स्वातंत्र्य राजसूय यज्ञ में बारहठ परिवार की महान आहूति(2) – ओंकार सिंह लखावत

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अहिंसा मानव धर्म का सर्वोपरि अंग

माणिक भवन, कोटा
७-१२-१९४०

भाई श्री रामनारायण जी चौधरी,
सप्रेम बन्दे।

प्रियवर,

आपका पत्र मिला, विदित हुआ। मैं अहिंसा को मानव धर्म का सर्वोपरि अंग समझता हूं क्यों हिंसा पाशव वृत्ति है। आततायी पर अबला शक्ति की रक्षा में कदाचित् हाथ उठाने का प्रयोग अपरिहार्य हो भी तो हिंसक का हाथ तोड़कर तुरंत उसकी सुश्रुषा में उतना ही प्रेमपूवर्क लग सकता हूं जितना कि अपने प्रिय बंधु के लिये। कह नहीं सकता मेरी यह अहिंसा श्री बापू की अहिंसा की सीमा में आयेगी या नहीं।

जहां तक देखा, हृदय में द्वेषवृत्ति का अभाव सा ही पाया। इस संबंध में मैंने अपने आपकी परीक्षा उस समय ली जब श्री बापू की अहिंसा व सत्याग्रह का स्वरूप भारत में प्रयुक्त न हो पाया था, अर्थात् आज से पच्चीस छब्बीस वर्ष पूर्व जब हजारी बाग के जेल सुपरिन्टेन्डेन्ट व सिविल सर्जन मि. जार्डन ने मनमाना जुर्म इस शरीर पर किया। तब भी किसी क्षण मेरे हृदय में उसके या अंग्रेज जाति के प्रति द्वेष उदय नहीं हुआ और संकल्प की दृढ़ता भी आज के सत्याग्रह के अनुरूप स्वभावत: Like a brook अविछन्न बनी रही और मैं हिंसा का हृदय परिवर्तन करने में सफल हुआ। वही मैं अब भी हूं। यह मैंने अपनी प्रशंसा में नहीं लिखा, केवल इतना सा दिखाना है कि उस समय के एक कट्टर क्रांतिवादी में भी आर्य धर्म की ज्योति बुझी नहीं थी। अस्तु अब तो उस क्रांतिवाद को मैं अव्यवहार्य हृदयंगम करता हूं और अहिंसा के निर्मल और खुले हुए मार्ग को ही श्रेय मानता हूं। इतना सा खुलासा भी इसलिये कि उस समय के और इस समय के केसरी सिंह को समझने में बापू को भ्रम न हो।

हिन्दू और मुसलमानों की एकता का मैं हृदय से इच्छुक रहा हूं और हूं। बल्कि उसे परमावश्यक समझ, निरंतर क्रिया रूप से सचेष्ट रहा हूं। इतना ही नहीं, प्रत्युत् मेरे लिये प्रत्येक मानव या जाति धार्मिक दृष्टि से परे नहीं और न कोई अछूत है।

उपरोक्त तीनों बातों में तो मैं अपने आपको अधिकारी समझता हूं, किंतु हां, चौथी बात (नियमित चरखा कातना) इसमें अपने आपको पिछड़ा पाता हूं। यद्यपि मैं चरखे की उपादयेता हृदय से स्वीकार करता हूं और वही कारण है कि मेरे घर में बहु और बेटियां नित्य चरखा कातती हैं, फिर भी मैं स्वयं नियमबद्ध होने में असमर्थ हूं। मेरे हाथ की कोहनी की रग में चार पांच वर्षों से ऐसा दर्द है कि डॉक्टरों की सुईयां व एक्सरे भी ठीक न कर सका और वह बुढ़ापे के साथ आया हुआ और रहने का बहाना ही सिद्ध हुआ। इसी दर्द के कारण मेरी लिखने की प्रवृत्ति कुण्ठित हो गई। दस बीस मिनट भी सतत लिखना पड़े तो दर्द का दौरा हो जाता है और तीव्र वेदना अनुभव करनी पड़ती है। अत: चरखे में हाथ के घुमाव की या रगों में आकुंचन की चेष्टा नहीं कर सकता, यह विवशता है।

इस शरीर के संबंध में यदि बापू को फिर भी कुछ जानता हो तो वे काशी के सुप्रसिद्ध बाबू भगवानदास जी एवं प्रयाग के माननीय बाबू पुरुषोत्तमदास जी टण्डन से पूछ सकते हैं। मैं अब अपने लिये कुछ न लिखूंगा। यदि उपरोक्त त्रुटि के कारण ही मैं पूज्य बापू के चुनाव में न आ सकूं तो मैं उनके दस नियमों में बाधक होते हुए भी अपने आपको पेश करने की धृष्टता नहीं करना चाहता। आग्रह भी नैतिक अपराध है।

यह उपरोक्त स्पष्टीकरण आप उचित समझो तो निवेदन कर देना। यदि मौन ही ठीक प्रतीत हो तो उसमें भी मेरी अनुमति है। स्वामी श्री आत्मानन्दजी भी अपनी स्थिति विशेष के कारण नियमित चरखा कातने के नियम को निभाने में असमर्थ हैं। हां शेष बातों में प्रणबद्ध हैं।

भवदीय
ठा. केसरी सिंह


गांधीजी का पत्र

आश्रम साबरमती
शनिवार ६-३-१९२५

भाई केसरी सिंह जी,

आपका खत माघ कृ. ५ का मैने मेरे पास रख छोड़ा, ऐसी इच्छा से कि मैं कुछ न कुछ ‘यंग इंडिया’ में लिखूं। अब सोचता हूं कि लिखने से कुछ लाभ नहीं है। किसी ने ऐसा माना ही न था कि सब प्रतिनिधि सेठी जी के वश में हैं और दोषित हैं।

आपका
मोहन दास

महात्मा गांधी

अहिंसा के पथ पर

श्री केसरी सिंह जी बारहठ अपने जीवन के अंतिम वर्षों में महात्मा गांधी के सान्निध्य में स्वतंत्रता हेतु अहिंसात्मक आंदोलन में भाग लेना चाहते थे। उन्होंने महात्मा गांधी के अनन्य सहयोगी श्री रामनारायण जी चौधरी को उक्त आशय का पत्र दिनांक ७ दिसम्बर १९४० को लिखा।

महात्मा गांधी ने श्री केसरी सिंह बारहठ को उक्त पत्र के उत्तर में स्वीकृति दी तब तक बारहठ जी का स्वर्गवास हो गया था।


श्री केसरी सिंह बारहठ का त्याग और तपस्या अभिनव भारत के लिये प्रातःस्मरणीय

बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’

बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ का पत्र

‘प्रताप’ प्रसिद्ध राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्र
॥ वन्देमातरम्॥
जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है,
वह नर नहीं, नर-पशु निरा है और मृतक समान है।

‘प्रताप’ कार्यालय
कानपुर १९-४-१९३१

आदरास्पद बंधु,

नमोनमः।

आपका सन्तप्त पत्र मिला। श्रद्धाभाजन गणेशजी तो हम लोगों को अनाथ करके चले गये। पर, वे अमर हैं। जिस शान से वे जिये, उसी शान से खेत रहे। उनका बलिदान, साहस और धैर्य की परिसीमा का परिचायक है।

आप उनके बहुत पुराने मित्रों में हैं व आपका त्याग और आपकी तपस्या तो अभिनव भारत के लिये प्रातःस्मरण वस्तु है। यदि आपके सदृश महानुभावों की कृपा रही तो ‘प्रताप’ उसी प्रकार, पूर्ववत् सेवा करता रहेगा।

भगवान मुझे बल दे कि मैं पूजनीय गणेशजी के चरण-चिह्नों का अनुसरण कर सकूं।

आशा है आप सानन्द हैं।

आपका
बालकृष्ण शर्मा


शीशी में उतारे बिन भूत यह माने ना

(केसरी सिंह बारहठ)

श्वेत टकसाल ‘गौरमिंट’ है अदृश्य बला,
असली स्वरूप या को सर्वजन जानेना।
जाहि घर घुसै ताहि करत श्मसान रूप,
बुद्धि को बिगारि नगे नाच में लजानेना।
सर्व उपचार हार छूटे प्राण सोखे लेत,
तंत्र-पटु गांधी बिन आय हैं ठिकानेना।
असहयोग मंत्र फूंकि बीसी हूं की तीसी मांहि,
शीसी में उतारे बिन भूत यह मानेना।।१।।
क्यों कर रखे अपंग, अंग अपना कर लेना।
दबा कंठ पर हाथ, सत्व कुछ लौटा देना।
विनिमय का हि महत्व, धातु कुछ भी हो क्यों ना।
तांबा कांसी निकल, रजत चाहै हो सोना।
अपने सांचे ढालकर, मन अनुरूप बनाइये।
इक टकसाली भाव में, फिर सब नाच नचाइये।।२।।
राजमद आते राते चहरे लजाते नाहिं,
सबें खोसि जहां तहां कुछ पाते हैं।
घर घर घुसि जाते अपनी मनाते मना,
विवश बनाते दास दीन बलिलाते हैं।
सतत सताते न्याय सत्य को बताते धत्ता,
करि करि ताते घाव नोन छिटकाते हैं।
आते हैं जु वही दिन आते हैं ठहर जाओ,
दंभी जब दांत तबे तिनखे दबाते हैं।।३।।

शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी को श्रद्धांजलि

(केसरी सिंह बारहठ)

गणेश शंकर विद्यार्थी

गणेश शंकर विद्यार्थी कानपुर में सन् १९३१ में शहीद हो गये। उनके शहीद होने पर श्री केसरी सिंह जी बारहठ ने उन्हें काव्यमय श्रद्धांजलि अर्पित की-

दीनन को बंधु हो पुजारी हो स्वतंत्रता को,
साहस को सिंधु, अनुसारी सत्य-कथ को।
निर्बल को बल हिय-शूल अरिपथिन को,
साँचो श्री गणेश हो सुमांगलिक अथ को।
सेवक अथक मातृभूमि को सपूत पूत,
अटल उपासी हो ‘प्रताप’ वीर पथ को।
मेधा को सुमल्ल स्वामी लेखिनी को वीर,
धीर धुर धोरी हो धुरीण हिन्द-रथ को।

प्यारे राम की सम्पदा देश उन्नति और शिक्षा हेतु

श्री केसरी सिंह बारहठ साधु प्यारे राम जो व्यभिचार में लिप्त था की सम्पदा को देश उन्नति और शिक्षा पर व्यय करना चाहते थे। श्री केसरी सिंह व अन्य के विरुद्ध उक्त हत्याकाण्ड में दिये गये फैसले में उक्त आशय की टिप्पणी निम्नांकित प्रकार की गई है-
“It has been admitted as mentioned above that Kesri singh’s intention in acquiring the wealth of Pyare Ram was to apply it to the ‘Desh Unnati’ and Education, that the same sort of training be imparted to Luchmilal and that their assent was obtained on that understanding and that they were sent to Jodhpur for that purpose. ”

(संदर्भ : राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली Foreign and Political Department
Notes/General-B, July 1915/Nos. 106-110)


आपके कष्टों का स्मरण नाड़ियों में स्फूर्तिदायक : माखनलाल चतुर्वेदी

माखनलाल चतुर्वेदी

पं. माखनलाल चतुर्वेदी देश के ख्याति प्राप्त साहित्यकार थे। वे केसरी सिंह जी बारहठ के जीवन से प्रेरणा ग्रहण करने की भावना दिनांक १९ मार्च १९३४ को खंडवा से लिखे पत्र में यों प्रकट करते हैं-

“मेरी बड़ी इच्छा है कि एक बार आकर आपके विमल पारिवारिक जीवन में जबरदस्ती प्रवेश करूं और-कृपा लाभ लूं। झालरापाटन जाकर भाई श्री गिरधर जी और उनके बच्चे को भी देखना चाहता हूं। देखें कब अवसर मिलता है, परंतु जिस दिन आऊंगा, बिना खबर दिये चोर की तरह पहुंच जाऊंगा। आपके स्वास्थ्य की शिथिलता का संवाद पाकर दुःख हुआ। आपके कष्टों का स्मरण ही किसी की नाड़ियों में स्फूर्ति देने के लिये काफी है। ”

आपका अपना मानकर
धन्य
माखनलाल चतुर्वेदी
(संदर्भ : श्री फतेह सिंह जी मानव का नीजि संग्रहालय से)


सितम और सितम सहकर उफ न की

(डॉ. रघुवीर सिंह सीतामऊ)

डॉ. रघुवीर सिंह

श्री केसरी सिंह बारहट की हवेली शाहपुरा, भीलवाड़ा

देश के प्रसिद्ध इतिहासकार महाराज कुमार डॉ. श्री रघुवीर सिंह जी ने श्री केसरी सिंह जी बारहठ के पुत्र श्री रणजीत सिंह के अत्यधिक बीमार होने की सूचना पत्र मिलने पर दिनांक ३० अक्टूबर १९३८ को सीतामऊ से उनको पत्र लिख कर कहा कि-

“मैंने अब तक कई व्यक्तियों (महान पुरुषों) की जीवनियां पढ़ी, उनकी सुख-दुख वार्ता से परिचित हआ, परंत अब तक इतनी विकट वार्ता का विवरण बहुत ही कम देखने को मिला। आपकी विगत विपत्ती वार्ता से परिचित रहा हूं एवं आपके दिल की यातनाओं का अंदाज लगा सकता हूं और जिस व्यक्ति ने सितम पर सितम सहकर भी अब तक उफ न की, जरा भी विचलित न हुआ, उसको जरा भी क्षुब्ध होते देखकर जी रो देता है।”

(संदर्भ : श्री फतह सिंह जी मानव के संग्रह से)


चारण वही है, जो स्वतंत्रता उपासक हो

(केसरी सिंह बारहठ)

चारण वही है, जो स्वतंत्रता उपासक हो,
वाणी का वरद पुत्र जाने सत्य तत्व को।
अभय अडोल अवलम्ब निज शक्ति पर,
क्षत्रिन को देत पाठ व्यापक ममत्व को।
साहस की ज्वाला फूंकि मुरदे जगाय देत,
नाशवान देह दै खरीदें अमरत्व को।
वीर रस निर्झर बहाय बिथराय स्वयं,
न्हाय के दिखाय देत मरन महत्त्व को।।
सत्य अभय स्वातंत्र्य उपासक सिखा मरण जीवन का मर्म।
क्षात्र धर्म उद्बोधक ‘चारण’, रहा सदा साधक युग-धर्म।।

राष्ट्रभाषा हिन्दी रानी बनी : केसरी सिंह बारहठ

अंकुर सुनागरी को पोस्यो इस सींचि सींचि,
ग्रीष्म में आल बाल बांधि सुकुमार में।
वही लेलहानी जगजानी तब दिव्य बानी,
रानी बनी चढ़ी राष्ट्रभाषा अधिकार पें।
रसा सरसावें बरसावें क्यों न पावस ये,
झूमि झूमि आवें अब धन धनसार पें।
जौ लों हिन्द हिन्दी एहो भारत के इन्दीवर,
लगि हैं न बिन्दी तोलों तेरे उपकार पें।।


कहो प्यारे नेताओं को कहां लों पिटाओगे?

(केसरी सिंह बारहठ)

श्री लाला लाजपतराय

साइमन कमीशन १९३२ में लाहौर गया जहां उसका ‘बायकाट’ करते हुये सत्याग्रहियों पर ब्रिटिश सरकार के अधिकारियों ने बर्बर लाठीचार्ज किया एवं एक सार्जेट के लाठी प्रहार से देशरत्न लाला लाजपतराय बुरी तरह घायल हो गये और अंततः उसी से उनका प्राणांत हुआ। उस दर्दनाक समाचार को सुनकर ठाकर साहब ने यह कवित्त लिखा।

कवित्त
देश के दुलारे लाल, मारे जात डंडो मौत,
देखन तुम्हारे हारे कायर मिटाओगे।
ललकि भिडंत के नगारे चोट देकें अब,
ओट ले अहिंसा की क्या किस्सा ही मिटाओगे?
सहज उपाय हाय वही ना निभाय सके,
खादी बिसराय परदेशी को भिराओगे।
लाज बोरि रेता में फजेता जननी का करि,
कहो! प्यारे नेताओं को कहां लों पिटाओगे?


क्रांति के पुजारी स्वतंत्रता सेनानी राव गोपाल सिंह खरवा को श्रद्धा सुमन

(केसरी सिंह बारहठ)

केसरी सिंह जी बारहठ के स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी साथियों में अत्यधिक विश्वसनीय साथी थे खरवा ठाकुर राव श्री गोपाल सिंह जी। वे अत्यधिक बहादुर देशभक्त थे। उन्होंने केसरी सिंह जी बारहठ का प्रमुखता से बहादुरी पूर्वक साथ दिया।

चैत्र बदी सप्तमी वि. सं. १९३८ को उनके स्वर्गवास होने पर काव्यमय श्रद्धांजलि अर्पित की बारहठ जी ने-

परम उदार त्याग मूर्ति पुंज साहस को,
क्रांति को पुजारी दुःख देश को सह्यो नहीं।
भारती-स्वतंत्र बलिवेदी पैं बिहँसि बढ्यो,
दासता विलासिता की धार में बह्यो नहीं।
धीरज-धुरीण सहि सकट अटल रह्यो,
ईश भक्ति भिन्न अन्य आश्रय गह्यो नहीं।
राष्ट्रवर राव श्री गोपाल के सिधाते स्वर्ग,
आज राजपूती को नमूनो भी रह्यो नहीं।
रजवट भरिया नित रहे, कमधज अरियां काल।
बेलू बरियाँ विपत रो, गुण भरियो गोपाल।।१।।
रह्यो लाल पांचाल में, महाराष्ट्र में बाल।
राजत राजस्थान में, गौरवमय गोपाल।।२।।

केसरी सिंघ री सगली गवाड़ी ई क्रांतिकारी

कोटा रा सिरै क्रांतिकारी केसरी सिंघ री राजस्थान, बंगाल अर पंजाब रा क्रांतिकारियां सूं तोजी बैठोड़ी ही। अर्जुनलाल सेठी सूं वारा घणा घणी मेळ अर मास्टर अमीरचंद सूं खासी भली ओलखाण ही। उण समैं केई आजादी रा परवानां नै सूली रै सूये माथै चढणौ पड़ियो अर वारे परिवार माथै केई अबखायां आय पड़ी। केसरी सिंघ इण गत रा परिवारां सारूं पईसां रौ जुगाड़ बैठावण रो ताक में हा। इण मुदै सारूं जोधपुर रै अेक महंत री कोटा में हत्या हुगी। इण बाबत केसरी सिंघ, लाहेरी रामकरण अर हीरालाल जालोरी गिरफ्तार हुया अर इणां माथै मुकदमौ दर्ज हुयौ। तीन जणांनै तो बीस-बीस बरस अर हीरालाल ने सात बरस री सजा बोली जी।

थोड़ा दिनां पछै केसरी सिंघ नै बिहार री हजारी बाग जैल में मेल दिया। केसरी सिंघ री तो सगळी गवाड़ी ई क्रांतिकारी बेटौ प्रताप सिंघ बम बणावण रै अपराध में पकड़ीज्यो अर बरेली जेल में मेलीज्यो। तर तर रा जुल्मां सूं करनै जैल में इज प्रताप सिंघ रो सरगवास हुयो।

(संदर्भ : राजस्थान में आजादी रौ आंदोलन : जहूर खां मेहर)

‘राजस्थान केसरी’ के सम्पादक थे केसरी सिंह बारहठ

केसरी सिंह बारहठ को अर्जुनलाल सेठी द्वारा जमनालाल बजाज से विस्तृत बातचीत के बाद स्वयं जमनालाल बजाज ने केसरी सिंह बारहठ को परिवार सहित वर्धा आने का आमंत्रण भेजा। केसरी सिंह बारहठ अपने दामाद श्री ईश्वरदान आशिया और पुत्री श्रीमती चंद्रमणि को साथ लेकर वर्धा चले गये। ठाकुर केसरी सिंह बारहठ ने वर्धा में ‘राजस्थान केसरी’ साप्ताहिक समाचार पत्र का सम्पादन कार्य श्री अर्जुनलाल सेठी के सहयोग से प्रारम्भ किया। उक्त समाचार पत्र का नामकरण ठाकुर केसरी सिंह बारहठ के नाम पर श्री अर्जुनलाल सेठी ने ‘राजस्थान केसरी’ रखा।

‘राजस्थान केसरी’ का सम्पादन करते-करते प्रकाशित होने वाली सामग्री के संबंध में नीति को लेकर मतभेद उत्पन्न हुआ। श्री बारहठ सत्य और राष्ट्र को प्रेरित करने वाली सामग्री को प्रकाशित करने के पक्षधर थे। उक्त मतभेद के कारण उन्होंने ‘राजस्थान केसरी’ के सम्पादन का कार्य छोड़ दिया।


श्री माणिक कंवर स्मरणांजलि

(केसरी सिंह बारहठ)

श्री केसरी सिंह जी बारहठ की धर्म पत्नी श्रीमती माणिक कंवर ने उनका स्वातंत्र्य आंदोलन में मनसा वाचा कर्मणा साथ दिया। उन्होंने घर के वातावरण को स्वर्ग सा सुंदर बना रखा था। श्रेष्ठ संस्कारों से युक्त श्रीमती माणिक कंवर का आषाढ़ शुक्ला ४ वि. सं. १९२७ को स्वर्गवास हो गया। केसरी सिंह जी के कवि मन ने उनको यों स्मरण किया-

तेरे सिधाते हाय मणि।
अरमान मन का बह गया।
हा! आंख के जल संग ही,
सर्वस्व मेरा बह गया।
कोई किसी का है नहीं,
सब स्वार्थ ही का खेल है।
सुत हो सुता हो बंधु हो,
अब नहि तिलों में तेल है।
अतृप्त नयन युरमने,
गुंधे विचित्र मुक्ताहार।
दिये बिखेर रम्य पुस्प,
वाणि ने अनेक बार।
उपेक्षणीय मान के,
उन्हें गई बताय मौन।
मणी! मणी!! मणी!!! रटूं,
दिखाय हाय पंच कौन?


श्री केसरी सिंह बारहठ को काव्यांजलि

श्री केसरी सिंह जी बारहठ को अनेक कवियों ने काव्य मयी श्रद्धांजलि अर्पित की है, उनके कुछ अंश प्रस्तुत हैं-

थिर संपत रजथांन, भ्रात पुत्र संचित विभो।
देस हेत बलिदान, करगो बारहठ केशरी।।

-उदयराज उज्ज्वल

लेय निज हाथ कवि धजा इण देसरी,
सेस री जाय सुरलोक रोपी।
अमर सहीद प्रताप पितरेसरी,
अमरापुर राव री सभा ओपी।।

-बारहठ कान्हीदान, देशनोक

रे गरबीले केसरी, सुजस कथित संसार।
तो पर तोर प्रताप पर, अक्षय है बलिहार।।

-ठाकुर अक्षय सिंह रत्नू

कवि केहर कंठीर, सोदो केहर सांपरत।
भल केहर बड़वीर, इल तैं केहर ऊठगो।।
सोदा हंदी साख, रहसी जब लग थिर रसा।
दिल सांचे ते दाख, खागो नरयंद भेंट कर।।

-राव नरेंद्र सिंह, जोबनेर

हाड़ौती के हृदय धन, चारण कुल के चन्द।
वीर भूमि बन केसरी, जय जय जय स्वच्छन्द।।
कलम न होगी बन्दिनी, जिह्वा पर नहिं रोक।
गाये जायेंगे तभी, तब गुण गण के ओक।।

-लक्ष्मण स्वरूप त्रिपाठी, अलवर

राणा को कर्तव्य सुझाया जिसने चोखा,
ठीक समय पर ब्रिटिश नीति ने खाया धोखा।
करता था यह देश प्रेम जिसकी रग रग में,
भाता था उत्साह सर्वथा जो अग जग में।।
देख देश की दीन दशा जो कभी न सोया,
प्यारा पुत्र प्रताप देशहित जिसने खोया।
चारण कुल आकाश का चन्द्र कहां वह है गया,
वीर केसरी सिंह हा! आज कहां गुम हो गया।।

-श्री कृष्णदत्त शास्त्री, अलवर

समता शक्ति सुतंत्रता, श्रम अर सील सुमिट्ठ।
कोट क्षमघृति केहरी, देश भगत में दिट्ठ।।
सुहढ़ भ्रात जामात सुत, समिधा हुआ सुचंग।
जग्य हुतासण झोकिया, रंग केहर घण रंग।।

-नारायण सिंह ‘सेवाकर’, नोख

केसरि और प्रताप अठ, जोरावर वर वीर।
कीन्ह निछावर देशहित, संयुत विभव शरीर।।

-यशकर्ण खिड़िया

सदके उस जमी के, पैदा किये हैं जिसने।
बारहठ केसरी ओ जोरावर ओ परताप।।

-नन्द किशोर ‘नबाब’, सांदू

विद्या का वृहस्पति समाज का सुधाकर वो,
पिता परताप आजवासी सुरशाला का।
हे हरि! अन्याय हआ राजस्थान शेर मरा,
केसरी सुमेर गिरा मेरी जाति माला का।।

-ठा. बलवन्त सिंह बारहठ, माहुंद (अलवर)

क्षेय हुआ परताप, रूड़े राजस्थान में।
उण रा खावै धाप, इण रा रूलग्या रोळ में।।

-गणेशीलाल व्यास ‘उस्ताद’

फवती खारी फेट, बात लपेट चपेट दे।
अवगुण री आखेट, करसी अब कुण केहरी।।

-ठाकुर राम सिंह राठौड़, केलवा (मेवाड़)

करत कपूती जो कठै, जबरो आतो जोस।
खरी सुणातो केहरी, राजावां करि रोस।।

-ठा. कल्याण सिंह शेखावत, गांगियासर, झुंझनू

मेवाड़ी मांटी निज निपजै, जंगी जोरावर सा जौदा।
हिंदवाणी सूरज महाराणां (तो) करे कंवर चारण सौदा।।

