स्वातंत्र्य राजसूय यज्ञ में बारहठ परिवार की महान आहूति – ओंकार सिंह लखावत

स्वातंत्र्य राजसूय यज्ञ में बारहठ परिवार की महान आहूति

© ओंकारसिंह लखावत

प्रथम संस्करण : दिसम्बर, 2012

ISBN : 978-81-920932-5-3

स्वातंत्र्य वीर श्री केसरी सिंह जी बारहठ की
समृद्ध एवं राष्ट्रभक्ति से परिपूर्ण परम्परा का निर्वहन करने वाली
उनकी पौत्री श्रीमती राजलक्ष्मी जी ‘साधना’ को
सादर समर्पित

 

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ब्रिटिश साम्राज्यवादी शासन, जिसमें कभी सूर्य अस्त नहीं होने का दम्भ भरा जाता था, को उखाड़ फेंकने के लिए सबसे यशस्वी स्वतंत्रता संग्राम भारत में ही लड़ा गया था। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन से लेकर अगस्त, १९४७ में पूर्ण स्वतंत्रता हासिल होने तक करीबन एक शताब्दी तक भारत ने साम्राज्यवादी शासन के खिलाफ एक दीर्घकालीन, सुनियोजित एवं प्रबुद्ध नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई लड़ी जिसकी मिसाल विश्व के अन्य किसी भी भाग में देखने को नहीं मिलती। इस महासमर में देश के असंख्य राष्ट्रभक्तों ने अपना जीवन उपार्जन, सम्पति एवं वैभव स्वतंत्रता की बलिवेदी पर समर्पित कर दिया।

राजपूताना में स्वतंत्रता की ज्वाला को प्रज्वलित करने वाले यशस्वी क्रांतिकारी ठाकुर केसरी सिंह बारहठ थे, जिन्होंने राष्ट्र धर्म की पालना में स्वयं को ही नहीं अपितु सम्पूर्ण परिवार को न्योछावर कर दिया। शाहपुरा के इस सपूत ने सम्पूर्ण राजपूताना में शिरोमणि क्रांतिकारियों के साथ मिल कर सुनियोजित तरीके से क्रांति के विप्लव का ऐसा बिगुल बजाया कि ब्रिटेनिया सल्तनत हतप्रभ रह गई। केसरी सिंह बारहठ शिरोमणि राष्ट्रभक्त, राष्ट्रचिंतक, उच्च कोटि के मनीषी, विभिन्न भाषाओं के ज्ञाता तथा डिंगल के लब्ध प्रतिष्ठित कवि थे। आपका लालन-पालन एवं शिक्षा-दीक्षा जिस वातावरण में हुई वह राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत था और इसी कारण युवावस्था से ही आपका मुख्य सरोकार राष्ट्रचिंता, राष्ट्रचिंतन एवं राष्ट्रभक्ति हो गया।

ठाकुर केसरी सिंह बारहठ युग-दृष्टा थे। इन्होंने तत्कालीन भारत की दुर्दशा का गहन चिंतन किया जो इनके कृतित्व में स्पष्ट परिलक्षित होता है। ब्रिटिश शासन का मुख्य लक्ष्य भारत का शोषण था और इस शोषण को निर्बाध बनाए रखने हेतु न केवल दण्ड एवं अत्याचार पर आधारित निरंकुश शासन व्यवस्था को अंजाम दिया अपितु नैतिक एवं विचारहीनता का शिकार बनाकर ब्रिटिश सभ्यता एवं संस्कृति की श्रेष्ठता को स्थापित करने का भी दुस्साहस किया। इसलिए देश को दासता की बेड़ियों से मुक्त कराकर स्वतंत्रता की स्थापना ही बारहठ का मुख्य धर्म एवं कर्म बन गया। आपने लिखा है

प्रधान मानवीय सत्य है स्वतंत्रता अहा,
वरण्ये धर्म कर्म मर्म मंत्र ही यही रहा।
महान प्राण प्राण वारि के तुम्हें ही खोजते,
नमामि विश्व वंदनीय अंत मां स्वतंत्रे।

स्वतंत्रता की बलिवेदी पर अपने आपको न्यौछावर कर देने वाले क्रांतिकारियों, शहीदों एवं देशभक्तों से सम्पूर्ण स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास सुशोभित है, किंतु खुद के साथ पूरे परिवार को न्यौछावर करने वाले राष्ट्र गौरव केसरी सिंह ही थे, जिन्होंने अपने अनुज जोरावर सिंह बारहठ एवं पुत्र प्रताप सिंह बारहठ को इस महान राष्ट्रीय यज्ञ में समर्पित कर दिया। इस वीर शिरोमणी त्रिमूर्ति को शत्-शत् नमन।

श्रीमान ओंकार सिंह जी लखावत ने अथक परिश्रम कर इस त्रिमूर्ति पर पुस्तक तैयार की है इसके लिए उन्हें हार्दिक बधाई। इस पुस्तक को पढ़कर भावी पीढ़ियां इन महान क्रांतिकारियों से राष्ट्रभक्ति एवं राष्ट्र के प्रति समर्पण की प्रेरणा लेंगी, ऐसी मेरी कामना है। इति शुभम्।

ज्योति जला निज प्राण की

आज हम स्वतंत्र हैं, मौलिक अधिकारों के अधिकारी हैं और चाहे जब चाहे जो बनने और करने का रास्ता खुला है, परंतु यह हमारे कारण नहीं। जरा सोचिये, कुछ रुकिये, बुद्धि पर जोर लगाइये तब पता चलेगा कि यह सब उन स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और बलिदान की बदौलत है।

अपने और अपनों के लिये तो सब कुछ ऐसे और वैसे करने को तत्पर रहते हैं, क्या कभी इनके बारे में सोचने की फुर्सत भी निकाली है ? यदि हां तो ठीक है, नहीं तो स्वतंत्रता आंदोलन और विप्लव की आंधी के शताब्दी वर्ष में थोड़ा समय निकालिये। दादा-दादी, माता-पिता, पति-पत्नी, बेटी-बेटा, पौता और पौती में आप जो भी हो बैठकर स्वतंत्रता सेनानियों की माला के मणिये बने स्वातंत्र्य वीर श्री केसरी सिंह जी बारहठ, श्री जोरावर सिंह जी बारहठ और श्री प्रताप सिंह जी बारहठ की संक्षिप्त जीवनी पढ़ डालिये।

बारहठ परिवार की स्वतंत्रता के राजसूय यज्ञ में महान् आहूति हमें स्वतंत्रता का महत्व बताती है। जीवन जीने की सार्थकता का भान कराती है।

१८५७ के स्वतंत्रता आंदोलन में अंग्रेजों की सत्ता को स्वातंत्र्य वीरों ने चुनौती दी और गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने का प्रयास किया था। भारत माता को स्वतंत्रता दिलाने के लिये क्रांतिकारियों ने सर्वस्व न्यौछावर कर शक्तिशाली ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी थी।

मुम्बई में ‘गणपति बप्पा’ घरों से निकल कर सार्वजनिक रूप से समारोह में प्रकट होने लगे तो स्वराज का भाव देशभक्तों के खून में उबलने लगा। छत्रपति शिवाजी और गणेश जी के श्लोक उच्चारित होने लगे। भगवत गीता ने कर्तव्य बोध कराया।

१८९७ की २२ जून को ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के सिंहासनारूढ़ होने ६०वीं वर्षगांठ के समारोह को अंग्रेजों की प्रसन्नता को वीरव्रती चापेकर बंधुओं ने पूना में अंग्रेज अधिकारी श्री रैंड एवं ले. आर्येस्ट को मौत के घाट उतार कर ग्रहण लगा दिया।

श्री बाल गंगाधर तिलक और स. म. परांजपे की कलम से ‘केसरी’ में राष्ट्रीयता का भाव जगाने का अभियान अंग्रेजों के दमन और जेल की सजा के उपरांत भी परवान पर था।

लंदन में रहकर श्री श्याम जी कृष्ण वर्मा ने ‘इण्डिया होम रूल सोसायटी’ का गठन कर स्वतंत्रता की चिंगारी को जलाये रखा। गणेश विनायक सावरकर के ‘मित्र मेला’ ने शारीरिक रूप से बलिष्ठ युवकों को देश हेतु तैयार करना प्रारम्भ किया। वीर सावरकर ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास की कहानी लिखकर नौजवानों में प्राण फूंक दिये। लंदन में मदनलाल धींगरा के स्वदेश प्रेम की रिवाल्वर की गोली ने १ जुलाई १९०९ को कर्नल सर विलियम कर्जन के प्राण ले लिये।

२१ दिसम्बर १९०९ को नासिक जिला मजिस्ट्रेट श्री जैक्सन को गोलियों से भून कर अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी गई। नासिक, सतारा, ग्वालियर, पूना, अहमदाबाद में शस्त्रों, बमों एवं आयुद्धों का संग्रह सशस्त्र क्रांति हेतु होने लगा। बंगाल में महर्षि अरविंद घोष की वाणी और योजना सूत्रों ने राष्ट्रभक्ति का भाव जाग्रत करना प्रारम्भ किया। बंग भंग ने तो बंगाली युवकों में बिजली के करंट जैसा कार्य किया। विप्लव गान गाये जाने लगे। युवकों की टोलियों ने भारत माता को स्वतंत्र कराने के लिये शस्त्रों का सहारा लेना प्रारम्भ किया। ‘जुगांतर’ नाम से नया अखबार निकलने लगा। सर्वश्री अबिनास भट्टाचार्य, भूपेन्द्र नाथ दत्त, रास बिहारी बोस, शचीन्द्र नाथ सान्याल आदि ने शस्त्रों एवं शास्त्रों का अध्ययन करा कर स्वतंत्रता के मार्ग को पार पाने की योजायें बनानी प्रारम्भ की। ‘अनुशीलन समिति’ ने स्वतंत्रता के दीवाने तैयार करने के कारखाने का कार्य किया।

श्री रासबिहारी बोस व श्री शचीन्द्र सान्याल आदि ने बंगाल से बाहर क्रांतिकारी दल बनाने का कार्य प्रारम्भ किया।

दिल्ली में मास्टर श्री अमीरचन्द प्रमुख कार्यकर्ता बने। राजपूताना में स्वतंत्रता की अलख जगाने के लिये पहले से श्री केसरी सिंह बारहठ, श्री अर्जुन लाल सेठी, राव श्री गोपाल सिंह खरवा, दामोदर दास जी राठी सक्रिय थे।

श्री केसरी सिंह जी बारहठ व श्री अर्जुनलाल जी सेठी ने क्रांतिकारी नवयुवकों को तैयार करने के लिये छात्रावासों की स्थापना की। नौजवानों को स्वराज, स्वतंत्रता, राष्ट्रधर्म, बलिदान एवं सशस्त्र क्रांति का प्रशिक्षण व संस्कार दिया जाने लगा। स्वयं श्री केसरी सिंह बारहठ ने अपने पुत्र श्री प्रताप सिंह बारहठ, भाई श्री जोरावर सिंह व दामाद श्री ईश्वरदान आशिया को क्रांतिकारियों के साथ रह कर सशस्त्र क्रांति हेतु दिल्ली श्री शचीन्द्र नाथ सान्याल, मास्टर अमीरचन्द के पास श्री रास बिहारी बोस के निर्देशानुसार भेज दिया।

स्वयं श्री बारहठ ने क्रांतिकारियों को हथियारों एवं क्रांतिकारी सशस्त्र आंदोलन हेतु धन जुटा कर भेजने का बीड़ा उठाया।

श्री केसरी सिंह प्रख्यात कवि व बुद्धि के धनी थे। १९०३ में लॉर्ड कर्जन के दिल्ली दरबार में मेवाड़ के महाराणा श्री फतेहसिंह जी को जाने से रोकने हेतु ‘चेतावणी रा चुंगट्या’ लिख भेजे। महाराणा पर प्रभाव पड़ा, दिल्ली दरबार में मेवाड़ महाराणा की कुर्सी खाली पड़ी रही।

२३ दिसम्बर १९१२ को लॉर्ड हार्डिंग के चांदनी चौक के जुलूस पर बम फेंकने में जो क्रांतिकारी शामिल थे उनमें प्रताप बारहठ व जोरावर सिंह बारहठ भी सम्मिलित थे। प्राप्त साक्ष्य के अनुसार बम फेंकने का कार्य जोरावर सिंह बारहठ ने ही किया था।

जहां श्री जोरावर सिंह बारहठ ने क्रांतिकारियों को हथियारों हेतु धन देने बिहार के आरा जिले में महंत के यहां डाका डालने में प्रमुख भूमिका श्री अर्जुनलाल सेठी के शिष्यों मोती चंद, जयचंद आदि के साथ निभाई वहीं वे जोधपुर के साधु प्यारेलाल से धन लेने हेतु चाबियां प्राप्त करने के प्रयास में हत्या के आरोपी बनाये गये। श्री जोरावर सिंह को आजन्म अंग्रेज पुलिस गिरफ्तार नहीं कर सकी। उन्होंने लगभग २७ वर्ष फरारी में कष्टमय बिहड़ों, नदियों एवं अनजान जगहों पर बिताये।

