बरसी काळी बादळी

बरसी काळी बादळी, हरसी धरा अनंत।
दरसी हरियल ओढणे, सुंदर सी गुणवंत॥
सुंदरसी गुणवंत, गोरडी सज धज बैठी।
आभा जेण अनंत, सरस नरपत मन पैठी।
हरियल भाखर तणी, कंचुकि धारण करसी।
धरती आभा पीव, काज जद बादळ बरसी॥

अंबर री अग्राज सह, कद झबकेला बीज।
मुरधर थारे देसडे,गया मानवी सीज॥
गया मानवी सीज, लूवां री लपटां चाले।
दाझे सब दुनियांण, पखेरु पंछी- माळे।
इन्दर औ अरदास, करो उपकार धरापर।
बरसो अनराधार, धरा उपर सूं अंबर॥

बरसे रे अब बादळी, तरस रह्यो मरुदेस।
सरस सुधा सरसावजे, इन्दर रे आदेश॥
इन्दर रे आदेश, राज थुं झिर मिर वरसे।
जाणक झडियां लाल-मोतीयां री अंबर से।
बूठां थारे राज, कृषक हिय मे घण हरखे ।
माने मारी वात, बादळी मुरधर बरसे॥

~~नरपत आसिया “वैतालिक”

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