-लूण सिंह ‘करणीसुत’ लखावत, टहला

शचीन्द्र नाथ सान्याल एवं गोपाल सिंह खरवा की सम्पर्क कड़ी थे प्रताप बारहठ

शचीन्द्र सान्याल तथा राव गोपालसिंह के सम्पर्क की बिचली कड़ी का काम बंदी बनाये जाने से पूर्व बारहठ केशरीसिंह का पुत्र प्रतापसिंह करता था। उसके माध्यम से शचीन बाबू के पास कुछ रिवॉल्वर तथा कारतूस भेजे गये थे।

(संदर्भ : राव गोपाल सिंह खरवा : शेखावत सुरजनसिंह झाझड़)


कुंवर श्री प्रताप सिंह बारहठ

कुंवर प्रताप बारहठ का जन्म श्री केसरी सिंह बारहठ के पुत्र के रूप में माता श्रीमती माणिक्य कंवर की कोख से २४ मई १८९३ को उदयपुर में हुआ। कुंवर प्रताप बारहठ का प्राथमिक विद्याध्ययन कोटा में हुआ एवं हाई स्कूल की शिक्षा दयानन्द एंग्लो वैदिक हाईस्कूल, अजमेर में प्राप्त की, परंतु स्वातंत्र्य आंदोलन में भाग लेने की दृढ़ इच्छा ने उन्हें परीक्षा देने से रोक दिया।


प्रताप प्रकृति से ही सिंह था

(प्रख्यात क्रांतिकारी रास बिहारी बोस)

कुंवर प्रताप बारहठ को प्रसिद्ध क्रांतिकारी और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रासबिहारी जी बोस ने निर्भीकता व शक्ति में ‘सिंह’ बताया था।

रास बिहारी जी बोस ने अपने एक आलेख में प्रताप बारहठ का वर्णन करते हुए लिखा-“हम लोग जिस समय नवद्वीप (बंगाल) में थे उस समय बहुत से भाई आते-जाते थे, उनमें से प्रतापसिंह की कुछ बातें करूंगा। प्रताप के बाप, चाचा, दादा सब कोई देश के लिये आत्मदान कर चुके हैं। प्रताप के साथ मेरा संबंध बहुत पुराना था। पंडित अर्जुनलाल सेठी जी की सिफारिश लेकर प्रताप और उनके बहनोई अन्य दो लड़कों के साथ देश सेवा करने के लिये मास्टर अमीरचन्द जी (जिनको बम काण्ड में फांसी दी गई) के पास १९१३ में आये थे। मुझे देखते ही अमीरचन्द ने कहा था-बाबूजी! मैं आपके लिए चार बड़े देश प्रेमी यहां ले आया हूं। मैं उस दिन दिल्ली से जाने वाला ही था इसलिए उन लोगों ने मेरे लिये राजपूताने के ढंग की रोटी तरकारी बना कर रखी थी।

मैंने अवधबिहारी को एक काम से बाहर भेजा था, वहां पर प्रताप को देखा था तो मालूम हुआ कि उसकी आंखों से आग निकल रही है। प्रतापसिंह प्रकृति से ही सिंह था। मेरे विदेश जाने का कारण प्रताप को मालूम होने पर वह रो दिया था। उसे बड़ा दुख था कि वह बहुत दिन मुझे देख नहीं पायेगा। प्रताप के साथ मेरा वही अंतिम साक्षात्कार था। प्रताप अब इस जगत में नहीं है।

जेल में ही वह पृथ्वी छोड़ कर स्वर्ग चला गया, जहां की चीज थी, वहीं चली गई। ”

(संदर्भ : ‘मैं जापान कैसे गया’ आलेख राजा महेन्द्र प्रताप अभिनन्दन ग्रंथ में प्रकाशित,
स्व. रासबिहारी बोस के आलेख से)

हिन्दुस्तान के अंग्रेज गृह सचिव क्रेडक को मारने की क्रांतिकारी जिम्मेदारी ली प्रताप बारहठ ने

शचीन्द्र सान्याल और प्रताप को राजस्थान में क्रांतिकारियों को फिर से संगठित करने का काम सौंपा गया। ये दोनों पहले दिल्ली गये और फिर प्रताप अकेला राजस्थान आया। क्रांतिकारियों ने भारत सरकार के गृह सचिव सर रेजिनल्ड क्रेडक को मौत के घाट उतारने का इरादा किया और इस काम के लिये जयचन्द को चुना गया। जयचन्द निमेज डकैती के श्री रेजिनल्ड क्रेडक बाद से फरार था और ऋषिकेश में बाबा कमली वाले आश्रम में रहता था। उसे वहां से बुलाकर लाने के लिये रामनारायण चौधरी को भेजना तय हुआ। रामनारायण चौधरी इससे पहले जयपुर में अर्जुनलाल सेठी की प्रेरणा से क्रांतिदल में शामिल हो चुके थे। प्रताप जयपुर से रामनारायण चौधरी को दिल्ली ले आये। वहां से चौधरी बनिये का वेश धारण करके ऋषिकेष पहुंचे और जयचंद से मिले पर जयचंद ने इनकार कर दिया। इस पर क्रेडक को मारने की जिम्मेदारी प्रताप ने ली, लेकिन क्रेडक बीमार पड़ गया और उस पर हमला नहीं हो सका।

इस पर प्रताप के विरुद्ध वारंट जारी हो गया। वह हैद्राबाद (सिंध) चला गया। जब वहां से कुंवर प्रताप बारहठ और रामनारायण जी चौधरी लौट रहे थे तो आशानाडा रेल्वे स्टेशन पर अपने मित्र स्टेशन मास्टर से मिलने चले गये। आशानाडा रेल्वे स्टेशन के मास्टर ने पुलिस को इत्तिला दे दी और वहां पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।


श्री केसरी सिंह जैसे कितने लोग जिन्होंने अपनी संतान की देश कार्य में बलि दी

प्रख्यात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं क्रांतिकारी शचीन्द्र सान्याल ने स्वतंत्रता आंदोलन में सशस्त्र विप्लव का नेतृत्व किया था। वे रास बिहारी बोस के निकटतम सहयोगी थे और वीरव्रती प्रताप बारहठ के अन्यनत्तम सहयोगी थे। श्री सान्याल को वीर सावरकर जी की तरह दो बार आजीवन काले पानी की सजायें हुई। अंग्रेज सरकार के छक्के छुड़ाने और विप्लव की आंधी के प्रवाह को तेज करने का कार्य उन्होंने वीरवर प्रताप बारहठ के साथ मिलकर किया था।

वीर योद्धा शचीन्द्रनाथ सान्याल ने अपनी आत्मकथा ‘बंदी जीवन’ (१९२२) में अपने साथी प्रताप बारहठ का गौरवपूर्ण स्मरण करते हुए एक अध्याय लिखा है। जब प्रताप बारहठ को अंग्रेज पुलिस यातनाएं देकर पूछताछ कर रही थी, उस समय श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल जेल की पड़ौसी बैरक में बंदी थे। आपने अनेक बार प्रताप बारहठ के साथ विप्लवी योजनायें बनाईं थी।

महान क्रांतिकारी योद्धा श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल ने स्वयं अपने शब्दों में प्रताप बारहठ को स्मरण करते हुए लिखा कि-

“राजपूताना के एक युवक के साथ मैं दिल्ली आ पहुंचा। अपने दल के ही एक युवक के डेरे पर अतिथि हुआ। दिल्ली में जो करना था सो किया। दिल्ली में ही पिंगले के साथ भेंट होने की बात थी। उस समय के होम मेम्बर ‘सर रीजनल्ड क्रैडक साहब’ तब दिल्ली में न थे और एक-दो और कारण थे, जिससे दिल्ली में कुछ किया नहीं गया. . .। राजपूताने के जिस युवक के साथ मैं दिल्ली गया उसका नाम था प्रताप सिंह। ये राजपूताने के चारण वंश के थे। चारण लोग राजपूतों में पूज्य माने जाते हैं। प्रताप के पिता का नाम सरदार केशरी सिंह, वे उदयपुर के राणा के विशेष प्रिय थे और अब मुझे ठीक ठीक याद नहीं, या तो प्रताप के पिता या उनके दादा उदयपुर के राणा के मंत्री पद तक पहुंचे थे। इनकी जागीर मेवाड़ के अंतर्गत शाहपुरा राज्य में थी। . . . राजपूताना के आज बिल्कुल अध:पतित हो जाने पर भी उस अतीत युग के संस्कार आज भी प्रत्येक राजपूतानावासी के हृदय में अंकित हैं। प्रताप परिवार की कहानी देख कर यह बात मेरे मन में स्वत: जाग उठती है। यह परिवार राजपूताना के गणमान्य समृद्ध जमींदारों में गिना जाता था, किंतु स्वदेश प्रीति और तेजस्विता की खातिर इन्हें अपना घर-बार बर्बाद करना पड़ा।

सबसे पहले दिल्ली षड्यंत्र के मामले के संबंध में प्रताप और प्रताप के बहनोई पकड़े गये, किंतु उनके विरुद्ध कोई विशेष प्रमाण न रहने से उस बार उनका छुटकारा हो गया। इसके कुछ ही दिन बाद कोटा में ही एक और राजनैतिक मामले में प्रताप के पिता केशरी सिंह जी को आजन्म काले पानी का दण्ड हुआ और प्रताप के एक सगे चाचा के नाम भी वारंट निकला, संभव आज भी वे पकड़े नहीं गए। केशरी सिंह जी का स्वास्थ्य अच्छा न रहने से उन्हें अण्डमान नहीं जाना पड़ा, देश की जेलों में ही रहना पड़ा।

इस मामले के फलस्वरूप केशरी सिंह जी की और उनके छोटे भाई की समूची सम्पत्ति तो जब्त हुई इसके अलावा उनके जो भाई राजनीति के पास फटकते भी न थे, उनकी भी सारी सम्पत्ति जब्त हो गई। इस तरह वे समृद्ध-सम्पन्न जागीरदार की अवस्था से एकदम रास्ते के भिखारी हो गये। प्रताप की माता के दुखों की उस समय सीमा न थी, आज एक संबंधी के पास रहतीं तो कल दूसरे संबंधी के घर जाकर अतिथि बनतीं। अंत में अपने पिता के घर जाकर किसी तरह दिन काटती रहीं, प्रताप के मामा के घर की हालत भी विशेष अच्छी न थी। विधाता जब किसी के प्रति निर्दयी होते हैं तब उनकी निष्ठुरता के निकट संसार की सब निष्ठुरता फीकी पड़ जाती है और वे जिनको वीर बनाकर उठाते हैं, उनके वीरत्व के निकट भगवान की निष्ठुरता भी हार मानने को बाध्य होती है। इसी से इतनी विपत्ती में पड़कर भी प्रताप सिंह बराबर विप्लव दल में काम करते रहे। काम करने में भी अंतर है, केवल कर्तव्य ज्ञान से काम करना एक बात है और काम करके आनंद पाना दूसरी बात; हमारा विचार है कि काम करके आनंद पाया जाये यही हमारा कर्तव्य है; अर्थात् जैसा काम करने से मनुष्य साक्षात् रूप से आनंद भी पाये, हमारा विचार है वैसा काम ही मनुष्य का कर्तव्य है और जो करके मनुष्य आनंद तो पाये ही नहीं, प्रत्युत उससे क्लेश का आभास हो वह काम करना मनुष्य को उचित नहीं। वैसी स्थिति में मानना होगा कि अनाधिकार चेष्टा की जा रही है, क्योंकि वैसी स्थिति में आनंद अथवा तृप्ति कुछ भी नहीं होती। अर्थात् लज्जा की खातिर, लोक-निंदा के भय से कर्तव्य-कार्य में योग देना एक बात है और कर्तव्य कार्य करके सचमुच आनंद पाना दूसरी बात।

प्रताप ने जो अपनी पारिवारिक अवस्था के भीषण संकट काल में भी इस प्रकार विप्लव कार्य में योग दिया था, उससे उनके दिल के किसी कोने में किसी तरह की ग्लानि अथवा संकोच तो था ही नहीं, वरन् विपत्ति की ऐसी कराल मूर्ति आंखों से देखकर भी वे पिता के अभिप्रेत प्रिय कार्य में फिर भी अपने को लगा सके, इससे उनका दिल आनंद और गर्व से फूल उठता था। ऐसे बहुत सज्जन देखे गये हैं जो केवल कर्तव्य की खातिर अथवा बंधुत्व को निबाहने के लिये ही इस विप्लव कार्य में योग देते थे, इसी से उनके कार्य में वैसा उत्साह न देखा जाता था और इसीलिए वे अधिकांश समय मुरझाये से रहते थे। ऐसा भाव देखकर हम उन्हें अधिक दिन यह विडम्बना न भोगने देते और शीघ्र ही निर्विवाद रूप से आनन्द भोगने का अवसर दे देते थे, जिससे वे छुटकारा पाकर शांति से दम ले सकें। किंतु जब-जब ऐसा नहीं किया गया है, जब-जब प्रकृति और प्रवृत्ति के विरुद्ध आचरण किया गया है, तब-तब प्रकृति देवी ने अपना पूरा बदला चुकाया है।

