बीसहथ रा सौरठा – रामनाथ जी कविया

उभी कूंत उलाळ, भूखी तूं भैसा भखण।
पग सातवै पताळ, ब्रहमंड माथौ बीसहथ।।१
सौ भैसा हुड़ लाख, हेकण छाक अरोगियां।
पेट तणा तोई पाख, वाखां लागा बीसहथ।।२
थरहर अंबर थाय, धरहरती धूजै धरा,
पहरंता तव पाय, वागा नेवर बीसहथ।।३
पग डूलै दिगपाळ, हाल फाळ भूलै हसत।
पीड़ै नाग पताळ, बाघ चढै जद बीसहथ।।४
करनादे केई वार, मन मांही कीधो मतो।
हुकुम बिनां हिकवार, देसाणों दीठौ नहीं।।५
जिण दिन ओयण जाय, स्त्रवणै वाजा सांभलूं।
सो दिन धिन सुरराय, महि ऊगो मेहासधू।।६
दिन पलटै पलटै दुनी, पलटै सह परिवार।
मेहाई पलटौ मती, बाई थें उण वार।।७
करनी तूं केदार, करनी तूं बदरी कमल।
है देवी हरिद्वार, मथुरा तूं मेहासधू।।८
माता तूं मम्माय, पिता तुहीं परमेसरी,
सखा तुहीं सुरराय, बंधव तूं ही बीसहथ।।९
करनी तूं करतार, ओर न कोई आसरो।
सरणाई साधार, मोटो बळ मेहासधू।।१०
थळवट अळग थईह, कुळवट ब्रद भूली कियां।
करनी कठै गईह, मो बिरियां मेहा सधू।।११
देवी टाबरिया कहै, राज वड़ां आ रीत।
क्रोड गुनां छोरू करै, महर करै माईत।।१२
गंग जमन उलटी बहै, व्है गिर मेर गरक्क।
करनी ऊपर नह करै, ऊगै नहीं अरक्क।।१३
करनी कर काबोह, मढ मांही राखौ मनें।
अलगा सूं आबोह, बणै न किण विध बीसहथ।।१४
मौत छुरौ ऊर मेल, हुं पड़ियौ असमांन हूं।
झट थें लीधौ झेल, बीसां हाथां बीसहथ।।१५
आई कीजै ऊंदरा, मेहाई मढ मांय।
किणक चुगां कोठार री, पड़्या रहां पग छाय।।१६
देवी थारी दाय, राजी व्है ज्यूं राखजै।
मोटो सरणों माय, मैं लीन्हौ मेहा सधू।।१७
मोटै घर मग तोह, थगथगतो आवण थटूं।
पिसलै मो पग तोह, डग तोह राखै डोकरी।।१८

~~रामनाथ जी कविया

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *