हाथ है!!”

सेवट चारणां गांम में बिराड़ (चंदो) कर तीन सौ रुपिया भेल़ा किया अर जैसल़मेर रो हर्जानो भरियो। राज रा आदमी पाछा गया। घणै दिनां तांई भाटी ऊमसिंह बीजा माड़वै रैया।


।।२।।
कटारी खावण रो हक पैला म्हारो!!

जैसल़मेर रो गांम राजगढ़ जिको पैला ‘रासै/रासलै रो तल़ो’ बाजतो। जद रावल़ मूल़राज द्वितीय नै ओ भ्रम हुयग्यो कै राज में विद्रोह करावण में “भाटी बनै रै पांच अर सिंधी लधै रै ई पांच बेटां रो हाथ है” तो इण बात सूं महारावल़ विमुख होय बनैसिंह रै बेटां नै गढ में रैवण नीं दिया। इणी बनैसिंह रै बेटै जोगीदास रै बेटां दानसिंह, फतेहसिंह अर राजसिंह रासै रै तलै आपरी गवाड़ी बांधी।

ऐ बिहारीदास रै बेटे कुशल़सिंह री वंश परंपरा में हा। कुशल़सिंह सपूत भाटी होयो। जिणांरै विषय में चावो है-

कुशल़ा थारो कोट, 
इडग रहै ओ डांगरी।।

ऐ भाटी मरद हा सो जैसलमेर में तो धांफल घाली ईज साथै ई मारवाड़, बीकानेर में ई मोको पड़ियां हाथ बतावण सूं नीं चूका। इणां मांय सूं दानसिंह अर फतेहसिंह तो किणी लड़ाई में मारीजग्या सो लारै राजसिंह रैया। राजसिंह ई अणी-पाणी वाला राजपूत हा सो राज रै दबाव आगै हियै हेठो नीं कियो। इणां रै अखजी, खेतसिंह अर रुघजी आद बेटा हा। इनै राज रो दबाव अर ऊपर पड़ता काल़ !! कनै आजीविका रो कोई पुख्तो साधन नीं होवण सूं ऐ ई मारवाड़-बीकानेर में बख पड़ियां लोगां रो माल-मवेशी आगो-पाछो करता।

एकर रुघजी जोधपुर रै रसालै री चरती घोड़्यां मांय सूं नाथड़ाऊ रै देवराजोत, जिको उण रसालै रो रसालेदार हो, री घोड़ी ले आया।

पाग्यां पग देखिया अर देवराजोत राजगढ आय कैयो कै – “हूं थांरो गिनायत अर थे बडा सिरदार ! सो म्हारी घोड़की पाछी दे दिरावो !!”

आ सुण भाट्यां इणनै तगतगायो अर कैयो कै – “तैं सुणी नीं कै डाकण बेटा दे कै ले? कालो हुवोरो कै बगनो है !! कदै ई जीराणां आयोड़ी लकड़ी पाछी घरै हाली है? तूं ई गागनो लागै जको मसाणां में आय मखाणा जोवै !!”

आ सुण बिचारो देवराजोत पाछो जोधपुर गयो अर उठै सूं सितर-अस्सी आदमी बंदुकिया ले आयो अर राजगढ बारैकर घेरो दियो।

अठै भाटी कमती ई हा, ओ चकासो देखियो जणै, हा जकां मांय सूं ई केई हाथां पगरखी लेय पड़ छूटा पण राजसिंह रो बेटो अखजी अर खेतसिंह आय उगाड़ै काल़जै भिड़िया-

घाटी चढ हेलो कियो, हेलै पाड़ी हल्ल।
लाज कहै मर जीवड़ा, वेह कहै घर हल्ल !!

लाज रै लंगर बंधियै भाटी अखजी राटक बजाई। भाटी रो आपाण देख एकर तो राठौड़ मोल़ा पड़िया पण जैड़ो कैताणो हालै कै -“घण जीतै अर जोधार हारै !!” अखजी वीरगत वरी अर लड़ाई में खेतसिंह खेत रैया। किणी कवि कैयो कै भलांई बीजोड़ा नाठग्या ! पण जे अखो भाजतो तो माड री धरती लाजां मरती !! –

आई फौज राजाणै ऊपर,
गोल़ां बाजी रीठ घणी।
(जे) भाटी अखो भड़ भाजै,
तो लाजै धरती माड तणी !!