प्रताप वैसे कर्तव्य की खातिर ही उस कार्य में योग न देते थे। उन जैसे युवक मैंने बहुत ही कम देखें हैं। प्रताप केवल स्वयं ही आनंद में रहते हों सो नहीं, उनके संग में जो रहते थे वे भी आनंद पाते थे। तो हमारा तो विचार है कि जिसका मन ऐसी अवस्था में माता-पिता के लिए अधीर न होता हो उसका विश्वास करना उचित नहीं। मायामोह का एकदम अभाव होना एक बात है और माया-मोह में लिप्त न होना दूसरी बात। मनुष्य की दृष्टि से मैं तो उन्हीं को श्रेष्ठ कहूंगा जिनके स्वभाव में माया-मोह की पूरी सत्ता है किंतु जो माया-मोह में लिप्त नहीं होते। इसी से प्रताप को जब दुखी देखता तब मेरे प्राणों में बड़ी व्यथा होती। किंतु कार्य-क्षेत्र में जब देखता प्रताप किसी से भी पीछे नहीं है तब फिर वैसा ही आनंद भी प्रतीत होता।

भले-बुरे का द्वंद्व भी प्रताप के अंतःकरण में चरम अवस्था तक जा पहुंचा था। प्रताप के पकड़े जाने पर पुलिस बहुत दिन तक अनेक प्रकार के प्रलोभन दिखाकर उन्हें सब गुप्त बातें प्रकट कर देने के लिए विशेष तंग करती रही। पुलिस प्रताप से कहती कि सब गुप्त बातें कह देने पर केवल प्रताप को ही नहीं वरन् उसके पिता को भी छोड़ दिया जाएगा, यही नहीं उसके चाचा पर से भी मुकदमा उठा लिया जायेगा, उनकी सब सम्पत्ति फिर लौटा दी जाएगी, और इस सबके अलावा और भी कुछ पुरस्कार दिया जायेगा। प्रताप की माता ने, कितना कष्ट पाया है, प्रताप के भी दण्डित हो जाने से माता की अवस्था कैसी शोचनीय हो जायेगी और इस आघात को वे कैसे सह सकेंगी, यह सब बातें पुलिस अपनी स्वभावसिद्ध चतुराई के साथ बार-बार समझाती थी। पुलिस की ये सब बातें बिल्कुल निर्मूल हों सो भी तो न था। पहले पहल तो वे पुलिस के साथ ज्यादा देर ठीक तरह बात ही न करते थे। पीछे उन लोगों के साथ बात करना प्रताप को मानो कुछ-कुछ भला लगने लगा। एक दिन पुलिसवालों के साथ प्रताप की करीब तीन-चार घंटे बातचीत हुई। हम सब पास की निर्जन कोठरी में बैठे-बैठे दम थामकर जमीन आसमान की बातें सोचने लगे, संदेह हुआ कि अबकी बार प्रताप फूट पड़ेगा। पीछे मुकदमा आरंभ होने पर जब हम सबको प्रायः दिनभर इकट्ठा रहने का सुयोग मिला तब मालूम हुआ कि सच ही प्रताप का मन बहुत विचलित हो गया था। यहां तक कि अंत में एक दिन प्रताप ने, पुलिस से-कह दिया कि वे एक दिन और सब बातों पर विचार कर लें फिर कहना होगा तो कह देंगे। किंतु अगले दिन जब पुलिस प्रताप से मिलने आई, प्रताप बोले-‘देखिये बहुत सोचा-विचारा अंत में तय किया है कि कोई बात नहीं खोलूंगा। अभी तक तो केवल मेरी ही माता कष्ट पा रही है, किंतु यदि मैं गुप्त बातें प्रकट कर दूं तो और भी कितने ही लोगों की माताएं ठीक मेरी माता के समान दुख पाएंगी, एक मां के बदले और कितनी माताओं को तब हाहाकार करना होगा। ‘ मन के एक बार नीचे फिसल पड़ने पर उसे फिर अपनी जगह लौटा लाना कितना कठिन कार्य है, यह चिंताशील व्यक्ति ही समझ सकते हैं।

नहीं मालूम आज भारत में कितने ऐसे पिता हैं, जो सरदार केशरीसिंह की तरह सब जान-बूझकर अपने और अपनी संतान को इस प्रकार देश के कार्य में बलि दे सकेंगे। भारत का दुर्भाग्य है कि प्रताप सा युवक आज इस जगत में नहीं है। बरेली जेल में अंग्रेजों का दण्ड भोगते-भोगते उसका नश्वर शरीर उस दिव्य आत्मा का साथ न निबाह सका। इसी प्रताप के साथ मैं दिल्ली गया था और कई दिन तक इकट्ठे काम करने का अवसर पाया था। उस समय प्रताप की आयु लगभग बाईस बरस की रही होगी। दिल्ली में, हमने इस यात्रा में कितना काम किया यह दूसरे परिच्छेद में लिखा जायेगा।

. . . प्रताप के साथ इस बार दिल्ली में रहते समय मैंने इन्हीं बालमुकुन्दजी के साथ बातचीत की थी। . . . दिल्ली के विप्लव दल के दो मुख्य कार्यकर्ता श्रीयुत अवधबिहारी और श्रीयुत अमीरचन्द उत्तर भारत के अनेक विप्लवियों की अपेक्षा बहुत अंशों में श्रेष्ठ थे। . . . अमीरचन्द और अवधबिहारी के साथ मेरी वैसी घनिष्टता न हुई थी; कारण कि वे पहले ही पकड़े गये। किंतु इस बार प्रताप के साथ दिल्ली आकर लक्ष्मीनारायण और खास्ताजी के खूब घनिष्ट रूप से मिलने का अवसर पाया। . . . अवधबिहारी और अमीरचन्द के पकड़े जाने पर दिल्ली के विप्लव दल का कार्यभार लक्ष्मीनारायण और गणेशीलाल पर आ पड़ा। . . . मैं इस बार प्रताप के साथ दिल्ली आने के पहले और भी कई बार दिल्ली आया था और तब से ही देखता था कि अवधबिहारी आदि की गिरफ्तारी के बाद से दिल्ली में हमारा काम प्रायः कुछ भी आगे नहीं बढ़ रहा था। . . . इन सब कारणों से अनेक प्रकार से विप्लव की चेष्टा विफल होने के बाद हम और प्रतापसिंह नये सिरे से कार्य चलाने के लिये दिल्ली आये। हमारे दिल्ली आने का यह भी एक कारण था। क्रीडक साहब के दिल्ली में न रहने से हमें अपना एक विशेष कार्य अंत में स्थगित ही रखना पड़ा, किंतु दिल्ली की विप्लव समिति के पुनर्गठन में हम पूर्ण उद्यम से लग गये।

. . . हम लोग दिल्ली में एक मकान भाड़े पर लेकर प्रायः पंद्रह दिन रहे। दिल्ली से राजपूताना बहुत दूर नहीं है, मैं दिल्ली में ही रहा और प्रताप को दो बार जयपुर भेजा। हमारी इच्छा थी कि राजपूताना के कुछ युवकों को दिल्ली में लाकर दिल्ली के विप्लव केन्द्र को सुगठित कर डालें। प्रताप राजपूताना में कार्य करते और मैं दिल्ली के कार्यकर्ताओं के साथ मिलता-जुलता और उनमें से अपने दिल के मुताबिक आदमी छांटता। इस प्रकार दिल्ली में कुछ दिन काम करने के फलस्वरूप खास्ता जी के मन में बुझी हुई आग फिर प्रज्वलित हो गई। . . . इस प्रकार जिस समय दिल्ली का कार्य क्रमशः आगे बढ़ने लगा मैं भी ठीक उसी समय खूब बीमार पड़ गया। लाचार प्रताप को संग लेकर मैं बंगाल चला आया। मेरे नाम उस समय वारंट निकल आया, इसलिए युक्त प्रदेश में न रहकर बंगाल आना ही ठीक समझा।

. . . बारी का बुखार लेकर प्रताप के साथ बंगाल से मैं अपने केन्द्र में आ उपस्थित हुआ। बंगाल में हमारी विप्लव समिति का केन्द्र था कलकत्ता के निकट एक गाँव। अनेक कारणों से उस गांव का नाम अब भी नहीं लिखा जा सकता। इसी स्थान में मुझे पन्द्रह दिन तक खाट पर पड़े रहना पड़ा और इसी स्थान के युवकों ने उस समय बड़े यत्न से मेरी सेवा शुश्रूषा की। प्रताप मुझे बंगाल में छोड़कर राजपूताना चले गये। बात थी कि मैं स्वस्थ होने पर राजपूताना जाऊंगा और इस बार बड़े यत्न के साथ राजपूताना में विप्लव के केंद्र स्थापित करने होंगे। परंतु जब उनके साथ मेरी भेंट हुई, तब हम दोनों ही जेल में थे।”

शाबास बहादुर

जब चांदनी चौक से लॉर्ड हार्डिंग का हाथी पर सवार होकर जुलूस निकल रहा था, उस समय उनके साथ हाथी पर ‘लेडी हार्डिंग’ भी सवार थी। हाथी के हौदे पर बम का धमाका हुआ। झटका लगा और वह आगे की ओर गिर गई। बम के धमाके से भीड़ निस्तब्ध होकर चुप हो गई। जब लॉर्ड हार्डिंग ने जुलूस को आगे बढ़ाने का निर्देश दिया उस समय लेडी हार्डिंग के अनुसार भीड़ में से लोग चिल्लाने लगे और आवाज लगा रहे थे-‘शाबास बहादुर।

उत्तर प्रदेश पुलिस के डी. आई. जी. श्री पी. बैम्बले ने बम कांड में दी अपनी गवाही में कहा कि-“मैंने चांदनी चौक में ईस्ट इंडिया रेलवे बुकिंग
ऑफिस को पार किया तो पीछे एक खतरनाक धमाके की आवाज सुनाई दी। मैं समझ गया कि यह बम विस्फोट है। इसी के साथ छज्जे से आवाज सुनाई दी-‘शाबास मारा’। यह आवाज सराहना की हर्ष अनुभव की थी।”


हम सब हार गये वह विजय हुआ : क्लीवलैंड

कुंवर प्रताप बारहठ रास बिहारी बोस के साथी को जब बनारस षड्यंत्र में गिरफ्तार किया गया तब ब्रिटिश पुलिस व गुप्तचर विभाग के अधिकारियों ने गहन शारीरिक यातनायें देकर पूछताछ की। पूछताछ के पश्चात ब्रिटिश सरकार के गुप्तचर विभाग के निदेशक सर आर्चीबाल्ड क्लीवलैंड, दिल्ली ने बनारस जेल में कुंवर प्रताप बारहठ को यातनायें देकर कठोरता से गहन पूछताछ के पश्चात टिप्पणी की कि-“मैंने आज तक प्रताप सिंह जैसा वीर और विलक्षण बुद्धि वाला युवक नहीं देखा। उसे सताने में हमने कोई कसर नहीं रखी पर वह टस से मस नहीं हुआ। हम सब हार गये वह विजयी हुआ।”

प्रताप बारहठ ने पूछताछ में सर क्वीवलैंड से कहा कि-“मेरी मां को रोने दो जिससे सैंकड़ों को न रोना पड़े। यदि मैंने दल का भेद खोल दिया तो यह मेरी वास्तविक मृत्यु होगी और मेरी माता का अमिट कलंक होगा।”

कुंवर प्रताप बारहठ को बनारस षड्यंत्र कांड में दोष सिद्ध माना गया और पांच वर्ष की कठोर कारावास की सजा से दंडित किया। उन्हें बरेली की जेल में रखा गया, जहां शारीरिक यातनाएं दी गईं।

यातनाओं से त्रस्त कुंवर प्रताप बारहठ बरेली के कारागृह में २४ मई, १९१८ को शहीद हो गये। उनके बारे में बरेली कारागृह के बंदी रजिस्टर के पृष्ठ संख्या १०६/१०७ में निम्नलिखित विवरण लिखित है-

प्रताप सिंह सुपुत्र केसरी सिंह

रजिस्टर नं. 1-1-1916 To 31-12-1916
रजिस्टर का पेज नं. १०६/१०७

नाम कैदी
:
प्रताप सिंह
सजा की अवधि
:
5 साल की सख्त कैद
रजिस्टर नं. कैदी
:
जेल में पहले आये ६५९२
दुबारह का नं. १०३१७
चालवचलन
:
अच्छा
उम्र
:
18 वर्ष
पेशा
:
नौकरी
जात
:
चारण
पिता का नाम
:
केसरी सिंह
रियासत व जिला
:
रियासत-शाहपरा, जिला-अजमेर
सजा कहाँ से पड़ी
:
स्पेशल सेशन जज बहादुर बनारस
सजा की तारीख
:
१४-२-१९१६
रिहाई
:
१३-२-१९२१ को होनी थी
बा हिसार रहे सहरा सूट में फूट हो गया।
मरने की तारीख
:
२४-५-१९१८ मर गये
चेहरा
:
गोल चेहरा
रंग
:
गोरा (गन्दमी)
होलिया
:
नाक पर एक दाग, होठ (मोटे) खुर्द,
दाहिने बाजू पर एक तिल, दाहिने पैर की
पिंडली पर एक दाग, सकरमनी सद दाग
ऊर्द खुर्द
लम्बाई
:
५ फीट १ इंच
वजन
:
१०२ सेर
समय
:
दुपहर के बाद

अमर शहीद प्रताप बारहठ

(श्री मनुज देपावत, देशनोक)