श्री केसरी सिंह बारहठ को भी अंग्रेज सरकार ने दबाव डालकर कोटा हत्या कांड में गिरफ्तार करा कर आजीवन कारावास की सजा से दंडित कराया। अंग्रेजों ने दबाव डालकर श्री केसरी सिंह जी बारहठ की शाहपुरा में संयुक्त परिवार की जो जागीर व सम्पत्ति थी उसे जब्त करा दी।

वीरवर कुंवर प्रताप सिंह बारहठ तो क्रांतिकारी थे। वे श्री शचीन्द्र नाथ सान्याल के निकटवर्ती एवं विश्वसनीय क्रांतिकारी साथी थे। वे उनकी योजनाओं की क्रियान्विति में जुटे रहते थे।

श्री प्रताप बारहठ को बनारस षड्यंत्र प्रकरण में गिरफ्तार किया गया। बंदी बनाकर यातनायें दी। पांच वर्ष की कैद की सजा से दंडित किया। अंग्रेज पुलिस की यातनाओं से त्रस्त बरेली के कारागृह में ही वे शहीद हो गये।

इन अमर शहीदों को स्मरण करना राष्ट्रीय दायित्व है। हम हर भारतीय का कर्तव्य है कि उनको श्रद्धापूर्वक स्मरण कर देश की स्वतंत्रता एवं मूल्यों को अक्षुण्य बनाये रखें एवं अपने प्राणों की ज्योति जला कर भारत को प्रकाशवान बनायें।

इन वीरों की प्रेरणादायी कथा के तथ्यों को आप तक पहुंचा कर मैं भी अक्षरों के माध्यम से श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।

मुझे सौभाग्यवश अपने सांसद काल में शाहपुरा के त्रिमूर्ति स्मारक के सौंदर्यकरण का कार्य सांसद विकास निधि से कराने का सुअवसर मिला था, जीवन धन्य हो गया।

श्री केसरी सिंह जी बारहठ के वंशजों का मुझ पर अत्यधिक आशीर्वाद और सहयोग रहा, जिसको मैं आजीवन भूल नहीं सकता।

पुस्तक को लिखने में मार्गदर्शन करने एवं सामग्री उपलब्ध कराने में सहयोग के लिए मैं पद्मश्री डॉ. चन्द्रप्रकाश जी देवल, श्री फतेहसिंह जी मानव, श्री राजेन्द्र सिंह जी सौदा (कोटा) एवं बारहठ परिवार पर कलम चलाने वाले पूर्ववर्ती लेखकों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता हूं।

इस पुस्तक को तैयार करने में श्री बनवारी कुमावत ‘राज’ एवं मेरी पुत्री डॉ. श्रीमती सरला लखावत, डॉ. श्रीमती सरोज लखावत एवं पौत्री अभिलाषा लखावत ने सहयोग दिया उसके लिये आभार।

आओ हम सब इनकी जीवन गाथा को बार-बार सामूहिक और व्यक्तिगत रूप से पढ़कर स्मरण करें एवं स्वतंत्र, स्वराज की ज्योति को जला कर रखने में योगदान दें।


स्वातंत्र्य राजसूय यज्ञ में बारहठ परिवार की महान आहूति

स्वातंत्र्य वीर केसरी सिंह जी बारहठ, जोरावर सिंह जी बारहठ और कुंवर प्रताप बारहठ ने स्वातंत्र्य आंदोलन के राजसूय यज्ञ में संपूर्ण जीवन की आहूतियां देकर राष्ट्र रक्षार्थ त्याग और बलिदान के इतिहास के स्वर्णिम अध्याय की रचना की। हिन्दुस्तान के स्वतंत्रता आंदोलन में पूरे परिवार को होम देने की यशोगाथा अपने प्रकार की विलक्षण एवं प्रेरणादायी है। श्री केसरी सिंह जी बारहठ ने जैल से अपनी पुत्री चंद्रमणि को सन् १९१४ में पत्र लिखकर इसी भाव को निम्नांकित प्रकार स्वहस्ताक्षरित व्यक्त किया-
(तुम अवश्य यह जानकर संतुष्ट होगी कि भारत के एक महत्त्वपूर्ण प्रदेश में जाग्रति होने का प्रारम्भ अपने परिवार की महान आहूति से ही हुआ है। इस राजसूय यज्ञ में हम लोगों की बलि मंगलरूप हुई है। नाशवान शरीरों की तुच्छता और इस महाभारत अनुष्ठान की महत्ता मिलाकर देखने से ही यह सब प्रतीत होगा।)


सौदा बारहठों का इतिहास

बारहठ त्रिमूर्ति की कथा को आगे बढ़ाने के प्रारम्भ में बारहठ त्रिमूर्ति की वंश परम्परा एवं जन्म के बारे में वर्णन करना आवश्यक लगता है।

सौदा बारहठों के मूल पुरखे गुजरात के खोड़ गांव के चनणजी थे। चनणजी के कुल सात पुत्र हुए। शिवदास जी सबसे बड़े पुत्र थे और उनके पुत्र का नाम बल्लू जी, बल्लुजी के पुत्र का नाम बाल मुकुंद जी, इनके पुत्र का नाम करमसेण जी और करमसेण जी के पुत्र का नाम बारूजी था।

प्राप्त इतिहास के अनुसार मेवाड़ के महाराणा हमीर सिंह जी जब द्वारका जा रहे थे तो रास्ते में खोड़ गांव में रुके। खोड़ गांव में बरबड़ी जी नामक चारण कुल में अवतारी देवी अत्यधिक लोकपूज्य थी। उनके प्रति क्षेत्र के लोगों की अत्यधिक आस्था थी और बरबड़ी जी के कहे वचन फळते थे। महाराणा हमीर सिंह जी भी अपने चित्तौड़ विजय के संकल्प को लेकर आशीर्वाद लेने बरबड़ी जी के पास हाजिर हुए। मां बरबड़ी जी को प्रणाम किया, अपना परिचय दिया, आस्था प्रकट की। मां से अपनी व्यथा कथा विनम्र भाव से निवेदित कर दी। बरबड़ी जी ने महाराणा हमीर सिंह जी की प्रार्थना को सुनकर आशीर्वाद दिया और आदेश दिया कि-“तुम पीछे मेवाड़ में जाओ। ” महाराणा हमीर सिंह जी ने बरबड़ी जी से प्रार्थना की “माँ मेरे पास न तो फौज है, न ही माली हालत फौज एकत्र करने की। मैं किस विध चित्तौड़ जाकर विजय प्राप्त करूं?”

लोक पूज्य देवी बरबड़ी जी ने महाराणा हमीर सिंह जी को आशीर्वाद देते हुए आश्वस्त किया कि तुम फौज और खर्च की चिंता मत करो। तुम्हारे पास जालौर की राजकुमारी के विवाह का प्रस्ताव आयेगा उसे स्वीकार कर लेना। मेरा पुत्र बारू पांच सौ घोड़े लेकर तुम्हारे पास आयेगा और तुम्हारी मदद करेगा। माँ ने हमीर के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। उससे उसकी कोढ़ की बीमारी भी मिट गई। उपरोक्त आशीर्वाद प्राप्त कर महाराणा हमीर सिंह जी वापस केलवाड़ा लौट गये।

माँ बरबड़ी जी का पुत्र बारू भी देवी के वचनानुसार पांच सौ घोड़े लेकर महाराणा हमीर सिंह के पास पहुंच गया।

बरबड़ी जी के आशीर्वाद के अनुसार जालौर के शासक माल देव जी सोनगरा ने अपनी राजकुमारी के विवाह का प्रस्ताव हमीर सिंह जी के पास भेजा, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। विवाह सम्पन्न हुआ और मालदेव जी ने अपने प्रमुख सैन्य अधिकारी मौजीराम मेहता को भी महाराणा हमीर की सेवा में भेज दिया। महाराणा हमीर सिंह जी ने बारू जी की अश्व सेना एवं मौजीराम मेहता की बुद्धिमता के बल पर चितौड़ को विजयी किया।

महाराणा हमीर सिंह जी ने बारू जी को सम्मानपूर्वक अपना ‘पोलपात’ बारहठ बनाया और जागीर में पच्चीस हजार का पट्टा व बारह गांव व आंतरी गाम का उदक प्रदान किया। इसकी पुष्टि के गीत का प्रासंगिक अंश निम्नांकित है

बैठक ताजीम गाम गज बखसे,
किव को मोटो तोल कियो।
बड़ दातार हमें बारू ने,
दे इतरो बारठो दियो।

तब से ‘सौदा बारहठ’ कहलाने लगे। सिसोदियो और सौदा चारणों का काल कालान्तर तक मधुर रिश्तों के वचन भी कहे गये कि-‘श्रीमुख समथ कियो अजमल सुत, सौदा नह विरचै सीसोद।’

महाराणा हमीर सिंह जी ने लोकपूज्य देवी बरबड़ी जी को सादर आमंत्रित कर सम्मानित किया और उनके स्वर्गारोहण के पश्चात चित्तौड़ के किले में बरबड़ी जी का मंदिर निर्माण कराया।

बारहठ त्रिमूर्ति के पुरखे बारू जी अयाची थे। वे महाराणा चित्तौड़ के अलावा किसी से दान या भेंट नहीं लेते थे। महाराणा क्षेत्रसिंह जब बूंदी के राव लालसिंह की बेटी से विवाह करने बूंदी गये तब बारू जी बारहठ भी साथ थे।

स्वाभिमानी बारू जी ने विवाह के अवसर पर बूंदी के शासक राव लालसिंह से याचना करने से इंकार कर दिया। लालसिंह ने षड्यंत्र रच कर बारूजी को महल में बुलाकर कहा कि मुझसे याचना कर भेंट लेनी पड़ेगी, परंतु बारू जी ने अपने आप को अयाची बता कर याचना करने से इंकार कर दिया। लालसिंह ने अत्यधिक दबाव डाला तब बारू जी ने एक शर्त रखी कि राव लालसिंह जी पहले उनकी भेंट स्वीकार करे, लालसिंह इस शर्त पर सहमत हो गये। स्वाभिमानी बारू जी एक तरफ गये और तलवार से स्वयं का सिर काटकर नौकर के साथ पूर्व निर्देशानुसार राव लालसिंह के पास पहुंचा दिया।

बारू जी की इस स्वाभिमानी प्राणोत्सर्ग की घटना की जानकारी मिलने पर महाराणा और बूंदी के राव लालसिंह की सेना के बीच युद्ध हुआ और राव लालसिंह मारा गया। ऐसे स्वाभिमानी और निर्भीक थे त्रिमूर्ति बारहठों के पुरखे बारू जी सौदा बारहठ।

बरबड़ी जी भी अत्यधिक चमत्कारिक देवी थी। उनके अनेक चमत्कारों का उल्लेख मिलता है। राव नवधण पंवार की सम्पूर्ण सेना को एक कुल्हड़ी में चावल पका कर भोजन से तृप्त कर देने की घटना के पश्चात बरबड़ी जी को अन्नपूर्णा देवी के नाम से पुकारा जाने लगा। इस संबंध के एक छप्पय का निम्नांकित अंश प्रसिद्ध है-

लाख फौज नवघण तणां,
कहो कसी विध सिघचड़ी।
बरबड़ी हार कुबेर रो,
किनां तुहाली कूलड़ी।।


बारू जी का वंश वृक्ष


बारहट त्रिमूर्ति का वंश वृक्ष


पोलपात
प्रतौलीपात्र (सं)

राजपूत युग में चारण जाति का वह व्यक्ति जो युद्धकाल में शत्रु द्वारा घिर जाने पर मरने का निश्चय कर युद्ध में कूदने वालों में सबसे आगे रह कर किले का मुख्य द्वार खोलता था।

विशेष विवरण: राजाओं के राज्यकाल में जब किसी राजा का किला शत्रु द्वारा घेर लिया जाता था तो किले के अंदर सभी राजपूत मरने का निश्चय कर सामूहिक रूप से अफीम (दृढ़ संकल्प) लेकर शत्रु से लोहा लेने के लिए तैयार हो जाते थे। ऐसे समय में सबसे पहला व्यक्ति पोलपात वह वंशानुगत चारण होता था जो सबसे पहले आगे आकर किले का मुख्य द्वार खोल कर शत्रु से मुकाबला करके वीर गति को प्राप्त होता था। चारणों की इस निर्धारित अमूल्य सेवा का मूल्यांकन उस समय होता था जब राजघराने में विवाह के समय दूल्हा बिना पोलपात की अनुमति के तोरण बांदने नहीं जा सकता था और इस स्वीकृति के साथ पोलपात को निश्चित राशि भेंट स्वरूप देनी पड़ती थी।

(संदर्भ: डॉ. पद्मश्री सीताराम लालस रचित राजस्थानी सबद कोस)

लड़कियों के हाथों में सच्ची तलवार दीजिये
(केसरी सिंह बारहठ)

१९४० में श्री हीरालाल शास्त्री द्वारा संचालित वनस्थली बालिका विद्यालय में श्री राजेन्द्र बाबू की अध्यक्षता में बालिकायें जब व्यायाम प्रदर्शन कर रही थीं, तब उनके हाथ में लकड़ी की तलवारें देख कर, वहां उपस्थित श्री केसरी सिंह बारहठ ने व्यायाम की प्रशंसा करते हुये अपेक्षा की कि बालिकाओं के हाथ में लकड़ी के स्थान पर असली तलवारें होनी चाहिये।

(संदर्भ: श्री हीरालाल शास्त्री, भू. पू. मुख्यमंत्री के भाषण)


अमर शहीद बारहठ श्री नरू जी

बारहठ त्रिमूर्ति के पुरखे नरू जी बारहठ की शूरता और उदयपुर के जगदीश मंदिर की मुगल सेना से रक्षा करने में बलिदान की गाथा इतिहास की प्रमुख प्रेरणादायी घटना है।

मुगल बादशाह औरंगजेब द्वारा हिन्दुओं पर लगाये गये ‘जजिया कर’ का मेवाड़ के महाराणा राजसिंह जी ने पत्र लिख कर विरोध प्रकट किया था। विरोध से गुस्साये औरंगजेब ने अपनी सेना को उदयपुर पर हमला करने भेजा। सैन्य नीति एवं परामर्श के अनुसार महाराणा राजसिंह जी तो मय जनाना के पहाड़ियों में चले गये। नरू जी बारहठ को किसी ने व्यंग्य से कहा कि जिस द्वार पर हठ पूर्वक ईनाम में जागीरें प्राप्त की अब उस द्वार को छोड़कर कैसे जाओगे बारहठ जी?