अखजी रै वीरगत वरतां ई बीजोड़ै भाट्यां सूं झाट झली नीं अर इनै-बिनै पड़ छूटा। गांम में लुगाइयां रैयी सो मारवाड़िया गांम में बड़िया। घोड़ै बीजै तो कीं हाथ आए नीं अर जावता गांम री गायां ले बहीर होया।

बात बोनाड़ै रतनुवां कनै पूगी कै मारवाड़िया, भाट्यां री गायां आपांरै ऊपरकर ले जाय रैया है !! जे गायां इणविध गी तो आंपै जीवता मरियै जैड़ा हां !! रतनू भीम अर जगराम जिकै रतनू किसनैजी हरपाल़ोत री वंश परंपरा में हा।

किसनैजी दो ब्याव किया। पैलै ब्याव सूं हरराज, हरनाथ अर गंगाराम अर दूजै सूं सांईदान होया। गंगाराम रै सूरोजी अर सूरैजी रै जगराम होयो तो सांईदान रै रतनू भीम। ऐ आपरो साथ ले, गायां रै आडा फिरिया।

पांच-सात आदम्यां नै गायां रै आडै फिरतै देख राठौड़ां धाकल करी कै – “कुण हो रै जको बैती मोत नै रोको? क्यूं खतै री बिणाई में मरो !!”

आ सुण रतनू भीम अर जगराम कैयो कै-
“म्है रतनू चारण हां अर म्हांरै ऊपरकर भाट्यां री गायां इयां जीवता को ले जावण दां नी !! मोत तो मोड़ी कै बेगी हरएक री आवणी ईज है। मोत रो हाऊ बताय गायां ले जावो उवा अठै पोल नीं है !!”

आ सुण उण देवराजोत कैयो कै – “बाजीसा ! थांरै-म्हांरै दूध पीवै जैड़ी बात ! थांरै ऐड़ा ई भाटी अर ऐड़ा ई म्हे ! क्यूं पारकी पीड़ में पड़ो !!”

आ सुण रतनुवां कैयो – “काला हुवा रा कै जाण-अजाण बणो !! भाटी म्हांरा भाई !! थे म्हांरै माथैकर गायां लेग्या तो साकल़ै म्है लोक में मूंडो कठै काढालां?”

आ सुण राठौड़ वाद चढिया अर चारणां रै थोरै सूं गायां छोडी नीं। आ देख रतनू जगराम नै बमडी आय जको कटारी काढर कैयो कै – “म्हे ठैर्या चारण ! छत्री ऊपर छोह नीं करां अर छोह करां परो तो ई निज रो पिंड ई छोलां !! म्हांरै कनै ओ ई हथियार”, आ कैय उणां कटारी गल़ै करी !!

खून सूं शरीर गरकाब होयो, राठौड़ सैतरा-बैतरा होया ! जगराम नै खून सूं न्हावतै नै देख रतनू भीम जिकै पग में जगराम रै काका लागता, कैयो – “रे डीकरा ओ की कियो? म्हारै धोल़ां में धूड़ नखाई, हूं गांम में किसो मूंडो लेयर जाऊंला? ह़ूं कैवूंलो कै जगै कटारी खाधी अर हूं बांठां पग देय आयो !! जे हमे दूजी कटारी खाई तो तनै आवड़ री आण अर म्हारै गल़ै री सोगन है, आं सूं गायां लड़ छोडावता पण तैं रीस में खतावल़ करी सो कटारी गल़ै की। हमे कटारी, आ हूं खावां !!” राठौड़ां हाको कियो बाजीसा ! मत बाजीसा ! मत। जितै रतनूं भीम गल़ै खाय प्राणांत कियो-

अड़िया रण चढ आंगणै, भीम अनै जगराम।
वट चारण बहिया सुभट, निडर रखावण नाम।।
सुरभ्यां कज भिड़ सूरमै, कीरत रखी कदीम।
गल़ै करी सुजड़ी गढव, भड़ अड़ रतनू भीम।।

राठौड़, भाट्यां री गायां छोड न्हाठा। रतनू भीम री इण बात रो साखीधर पाल़ियो (स्थान/थान) आज ई आरंग में मौजूद है।


।।१।।
चारण चौथो वेद!!