दीप शिखा के परवाने की यह बलिदान कहानी है।
यह बात सभी ने जानी है।
अत्याचारी अन्याई ने, अन्याय कि भारत भू पर,
डोली थी डगमग वसुंधरा, वह कांप उठा ऊपर अंबर।
माता के बंधन कसे गये, झनझना उठी थी हथकड़ियां,
बज उठी बेड़ियां पैरों की, लग गई आंसुओं की झड़ियां।
रोती जननी को दानव ने, कारागृह में कर दिया बंद,
रुक गये गीत आजादी के, रुक गये थे प्रलय-छंद।
हँस उठा ब्रिटिश साम्राज्यवाद दीनों का उसने किया नाश,
भारत के कोने-कोने में गूंजा था जिसका अट्टाहास।
सुन आर्य भूमि का आर्तनाद उठ गये देश के दीवाने,
जल उठी ज्वाल, लपटें कराल आ गये शमां पर परवाने।
चुप रह न सका सौदा प्रताप जग उठ जाति का स्वाभिमान,
जगती तल के इतिहासों में गूंजे थे जिसके कीर्ति गान।
आखिर चारण का बच्चा था वह वीर केशरी का सपूत,
पद-दलित देश की धरती पर वह बनकर उतरा क्रांति दूत।
उसने करणी का नाम लिया उसने माता का नाम लिया,
कवि के बच्चे के मुक्त कण्ठ से इन्कलाब का गान किया।
वह देख रहा था दानव को निर्दोषों पर गिर रही गाज,
वह देख रहा था बहनों की जो खुले आम लुट रही लाज।
सुनता था अपने भारत में असहाय नारियों का क्रंदन,
जब हँसी-खुशी की ध्वनियों से वह गूंज रहा उनका लंदन।
वह सह न सका, उठ खड़ा हुआ उन दहक रहे अंगारों में
शासक के अत्याचारों में उसकी तीखी तलवारों में।
उसके उन्मादक गीतों से जग उठी जेल की दीवारें,
वह कांप उठा अत्याचारी थी बन्द हो गई हुंकारें।
कुछ सिहर उठा था सिंहासन का उदित हो गया क्रूद्ध श्राप,
उस आंदोलन की ज्वाला से पापी का जलने लगा पाप।
पर अत्याचारी शासक ने धोखे से उसको पकड़ लिया,
उस दहाड़ते हुए शेर को जंजीरों में जकड़ लिया।
वह कैदी था, पर झुका नहीं था अडिग रहा देशाभिमान,
वह बंदी था, पर झुका नहीं क्या हुई भावनाएं गुलाम।
कारा की कठिन यातना से कट गया गात उसका कोमल,
अत्याचारों की आग जल वह पुष्प गया ज्वाला में जल।
चल पड़ा दनुज का दमन चक्र उसकी नृशंसता कठिन-क्रूर,
पिस गई मनुज की मानवता होकर पाटों में चूर-चूर।
उसके ज्वलंत अरमानों का हो गया भव्य प्रासाद ध्वस्त,
हो गया जेल के आंगन में वह सौदा कुल का सूर्य अस्त।
खो गया देश का वह वैभव माता ने खोया था सपूत,
था मरा? नहीं, वह अमर हुआ चिर स्मरणीय वह क्रांति दूत।
फिर एक दिवस होगा ऐसा चारण वाणी की आग जलेगी,
सकल चिताएं भभक उठेगी उस शहीद की राख जलेगी।
तब होगा प्रतिकार हमारा, मन साध मिटानी है।
दीप शिखा के परवाने की, यह बलिदान कहानी है।
यह बात सभी ने जानी है।


श्री जोरावर सिंह बारहठ

श्री जोरावर सिंह बारहट

क्रांतिवीर श्री जोरावर सिंह जी का जन्म पिता श्री कृष्ण सिंह जी के यहां माता श्रृंगार बाई की कोख से भाद्र शुक्ल पक्ष १० बुधवार वि. सं. १९४० को हुआ। इनकी जन्म कुण्डली निम्नांकित प्रकार है

“विक्रमाब्द १८४० शाके १९०५ भाद्रपद शुक्ल पक्षे तिथौ १० बुध वासरे घटी ५/४० पूर्वाषाढ़ा नक्षत्रे घटी ६/२ सौभाग्य योगे घटी ६/४६ तात्कालिक विष्टीकरणे जन्मगण १५१ सूर्य ४/२६ एवं पंचांग शुद्धौ सूर्योदयात् इष्ट घटी ४२/३० तत्समये लग्न स्पष्ट १/२४/१०/२६ वष लग्नोदये।”

श्री जोरावर सिंह जी बारहठ अपने पिता श्री कृष्ण सिंह जी के साथ जोधपुर चले गये। श्री कृष्ण सिंह जी जोधपुर महाराजा श्री जसवंत सिंह जी के आमंत्रण पर अपनी सेवायें देने जोधपुर पधारे थे।

श्री कृष्ण सिंह जी की शिक्षा जोधपुर में ही हुई। आपको जोधपुर के महाराजा सरदार सिंह जी ने प्रभावित होकर महारानी साहिबा के महलों के प्रबंधक का वैतनिक दायित्व सौंपा, जो आपने अत्यधिक कुशलता से निभाया।

श्री जोरावर सिंह जी का विवाह तत्कालीन कोटा राज्य के अतरालिया के चारण जागीरदार श्री तखत सिंह जी की सुपुत्री अनोप कुंवर के साथ सम्पन्न हुआ।

श्री जोरावर सिंह बारहठ ने स्वतंत्रता आंदोलन के आरा काण्ड में भाग लिया, आपने भतीजे कुंवर प्रताप सिंह बारहठ के साथ २३ दिसम्बर १९१२ को चांदनी चौक में बम फेंका था। अंग्रेज पुलिस आपको जीवनपर्यंत ढूंढती रही, परंतु गिरफ्तार नहीं कर सकी।

आपने १७ अक्टूबर, १९३९ में अंग्रेज सरकार के गिरफ्तारी वारंट के अस्तित्त्व में रहते हुए स्वर्गारोहण किया।

१९०३ से १९३९ तक की ३६ वर्ष की अवधि में अंग्रेजी सत्ता व उसकी पुलिस व गुप्तचर इस महान क्रांतिकारी को कभी भी अपनी गिरफ्त में नहीं ले सकी।

श्री जोरावर सिंह जी बारहठ अपने फरारी काल में मध्यप्रदेश के मेरे पैतृक गांव करंडिया एवं उसके निकटवर्ती चारणों के गांव ‘एकलगढ़’ में अधिकांश समय साधु के वेश में विराजे।

आप पर ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तारी हेतु समय समय पर अनेक पुरस्कार घोषित कर रखे थे। अंग्रेज सरकार द्वारा भारत में क्रांतिकारियों द्वारा प्रारम्भ किये गये विप्लव से व्यथित होकर न्यायाधीश रोलेट की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। इस समिति को भारत में विप्लव, सशस्त्र विद्रोह और आंदोलनों के बारे में विस्तार से जाँच कर रिपोर्ट देनी थी। इस रिपोर्ट का नाम ‘सेडीशन कमेटी रिपोर्ट १९१८’ रखा गया और इसे गजट में प्रकाशित किया गया। इस रिपोर्ट के अध्याय-८, पृष्ठ-१२६-१२७-१२८ में ‘Revolutionary Crime in Bihar and Orissa’ में श्री जोरावर सिंह बारहठ से जुड़े निमेज कांड का वर्णन निम्नलिखित प्रकार किया गया है-

“After the Muzaffarpur tragedy, however, Bihar had a long respite from political crime; and the next incidents that have claimed our attention were also murders committed by revolutionaries from outside the province. The circumstances of these murders were remarkable, and show clearly the baneful in fluence exercised by the Bengal propaganda of robbery and homicide on youthful minds, outside Bengal. They also show how, despite professions of religion and patriotism, those select as a victim an unoffending person belonging to a calling held in special reverence by Hindus.

Arjun Lal Sethi

Moti Chand and Manik Chand, two Hindu youths, belonging to the Jain sect which is peculiarly averse to taking life to any kind, were natives of Sholapur, a district in Bombay Arjun Lal Sethi Presidency, They had at first studied at home and in Poona, but afterwards, with two other Maratha Jains, joined the school of a Jain named Arjun Lal Sethi in the State of Jaipur. According to Manik Chand they had read previously and brought with them to Jaipur such books as the Life of Mazzini, The first eight years to Tilak, cuttings from such newspapers as the Kal, the Bhola and the Kesari and at the school which they had joined in order to study religion and with it secure general education they and their companions received visits and lectures from one Bhishan aged about 40, a native of the Mirzapur district in the United Provinces and a resident of Benares.

Arjun Lal’s school was mainly religious but Bishan Datta’s lectures were political. “Besides the excellent sentiment that man should serve his country he included first the duty of attaining swaraj (self-government), a boon which he did not define, though inter alia he wanted a committing of dacoity was the road to Swaraj. ” To attain Swaraj dacoities should be taught. They should be committed in order to obtain funds wherewith to procure revolvers and pistols wherby to facilitate robbery by violence. Bishan Datta would gain followers organize dacoity on grand scale. He pointed out to the students various examples of political woes under which the country suffered. He spoke on this topic to the students individually or in twos and three, but never to more than five at a time. He also “praised men like Kanai Lal Datta” (the murderer of informer Narendra Gosain). On his third visit to Arjun Lal’s school he said to Moti Chand, Manik Chand and Jai Chand (another student), “Up to this it has been only theory. It is now time to do something practical” and added“Are yo ready?” His audience well understood him to be asking them to promote swaraj by committing a dacoity and consented to his proposal. He proceeded to explain that there was an opportunity for dacoity, and offered, if they were ready, to take them to the place suited for the purpose.

The name of this place he did not then disclose. They agreed under the guidance of Bishan Datta they left the boarding-house two or three days later, were joined by a certain Jorawar Singh, whom they did not know previously, and during an intermediats short stay at far-distant Benares, learnt from Bishan Datta that the victim was to be a Hindu Mohant or About who resided in and looked after a small temple in Nimez, in Bihar and was believed to be wealthy. After a preliminary reconnoitre by two of the associates, Moti Chand, Manik Chand, Jai Chand and Joravar Singh Started on the expedition, supplied by Bishan Datta with funds for the journey and with heavy staffs in case of resistance. They carried out their enterprise, murdered the Mohant in the most treacherous and brutal manner, as well as an unfortunate boy who happened to be acting as his servant, but could not find the key of his safe which contained cash and property worth about Rs. 17, 000. Consequently they returned to Bishan Datta with nothing but a time-piece and a drinking pot. He informed them that they had been fools and had taken a man’s life needlessly.

This abominable crime was perpetrated on the 20th of March 1913; and it was not till a year later that any clue was obtained to its auothership. Then Arjun Lal Sethi, who had left Jaipur and proceeded to Indore to start another school there, fell under the suspicion of the police who were enquiring into the Delhi conspiracy case. He had brought with him from Jaipur a certain Sheo Narayan, among whose belongings ojectionable papers were found. On examination Sheo Narayan told the police that, when he was residing at the boarding-house of Arjun Lal’s school at Jaipur, there arrived about january 1913 a visitor named Bishan Datta. Subsequently three students of the institution named Moti Chand, Manik Chand, and Jai Chand left the boarding-house together, ostensibly on pilgrimage, and on their return some 25 days later, related, in the presence of himself, Arjun Lal and some of the other young men, how they had killed a sadhu (Hindu ascetic), but had been unable to get any of his money, which it was their object to secure. This discloure started a prolonged investigation. Moti Chand was convieted and hanged. Bishan Datta was transported for ten years, as it was held that he had not instigated the murder but only the dacoity. The Sessions Judge found that Arjun Lal “must have been aware of the object with which three of his free boarder students took their departure on pilgrimage.”


श्री जोरावर सिंह बारहठ के साथियों को एक ही मुकदमे में दो फांसी की सजा दी गई

श्री जोरावर सिंह बारहठ पर यह आरोप लगाया गया कि दिनांक २० मार्च १९१३ को उन्होंने अपने साथी मोतीचंद, जयचंद, बिशनदत्त द्विवेदी निवासी बनारस एवं माणिक चंद के साथ मिलकर निमेज जिला-आरा, बिहार के महंत भगवानदास एवं उसके नौकर बंशीधर की हत्या कर दी। उपरोक्त प्रकरण में जोरावर सिंह और जयचंद फरार हो गये और वे जीवनपर्यंत अंग्रेज पुलिस द्वारा गिरफ्तार नहीं किये जा सके।

इस प्रकरण में माणिकचंद वादा माफ गवाह हो गया। श्री माणिकचंद की गवाही के आधार पर श्री मोतीचंद को महंत की हत्या कारित करने के आरोप में फांसी की सजा और नौकर बंशीधर की हत्या के आरोप में एक और फांसी की सजा से दण्डित किया गया। बिशनदत्त द्विवेदी को भारतीय दंड संहिता की धारा ३९४ डकैती के आरोप में १० वर्ष की सजा से दण्डित किया गया।

मोतीचंद द्वारा फोर्ट विलीयम उच्च न्यायालय, बंगाल में की गई अपील की सुनवाई करते हुये न्यायमूर्ति श्री सरफूद्दीन एवं न्यायमूर्ति कोक्श ने अपील की सुनवाई कर महंत भगवानदास की हत्या के आरोप में दी गई सजा को बहाल रखा और नौकर बंशीधर की हत्या के आरोप में दी गई फांसी की सजा को निरस्त कर दिया।

उपरोक्त प्रकरण में मोतीचंद पर स्वयं द्वारा महंत भगवानदास एवं उनके नौकर बंशीधर की हत्या करने का आरोप नहीं था अपितु उपरोक्त दोनों की हत्या करने का आरोप क्रांतिकारी जोरावर सिंह बारहठ पर था। उनका गिरफ्तारी वारंट न्यायालय ने जारी कर रखा था और गिरफ्तार कराने वाले को नकद पुरस्कार देने की भी घोषणा अंग्रेज सरकार ने कर रखी थी।

यदि श्री जोरावर सिंह बारहठ पकड़े जाते तो निश्चित रूप से उन्हें फांसी की सजा होती और फांसी के फंदे को चूमना पड़ता।


लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंकने का जिम्मेदार कौन?