नरू जी ने महलों का द्वार छोड़ पहाड़ों में जाने से इंकार कर दिया और जब मुगल बादशाह औरंगजेब के सेनापति इक्का ताज खां और रूहल्ला खां सेना लेकर उदयपुर में जगदीश मंदिर की मूर्तियां तोड़ने लगे तो जगदीश मंदिर की देव मूर्तियों की रक्षार्थ नरू जी सौदा बारहठ ने मुगल सेना से युद्ध किया और 25 जनवरी 1680 को शहीद हो गये।

इसी स्वाभिमानी देशभक्ति का खून था बारहठ त्रिमूर्ति में।


श्री कृष्ण सिंह बारहठ

श्री कृष्ण सिंह जी बारहठ स्वतंत्रता सेनानी केसरी सिंह बारहठ व जोरावर सिंह बारहठ के पिताश्री एवं कुंवर प्रताप बारहठ के दादाजी थे। श्री कृष्ण सिंह जी का मूल नाम किशन सिंह था। उनका जन्म शाहपुरा रियासत के गांव बारहठजी का खेड़ा (देवपुरा) में हुआ। स्वयं श्री कृष्ण सिंह जी द्वारा लिखित ग्रंथ ‘राजपूताना का अपूर्व इतिहास’ के अनुसार उनका जन्म फागुन सुदी एकम विक्रम संवत् १९०६ को माता शृंगार बाई की कोख से हुआ। उनके एक बहन रसाल बाई नाम से थी। श्री ओनाड़ सिंह जी का स्वर्गवास चैत्र सुदी १२ वि. सं. १९२१ को ही हो गया, जब कृष्ण सिंह जी की आयु मात्र १५ वर्ष की थी।

मेवाड़ के कविराजा श्यामदास जी दधवाड़िया इनके मामा थे। कृष्ण सिंह जी ने उनसे भाषा व काव्य रचना की शिक्षा ग्रहण की थी।

श्री कृष्ण सिंह जी का विवाह कुम्हारिया (जयपुर) के शक्तिदान जी कविया की पुत्री बख्तावर बाई से मिंगसर सुद ९ वि. सं. १९२२ को हुई। वे शाहपुरा के राजा श्री नाहरसिंह जी के साथ अधिक समय रहते थे।

श्री कृष्ण सिंह जी ने दूसरा विवाह मिगसर सुद २ वि. सं. १९३० को मेवाड़ के राजनगर जिले के पसूंद के आशिया वीरदान जी की बेटी (शृंगार बाई) के साथ हुआ।

प्रथम आसोज सुदी १४ वि. सं. १९३६ को दूसरे पुत्र श्री किशोर सिंह जी का जन्म शाहपुरा में हुआ।


स्वातंत्र्य वीर श्री केसरी सिंह बारहठ

श्री केसरी सिंह जी बारहठ का जन्म पिता श्री कृष्ण सिंह जी के यहां माता बख्तावर बाई की कोख से मिगसर बदी ६ वि. सं. १९२९ को हुआ। श्री केसरी सिंह जी की जन्म कुण्डली के अनुसार- “अथास्मिन् शुभ संवत्सरे श्री मन्नृपति विक्रमार्क राज्यातीत १९२९ शाके १७९४ मृगसिर मासे कृष्ण पक्षे तिथौ ६ गुरु वासरे घटी २७ पलानि ३५ इष्ट घटि २८ पल ५ अश्लेषा नक्षत्रे ठाकुरां राज्य श्री बारहठ कृष्ण सिंह जी कस्य पुत्र जन्म।”

श्री केसरी सिंह जी बारहठ की शिक्षा आठ वर्ष की आयु में उदयपुर में अपने पिता श्री कृष्ण सिंह जी की देख-रेख में प्रारम्भ हुई। आपने चारण पाठशाला में गुरुवर श्री गोपीनाथ जी शास्त्री के निर्देशन में शिक्षा ग्रहण की।

आप पर महर्षि दयानन्द जी सरस्वती का बाल्यकाल से ही प्रभाव था। उदयपुर प्रवास के दौरान सरस्वतीजी चारण पाठशाला में छात्रों को आशीर्वाद देने पधारे। आपने छात्रों को उपदेश दिया कि जाति से तो चारण हो, परंतु कर्मशैली से भी चारण बनो। महर्षि दयानंद सरस्वती की उक्त बात ने छात्र केसरी सिंह बारहठ के मनमस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ी और कर्म से चारणाचार के निर्भीक और राष्ट्रभक्ति के लक्षणों को अपनी जीवनशैली का अंग बना लिया। केसरी सिंह जी बारहठ की माता जी का उसी वर्ष पौष बदि १० को स्वर्गवास हो गया। इस परिस्थिति में केसरी सिंह जी बारहठ को दादी शृंगारी बाई ने पालन-पोषण कर बड़ा किया।

आपके पिता श्री कृष्ण सिंह जी उदयपुर महाराणा साहब की सेवा में उदयपुर चले गये। केसरी सिंह जी की संस्कृत भाषा में अध्ययन उदयपुर में सम्पन्न हुआ। आपने गुरुमुखी, प्राकृत, डिंगल, पिंगल, मराठी, गुजराती और बांग्ला भाषा का अध्ययन कर अभ्यास किया।

आपका विवाह कोटा रियासत के कोटड़ी के प्रसिद्ध चारण कविराजा देवीदान जी की सुपुत्री माणिक्य कंवर के साथ वि. सं. १९४७ में सम्पन्न हुआ।

आप उदयपुर महाराणा फतह सिंह जी के प्रमुख विश्वस्त परामर्श दाता थे। आप हमेशा महाराणा साहब और अन्य रियासतदारों में देशभक्ति और स्वराज का भाव जागृत करते रहते थे।

स्वतंत्रता सेनानी श्याम जी कृष्ण वर्मा भी श्री केसरी सिंह जी बारहठ के अभिन्न मित्र के रूप में उदयपुर आकर रहने लगे।

अंग्रेजी शासन को प्रखर देशभक्त श्री कृष्ण सिंह जी, केसरी सिंह जी बारहठ और श्याम जी कृष्ण वर्मा का एक साथ विचार-विमर्श करना एवं देशभक्ति एवं स्वराज की गतिविधियों में भाग लेने का कृत्य अप्रिय लगा और उन्होंने इन्हें अलग करने की योजना पर कार्य प्रारम्भ किया। अंग्रेजी गुप्तचर पलिस ने बारहठ परिवार की गतिविधियों पर नजर रखना प्रारम्भ कर दिया।

राजपूताना में ‘अभिनव भारत’ नामक संगठन का गठन किया गया, जिसमें केसरी सिंह जी बारहठ, खरवा ठाकुर गोपाल सिंह जी और अर्जुनलाल जी सेठी प्रमुख थे। बाद में जोरावर सिंह जी व प्रताप सिंह जी बारहठ व ईश्वरदान जी आशिया इसमें शामिल हो गये।

श्री अर्जुनलाल सेठी जी ने प्रताप बारहठ को दिल्ली के रास बिहारी बोस के अनन्य सहयोगी श्री अमीरचन्द के पास भेजा जहां श्री रास बिहारी बोस व श्री शचीन्द्र नाथ सान्याल के सम्पर्क में आकर क्रांतिकारी योजनाओं में भाग लिया।

श्री केसरी सिंह जी बारहठ कोटा राज्य के १९०४-१९०५ में एथनोग्राफी विभाग के राज्य अधीक्षक थे। आपको ६० रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता था।


लॉर्ड कर्जन का दरबार और ‘चेतावणी रा चूंगट्या’

ब्रिटेन में एडवर्ड सप्तम का राज्याभिषेक हुआ। भारत में उस समय लॉर्ड कर्जन वॉयसराय के पद पर नियुक्त थे। सन् १८५७ के स्वातंत्र्य आंदोलन के पश्चात निरंतर हिन्दुस्तान को ब्रिटिश सरकार के आधिपत्य से मुक्त कराने का भाव व विद्रोही घटनाक्रम प्रज्ज्वलित हो रहे थे। वॉयसराय लॉर्ड कर्जन ने सम्पूर्ण भारत को अपने आधिपत्य के प्रति राजा-महाराजाओं, राय बहादुरों एवं सत्ता के परिक्रमा लगाकर भाग्योदय की कामना करने वाले सत्ता लोलुप बड़े रईसों की एक साथ उपस्थिति प्रदर्शित कर दबदबा कायम करने हेतु सन् १९०३ में दिल्ली दरबार का आयोजन किया। सभी को दिल्ली दरबार में उपस्थिति होने हेतु आमंत्रित किया गया। उपस्थिति हेतु परोक्ष रूप से दबाव व लालच का उपयोग भी किया गया। लॉर्ड कर्जन चाहते थे कि स्वधर्म, स्वतंत्रता एवं स्वराज के लिये पीढ़ी दर पीढ़ी संघर्ष करने वाली परम्परा के प्रतिनिधि मेवाड़ के महाराणा श्री फतेहसिंह जी की भी दिल्ली दरबार में उपस्थिति हो। वह यह संदेश देना चाहता था कि अधीनता स्वीकार नहीं करने वाली समृद्ध परम्परा का प्रतिनिधि मेवाड़ महाराणा भी ब्रिटिश साम्राज्य के समक्ष उपस्थित होकर नतमस्तक हो गये हैं।

कई राजा महाराजाओं ने तो निमंत्रण प्राप्त करने के लिये प्रत्यक्ष रूप से प्रयास किये। मेवाड़ के तत्कालीन महाराणा श्री फतेहसिंह जी को भी न केवल दिल्ली दरबार का निमंत्रण भेजा गया अपितु उन्हें निश्चित रूप से उपस्थित होने हेतु प्रेरित भी किया गया। नफा-नुकसान भी समझाया गया। आमंत्रण प्राप्त कर मेवाड़ महाराजा ने दिल्ली दरबार में उपस्थित होने हेतु दिल्ली जाने की तैयारियां प्रारम्भ कर दी।

लॉर्ड कर्जन ने महाराणा मेवाड़ श्री फतेह सिंह जी को दिल्ली दरबार में उपस्थिति होने के लिए निम्नलिखित पत्र प्रेषित किया-

letters to Indian princes
Calcutta the 19th March 1902

MY HONORED AND VALUED FRIEND,

I have the pleasure to inform your Highness that it is my intention to hold an imperial Durbar at Delhi on the 1st January 1903, for the purpose of celebrating, in a befetting, manner, the solemn event of the coronation of His Imperial Majesty King Edward VII, Emperor of India, and His dearly beloved consort the Queen.

In instructing me to hold this Durbar, His Majesty has desired it be made known that he is anxious to afford to all the princess and the chiefs of India the opportunity of testifying their loyalty to his throne person and that attendance there at will be regarded by His Majesty as equivalent to presence at his coronation in England.

I enclose for your highnesses information, a copy of announcement which I have caused to be published in the Gazette of India and I request the honour of your Highnesse’s presence on this auspicious occasion.

Due notice will be given through the usual channel of the particular date at which your Highness will be expected at Delhi.

