बसो नित मो चित श्री हरि : छंद – मत्तगयंद

!!दोहा!!
नटनागर ! रसराज! हरि!, मुरलीधर! चितचोर!!
दामोदर! करिये दया, केशव! नंद-किशोर!

!!छंद – मत्तगयंद!!
मंजुल श्यामल गात मनोहर नाथ दयानिधि देव मुरारी !
है लकुटी कर ;पीत धरे पट कामरि ओपत सुंदर कारी!
गुंजन माल गले बिच सोहत मोर पखा युत पाग सु धारी!
केशव नंद किशोर! बसो नित मो चित श्री हरि रासबिहारी!! १

झांझ पखावज होत अवाज सखी ब्रज भीर भयी अति भारी!
बीन सितार मृदंग बजै रस राग बिहाग छयो चहुधा री!
मोहन तान मनोहर छेड़त, बांसुरिया धुनि हौ बलिहारी !
केशव नंद किशोर! बसो नित मो चित श्री हरि रासबिहारी!! २!!

धेनु चरावत माखन खावत वेणु बजावत है गिरधारी!
नाच नचावत मोद मनावत आन मिले जबही ब्रजनारी!
सांवरि सूरत मोहनि मूरत, जा पर मात जसोमति वारी!
केशव नंद किशोर! बसो नित मो चित श्री हरि रासबिहारी!! ३

ले मटकी जमना जलको ठिठकी ठिठकी निकसी पनिहारी!
रोक लई नटनागर राह उचार दई वनिता ब्रज गारी!
कंकर मार के फोरि दियो घट भीग गये अॅंगिया पट सारी!!
केशव नंद किशोर! बसो नित मो चित श्री हरि रासबिहारी!! ४

कारि घटा तन, बिजु छटा पट श्याम बलाहक की बलिहारी!
लाल गुलाल अबीर उछाल लिए ब्रजबाल रू ग्वाल सखा री!
डालत रंग सखि नंदलाल निहाल भई वृषभानु दुलारी!
केशव नंद किशोर! बसो नित मो चित श्री हरि रासबिहारी!! ५

एरि भटू इन नैन-निकुंजन, आन बसै जब गोधन चारी!
चैन नहीं चित को दिन रैन ;बसी छबि काजर सी कजरारी!
भूल गई गृह काज रु लाज, सखी लखि मोहन को बज्रनारी!
केशव नंद किशोर! बसो नित मो चित श्री हरि रासबिहारी!! ६

दीपक कंचन थार में बार के, संग भरी जमुना जल झारी!
झालर घंट नगाड बजै जयकार करै ब्रज के नर नारी!
संत मुनिन्द्र कविन्द्र खडै, पुनि आरति होय रही सुखकारी !
केशव नंद किशोर! बसो नित मो चित श्री हरि रासबिहारी!! ७

पीत पटी लकुटी बिसरै प्रभु, गुंजन माल मुरारि बिसारी!
धार दई पग पैजनिया, सिर ओढ लई मुरलीधर सारी!
जा छबि हेरि हॅंसै जगती विभु स्वांग धर्यौ वृषभानु दुलारी!
केशव नंद किशोर! बसो नित मो चित श्री हरि रासबिहारी!! ८

!!दोहा!!
केशव माधव रसिकवर, गोपालक दधिचोर!
नरपत को दो नाथ तुम, निज चरनन में ठौर!!

~~©नरपत आसिया “वैतालिक”

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