क्रांतिकारी और विप्लव आंदोलन के दौरान २३ दिसम्बर १९१२ को लॉर्ड हार्डिंग पर चांदनी चौक, दिल्ली में बम फेंकने वाला कौन था? इस तथ्य का अंग्रेज सरकार उसके अनुसंधान और गुप्तचर अधिकारियों के सारे दल मिलकर पता नहीं लगा सके और ठोस साक्ष्य भी नहीं जुटा सके।

लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंकने के साहसिक कार्य की योजना इतनी कारगर व सुदृढ़ थी कि एक कड़ी के विफल होने पर भी सभी क्रांतिकारियों का पता नहीं चल सकता था।

यही कारण था कि वॉयसराय जैसे सर्वोच्च शासन प्रमुख पर बम फेंकने जैसे साहसिक कदम की सभी कड़ियों को अंग्रेजी सरकार नहीं जोड़ सकी। दिल्ली में सेशन्स प्रकरण संख्या 6/1914 दी क्राउन बनाम बसंत कुमार विश्वास, अबधबिहारी, अमीरचन्द, बालमुकुंद, बलराज, हनवंत सहाय, मन्नुलाल, चरणदास, रघुवर शम खुशीराम एवं रामलाल उर्फ छोटेलाल के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302/120-बी के अंतर्गत दिल्ली में चलाये गये मुकदमे में स्वयं न्यायाधीश ने मुकदमे के आरोपों के बारे में अपने निर्णय में लिखा कि- “In this case the accused, 11 in number stand charged under sections 302-120 B of the Indian Penal Code with conspiracy to commit murder between the 27th of March 1913 and the 31st of March 1914, both at Delhi and Lahore and other place in British India.”

१९१३ के लाहौर बम काण्ड में राम पदारथ नामक व्यक्ति मौत के घाट उतार दिया गया। उक्त मुकदमा २७ मार्च १९१३ एवं ३१ मार्च १९१४ के मध्य दिल्ली व लाहौर में हुये बम काण्डों के घटनाक्रमों को लेकर आरोप विरचित कर चलाया गया।

राष्ट्रीय अभिलेखागार नई दिल्ली से प्राप्त उक्त प्रकरण के निर्णय में न्यायाधीश ने अंग्रेज अधिकारी श्री एल्स्टॉन के शब्दों को उल्लेखित करते हुए कहा कि लॉर्ड हार्डिंग पर दिल्ली में २३ दिसम्बर १९१२ फेंके गये बम के बारे में विश्वसनीय व पर्याप्त वैधानिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हो सकी थी। निर्णय के पृष्ठ २ के अनुसार-

“The first fruits of the conspiracy are said to have been the throwing of the bomb at Delhi on the 23rd of December 1912. The evidence on the subject is entirely circumstantial and consists in the fact that Basant kumar Biswas left Lahore a couple of days before the bomb was thrown under suspicious circumstances that Abad Bihari was also away from Lahore at the time and that Dina Nath, the approver had a conversation with Abad Bihari which showed that the latter knew the details of how that bomb was thrown. To quote the words of Mr. Alston ‘however as there was no direct evidence on the point and as it might be thought the indirect evidence was not sufficient in itself to bring home legal proof, we have not set out the Delhi bomb outrage in the way we have set out the later Lahore Gardens bomb case. ‘ There is certainly no legal proof on the subject and it is merely and interesting coincidence that two months after the plan of campaign was formed in Lahore, a bomb precisely similar to those used in recent outrages in Calcutta and to that used in May 1913 in Lahore was throw at Delhi.

श्री एम. हैरिस्सन अपर सैशन्स न्यायाधीश दिल्ली प्रांत के न्यायालय में सैशन्स प्रकरण संख्या ६/१९१४ दी क्राउन बनाम बसंत कुमार बिस्वास व अन्य के मुकदमे की सुनवाई २१ मई १९१४ से १ सितम्बर १९१४ तक चली और ५ अक्टूबर १९१४ को निर्णय सुनाया गया।

इसी न्यायालय में सैशन्स मुकदमा संख्या ८/१९१४ दी क्राउन बनाम अमीरचन्द व अबधबिहारी आरोप अंतर्गत धारा ४, ५ व ६ विस्फोटक अधिनियिम में चलाया गया और इसका निर्णय भी ५ अक्टूबर १९१४ को सुनाया गया।

यहां निर्णय के उस भाग को उल्लेखित करना पाठकों की जानकारी हेतु आवश्यक लगता है, जिसमें के क्रांतिकारी को किस-किस आरोप में फांसी की एवं काले पानी की सजा दी गई-

क्र. नाम क्रांतिकारी आरोप जिसमें दोषी पाया
(धारा ३०२ एवं १२०-बी भा. द. स. )
सजा
1. बसंत कुमार बिस्वास
आयु २३ वर्ष
बम रखना, बम रखकर राम पदारथ की हत्या करना आजीवन काला पानी
(हाईकोर्ट ने फांसी की सजा दी)
2. अवधबिहारी आयु २५ वर्ष समिति का सदस्य। बम रखने का निर्देश देना।
साहित्य प्रकाशन एवं पोइजन मैन्युल रखना।
बसंत कुमार से कार्य कराना।
फांसी की सजा
3. अमीरचन्द आयु 40 वर्ष क्रांति के लिये प्रशिक्षित करना
यूरोपियन को समूह में मौत के घाट उतारने की प्रेरणा देना।
अपने घर पर योजनायें बनाना एवं
बम की टोपी कब्जे से बरामद होना।
फांसी की सजा
4. बालमुकुन्द समिति का सदस्य, बम अपने कब्जे में रखना।
लाहौर बम काण्ड की योजना में सम्मिलित होना।
फांसी की सजा
5. हनवंत सहाय समिति का सदस्य होना, परंतु किसी अपराध हेतु
सक्रियता से भाग नहीं लेना।
आजीवन काला पानी की सजा
6. बलराज हत्या का षड्यंत्र करना आजीवन काला पानी की सजा
7. छोटेलाल उर्फ रामलाल (धारा ३०२ एवं १२०-बी भा. द. स. ) आरोप मुक्त
8. चरणदास (धारा ३०२ एवं १२०-बी भा. द. स. ) आरोप मुक्त
9. मन्नुलाल (धारा ३०२ एवं १२०-बी भा. द. स. ) आरोप मुक्त
10. रघुबर शर्मा (धारा ३०२ एवं १२०-बी भा. द. स. ) आरोप मुक्त
11. खुशीराम (धारा ३०२ एवं १२०-बी भा. द. स. ) आरोप मुक्त

अवधबिहारी एवं अमीरचन्दको विस्फोटक अधिनियम की धारा ४ में २० वर्ष के काला पानी की सजा दी गई। मुल्जिम दीनानाथ को वादा माफ गवाह बना दिया गया और उसने क्रांतिकारियों के विरुद्ध बयान दिया। निर्णय में उसे सभी आरोपों से उन्मोचित कर दिया गया।

न्यायाधीश ए. हरीसन द्वारा दिये गये निर्णय का अंश ज्यों का त्यों प्रस्तुत है-

“There is one more point only and that is that Manni Ram tells us that Raghobar Sharma wrote to him at Multan to ask him to discover the names of disaffected persons in that place. I have a very poor opinion of Manni Ram, and I believe that here again he is implicating another, while trying to save his own skin. I find that the evidence against Raghobar Sharma is quite insufficient and agreeing with all the assessors I find him not guilty.

The question of sentences alone remains. Six of the accused have been found guilty of being members of a conspiracy, which existed mainly for the purpose of committing wholesale murder, and all are equally guilty. On this point the law is very clear, but, although they are equally guilty, it does not follow that they should necessarily receive the same sentence, and I think that, in awarding punishment, a distinction may well be drawn between those who actually handled bombs and those did not, or who are not shown to have done so. The first class includes Basant Kumar Biswas, Abad Bihari, Amir Chand and Balmokand and the latter Bal Raj and Hanwant Sahai only. Although Basant Kumar Biswas handled a bomb on more than one occasion and although I am satisfied that he actually placed the bomb, which caused the death of Ram Padarath, and was meant to cause the death of many more, I am inclined to treat him leniently. He is very young, being only 23 years of age and less developed mentally and physically than might be expected at that age. He comes of a very humble walk in life, having been a domestic servant of that dominating personality Rash Behari Bose, and he was neither socially nor by education the equal of his fellow conspirators. He was never admitted, as far as I can judge, to the full dignity of membership of the committee and was treated more as a useful tool, than as a real colleague. He knew perfectly well what he was doing, but at the same time I think that he deserves more consideration than those, who “trained and taught and used him. In spite therefore of the fact that he actually committed the murder of Ram Padarath I sentence him to transportation for life under section 302 read with 120 B.

For the other three men, who fall into this class I can find nothing what-say in extenuation of their crimes. Abad Bihari is only 25 years of age but he is a highly educated and intelligent man, who was used as no man’s. tool. From the beginning he was an active member of the committee, and, in fact, the most active. He arranged and was consulted in everything. Though he did not himself place the bomb, preferring to employ Basant Kumar Biswas for this dangerous feat, he put it together and then directed his agent what to do. He organised the campaign of Leaflets, which was meant to bear fruit in murders and crimes. He was in possession of the Poison Manual to mention one document only. He was an accessory to the presence of the bomb cap in Amir Chand’s house. If any man ever earned the full penalty, which the law prescribes, it is he and under section 302 read with 120 B, I sentence him to death subject to the confirmation of the Chief Court.

The case of Amir Chand is if possible worse than that of Abad Bihari.

A man of 40 years of age filling a position of importance in the educational world at Delhi, respected and consulted by his compatriorts such as Rai Bahadur Sultan Singh no less than by the members of the Delhi Mission, a man who used his undoubted gifts and his influence over the young to train others and even his own adopted son by means of the literature of anarchy and crime, and not only this but a man, who assisted in the dissemination of the poisonous literature of this organisation, and who himself composed an article advocating a wholesale massacre of Europeans; a man, moreover, who allowed his house to be used as the general meeting place of disaffected criminals, and in whose possession a portion of a bomb was discovered. There is only one possible sentence for him also, and, finding him guilty under sections 302 and 120 B, I sentence him to death subject to the confirmation of the Chief Court.

Balmokand is the third member of this class. He was one of the committee from the beginning, the committee which made all the plans including that of the Lahore outrage. He took over and kept with him the bombs, which Basant Kumar brought from Bengal, and, whenever he was in Lahore, he took an active part in the proceedings. He knew full well what he was doing and so did his friend Bal Raj as is shown by the correspondence. I can find no possible extenuation for his conduct either, and finding him guilty. under sections 302 and 120 B, I sentence him to death subject to the confirmation of the Chief Court.

As to Bal Raj there is this difference in his case, as compared with that of his friend Balmokand, that he is not shown to have ever actually handled a bomb. They are both equally guilty as members of the conspiracy but it does appear to me that a distinction may fairly be drawn in the matter of punishment. Perhaps the distinction is too fine but, although Bal Raj was undoubtedly a full member from the beginning, and a member of the managing committee, I think, erring perhaps on the side of mercy, that a sentence of transportation for life is sufficient in his case. I find him guilty under sections 302 and 120 B, and pass this sentence.

Hanwant Sahai remains. If mercy is to be shown to Bal Raj and, Basant Kumar he deserves it as much as they. He was a member and an active member, but it is not shown that he took any prominent part in organising an actual outrage as opposed to the preaching of anarchical crime. This does not affect his guilt but may be taken into consideration in passing sentence. I, therefore, find him guilty under sections 302 and 120 B, of having been a member of the conspiracy and sentence him to transportation for life.

The approver Dina Nath has, in my opinion given his evidence honestly and has told the truth. I discharge him. As to Sultan Chand, I have some hesitation in passing the same order in his case. He has undoubtedly perjured himself over the matter of the hole in the wall but he is young and perhaps he has suffered enough. Were it not that, I should not have convicted him under any section of the Penal Code. I should feel less inclined to be lenient but this being so and as he has been in custody for five months I discharge him also.”