I desire to express the High consideration which I entertain for your Highness and to subscribe my self.

your Highnesse’s sincere Friend

CURZON
Viceroy and Governor General of India.

यह समाचार जब स्वातंत्र्य आंदोलन में सक्रिय प्रमुख सेनानियों तक पहुंचा तो वे चिंतित हुए। खरवा ठाकुर श्री गोपाल सिंह जी, श्री भूर सिंह जी मलसीसर, राव नरेन्द्र सिंह जी जोबनेर एवं ठाकुर श्री केसरी सिंह जी व अन्य ने मलसीसर हाउस जयपुर में बैठक कर इस विषय का भावी स्वतंत्रता आंदोलन पर होने वाले प्रभाव पर विचार-विमर्श किया। सभी क्रांतिकारियों का मत था कि यदि सतत् शताब्दियों से राष्ट्र व धर्म की रक्षार्थ संघर्ष करने वाले मेवाड़ के महाराणा दिल्ली दरबार में उपस्थित होकर अधीनता की स्वीकारोक्ति का संदेश देते हैं तो स्वतंत्रता आंदोलनकारियों के मनोबल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। सबने मिलकर महाराणा फतेहसिंह जी को दिल्ली दरबार में जाने से रोकने के प्रयासों के बारे में गंभीर विचार-विमर्श कर निश्चित किया कि यह कार्य वंश परम्परा चारणाचार का पालन करने वाले श्री केसरी सिंह जी बारहठ करे।

यह निर्णय हुआ तब तक मेवाड़ महाराणा श्री फतेह सिंह जी विशेष रेल से उदयपुर से दिल्ली के लिये प्रस्थान कर चुके थे। श्री केसरी सिंह जी बारहठ का उदयपुर पहुंच कर महाराणा से भेंट करने का समय नहीं बचा।

योजनानुसार श्री केसरी सिंह जी बारहठ ने अपनी वंशानुगत समृद्ध स्वाभिमान का भाव जागृत करने वाले साहित्य विधा में दोहों का सृजन किया। महाराणाओं के स्वतंत्रता के सूर्य जैसी आभा वाली परम्परा का स्मरण कराने एवं दिल्ली दरबार में महाराणा के उपस्थित होकर ब्रिटिश सत्ता की अधीनता स्वीकार कर नतमस्तक होने से स्वतंत्रता आंदोलन के मनोबल पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव से अवगत कराने की योजना बनी।

श्री केसरी सिंह जी बारहठ ने ‘चेतावणी रा चुंगट्या’ शीर्षक से लोकप्रिय काव्य को लिख कर महाराणा श्री फतेहसिंह जी को उदयपुर से दिल्ली रेलमार्ग पर स्थित ‘सरेरी’ (भीलवाड़ा) रेल्वे स्टेशन पर रेल रोककर लिखित संदेश दिया गया। महाराणा श्री फतेह सिंह जी ने काव्यात्मक संदेश को पढ़ा और तुरंत प्रतिक्रिया दी कि यदि यह संदेश मुझे उदयपुर में मिल जाता तो मैं दिल्ली के लिये प्रस्थान नहीं करता। अब दिल्ली तो जाऊंगा, परंतु संदेश मेरे चेतन मन में अवस्थित हो गया है।

दिल्ली में लॉर्ड कर्जन के द्वारा भव्य दिल्ली दरबार का आयोजन हुआ। दिल्ली दरबार का स्थल राजा महाराजाओं, रईसों, पदवियों से सुसज्जित बड़े लोगों से अटा पड़ा था। लॉर्ड कर्जन व उनकी धर्मपत्नी की सवारी हाथी पर सवार होकर अपने सत्ता के मद में चूर होकर इतरा रही थी। दिल्ली दरबार में उपस्थित राजा-महाराजा सवारी के समक्ष प्रदर्शन कर और खुद का चेहरा दिखा कर उपस्थिति एवं अधीनता का याचनापूवर्क संदेश दे रहे थे।

दिल्ली दरबार में उपस्थित राज्यों एवं रियासतों के प्रमुख हाथी पर लॉर्ड कर्जन को देखकर इतने झुक रहे थे, मानो उनकी रीढ़ की हड्डी के छल्ले निकाल लिये गये हों और उनका सिर सहित शरीर रबड़ का खिलौना हो गया हो।

दिल्ली दरबार में आमंत्रित सत्ताधीशों के बैठने का प्रत्येक हेतु स्थान नाम सहित चिह्नित किया गया था। लॉर्ड कर्जन के सम्मान में सभी राजा-महाराजा व रईस कठपुतलियों की तरह एक से बढ़कर एक सम्मान में झुकने एवं भेंट देने में अग्रणी होने की होड़ में लगे थे। परंतु मेवाड़ के महाराणा श्री फतेहसिंह जी के बैठने हेतु निश्चित कुर्सी खाली थी।

मेवाड़ के महाराणा श्री फतेहसिंह जी ने ब्रिटिश सत्ता की दया और कृपा से बड़ा मेवाड़ के महाराणाओं की स्वाभिमानी परम्परा को मानते हुये दिल्ली दरबार में नहीं जाने का निर्भीक होकर निर्णय किया।

यह प्रभाव था प्रमुख चारण कवि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कवि श्री केसरी सिंह जी बारहठ की कविता मय संदेश का।

हम यहां सुविज्ञ पाठकों के पठनार्थ श्री केसरी सिंह जी बारहठ की वह काव्य रचना ‘चेतावणी रा चुंगट्या’ शीर्षक से यहां प्रस्तुत कर रहे हैं:-

चेतावणी रा चुंगट्या

पग पग भम्यां पहाड़, धरा छाड़ राख्यो धरम,
(इँशूँ) महाराणा र मेवाड़, हिरदै बशिया हिन्द रै।।१॥
पांवो पांवो पहाड़ों में भटकते फिरे, पृथ्वी छोडकर धर्म को बचाया, इसलिए ही ‘महाराणा’ और मेवाड़ दो शब्द हिन्दुस्तान के हृदय में बस गये हैं।।१।।

घण घलिया घमशाण, राण शदा रहिया निडर,
(अब) पेखन्ता, फुरमाण हलचल किम फतमल! हुवै।।२।।
अनेक युद्ध हुये, तब भी महाराणा सदा निर्भय रहे। हे फतहसिंह! अब सिर्फ फरमानों को देखते ही यह हलचल कैसे मच गई।।२।।
गिरद गजां घमशाण, नहचै धर माई नहीं,
(ऊ) मावै किम महाराण, गज दोशै रा गिरद में।।३।।
जिसके हाथियों के युद्ध की उड़ी हुई धूलि निश्चय ही पृथ्वी पर नहीं समाती थी, वह महाराणा स्वयं दो सौ गज के घेरे में कैसे समा जायेगा।।३।।

औरा ने आशाण, हाँका हरबल हालणो।
किम हालै कुल राण, (जिण) हरबल शाहों हंकिया। ॥४॥
दूसरे राजाओं के लिए आसान होगा कि वे हकाले जाने पर शाही सवारी में आगे बढ़ते रहें, चलते रहें, परंतु जिस महाराणा वंश ने अपने हरोल में (आगे) बादशाहों को हॉक लिया था, वह शाही सवारी में कैसे चलेगा?।।४।।

नरियन्द शह नजराण, झुक करशी शरशी जिकाँ।
(पण) पशरेलो किम पाण, पाण छताँ थारो फता।।५।।
दूसरे सब राजा झुक झुक करके नजराना दिखाएंगे, यह उनके लिए तो सहज होगा, परंतु हे फतहसिंह! तेरे हाथ में तो तलवार रहती है, उसके रहते हुए नजराने का हाथ आगे कैसे फैलेगा।।५।।

शिर झुकिया शहंशाह, शिहाशण जिश शाम्हनै।
(अब) रलणै पगंत राह, फाब्बै किम तोने फता।।६।।
जिसके सिंहासन के सामने बादशाहों के सिर झुके हैं, फतहसिंह ! अब पंक्ति में मिल जाना तुझे कैसे फबेगा?।।६।।

शकल चढ़ावये शीश, दान धरण जिणरो दियो।
शो खिताब बखशीश, लेवण किम ललचावशी॥७॥
जिसके दिये हुये ‘धर्म’ के दान को संसार सिर पर चढ़ा रहा है, वह (हिन्दू पति) खिताबों की बख्शीश लेने के लिये कैसे ललचायेगा?।।७।।

देखेला हिन्द वाण, निज शूरज दिश नेहशूं।
पण तारा परमाण, निरख निशाशा न्हाँकशी॥८॥
समस्त हिन्दू अपने सूर्य की ओर स्नेहपूवर्क ताकेंगे, परंतु जब उनको तारा बने हुये दिखाई दोगे तो वे अवश्य ही निश्वास डालेंगे।।८।।

देखे अंजश दीह, मुलकेलो मन ही मनां।
दम्भी गढ़ दिल्लीह, शीश नमन्ताँ शीशवद।।९।।
हे शिशोदिया! दिल्ली का दम्भ किला तुझे सिर झुकाते हुये देखकर मन ही मन हँसेगा और इस दिन को अपने लिए अभिमान का दिन समझेगा।।९।।

अन्त बेर आखीह, पातल जे बाताँ पहल।
(वे) राणा शह राखीह, जिणरी शाखी शिर जटा।।१०।।
पहले महाराणा प्रताप ने अंतिम समय में जो प्रतिज्ञायें की थी, उनको आज तक सब महाराणाओं ने निभाया है और इसकी साक्षी खुद तुम्हारे सिर की जटा है।।१०।।

कठिण जमानो कोल, बांधै नर हीमत बिना।
(यो) वीरां हन्दो बोल, पातल शांगे पोखिया॥११॥
मनुष्य अपने में हिम्मत होने पर ही यह सिद्धांत बांध लिया करता है कि ‘जमाना मुश्किल है’ इस वीर वाणी के रहस्य को सांगा और प्रताप समझे थे।।११।।

अब लग शारां आश, राणरीत कुल राखशी।
हो रहाय शुख राश, एकलिंग प्रभु आपरै।।१२॥
अब तक सबको यही आशा है कि महाराणा अपने वंश की रीति को रक्खेंगे। सुख के राशि भगवान एकलिंग आपकी सहायता पर रहें।।१२।।

मान मोद शीशोद! राजनीति बल राखणो।
(ई) गवरमिण्ट री गोद, फल मीठा दीठा फता!।।१३।।
हे शिशोदिया फतहसिंह ! अपनी प्रतिष्ठा और हर्ष को राजनीति बल से रखना ही होगा। इस गवर्मेन्ट की गोदी में मीठे फल देखे हैं।।१३।।

(साभार : शाहपुरा काल सौरभ (शाहपुरा राज्य का इतिहास) : शाह मनोहर सिंह डांगी)

साहपुरै सिर मोड़ बंधायो, गीत पीढियां जाण्यो

(मोहन मंडेला, शाहपुरा)

जिनगाणी रो मूल मंत्र तो, मुगती मांही माण्यो।
मरबा पेली जो मरजाणै, जुग जुग जाय बखाण्यो।
चेतावण रा भर्‌या चूंगट्या, करतब काठो छाण्यो।
साहपुरै सिर मोड़ बंधायो, गीत पीढियां जाण्यो।
बरबादी रो ख्याल मांडता, कदे न उमड्यो गम।
बारहटां री बाड्यां नरसिंघ, हर-हर बोल्यो बम।।

लॉर्ड कर्जन दरबार का रेखाचित्र



‘चेतावणी रा चुंगट्या’ श्री केसरी सिंह बारहठ ने ही लिखे: राव गोपाल सिंह खरवा

मेवाड़ के महाराणा को दिल्ली में लॉर्ड कर्जन के दरबार में उपस्थित होने से रोकने हेतु प्रेरित करने का कार्य श्री केसरी सिंह जी बारहठ द्वारा ‘चेतावणी रा चुंगट्या’ शीर्षक से लोक प्रचलित काव्य की रचना की गई थी। इस घटना का सर्वाधिक प्रमाणिक समर्थन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और श्री केसरी सिंह बारहठ के अनन्य मित्र खरवा राव श्री गोपाल सिंह जी के द्वारा श्री खेत सिंह जी को दिनांक ३१ जुलाई, १९३८ को लिखे निम्नांकित पत्र से होता है:-

खरवा
तारीख 31 जुलाई, 1938

चिरंजीव भतीज श्री खेतसिंह योग्य,

म्हारी आशीष बांचजे। अत्र कुशल तत्रास्तु। अप्रंच थारो पत्र आया घणा दिन हो गया, परंतु उत्तर देवा में देर हुई जीको कारण यो हो कि प्रथम तो म्हूं खरवा सू बाहिर गयो हुवो हो। १५-१६ दिन के पश्चात् जद म्हूं खरवे आयो तो म्हारे बुखार व्है गयो और १५-२० दिन तक लगातार बण्यो रह्यो। बुखार १०१ डिग्री सूं लेकर १०५ डिग्री तक बण जातो हो। ई प्रकार शारीरिक अस्वस्थता का कारण सूं जल्दी पत्रोत्तर नहीं दियो जा सक्यो।