आजतक म्है आ सुणतो आयो कै चारण बिनां पढियां ई वेद, उपनिषद आद ग्रंथां रै साथै ऐतिहासिक, साहित्यिक अर सांस्कृतिक संदर्भां रा अद्भुत संदर्भ स्रोत होवै!! कणै कणै ई यूं लागती कै बिनां पढ्यां ई कोई कविता रो आंटो अर इतिहास कंठै कीकर राखै?पण म्है, म्हारी जिंदगी में ऐड़ा आदमी देखिया अर आज ई देखूं तो सुखद इचरज होवै कै मा वीणावादिनी रा पाणि इणरै माथै स्थाई रूप सूं है।

म्हारा जीसा (दादोसा) गणेशदानजी उणां रा अग्रज बाजीसा महेशदानजी, आसुदानजी माड़वा, रै साथै विराजमान में सुखजी सिवनाथजी रा सींथल़ जिकै स्याणीजी रै नाम सूं मसहूर है, पण भाई महिपालजी रतनू बोनाड़ा आपरै बाजीसा (ताऊजी) बलदानजी रतनू रा केई ओडियो म्हनै मेलिया सुणर आ बात हियै घर करगी कै महाराजा मानसिंहजी सही कैयो कै ‘बिना पढे ही चारण वेद के उच्चारण सो’।

पैला तो महिपालजी रो आभार। म्हनै इण ओडियोज सूं रतनू जगमाल-भीमा, मूलचंदजी भाटी, उम्मेदजी झीबा, जैमलजी झीबा, कुशलजी रतनू, सूरजमाल देथा प्रभृति प्रसंग पहलीबार सुणण मिलिया। संदर्भ सैति अर पिढ्यां सैती बात करणी। अनेक डिंगल गीत शुद्ध रूप सूं याद। ऊमर रै नवमै दसक रै पूर्वार्द्ध में ई इतरी सटीक याददाश्त। अद्भुत! वंदनीय। भलांई कठै कठै पांतरो (भूल) पड़तो हुवै या आधो अधूरो याद हुवै पण है जरूर। सांस्कृतिक संदर्भ रै पेटै ऊमर रै ई पड़ाव रा ऐ छेहला मिनख है। आज भलांई अकादमिक शिक्षा रो आपां या आपां रा साथी मोद बतावता होसी पण जद ऐ कैवै कै – “अरे ! मांटी आपांरै फलाणी बाई परणाई कै अरे ! मांटी तूं नाम ले तो रे ! हां फलाणो !!” उण बखत लागै कै इण समाज री कितरी समृद्ध श्रुति परंपरा ही। लारलै दो सौ साल री बातां तो इयां बतावै जाणै कै ऐ खुद उण बखत मौजूद हा!!

बैठण में तकलीफ है सो मांचै माथै सूता रैवै अर ऐड़ै श्रोता नै अडीकै जिको अजै ई जड़ां सूं जुड़्यो थको कै जुड़ाव राखै, अर पूरै मनोयोग सूं बाजीसा री हथाई सुणै।

ऐड़ो कोई आ जावै तो बाजीसा नै पूरी खुराक मिल जावै या अलूजी रो ओ कवत्त अठै खरो उतरै-

जिम मोरां दादरां, सघण घण पावस बूठै।
जल़ बीछड़ियां मच्छ, जांण जल़ जाय पहूठै।
तण बंधण बंधियो, अमल बायड़ियो लद्धो।
खीर खांड पकवान, घणो खुद्धारथ खद्धो।
आणंद हुवां मन माहरै, जीव तणो पायो जतन।
अलख नै केम भूलां अलू, रंक हाथ पड़ियो रतन।।

हालांकै सुणणियो सौभागियो है कै जिकी बातां उण आजरै तथाकथित इतिहास ग्रंथां में नीं पढी वे बिनां नाणो खरचियां फोगट में मिलै।

बाजीसा बालूदानजी/बलदानजी/बलजी हकीकत में राजस्थान रै ऐतिहासिक प्रवादां रा समृद्ध ज्ञानकोश है। साव अणपढ अर ता ऊमर गायां री सेवा करी कै ऐवड़ में लठ पटकियो कै ऊंठां रै तरां घाती पण एकर कठै ई कोई दूहो, गीत कै बात सुणी तो उवै घड़ी कंठां, अर विद्या कंठै अर धन अंटै होवै वो ईज काम आवै।

बाजीसा नै सादर प्रणाम।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”
संदर्भ:-आदरणीय बालुदानजी रतनू बोनाड़ा

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