उपरोक्त मुकदमे में किसी पर २३ दिसम्बर १९१२ को चांदनी चौक दिल्ली में वॉयसराय लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंकने का आरोप नहीं लगाया गया। इन पर लगाये गये आरोपों की दोष सिद्धि पश्चात् अपील निरस्त कर दी गई एवं दया याचिका भी निरस्त कर दी गई।

लाहौर उच्च न्यायालय ने इन सबकी अपील, मृत्युदंड के रेफरेंस एवं बसंत कुमार बिस्वास की सजा को फांसी में परिवर्तन करने की ब्रिटिश सरकार की निगरानी का निस्तारण किया। लाहौर उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ के दो न्यायाधीश श्री जॉन्सटॉन एवं श्री रट्टीगन ने अपील की सुनवाई कर अपना निर्णय एआईआर-१९१५, लाहौर-१६ बालमुकुंद बनाम राज्य में इस बात का उल्लेख किया कि दिल्ली बम काण्ड का कोई आरोप नहीं लगाया गया है और केवल संदेह व्यक्त किए गए हैं। न्यायाधीशों के अनुसार- “However, I do not wish to lay stress on this for the Delhi outrage is not charged and the matter is merely one of suspicion.”

न्यायाधीशों के अनुसार इस प्रकरण में २७ मार्च १९१३ एवं ३१ मार्च १९१४ के बीच किये गये अपराधों और षड्यंत्रों के प्रकरण की अन्वीक्षा की गई, जबकि लॉर्ड हार्डिंग पर बम दिनांक २३ दिसम्बर १९१२ को फेंका गया। स्वयं उच्च न्यायालय के शब्दों के अनुसार– “Johnstone J.-The sessions Court, Delhi in Trial No. 6 of 1914 had before it eleven accused persons, the charge against them, as amended by the learned Sessions Judge on 11th July 1914 in the course of the trial, being as follows-

That you between 27th day of March, 1913 and 31st March 1914 both at Delhi and Lahore and other places in British India, did agree with one another and other persons, to wit, Dina Nath, Sultan Chand, Rash Bihari Bose, Hardayal, Arjan Lal Sethi, Hari Ram Sethi and other persons unknown, to commit the offence of murder under S. 302, Indian Penal Code, and that you were thereby parties to a criminal conspiracy to commit the offence of murder; in pursuance of which conspiracy a murder to wit the murder of Ram Padarath, was committed at Lahore on 17th may 1913 and that you thereby committed offence punishable under Ss. 302/102-B and 302/109 of the Indian Penal Code and within my cognizance.”

जब फांसी की सजा से दंडित श्री अवधबिहारी, बालमुकुंद और अमीरचन्द की याचिकायें अंग्रेज सरकार के पास गई तो उन्होंने अपनी आंतरिक पत्रावली में स्वीकार किया कि दिल्ली बम काण्ड (हार्डिंग बम काण्ड) में कभी भी सजा नहीं दिला पायेंगे। राष्ट्रीय अभिलेखागार नई दिल्ली के अभिलेखों में उपलब्ध उक्त पत्रावली का उपरोक्त अंश निम्नलिखित प्रकार है, जिस पर तत्कालीन भारत सरकार के गृह सचिव आर. क्रेडक एवं एच. व्हीलर के हस्ताक्षर है-

“We will probably never prove to conviction in a Court the Delhi outrage against its actual perpetrators, but we have moral certitude, and the country at large knows that in this gang of consprirators we have those who planned that distardly outrage.

Sir R. Craddock
8-3-15
H. Wheeler
27-3-15″

अमीरचन्द, अबधबिहारी एवं बालमुकुंद को दिनांक ८ मई १९१५ को दिल्ली जैल में एवं बसंत कुमार बिस्वास को १० मई १९१५ को अम्बाला की जैल में फांसी की सजा दे दी गई।


लॉर्ड हार्डिंग पर बम हमले को लिबर्टी विज्ञप्ति में देहली में देवी शक्ति प्रकटीकरण बताया

हिन्दुस्तान की परतंत्रता की बेड़ियों को काटने के लिये क्रांतिकारियों ने सशस्त्र विप्लव किया और परिणामतः स्वयं फांसी के फंदों पर झूलना स्वीकार किया। उनके बलिदानी कदम की सर्वत्र देश में सराहना की जाती थी।

लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंक कर ब्रिटिश सत्ता को खुली चुनौती देने का साहसिक कार्य के पश्चात क्रांतिकारियों ने ‘लिबर्टी’ नामक विज्ञप्ति लाखों की संख्या में प्रकाशित की जिसके प्रमुख अंश निम्नांकित प्रकार थे-

“वेद गीता कुरान सब हमें आदेश देते हैं कि मातृभूमि के शत्रु को फिर वह चाहे किसी भी जाति, सम्प्रदाय, रंग और धर्म का क्यों न हो, मारना हमारा धर्म है। अन्य बड़े या छोटे क्रांतिकारी कार्यों की हम बात नहीं करते, परंतु गत दिसम्बर मास में देहली में जो देवी शक्ति प्रकट हुई वह इसका निस्संदेह प्रमाण है कि भारत के भाग्य को स्वयं भगवान बदल रहे हैं। . . . इस क्रूर अत्याचारी सरकार के प्रतिनिधि पर देहली में बम फेंकने वाला अन्य कोई नहीं स्वयं सर्व शक्तिमान परमेश्वर की आत्मा थी। यदि वह देवी इच्छा न होती तो ब्रिटिश सरकार के साधन सम्पन्न अनुचर बम फेंकने वाले को पकड़ कर आज फूले न समाते। उसके विपरीत आज वे अपने भाग्य पर रूदन कर रहे हैं। भारतर्ष के तरुणों आगे आओ, अपने को इस पवित्र धरा के योग्य पुत्र प्रमाणित करो, फिरंगी आततायियों को मातृभूमि की बलिवेदी पर बलिदान करके उन्हें अपने रोष और घृणा से अवगत करा दो।”


लॉर्ड हॉर्डिंग पर बम गिराने वाले जोरावरसिंह ही थे

लॉर्ड हॉर्डिंग पर १३ दिसम्बर १९१२ को चांदनी चौक में बम फेंक कर उनकी हत्या का प्रयास करने एवं हाथी पर उनके अंगरक्षक की हत्या करने के आरोप में क्रांतिनायक रासबिहारी बोस, बालमुकुन्द, प्रताप सिंह, अमीर चन्द, अवधबिहारी, जोरावर सिंह, बसंत विश्वास, छोटेलाल, हनुमन्त सहाय आदि क्रांतिकारी उक्त घटना के समय उपस्थित थे। बम काण्ड के बाद सब क्रांतिकारी भूमिगत हो गये, लेकिन थोड़े दिनों के बाद अमीरचन्द, अवधबिहारी, बालमुकुन्द, बसंत विश्वास लाहौर बम काण्ड में पकड़े गये और इन्हें प्राण दण्ड मिला. . .।

प्रो. चिंतामणि शुक्ला एवं डॉ. अवधेश कुमार शुक्ल के अनुसा-“दिल्ली में लॉर्ड हॉर्डिंग पर बम फेंकने वालों के बारे में क्रांतिकारी दल के छोटेलाल और प्रताप सिंह के अनुसार जोरावर सिंह ने ही बम फेंका था। इनके अतिरिक्त ठा. केसरी सिंह बारहठ की पौत्री श्रीमती राजलक्ष्मी देवी ने इस संदर्भ में कहा था कि जब वह १४ वर्ष की थी, सन् १९३७ में वीर पुंगव जोरावर सिंह ने उन्हें चांदनी चौक में वह स्थान बताया था, जहां बुर्का पहन कर उन्होंने लॉर्ड हॉर्डिंग पर बम गिराया था। इनके मतों से पुष्टि होती है कि ऐतिहासिक बम गिराने वाले जोरावर सिंह ही थे।

बम काण्ड होने के बाद वीरवर जोरावर सिंह और प्रताप सिंह फरार हो गये थे। उन दिनों में बाढ़ से उमड़ती हुई यमुना पार कर राजस्थान जाने का निश्चय किया था। रात्रि में जाकर यमुना को पार करना खतरनाक था। कई घंटे तक ये दोनों पुल की लोहे की जंजीर पकड़ कर लटकते रहे, फिर अवसर पाकर इन दोनों राजस्थानी वीरों ने तैर कर उफनती यमुना को पार किया। नदी के किनारे दो पुलिस वालों को इन पर संदेह हुआ। जोरावर सिंह जी ने अपनी तलवार से उन्हें मौत के घाट उतार दिया। जोरावर सिंह जी जब आरा षड्यंत्र प्रकरण में अभियुक्त के रूप में फरारी अवस्था में उदयपुर पहुंचे।”


वायसराय पर बम फेंकने की करतूत इसी शरीर की थी : जोरावर सिंह बारहठ

क्रांतिकारी श्री जोरावर सिंह बारहठ को लॉर्ड हार्डिंग बम कांड बिहार के आरा के निमेज काण्ड एवं प्यारेलाल साधु हत्या काण्ड सहित राजद्रोह के मुकदमों में ब्रिटिश सरकार गिरफ्तार करना चाहती थी। श्री जोरावर सिंह जी बारहठ अंग्रेजों की गिरफ्त में नहीं आना चाहते थे। फरारी के समय आप मेवाड़ व मालवा के चारणों के गांवों में अनेक वर्षों तक साधु का वेष धारण कर गुप्त रूप से रहते थे। इसी काल खण्ड में आप प्रतापगढ़ जिले के संचई गांव में राव जगमाल सिंह जी जाडावत (चारण) के यहां विराजे।

श्री जगमाल सिंह जी जाडावत ने उनको स्मरण करते हुए कहा है कि- “एक दिन नदी के किनारे हम दोनों ही बैठे थे तो संक्षिप्त में उन्होंने मुझे फरमाया कि देहली वायसराय पर किन्हीं व्यक्ति ने बम फेंका उस समय दो व्यक्ति अपनी ही चारण जाति के थे। ऐसा तुमने कभी सुना? तो मैंने उत्तर दिया कि हां सुना अवश्य लेकिन सच्चाई क्या है ? मालूम नहीं, तब एक लम्बी सांप लेकर फरमाया कि वह सारी करतूत इसी शरीर की थी, जो तुम्हारे सामने है। यही मेरे छिप कर अज्ञात अवस्था में रहने का कारण है, याद रखो अगर यह भेद तुमने किसी से प्रकट किया तो तुम्हारी भी जागीर वगैरा सब नष्ट हो जायेगी, क्योंकि तुम्हारे यहां मैं पनाह पा रहा हूं। शेष वृत्तांत तुम से फिर कभी ब्योरेवार सुनाऊंगा।”

बम फेंकने में जोरावर सिंह शामिल

स्वतंत्रता सेनानी एवं क्रांतिकारी अर्जुनलाल सेठी ने अपने एक मित्र केशवचन्द्र को बताया था कि श्री रासबिहारी बोस ने उन्हें बताया था कि लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंकने में चार क्रांतिकारी सम्मिलित थे, उनमें स्वयं रासबिहारी बोस, बसंत कुमार विश्वास, जोरावर सिंह तथा एक मुस्लिम युवक था, जिसका नाम अब उन्हें याद नहीं रहा।


लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंकने का कार्य जोरावर सिंह को सौंपा गया : केसरी सिंह बारहठ

श्री केसरी सिंह जी बारहठ की पौत्री श्रीमती राजलक्ष्मी साधना जी ने लिखा है कि-दिल्ली देख कर जब हम कोटा लौटे तो दाता ने हम से यात्रा का वर्णन पूछा। हमने चांदनी चौक और उस तख्त वाली बात कही तो बड़े खुश हुये। मेरी जिज्ञासा और भी बढ़ गई जब मैंने उनसे बहुत ही आग्रह किया तब उन्होंने कहा कि “रासबिहारी बोस के नेतृत्व में क्रांतिकारी दल ने यमुना के उस पार एक जगह शस्त्र और बम बनाने का केन्द्र बना रखा था। इस बात की योजना पूर्व निधार्रित हो चुकी थी कि दिल्ली को राजधानी बनाने के समय वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंककर बताया जाये कि दिल्ली को अंग्रेजों द्वारा भारत की राजधानी बनाने से भारतीय खुश नहीं हैं। इस क्रांतिकारी दल ने पहले यह कार्य कुंवर प्रताप सिंह को सौंपा और कई महिनों तक पत्थर का निशान लगाने का प्रयास करते रहे पर जब करीब समय आया तब सबने सोचा कि प्रताप मझले कद के हैं। हो सकता है भीड़ आगे आ जाये और निशाना गलत हो जाये। इस पर यह कार्य जोरावर सिंह को सौंपा गया। निश्चित समय पर ये लोग बम लेकर नाव द्वारा यमना पार दिल्ली पहुंचे।

कुछ गोटे किनारी के कपड़े खरीद कर उसमें ये बम छिपाये, कपड़ों की पोटली उठाये नाव पर चढ़े तो बीच में किसी ने कहा-सामान नीचे रख दो गोद में क्या उठाये हो? तब जोरावर सिंह ने कहा कि-भाई हम माहेरा भरने (भात) जा रहे हैं कपड़े बिगड़ने का डर है।