स्वर्गीय महाराणा साहेब फतहसिंह जी लार्ड कर्जन का दरबार में दिल्ली पधारना लाग्या, उण समय जो दोहा बणार भेज्या वे बारहठजी केशरी सिंह जी (जो मेवाड़ का ही है और ३०-३५ वर्षां सूं कोटे रहवे है) का बणायोड़ा है। म्हूं तो महाराणा साहेब के दिल्ली पधारबा सूं पहली ही दिल्ली चल्यो गयो हो और म्हारो दिल्ली जाबो भी महाराणा साहब जद दरबार में न पधार्या तो म्हूं महाराणा साहब की दृढ़ता विषयक जो दोहा बणा कर दिल्ली में ही रूबरू मालम कर दिया हा, जो इण प्रकार है-

होता हिन्दु हताश, नमतो जे राणा नृपत।
सबल फत्ता साबाश, आरज लज राखी अजां।।१।।
करजन कुटिल किरात, शशक नृपत ग्रहिया सकल।
हुयो न यूं इक हात, सिंह रूप फतमल सबल।।२।।

बारहठ केसरी सिंह जी जो दोहा बणार भेज्या वे ‘चेतावनी रा चूंगट्या’ नाम सूं प्रसिद्ध है। महाराणा साहेब के दिल्ली पधारबा का समाचार राजस्थान में फैलता ही क्षात्र-स्वातंत्र्य का पुजारियां का हृदयां पर असह्य चोट पहुंची। क्षात्र-शक्ति का भक्त बारहठ केशरी सिंह जी ए दोहा बणा कर महाराणा साहेब की सेवा में भेज्या। उण बगत महाराणा साहेब स्पेशल ट्रेन द्वारा उदयपुर सूं रवाना हो चुक्या हा। ये दोहा नसीराबाद की स्टेशन पर श्री दरबार के नजर हुआ, उण बगत फरमायो बतावे है कि यदि ये दूहा उदयपुर में ही मिल जाता तो म्है दिल्ली के लिए रवाना ही नहीं होता, परंतु अब तो दिल्ली पहुंच कर ही इस पर विचार करहां। दिल्ली पहुंच कर महाराणा साहब जो कुछ कर दिखाई वा संसार प्रसिद्ध बात है यानी महाराणा साहेब दरबार में नहीं पधार्या। जिण बगत महाराजा, नवाब और उमरावां सूं भर्या दरबार में सम्राट को प्रतिनिधि लार्ड कर्जन महाराणा साहेब की खाली कुर्सी की तरफ देख रह्यो हो उण बगत उदयपुर राज्य की स्पेशल महाराणा साहेब को लिये हुये स्वतंत्रता की वेदी चित्तौड़ की तरफ दौड़ रही ही। थारी जाणकारी के लिये वे दोहा (बारहठ जी कृत) नीचे लिख्या जावे है।

लार्ड कर्जन का दरबार में बड़ौदे दरबार भी कई प्रकार की गड़बड़ करके लार्ड कर्जन का प्रभाव ने नहीं मान्यो हो।

सुणबा में आई है कि आजकल भाई जी पर श्री हजूर की बड़ी कृपा है और केई महकमों को काम भी सौंप दियो है बड़ी प्रसन्नता की बात है। पढ़बा लिखबा तथा घोड़ा बंदूक को अभ्यास राखजै, थारी प्रसन्नता को पत्र देती रीजे।

थारो सर्वदा शुभेच्छु
गोपालसिंह राष्ट्रकूट


केसरी सिंह बारहठ पर राजद्रोह का आरोप लगाया अंग्रेजों ने

अंग्रेज अधिकारी केसरी सिंह बारहठ और अर्जुनलाल सेठी का राजद्रोह में संलिप्त होने का आरोप ब्रिटिश अधिकारियों ने लगाया था। सर इलियट कॉल्विन ने जयपुर के महाराजा सर सवाई माधोसिंह को दिनांक ७ अगस्त १९१४ को अत्यधिक गोपनीय पत्र लिखकर उक्त जानकारी प्रदान की। हम यहां श्री कॉल्विन के पत्र को यथावत प्रस्तुत कर रहे हैं-

Appendix ‘B’ TOP SECRET
File No 129 II Camp Udaipur
The 7th August, 1914

My Honoured and Valued Friend,

1. I am addressing you by desire of the Government of India in regard to the recent revolutions regarding the spread of sedition in Rajputana.

2. The facts which have come to light create a situation which must naturally cause considerable anxiety, not only to the government of India but also to the Darbars in Rajputana. Appear from the fact that a murder was committed in Kotah two years apparently with a political motive, and that no intelligence received of this crime until March 1914 when a clue was discover in the course of enquiries in connection with other case, it appears that there has been existing for some years in Rajputana without knowledge of Darbars or of the Political officers, a secret political organisation directed originally against the Chiefs of Rajputana subsequently against the British Government, Attempts have also been made both by Kesri Singh in Jodhpur and Kotah and by Arjun lal in Jaipur, to spread sedition among Rajputana by means of education, and masters and students from the Boarding Houses established by them in Jaipur, Jodhpur, and Kotah were it see concerned in the political murder at Arrah and kotah. Steps are now being taken, as the result of the discoveries made by Mr. Armstrong to prosecute those responsible for the murder at Kotah. Including Kesri Singh and it is understood that the Jaipur Darbar will also institute proceedings against Arjunlal for abetment of the Arah murder. These prosecutions may be expected to have a salutary effect in checking sedition actively in Rajputana States, but it is necessary in the opinion of the Government of India, that some further measures should be taken to prevent Rajputana from again becoming the field for seditios conspiracy.

3. Your Highness will remember that His Excellency the late Lord Minto addressed a letter to you on the, 6th August, 1910 on subject of keeping native States free from seditious evil of seditionte and it was abundantly clear from Your Highness’s reply that our Highness was not less anxious than the Government of India organise affectual measuresry that end, and to Co-operate in every way with the Government of India to secure that object. It is still as it was than the earnest desire of the Government of India, that the Chiefs themselves should take the necessary steps for rooting out the evil of sedition but it is clear from the brief pieces of the situation given in the preceding paragraph that the efforts which have been made to this end have not yet been attended with complete success. It is obvious from the recent discoveries that machinery for watching and reporting the movements of conspirators in some of the more important states of Rajputana is wholly defective and that in some cases institutions which have professed to be on a purely educational basis have been used for political purposes.

4. The points, therefore, which still seem to require attention at the hands of darbars in Rajputana are (1) the adoption of adequate measures for the improvement of their police especially of their system of police intelligence, and (2) a closer control over their schools and colleges. I bring these two subjects to Your Highness’s attention in the full confidence that they will receive prompt consideration from the Jaipur Darbar and I need only add that if our Highness as a result of your deliberations on the subject, should require any advice or assistance from me or from the Resident, it will be very readily and gladly given.

The Government General in Council is confident that the Darbars of Rajputana with their traditional loyalty, will make every effort to discharge the duty which they owe both to themselves and to the Empire of rooting out the evil of sedition, before it attains a more serious growth. I desire to express the high consideration which I entertain for Your Highness and to subscribe myself.

Your Highness’s sincere friend,
(Sir, Elliot Colvin)
K. C. S. C. I.

Major General His Highness Maharaja Dhiraj
Sir Sawai Madho Singh Bahadur, Jaipur

मुझे अंग्रेजों के हवाले करके रुपये वसूल कर लो

श्री रास बिहारी बोस, श्री यतीन्द्र बाबू एवं श्री शचीन्द्र नाथ सान्याल द्वारा प्रारम्भ किये गये क्रांतिकारी विप्लव आंदोलन के लिए हथियार खरीदने और क्रांतिकारी साहित्य प्रकाशन हेतु धन राशि समाप्त हो गई थी। यतीन्द्र बाबू ने तो यहां तक कहा-“बिना हाथ में काफी धन किये इस काम में कूदना ठीक नहीं। ” इसी काल खण्ड में एक और धन जुटाने के लिये बंगाल में मोटर डकैती आरम्भ हुई।

एक तरफ ब्रिटिश राज के पास अपार धन, सेना व गुप्तचर विभाग का संगठनात्मक तंत्र विद्यमान था और दूसरी ओर शचीन्द्र सान्याल के शब्दों में-“भारत का हमारा यह दरिद्र विप्लव दल इतना दरिद्र है कि एक दिन रास बिहारी बोस ने हम लोगों से कहा कि-मुझे अंग्रेजों के हवाले करके साढ़े सात हजार रुपये वसूल कर लो।

यह संदेश केसरी सिंह जी बारहठ के पास पहुंचा और किसी भी हालत में क्रांतिकारी विप्लवी स्वातंत्र्य आंदोलन को धन उपलब्ध कराने के लिए आरा (बिहार) एवं कोटा से धन जुटाने के लिए सब कुछ किया।

(संदर्भ : बंदी जीवन : शचीन्द्र नाथ सान्याल)


श्री केसरी सिंह बारहठ को आजीवन कारावास की सजा

केसरी सिंह बारहठ ने अपने सम्पूर्ण परिवार को हिन्दुस्तान की आजादी के लिये क्रांतिकारी आंदोलन में भाग लेने के लिये सक्रिय कर दिया था। अंग्रेज सरकार की कुदृष्टि केसरी सिंह बारहठ और उसके परिवार पर थी। उन्होंने येन-केन-प्रकारेण केसरी सिंह बारहठ को गिरफ्तार करने की योजना पर काम प्रारम्भ किया। गुप्तचर अधिकारी उनकी हर गतिविधि पर नजर रखे हुए थे।

केसरी सिंह बारहठ का यह मानना था कि स्वतंत्रता आंदोलन क्रांति के द्वारा ही सफल हो सकता है। उनके सामने १८५७ का स्वातंत्र्य आंदोलन का इतिहास आगे के कदम उठाने के लिये गवाह के रूप में उपलब्ध था।

बंगाल में सर्वश्री रास बिहारी बोस, शचीन्द्रनाथ सान्याल, अरविन्द घोष एवं अन्य क्रांतिकारियों ने क्रांति का मार्ग अपनाकर सशस्त्र सीधी कार्यवाही के द्वारा हिन्दुस्तान को आजाद कराने के लिये रास्ता चुना। श्री रासबिहारी बोस के मार्ग निर्देशन में श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल, मास्टर अमीरचन्द, श्री अवधबिहारी, श्री बालमुकुंद एवं श्री बसंतकुमार बिस्वास जैसे क्रांतिकारी सक्रिय हो गये थे।

श्री केसरी सिंह बारहठ का श्री रासबिहारी बोस एवं श्री शचीन्द्र नाथ सान्याल से सम्पर्क-संबंध था और अपने पुत्र कुँवर प्रताप बारहठ, भाई श्री जोरावर सिंह बारहठ एवं दामाद श्री ईश्वरदान आशिया को मास्टर अमीरचन्द के पास क्रांतिकारी आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिये भेज दिया।

राजपूताना में श्री केसरी सिंह बारहठ का श्री अर्जुनलाल सेठी, खरवा राव श्री गोपाल सिंह, श्री दामोदार दास राठी, श्री श्याम जी कृष्ण वर्मा से सक्रिय सम्पर्क था और बंगाल की तर्ज पर राजपताना में क्रांतिकारी आंदोलन प्रारम्भ करने की योजना बना रहे थे। श्री रासबिहारी बोस के आग्रह पर श्री केसरी सिंह बारहठ, श्री अर्जुनलाल सेठी एवं श्री गोपाल सिंह खरवा ने क्रांतिकारी आंदोलन के लिये हथियारों, प्रकाशन और क्रांति योजनाओं की क्रियान्विति के लिये आवश्यक धन जुटाने का दायित्व अपने ऊपर लिया।

उपरोक्त योजना की क्रियान्विति हेतु श्री केसरी सिंह बारहठ ने अपने शिष्य हीरालाल, रामकरण भाई जोरावर सिंह एवं शांतभानु लहरी को अनैतिक रूप से धन एकत्र करने वाले जोधपुर के साधु प्यारेराम से येन-केन-प्रकारेण धन लाने का आदेश दिया।

श्री केसरी सिंह बारहठ के आदेश से उपरोक्त अनुयायी जोधपुर गये और वहां श्री जोरावर सिंह के आवास खुडाला की हवेली में २० अप्रेल १९१२ को पहुंचे। वहां सब प्रकार के प्रयास करने के बावजूद प्यारेराम साधु की तिजौरी की चाबियां प्राप्त नहीं कर सके, क्योंकि प्यारेराम स्वयं अहमदाबाद गये हुये थे।