इस तरह यह उस पार उतर गये। उसी पोटली में एक बुर्का भी था जो इनके नाप से सिलाया गया था। ये दोनों काका-भतीजा अपना स्थान ढूंढते पूछते चांदनी चौक पहुंच गये और वायसराय के हाथी का इंतजार करने लगे। प्रताप नीचे खड़े थे और ऊपर महिलाओं के बीच बुर्का पहन कर बम लिये जोरावर सिंह जी खड़े हो गये। उनका निशाना बहुत सधा हुआ था। ज्यों ही वायसराय लॉर्ड हार्डिंग का हाथी सामने आया महिलाओं में खलबली सी मच गई और बम फेंकते समय किसी महिला की कोहनी का धक्का लग गया। इसी से निशाना थोड़ा सा चूक गया। बम होदे की बीच में लॉर्ड हार्डिंग के पीछे की तरफ पड़ा, जिससे उनके पीछे सोने का छत्र लिये जमादार वहीं लुढ़क गया और लॉर्ड हार्डिंग व उसकी पत्नी घायल हो गये।”

बम जोरावर सिंह ने डाला था

श्री रामनारायण चौधरी

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम नारायण जी चौधरी कुंवर प्रताप बारहठ के अत्यधिक निकटवर्ती मित्र थे। वे महात्मा गांधी के भी सान्निध्य में रहे थे। श्री रामनारायण जी चौधरी ने राजस्थान के शिक्षाविद् व साहित्यकार लेखक श्री शंकर सहाय जी सक्सेना को लिखे पत्र में कहा कि-

“लॉर्ड हार्डिंग बम केस में मेरे सहपाठी और मित्र छोटालाल जैन अभियुक्त थे। मेरे सहपाठी और मित्र ठाकुर केसरी बारहठ के पुत्र प्रताप सिंह बारहठ उस कांड में शरीक ही थे। उन दोनों ने मुझे बताया कि बम जोरावर सिंह ने डाला था। बोस बाबू (रास बिहारी बोस) शरीर से ही इतने भारी थे कि यह पूर्ति का काम उनके बस का नहीं हो सकता। बहरहाल मेरे पास तो इन दो साथियों के कथन का ही आधार है और उनके लिए मैं मान ही नहीं सकता कि वे असत्य बात कहें।”

जोरावर सिंह बारहठ ने लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंका था

“केसरी सिंह बारहठ के भाई जोरावर सिंह बारहठ, जिन्होंने १९१२ को दिल्ली में लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंका था, सहर्ष मृत्यु का आलिंगन कर अमरता प्राप्त की थी। ”

(संदर्भ : देशी राज्यों में जन जागृति : भगवान दास केला, पृ. २५)

जोरावर सिंह ने कहा बम मैंने फेंका था

श्री जगदीश दान

एकलगढ़ मध्यप्रदेश में फरारी के कालखण्ड में स्वतंत्रता सेनानी जोरावर सिंह जी ठहरे थे। वे अमरदास साधु के वेष में श्री जगदीश दान के यहां रहते थे। श्री जगदीश दान जी पर श्री जोरावर सिंह अत्यधिक भरोसा करते थे। श्री जोरावर सिंह जी ने श्री जगदीश दान को बताया कि-

“दिल्ली में जब लॉर्ड हार्डिंग सजे हाथी के हौदे पर बैठ कर जुलूस में निकले तो गोला (बम) मैंने स्वयं एक ऊंचे मकान पर से फेंका था। हम लोग चार साथी थे। चार दिन तक हम दिल्ली में छिपे रहे पांचवे दिन हम बिखर गये।”

जोरावर सिंह बारहठ स्मारक एकलगढ़ (मध्यप्रदेश)

क्रांतिकारी वीर श्री जोरावर सिंह बारहठ सुविख्यात आरा कांड, बिहार के मुख्य अभियुक्त थे। २३ दिसम्बर १९१२ को आपने अन्य साथियों के साथ मिलकर तत्कालीन ब्रिटिश वॉयसराय लॉर्ड हार्डिंग पर चांदनी चौक दिल्ली में बम फेंका। आपको कोटा हत्याकांड में मुल्जिम बनाकर गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया था। आप आजीवन अंग्रेज शासन के हाथ नहीं आये और सत्ताइस वर्ष तक गिरफ्तारी का वारंट लेकर अज्ञातवास में रहे, जिसमें बीस वर्ष से ज्यादा आप एकलगढ़ मुख्य केन्द्र बनाकर पुराने सीतामऊ राज्य के गांव में रहे। इस इलाके में आप नाम बदलकर बाबा अमरदास जी के नाम से जाने जाते थे।

भुज तकियो त्रण घासियो, पुहुमि पट पोढ़ेह।
अध भूखो उठे जोरो, अम्बर ने ओढ़ेह।

(उपरोक्त दोहा श्री इन्द्र सिंह जी, एकलगढ़ ने सुनाया)


श्रद्धांजलि

श्री बरकत उल्ला खां

विदेशी शासन का मुकाबला किया

बारहठ केसरी सिंह जी ने जेल की जिंदगी गरीबी एवं कठिनाइयों को उन सुखों से जो उन्हें उपलब्ध थे से अच्छा माना। स्वयं विदेशी शासन का मुकाबला किया। जब राजपूताने का कोई राजा विदेशी ताकत के विरुद्ध खुले तौर पर खड़ा नहीं हो रहा था तो ऐसे समय में शाहपुरा के श्री केसरी सिंह बारहठ का ब्रिटिश शासन के विरुद्ध खड़ा होना एक बहुत बड़ी बात थी।

-श्री बरकत उल्ला खां, मुख्यमंत्री राजस्थान
22 नवम्बर 1912, शाहपुरा

 

श्री हरिदेव जोशी

टूटे नहीं, गिरे नहीं

श्री केसरी सिंह, श्री प्रताप सिंह और श्री जोरावर सिंह एक ही परिवार के सदस्य थे, इन्होंने अपने प्राणों का बलिदान दिया, क्योंकि गुलाम रहने की अपेक्षा स्वाभिमान से मर जाना ज्यादा अच्छा है। ऐसा करके उन्होंने अपने प्राणों से आजादी के संघर्ष को नेतृत्व दिया। उन्होंने अपने परिवार को स्वाधीनता आंदोलन में झोंक दिया। वे जीवनपर्यंत अडिग रहे, टूटे नहीं, गिरे नहीं।

-श्री हरिदेव जोशी, मुख्यमंत्री राजस्थान
25-4-1976

 

डॉ. रघुवीर सिंह

सर्वस्व खोया

बारहठ-पुत्र प्रताप सिंह ने अपने जीवन की बलि दे दी, बारहठ केसरी सिंह अपना सर्वस्व खोकर और अनेकों यातनायें सह कर भी अपने कर्तव्य से विरत नहीं हुआ और उसके भाई जोरावर सिंह ने अपने जीवन के अंतिम पच्चीस वर्ष चंबल कांठे में भटकते हुये पूर्ण अज्ञात वास में ही बिताये थे।

-डॉ. रघुवीर सिंह सीतामऊ

 

 

श्री जयनारायण व्यास

हृदय में आग सुलगती थी

उनके हृदय में हमेशा आग सुलगती रहती थी। वही आग उन्हें प्रेरणा देती थी, जिनके बल पर वे कविता किया करते थे। मैंने उन्हें सदा एक देशभक्त के रूप में ही देखा है। कविता तो उनके हृदय में सुलगने वाली आग को बाहर फेंकने का साधन मात्र थी।

-श्री जयनारायण व्यास, मुख्यमंत्री राजस्थान

 

 

श्री मोहनलाल सुखाड़िया

शाहपुरा तीर्थ स्थल

शाहपुरा की धरती हमारे लिये एक तीर्थ स्थल है। क्रांति के अग्रिम दूत, आजादी के दीवाने हुतात्मा केसरी सिंह जी बारहठ के जन्म से पावन बनी भूमि बेदी पर होम कर दिया था। ठा. केसरी सिंह जी और प्रताप सिंह जी के जीवन से सबको प्रेरणा लेनी चाहिये।

-श्री मोहनलाल सुखाड़िया
राज्यपाल तमिलनाडु एवं मुख्यमंत्री राजस्थान

 

 

श्री जगजीवन राम

शहादत पर गर्व

श्री केसरी सिंह, उनके भाई जोरावर सिंह और श्री प्रताप सिंह राजस्थान के वीर शहीद थे किंतु राजस्थान ही नहीं सारे भारत, विशेषकर बिहार, जहां इन्होंने शहादत को भी इन पर उतना ही गर्व है।

-श्री जगजीवनराम, पूर्व उप प्रधानमंत्री

 

 

स्वामी श्री करपात्री

आदर्श चारण कवि

बारहठ श्री केसरी सिंह जी ने सपरिवार स्वतंत्रता संग्राम के यज्ञ में सपरिवार भाग लिया और अपने वंश का नाम उज्ज्वल किया। श्री केसरी सिंह आदर्श चारण कवि थे।

-स्वामी करपात्री जी महाराज

 

 

श्री केसरी सिंह के सोरठे

बारहठ श्री केसरी सिंह के कहे सोरठों ने महाराणा फतेहसिंह के हृदय पर असर डाला क्योंकि दोनों ही एकदूसरे के भावों को समझने में समर्थ थे।

-स्वामी कृष्ण बोधाश्रम जी महाराज
जगद्गुरु शंकराचार्य, बद्रीकाश्रम

 

 

 

श्री अशोक गहलोत

अमर गाथा

शौर्य बलिदान और पराक्रम की धरती राजस्थान भी देश के स्वतंत्रता संग्राम में किसी से पीछे नहीं रही। मैं श्री केसरी सिंह बारहठ, श्री जोरावर सिंह बारहठ और कुंवर प्रतापसिंह बारहठ को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। मुझे विश्वास है कि इनकी अमर गाथा समाज के नव-निर्माण में सशक्त माध्यम बनेगी।

-श्री अशोक गहलोत, मुख्यमंत्री राजस्थान

 

 

श्रीमती वसुंधरा राजे

स्वतंत्रता आंदोलन में सर्वस्व न्यौछावर

स्वतंत्रता सेनानी श्री केसरी सिंह बारहठ और उनके भाई जोरावर सिंह बारहठ एवं पुत्र प्रताप सिंह बारहठ का स्वतंत्रता आंदोलन में बहुमूल्य योगदान रहा है। श्री बारहठ के पूरे परिवार ने स्वतंत्रता आंदोलन में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। वे सब हमारे प्रेरणा स्रोत हैं।

-श्रीमती वसुंधरा राजे, मुख्यमंत्री राजस्थान

 

 

श्री भैरोंसिंह शेखावत

स्वर्णिम पृष्ठों में लिखने लायक कार्य

स्वतंत्रता आंदोलन में श्री केसरी सिंह बारहठ ने तो अपने पूरे परिवार को ही आजादी की लड़ाई में झोंक दिया। वे सब क्रांतिकारी थे। उन्होंने स्वतंत्रता के इतिहास में राजस्थान का नाम स्वर्णिम पृष्ठों में लिखने लायक कार्य किया।

-श्री भैरोंसिंह शेखावत, मुख्यमंत्री राजस्थान

 

 


 

 


संदर्भ ग्रंथ

  1. राजस्थान में स्वतंत्रता संग्राम : बी. एल. पनगड़िया
  2. शहीद पुराण : कालीचरण घोष
  3. राजस्थान के क्रांतिकारी परिवार : शम्भूदयाल सक्सेना
  4. राजस्थान का इतिहास : श्री बी. एल. पनगड़िया
  5. बंदी जीवन : शचीन्द्र नाथ सान्याल, सं. पंडित सत्यनारायण शर्मा
  6. केसरी सिंह बारहठ व्यक्तित्व कृतित्व : डॉ. देवीलाल पालीवाल, बृजमोहन जावलिया, फतेहसिंह मानव
  7. आधुनिक राजस्थान का क्रांतिकारी इतिहास : प्रो. चिंतामणि शुक्ल, डॉ. अवधेश कुमार (शुक्ल)
  8. स्वाधीनता सेनानी अर्जुनलाल सेठी : डॉ. विष्णु पंकज
  9. राजस्थान में आजादी रौ आंदोलन : जहूर खां मेहर
  10. राजस्थान केसरी ठाकुर केसरी सिंह बारहठ : सवाई सिंह धमोरा
  11. अक्षय केसरी प्रताप चरित्र : अक्षय सिंह रत्नू
  12. चारण साहित्य शोध संस्थान, अजमेर ग्रंथागार
  13. महान क्रांतिकारी राव गोपालसिंह खरवा : शेखावत सुरजन सिंह झाझड़
  14. शाहपुरा काल सौरभ : शाह मनोहर सिंह डांगी
  15. राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली संदर्भ दस्तावेज
  16. राजपूताना का अपूर्व इतिहास : कृष्णसिंह बारहठ, संपादक : श्री फतह सिंह मानव
  17. एच. आइ. आर 1915 लाहौर 16
  18. राजस्थान उच्च न्यायालय संग्रहालय, जयपुर
  19. भारतीय स्वाधीनता आंदोलन : भगवानदास केला
  20. क्रांति-युग के संस्मरण : श्रीमन्मथनाथ गुप्त
  21. राजस्थान में क्रांतिकारी आंदोलन : शंकर सहाय सक्सेना
  22. भारतीय आतंकवाद का इतिहास : आचार्य चन्द्रशेखर शास्त्री
  23. कलम आज उनकी जय बोल
  24. The war and Revolutionary Movement
  25. History of Freedom Movement:R. C. Majumdar
  26. My Indian Years : Lord Harding
  27. Sedition Committee Report India 1918: Rowlatt Committee

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