ऐतिहासिक दस्तावेज में यह भी वर्णन मिलता है कि प्यारेराम साधु को अहमदाबाद से लाने और उससे धन प्राप्त करने के आदेश श्री केसरी सिंह बारहठ ने दिये और धन नहीं मिलने पर प्यारेराम साधु को कोटा लाने का आदेश दिया। प्यारेराम साधु को योजनानुसार कोटा लाया गया। अनेक प्रयासों, निवेदनों के बावजूद क्रांतिकारियों की गतिविधियों के लिये प्यारेराम साधु ने धन नहीं दिया।

आगे की कथा यह बताई जाती है कि क्रांति के लिये कोटा में प्यारेराम साधु को जान से हाथ धोना पड़ा। अंग्रेजों ने राजनीति से प्रेरित होकर अंतवोगत्वा मुकदमा बनाया। श्री केसरी सिंह बारहठ एवं उनके शिष्य शांतभानु लहरी एवं हीरालाल को मुल्जिम बनाकर गिरफ्तार किया गया। श्री केसरी सिंह बारहठ और उनके शिष्यों के विरुद्ध कोटा में विशेष अतिरिक्त सैशन न्यायालय का गठन कर प्यारेराम साधु की हत्या के आरोप में भारतीय दंड संहिता की धारा-३०२ आदि में मुकदमा चलाया गया। विशिष्ट न्यायाधीश ने श्री केसरीसिंह बारहठ को भारतीय दंड संहिता की धारा ३०२ में दोषी मानते हुये आजीवन कारावास की सजा से दंडित किया और उनके दोनों शिष्यों को भी धारा-३०२ में दोषी मानते हुये आजीवन कारावास की सजा से दण्डित किया गया।

तत्पश्चात कोटा के महाराजा की ओर से अंग्रेज सरकार से उन्हें अंडमान की जेल में बंदी बनाकर काले पानी की सजा देने का निवेदन किया गया, परंतु श्री केसरी सिंह बारहठ की आयु ४२ वर्ष हो जाने के कारण उन्हें काले पानी की सजा देने से गवर्नर जनरल ने इंकार कर दिया। गवर्नर जनरल ने कोटा महाराजा के निवेदन पर श्री केसरी सिंह बारहठ के दोनों शिष्यों हीरालाल एवं शांतभानु लहरी को कालेपानी की सजा देते हुये अंडमान की जेल में भिजवा दिया।

श्री केसरी सिंह बारहठ को आजीवन कारावास की सजा भुगताने के लिये प्रशासनिक कदम उठाते हुये अंग्रेज सरकार ने हजारी बाग की जेल में स्थानांतरित कर दिया।

भारत सरकार के राष्ट्रीय अभिलेखागार नई दिल्ली में श्री केसरी सिंह बारहठ व उनके शिष्यों पर चलाये गये मुकदमे से संबंधित पत्रावली के अंश उपलब्ध है। राष्ट्रीय अभिलेखागार नई दिल्ली के रिकॉर्ड के अनुसार श्री केसरी सिंह बारहठ और उनके शिष्यों पर जो आरोप लगाये उनका संक्षिप्त विवरण उन्हीं की भाषा में प्रस्तुत है-

The story as alleged by the prosecution is that Baret Kesri Singh, who has served in the Kotah State for a long time, is a man of learning and possesses intelligence above the average. His ideas towards the Government of India were as disaffected and antagonistic as those of the seditious and anarchical Societies of Bengal. He was desirous of disseminating similar views in Rajputaua and his efforts resulted in establishing a Rajput Boarding House at Kotah, and a Rajput Charan Boarding House at Jodhpur. In the Kotah Boarding House, Narayan Singh, a Rajput of Golia, District Ajmer was appointed Superintendent and in the Jodhpur Charan Boarding House, Lehri, at the recommendation of Kesri Singh. Kesri Singh through his teachings impressed on the minds of Luchmilal and Hiralal of Kotah, who were his pupils and constant associates, that money gained even by unlawful means for the promotion of education was not sinful. He also stated that there was a rich Sadhu Pyare Ram at Jodhpur, who was of loose character and that they should try to rob him of his riches. These two youths, as directed by him, proceeded to Jodhpur about the 20th April 1912, and there stopped with Zorawar Singh (Kesri Singh’s brother) at Kudala-ki-Haveli, where the latter resided and where the Rajput CharanBoarding was also held. There was a consultation for robbing Pyare Ram, in which Lehri, the Superintendent of the Boarding House, Ram Karan, Zorawar Singh, Narayan Singh and the two arrivals took part. ‘ When they could not agree as to the most appropriate plan of getting Pyare Ram’s wealth by theft or robbery, ete. , and a difference of opinion followed Kesri was called by wire. On his reaching there it was ascertained thatPyare Ram was not at Jodhpur, and that he kept the key of his safe always with him. Then in pursuance of Kesri Singh’s advice it was resolved that Ram Karan, Narayan Singh and Lehri be deputed to Ahmedabad to obtain the key from Pyare Ram in some way or other. Accordingly these persons set out for Ahmedabad and Kssri Singh, Luchmilal and Hiralal returned from Jodhpur to Kotah via Ajmer. But the persons deputed to Ahmedabad could find no opportunity to get the key from Pyare Ram, and Ram Karan and Narayan Singh came back to Jodhpur followed soon after by Lehri. From Jodhpur Narayan Singh informed Kesri Singh of all that had happened, and upon this it was proposed that Pyare Ram be inveigled to Kotah, and that by his murder his key be obtained from him. Ram Karan was directed to bring Pyare Ram over to Kotah.

In addition to dealing in money transactions Pyare Ram was in the habit of negotiating betrothals and marriages between high families, and receive his perquisites thereby. So Ram Karan induced Pyare Ram to go to Raja Bijaysingh, Jagirdar of Kunadi, in the Kotah State, in connection with the betrothal of the Baiji of Ahva (a Thikana in Jodhpur) and he consented to this. On Pritham Asadh Sudi eight, corresponding to the 22nd June 1912, Ram Karan accompanied Pyare Ram from his Ram Dwara to the Jodhpur Railway Station, purchased tickets for himself and the Sadhu and started with him, arriving at Kotah on the night of the 23rd June 1912. To receive the Sadhu and Ram Karan, Narayan Singh arrived at Sawai-Madhopur and accompanied them back from that place to the Kotah Station, and then went a little ahead to inform Kesri Singh of the arrival. Pyare Ram and Ram Karan followed him in a tonga, and Hiralal met them at the Clock Tower and conducted them for accommodation to the Rajput Boarding House, where Narayan Singh and Lehri were already present. Next day on the 24th June 1912 Hiralal and Kesri Singh visited the Boarding House, Narayan Singh, Ram Karan and Lehri being already there. They commenced talking with the Sadhu and when the latter, at their request, consented to take milk, it was prepared in a room different from the one in which the Sadhu was accommodated Here Kesri Singh himself came and mixed some poison (from a phial) in milk before Lehri and Hiralal, and asked Hiralal to take the cup of milk to the Sadhu for drinking. Hiralal declined to comply saying that his hand might shake and milk might be spilt. Thereupon the task was assigned to Lehri, who brought the milk to the Sadhu and the latter drank it. After this, dinner, which was prepared at Kesri Singh’s house, was served to the Sadhu. But when the poison did not appear to have any effect on the Sadhu, it was proposed to give him a further dose. After some time, however, it was noticed that the Sadhu felt uneasy, vomitted and purged, and was quite restless, On the 3rd day, the, 25th June 1912, when at about midday his condition grew Worse, the accused after a consultation among themselves sent for Doctor Gurdatta, who came to Kesri Singh’s house and proceeded in company with Kesri Singh, Narayan Singh and Ram Karan to the Boarding House to see the patient. The doctor had hardly reached the house when Narayan Singh going a little ahead and seeing what had happened in the house returned, and informed the party that the guest was dead. On this the doctor returned to his house and then Kesri Singh and others locked the Boarding House, and came back to Kesri Singh’s house. After a while Kesri Singh, at his own house, told, Luchmilal “what a misfortune has befallen. Lehri has disappeared after murdering the, Babaji and left the door of the house open; go and ascertain if the police has got any scent of the matter” and. added” you and Hiralal come to the Boarding House in the evening.”

Accordingly Luchmilal and Hiralal went to the Boarding House at sunset where they found Ram Karan and Narayan Singh present, Kesri Singh arriving a little later, Then they brought down the corpse of the Sadhu from the upper story, where it was lying, to the ground floor, and placed it in a pit already dug in the small room below the stairs and covered it with earth. A few days after lime was stored in this room. After a lapse of 5 or 6 months, when presumably Ram Karan gave a hint from Jodhpur that he was being prosecuted for kidnapping Pyare Ram, it was decided that the corpse be removed from the Boarding House. At that time the marriage of Kesri Singh’s daughter was being celebrated and the Boarding House was full of boarders, as the school had opened. So on the 8th of December 1912 a picnic (got) was given by Kesri Singh to the boarders at a distant place called Kanwas, and when the boarders and the then Superintendent, Bir Purushottamsingh, had gone to that picnic, and the Boarding House was left lonely, Pandit Vishnudutt (now a convict in the Arrah murder case), Partab Singh, son, and Zorawar Singh, brotherof Kesri Singh, and Luchmilal went to the Boarding House, exhumed the corpse, hacked it into pieces, put the pieces along with lime into gunny bags, then sewed the bags and removed them from that place.

So that the following seven persons appear to have participated in this murder:

(1) Kesri Singh, (2) Zorawar Singh, (3) Narayan Singh, (4) Ram Karan, (5) Luchmilal, (6) Lehri and (7) Hiralal. Before, however, the Police investigation Was commenced, Narayan Singh, the Superintendent of the Kotah Boarding House, had died, and Zorawar Singh, who is also one of the accused in the Arrah murder case, absconded, The offence being a heinous One and two years old it was deemed advisable to offer pardon to the two accused Ram Karan and Luchmilal, and make them approvers or witnesses on behalf of the Darbar. The case was accordingly conducted against three of the accused only, viz. , Kesri Singh, Lehri and Hiralal.

किशनगढ के महाराजा भी क्रांतिदल में

केसरी सिंह बारहठ राजपूतों में क्रांतिकारी भावना फैलाने के प्रयत्न में लगे हुए थे। उन्होंने किशनगढ़ के नाबालिग राजा मानसिंह के शिक्षक पण्डित जगदीश को क्रांतिदल का सदस्य बनाया और इनके असर से मानसिंह भी इस दल में शामिल हो गये।

श्री केसरी सिंह बारहठ की पैरवी में नज़्म यों पढ़ी गई

श्री केसरी सिंह बारहठ की हत्या के मामले में पैरवी सुप्रसिद्ध बैरिस्टर नवाब हामिद अली साहब ने की। वे श्री केसरी सिंह बारहठ की देशभक्ति, व्यक्तित्व और क्रांतिकारी आंदोलन में योगदान से अत्यधिक प्रभावित थे। श्री खान ने २ सितम्बर १९१४ को विशिष्ट अतिरिक्त सैशन्स न्याधीश कोटा श्री श्रीराम भार्गव के समक्ष अपनी बहस मे श्री केसरी सिंह के देशहित में किये गये त्याग और बलिदान की प्रशंसा करते हुये नज्म यों पढ़ी-

यह इरशादे अदालत है उठो तुम बहस को हामिद,
निगाहें मुल्जिमों की भी मगर कुछ तुमसे कहती है।
अदब से यह गुजारिश है हुजूर अब गौर से दम भर,
इधर देखें कि लफ्जे खून होकर दिल से बहती हैं।
लहू का एक दरिया जो न देखा जायेगा हरगिज,
बहेगा इस जमीं पर खूबियां जिस जां पे रहती हैं।
इसी इजलास में याने कहेंगे किस्सा मुल्जिम का,
वो मुल्जिम शायरे यक्ता सबायें जिसको कहती हैं।
वो मुल्जिम उम्र जिसकी देश की खिदमत में गुजरी है,
वो मुल्जिम पानी होकर हड्डियां अब जिसकी बहती हैं।
वह मुल्जिम बराबर कैद जिसका हिरासत है,
बदन में हड्डियां जितनी हैं, सब तकलीफें सहती हैं।
वो मुल्जिम केसरी जो जानी-दिल से देश का हामी,
वो जिसकी खूबियां अखलाक का दम भरती रहती हैं।
बहुत शोहरत सुनी है आपके इन्साफ की हमने,
अदालते गुस्तरी की नदियां हर सिम्त बहती हैं।
महाराजा के साये में यही नायब रहे हामिद,
रियासत की भलाई हो दुआयें हक़ से कहती हैं।


श्री केसरी सिंह बारहठ की जागीर जब्त करने का आदेश

श्री केसरी सिंह बारहठ के स्वतंत्रता आंदोलन में एक क्रांतिकारी के रूप में सम्मिलित होने एवं अंग्रेज सरकार द्वारा उनको गिरफ्तार कर एवं बंदी बनाकर कोटा में विशिष्ट न्यायालय गठित कर मुकदमा चलाया गया। उक्त मुकदमे में श्री केसरी सिंह बारहठ को आजीवन कारावास (२० वर्ष) की सजा से दण्डित किया गया और उन्हें हजारी बाग जैल में बंदी बनाया गया।

अंग्रेजों के दबाव में शाहपुरा के महाराजा राजाधिराज श्री नाहर सिंह जी ने श्री केसरी सिंह बारहठ की शाहपुरा रियासत में स्थित जागीर को जब्त करने का निम्नांकित आदेश पारित किया-

“During the year Baret Kesari Singh, a Charan Muafidar & Polpat of Shahpura who was implicated in the case of the murder of a Sadhu at Kota. Was found guilty of the offence & sentenced to 20 year’s imprisonment by the Kota Darbar. The culprit being the holder of a chariatable grant in Shahpura, the Rajadhiraj thought that a person who was capable of committing such an heinous offence elsewhere thereby bringing on the Cheifship where-in he enjoyed the grant, was no longer fit to hold any land is Shahpura. In the circumastance the Rajadhiraj considered it his duty to out off the connections of the culprit with the Chiefship by permanently confiscating his Muafi Jagir (Khera Baret) in accordance with the recognisation outstom prevaling in the Chiefshif.”

(संदर्भ : शाहपुरा काल सौरभ : शाह मनोहर सिंह डांगी)

 


कोटा दरबार ने की श्री केसरी सिंह बारहठ को अंडमान द्वीप के कारागृह में भेजने की मांग

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री केसरी सिंह बारहठ और उनके दो साथियों लहरी व रामकरण को अंडमान द्वीप के कारागृह में बंदी बनाने की मांग अंग्रेज सरकार से पत्र लिखकर की। राष्ट्रीय अभिलेखागार, भारत सरकार नई दिल्ली में इस आशय के उल्लेख का पत्र उपलब्ध है-

“No. 755/453,
Maunt Abu, dated the 12th March 1915
From: The Honourable Sir Elliot Colvin, K. C. S. I. , Agent to the Governor General in Rajasthan.
To: The Secretary to the Government of India in the Foreign and Political Department.The Kotah Darbar have applied the prisoners Kesri Singh, ShantBhanu Lehri and Ram Karan, whose nominal and descriptive rolls together with copies of translations of such portions of the judgement in each case are required to indicate the nature of the crime committed are attached and who have been sentenced to life imprisonment by the Kotah Criminal Court under section 302 of the Indian Penal Code, may be transported to the Andaman Islands. The Darbar are willing to meet the cost of their deportation and their maintenance charges at the Andamans.I have the honour to recommend that the exercise of the power conferred by section 15 of the Prisoners Act. III of 1900 the Darbar’s proposal may be sanctioned.”

अंग्रेज सरकार ने कोटा दरबार की उस मांग को यह लिखकर ठुकरा दिया कि केसरी सिंह की आयु ४२ वर्ष है और केवल ४० वर्ष की आयु तक के सजायाफ्ताओं को ही अंडमान के कारागृह में भेजा जा सकता है। राष्ट्रीय अभिलेखागार नई दिल्ली में उपलब्ध अंग्रेज शासन के अवर सचिव का पत्र दिनांक ९ जून १९१५ पाठकों के पठनार्थ प्रस्तुत है-

“No. 172,
Port Blair, dated the 9th June 1915.
From: W. Booth-Gravelt, Esq. Under Secretary to the Government of India, Home Department.
To: The Hon’ble the Agent to the Governor General in Rajasthan.In reply to your letter No. 755-453, date 12th March 1915, addressed to the Foreign and Political Department I am directed to say that, in exercise of the power conferred by section 15 of the Prisoners Act 1990 (III of 1900) the Governor General in Council sanctions the deportation to the Andamans of convicts Shant Bhanu Lehri and Ram Karan who have been sentenced by the Kotah Criminal Court to imprisonment for life under section 302 of the Indian Penal Code, provided that they are on medical examination certified to be fit for transportation under the rules laid down by the Government of India. Convict Kesri Singh is unfit for transportation as he has passed the limit of age, forty years up to which prisoners may be sent to the Andmans.The cost of the deportaion to and maintenance in the Andmans of the convicts in question will be borne by the Kotah State.”
सुवर्णभूषण और बेड़ियों में कोई अंतर नहीं

अंग्रेज सरकार के आदेश से पुलिस ने श्री केसरी सिंह बारहठ को गिरफ्तार कर पांवों में बेड़ियां डाल दी थी। उक्त बेड़ियों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये आपने फरमाया था-

“किसी समय पांव में सुवर्णभूषण थे और आज जबकि पैरों में बेड़ियां हैं तो मुझे स्थितियों में कोई अंतर दिखाई नहीं देता, जो केसरी सिंह तब था वही आज भी है।”

परलोक में आपका सहचर रह सकने की योग्यता प्राप्त कर रहा हूं: अर्जुन लाल सेठी

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी क्रांतिकारी श्री अर्जुनलाल जी सेठी केसरी सिंह जी बारहठ के अनुयायी थे। सेठी जी के पुत्र प्रकाश के असामयिक निधन पर बारहठ जी द्वारा लिखे पत्र का उत्तर देते हुये श्री सेठी जी ने दिनांक २५ मई १९२४ को लिखा कि-

“जिन वीर आत्माओं की जुदाई के दाग इस दिले सौजां में निरंतर शोला उठाते रहे हैं वे भव्य जीव आज मौजूद होते तो एक प्रकाश क्या हजार प्रकाश के पार्थक्य के सर लगने पर भी मुझे लेश ख्याल नहीं होता, परंतु उन्हीं की स्मृति में एक छोटी सी मूर्ति बनाते-बनाते ही छीन ली गई तो अब कार्य कर्तव्य क्या बाकी रहा है ? राजनैतिक क्षेत्र में कोई साथी नहीं, जिधर देखता हूं उधर काले ही काले बादल हैं। खैर, आपकी और इस अभागे सेठी की दशा, गति एक ही रही और रहेगी। परलोक में भी आपका सहचर रह सकू इसके लिये योग्यता प्राप्त कर रहा हूं। ईश्वर वहां तो अकेला न रखेगा, यह मोह तो इरादे से रख ही लेता हूं।

हम आप जल बुझे मगर इस दिल की आग को सीने में ‘जौक’ हमने न पाया बुझा हुआ।”

आपका सहचर पुजारी
सेठी

 


राजपूताना व मध्यभारत को मिला कर अजमेर का स्वतंत्र प्रांत राजस्थान बना देना चाहिये

श्री बी. जे. पटेल के नाम पत्र

सेवा में,

श्री बिट्ठल जे भाई पटेल महाशय,
मंत्री आल इण्डिया कांग्रेस कमेटी, बम्बई।

प्रिय महाशय,

कलकत्ता स्पेशल कांग्रेस से लौटते ही अर्श के रोग से मैं बहुत ही व्यथित हो गया। अभी तक मेरी हालत ऐसी नहीं कि मैं अपने सम्पूर्ण विचार विस्तृत रूप से आपके सम्मुख रख सकूं। तथापि विषय की गम्भीरता व आवश्यकता ने मझे विवश किया है कि मैं अपने विचारों का अत्यावश्यक भाग, संक्षेप में ही क्यों न हो आपके सामने अवश्य रखू, अतएव सबसे प्रथम-

1. आप लोगों-कांग्रेस सब-कमेटी के नेताओं ने देशी राज्यों की प्रजा को कांग्रेस में स्थान देना स्थिर कर उसकी अखिल भारतवर्षीयता को सार्थक किया है तदर्थ, राजपूताना व मध्य भारत के लोगों की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूं।

2. यह काम, जो इसकी महत्ता और आवश्यकता को देखते हुए बहुत पहले होना चाहिये था, बहुत देर से हुआ है। खैर, गया वक्त फिर हाथ नहीं आता, परंतु हमें यह विश्वास जरूर था कि देर आयद दुरस्त आयद। किंतु खेद है कि ऐसा नहीं हुआ।

3. कांग्रेस सब-कमेटी ने देश के जो प्रांत बनाये हैं उनमें अजमेर और दिल्ली का एक ही प्रांत बनाकर गवर्नमेंट का अनुसरण क्यों किया गया? मेरी सम्मति में-
(क) राजपूताना व मध्य भारत को मिलाकर अजमेर का एक स्वतंत्र प्रांत बना देना चाहिये जिसका नाम ‘राजस्थान’ हो।

(ख) और दिल्ली पंजाब में मिला दिया जाना चाहिये।

4. कांग्रेस कमेटी ने जो प्रांत रचना की है उसमें देशी राज्यों को शामिल तो कर लिया गया, उन्हें भी प्रति लक्ष की एक प्रतिनिधि भेजने का अधिकार दे दिया गया है, परंतु उसने जिन-जिन प्रांतों से जितने-जितने प्रतिनिधि आल इण्डिया कांग्रेस कमेटी में लेना स्थिर किया उस समय मालूम होता है, वह देशी राज्यों की जनता को भूल ही गई। अन्यथा कोई कारण नहीं दिखता कि पहले के समान ही अब भी अजमेर व दिल्ली को तीन ही प्रतिनिधि आल इण्डिया कांग्रेस कमेटी में भेजने का अधिकार दिया जाता, जबकि राजपूताना व मध्य भारत के समस्त देशी राज्यों की प्रजा का प्रचण्ड जन समूह भी अजमेर में ही समाविष्ट कर लिया गया।

(क) इसलिये आवश्यक तो यह है कि प्रत्येक देशी राज्य की ओर से कम से कम एक प्रतिनिधि आल इंडिया कांग्रेस कमेटी में रहे, परंतु जब तक ऐसा न हो तब तक, कम से कम पचास प्रतिनिधि समस्त देशी राज्यों की ओर से आल इण्डिया कांग्रेस कमेटी में रहे।

(ख) और इस हिसाब से राजपूताना व मध्य भारत के देशी राज्यों की ओर से एक एक प्रतिनिधि आने की जब तक सुव्यवस्था न हो तब तक राजपूताना व मध्यभारत की सब रियासतों की ओर से ‘राजपूताना मध्यभारत सभा’ और मनोनीत पन्द्रह प्रतिनिधि आल इण्डिया कांग्रेस कमेटी में अवश्य मिल जाये।

5. संक्षेप में कांग्रेस कमेटी रिपोर्ट में, इस समय परिवर्तन करवाने के लिये देशी राज्यों के संबंध में, मेरे विचार का अत्यावश्यक भाग यही है। मेरे विचार से यदि इस प्रकार भी कांग्रेस सब-कमेटी की रिपोर्ट में सुधार नहीं किया गया तो देशी राज्यों की प्रजा को कांग्रेस में प्रतिनिधित्व देने का कोई अर्थ ही नहीं होगा।

ईश्वर ने चाहा और आप लोगों ने अवसर दिया तो कांग्रेस होने तक, कम से कम नागपुर कांग्रेस में शरीक होने योग्य स्वास्थ्य लाभ करके, मैं इस विषय में अपने जीवन के अनुभव सहित अपनी सम्मति विशद और विस्तृत रूप से आप लोगों के सम्मुख रखूंगा। आशा है देशी राज्यों की प्रजा को अपने समकक्ष बनाने के सद्धेतु से कांग्रेस सब कमेटी की रिपोर्ट में कम से कम उपरोक्त सुधार करवाने के लिये आप अवश्य सहमत होकर सहायक होंगे।

भवदीय
ठाकुर केसरी सिंह

‘राजस्थान केसरी’ कार्यालय
वर्धा, सी. पी.
ता. १६. ११. १९२०


राजा और प्रजा दो पहियों के प्रबलचक्र

श्रीमान सम्मानीय एजेन्ट टू दी गवर्नर जनरल
राजपूताना की सेवामें

मान्यवर,

राजपूताने के बाहर और अन्दर की वर्तमान सार्वजनिक परिस्थिति ने मुझे यह दृढ़ विश्वास दिलाया है कि प्रत्येक देशी राज्य के लिए अपनी प्रचलित शासन शैली में समयानुकूल और उचित संशोधन करने का समय आ चुका है, इतना ही नहीं, बल्कि इस समय का लाभ न लिया गया तो आगे जाकर नरेशों के लिए एक पश्चाताप मय स्मृति रह जायेगी। अतः जो उनका हितैषी है उसे स्पष्ट कहना चाहिए कि जिस प्रजा से राज शासन का नित्य और प्रत्यक्ष संबंध है वह प्रजा उस शासन से अब अछूत नहीं रहना चाहती, उसकी इस यातना को वर्तमान काल बड़े वेग से आगे धकेल रहा है।

प्रजा की सुख शांति और मन की सर्वथा अवहेलना करते हुए केवल मौखिक सहानुभूति या दमन की नीति की सफलता की आशा पर स्वेच्छाचार को कुछ दिन अधिक जीवित रखने की चेष्टा करना जिसका कथन ही दुःखद है, ऐसे आंतरिक कलह को निमंत्रण देना है।

अपना दोष स्वीकार करना उच्च कोटि का नैतिक बल है, अतः सत्य के लिए मान लेना होगा कि कोई राज्य ऐसा नहीं है जिसकी वर्तमान शासन शैली में पूर्ण नियमबद्धता, पूर्ण स्थितरता और लोक हितैषिणी हो। प्रजा केवल पैसा ढालने की प्यारी मशीन है और शासन उन पैसों को उठा लेने का यंत्र है। राज्य कोष की आमदनी प्रतिदिन कैसे बढ़े, यही एक शासन का मूल मंत्र हो रहा है, न्याय और सुख शांति के महकमे तक भी उक्त मूल मंत्र ही के शोषक अंग हो रहे हैं। इसीलिए वे अपनी वास्तविक उपयोगिता में निस्सार है। राज्यों की आर्थिक नीति और स्थिति विकृत और विकट मार्ग पर है। ऐसी एक-पक्षी शासन शैली के परिणाम से नरेश की इच्छा न होते हुए भी प्रजा का पीड़न अनिवार्य ही है।

यह कदम ठीक है कि यह शैली नई नहीं, परंतु इसका ज्ञान नया है। जब तक गवर्नमेंट ने राज्यों की आंतरिक व्यवस्था के निरीक्षण में अपना उत्तरदायित्व समझा तब तक इस शासन के ऊपर एक प्रकार का बलिष्ठ नियम न था और साथ ही न्याय और शांति की पक्षपातिनी सरकार स्वहित से भिन्न अच्छे जज का काम देती रही, इसी से इस शासन शैली की बेहूदगियों से प्रजा का बहुत कुछ बचाव होता रहा। इसी से इसकी असली भयंकरता प्रजा के सामने इतनी न आ सकी। परंतु ज्यों ही गवर्नमेंट ने निज नीति वश अपना हस्तक्षेप उठा लिया, परदा उठ गया, तब मालूम पडा कि वास्तव में प्रजा अपने प्रिय राज-सिंहासन से बहुत दूर जा पड़ी है और दोनों का रूख दो भिन्न दिशाओं में हो चुका है।

शासन-शैली न पुरानी ही रही, न पूर्ण जीवन ही बनी, न वैसी एकाधिपत्य सत्ता ही रही, न पूरी ब्यूरोक्रेसी ही बनी, न सर्वथा अनियमित रही, न कानून (नियमबद्ध) ही बनी, जागीरदार लोग राज्य को अपना भक्षक जानकर मन ही मन झुलस रहे हैं। न वह सनातन राजभक्ति है, न वह विश्वास ही, सर्वत्र अविश्वास, स्वार्थ और हिंसावृति का राज्य है, जो लोग ऊपर ऊपर से शांति का दृश्य दिखलाने की चेष्टा कर रहे हैं और उसमें अपने आपको सफल मान रहे हैं, वे स्वयं धोखे में हैं। अग्नि को चादर से ढंकना भ्रम है-खेल है या छल है। मेरी आत्मा यही साक्षी देती है। ईश्वर यदि उसे असत्य सिद्ध करे तो मैं परम सुखी होऊंगा, परंतु अभी तक तो अनुभव से यही साक्षी मिलती है कि देशी राज्यों की प्रजा-अशिक्षित रखी हुई प्रजा केवल पशुबल को ही समझने वाली प्रजा दरिद्र होते हुए भी निर्दयता से निचोड़ी जाती हुई प्रजा, असहाय प्रजा, धीरे-धीरे अपना संयम खो रही है। जो कोई भी उसके उद्धार के नाम से क्रांति का तख्ता उसके सामने रख देता है उसी पर पैर रख देने के लिए तैयार हो जाती है। उसे लवलेश अनुभव नहीं, वह नहीं जान सकती कि कहीं इस नए तख्ते के नीचे इतना भयंकर खड्डा छिपा हुआ हो कि तख्त उलटते ही उसे हजारों हाथ नीचे ले जायेगा।

जब शासन ही अनियंत्रित हो तो अबोध प्रजा में नियमानुकूल कार्य करने की भावना हो ही कैसे सकती है? ऐसी दशा में व्यर्थ सतायी जाती हुई प्रजा में स्वेच्छाचारित की उदण्ड भावना जाग उठे तो कोई आश्चर्य नहीं। इसके साथ ही इस विकट परिस्थिति का लाभ उठाने के लिए उस अबोध और अनुभव रहित प्रजा के साथ खेलने के लिए अनेक अनुत्तरदायी धनियों को कूद पड़ने का प्रलोभन हो जाये तो भी आश्चर्य नहीं। इस मत का परिणाम क्या होगा? समझ में नहीं आता कि जहां अशांति, अविश्वास और अव्यवस्था दबी हुई ज्वालामुखी के समान गड़गड़ा रही हो, उन राज्यों में केवल एक राजा और उसके मुट्ठी भर वेतन भोगी सलाहकारों के आधार पर सरकार अपनी मैत्री का भार रखकर कैसे निश्चिंत हो सकती है।

मुझे विश्वास है कि मैंने अपने प्रत्यक्ष अनुभव के अनुसार जो देश की सच्ची दशा बहुत ही संक्षेप में लिखी है, वह आप से छिपी नहीं होगी क्योंकि आप इस प्रान्त के सर्वोच्च अधिकारी हैं। परंतु मैं देखता हूं कि इस रोग का असली इलाज अभी तक प्रारम्भ नहीं हुआ। वास्तव में मैं उसी को इलाज मानता हूं कि जिसमें नरेशों की प्रतिष्ठा और सत्ता बनी रहे, जागीरदारों को विश्वास हो जाये कि ऊपर से राजा और नीचे से प्रजा इन दो पहियों के प्रबल चक्र के बीच में रहते हुए भी उनके अस्तित्व और उचित अधिकारों का नाश नहीं होगा, प्रजा को निश्चय हो जाये कि हमारी सुख-शांति अटल रहेगी, न्याय का द्वार सबके लिए समान खुला रहेगा। मनुष्य मात्र के लिए जो अधिकार आवश्यक हैं, वे हमसे नहीं छीने जायेंगे। हमारे साथ पशुवत व्यवहार नहीं होगा, हम अपनी कमाई का और राज्य में सौंपी हुई अपनी थाती पूंजी का उपभोग ठीक-ठीक कर सकेंगे, सरकार को विश्वास हो जाये कि राज्यों में केवल राजा ही नहीं परंतु वहां की प्रजा भी हमारी मैत्री की कदर करती है और सच्चे दिल से राजभक्त है।

मैं इस इलाज की पहली और प्रधान दवा समझता हूं ‘सहयोग’ राजा, जागीरदार और प्रजा का पारस्परिक स्नेह और विश्वास पूर्वक व्यवहारिक और प्रत्यक्ष सहयोग संबद्ध समष्टि रूप राज्य का गवर्नमेंट के साथ सहयोगपूर्वक मैत्री पालन, बस। परंतु यह तब ही हो सकता है जबकि प्रजा के साथ सहयोग करने की आवश्यकता को सरकार और नरेश स्वीकार करे। स्वीकार का अर्थ है-स्थायी नीति की घोषणा द्वारा शासन में उचित परिवर्तन करना, परिवर्तन में प्रजा के प्रतिनिधियों की आवाज को स्थान देना, शासन की और राजा की अनुचित स्वेच्छाचारिता को रोकना।

राज्यों के सच्चे और ठोस हित के लिए एवं सरकार की व्यवहारिक पुष्टि के लिए प्रजा में सुलगती हुई भयंकर आग को समय पर बुझाने के लिए मैं उपरोक्त स्वीकृति को केवल उचित ही नहीं बल्कि परम आवश्यक समझता हूं।

माननीय! मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि मैं राजपूताने के राजा और प्रजा में पारस्परिक विश्वास, शांति, सुख और प्रेम देखने के लिए किसी से कम आतुर नहीं हूं,  अत: प्रत्येक सच्चे देशभक्त और राजभक्त के लिए उपरोक्त पवित्र लक्ष्य को जल्दी से जल्दी कार्य में परिणित करने का प्रधान कर्त्तव्य समझता हूं। आशा है, इस शुभ कार्य में अनेक योग्य व्यक्ति अपनी पूरी-पूरी शक्ति लगाने के लिए भी तैयार हो जायेंगे। स्वाधिकार की काल्पनिक उड़ान में अनुभवहीन प्रजा भी गुमराह होने से बच जायेगी और राज्यों की बुनियाद भी अधिक दृढ़ हो जायेगी।

मेरे उक्त अनुभव और विश्वास के साथ यदि आप महानुभाव सहमत हो सकते हों तो आपकी सहानुभूति जान लेने के बाद ही मैं पेश कर सकंगा कि कार्य का प्रारम्भ किस तरह से होना उचित होगा। केवल दिग्दर्शन के तौर पर मोटे रूप में एक स्कीम इसके साथ भेज देता हूं। परंतु इस पर से उठने वाले विशेष प्रश्नों पर यथावत् अपना विचार मैं तभी सामने रख सकता हूं जब कि खुद पुष्टि पाकर नरेशगण इस पर कुछ ध्यान देने को तैयार हो।

ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वह सब को सद्बुद्धि दे। मैंने अपना कर्तव्य किया है, अत: यदि आप मेरे विचारों को तुच्छ और अपेक्षा की दृष्टि से देखेंगे तो भी मुझे खेद नहीं होगा। इस बार मैंने यही उचित समझा कि मैं अपने विचार अपनी भाषा में ही प्रकट करूं। अंग्रेजी न जानने के कारण पहले भी जब-जब मैंने आपकी सेवा में अपने विचार दूसरों से लिखाये, तब-तब मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि मेरे विचार ठीक रूप में आपके सामने नहीं रखे जा सके और ऐसी दशा में गलतफहमी रह जाना स्वाभाविक है अत: हिन्दी में लिखने के साहस पर क्षमा करें।

अंत में एक बात और निवेदन करूंगा। मैं लीडरशिप के भूत से बहुत दूर भागता हूं क्योंकि मैं अपने में इतना गुण नहीं पाता। लीडर होना जितना सुगम हो गया है मैं उतना ही कांपता हूं। जो कुछ प्रार्थना की गई है उसका अर्थ यह कदाचित नहीं है कि मैं आगे बढ़ना चाहता हूं। अपने अंत:करण में मैंने जो कुछ अच्छा पाया वह निर्भय और नि:स्वार्थ से कह दिया। यदि आप स्वयं इस कार्य को हाथ में लें अथवा किसी दूसरे व्यक्ति के हाथ में सौंपे तो मैं बहुत ही प्रसन्न होऊंगा और अपनी ओर से किसी भी प्रकार के बदले की आशा छोड़कर अपनी शक्ति और सेवा समर्पण कर दूंगा। मैं नाम नहीं चाहता। केवल इसी लक्ष्य से कि मैं, सरकार और नरेशों की सहानुभूति से उनकी गरीब प्रजा की सच्ची सेवा कर सकूँ, आज तक किसी राजनैतिक आंदोलन में भाग लेने से दूर रहा हूं, परंतु मेरे हृदय को न जानकर केवल मेरे नाम से राजागण व्यर्थ ही चौंकते हैं। इसी से अपने विचार उनके सामने न रखकर आपके सामने रखने का साहस कर रहा हूं, क्योंकि आप ही पर इन राज्यों के हिता हित का भार है। किमधिकम्।

आपका विनीत शुभेच्छु
केसरी सिंह बारहठ

कोटा – अप्रेल, 1920

इस पत्र के साथ जो योजना भेजी गई थी वह यह है-

सूत्र रूप स्कीम-

राजस्थान महासभा

  1. भूस्वामि-प्रतिनिधि मण्डल।
    1. बड़े-छोटे उमराव
    2. जागीरदार
    3. माफीदार
  2. सार्वजनिक प्रतिनिधि परिषद।
    1. श्रमजीवी
    2. कृषक
    3. व्यापारी

उद्देश्य

(1) राजा और प्रजा में पारस्परिक सहयोग, प्रेम और शांति की स्थापना और रक्षा करना।

(2) राजस्थान अर्थात् भारत के देशी राज्यों में प्रजा के प्रति उत्तरदायी शासन पद्धति की स्थापना करवाना।

(3) नरेशों, भूस्वामी और सर्व साधारण जनता के न्यायतः प्राप्य अधिकारों की प्राप्ति और रक्षा करना अर्थात् सरकार हिन्द के मुकाबले में, नरेशों के मुकाबले में, भूस्वामी के मुकाबले में सर्व साधारण जनता के अधिकारों की रक्षा के लिये, न्याय और सत्य के आधार पर सब प्रकार के विधिवत प्रयत्नों द्वारा निर्बल पक्ष की सहायता करते हुए राज्य के प्रत्येक अंग में शांति और सुख की वृद्धि करना।

(4) राज्यों में धार्मिक, सामाजिक, नैतिक, आर्थिक, शारीरिक एवं लोक हितकारी शक्तियों के विकास के लिए सर्वांगीण चेष्टा करना।

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