प्राक्कथन-इतिहास एवं काव्य का मणिकांचन सुमेल: बीसहथी मां बिरवड़ी

राजस्थान जितना बहुरंगी है उतना ही विविधवर्णी यहां का काव्य है। जब हम यहां के पारम्परिक काव्य का अनुशीलन करते हैं तो शक्ति भक्ति से अनुप्राणित काव्यधारा हमारे सामने आती है। जैसा कि अन्य जगहों पर रामभक्ति काव्यधारा व कृष्णभक्ति काव्यधारा की सरस सलिला प्रवाहित होती हुई हम देखते हैं वहीं राजस्थान में इन दोनों धाराओं के साथ भक्ति की तीसरी धारा उसी बलवती वेग से प्रवाहित है, वो है देवी भक्ति काव्य धारा। क्योंकि राजस्थान में शक्ति पूजन की परम्परा युग-युगीन रही है। जिसका कारण स्पष्ट है कि धर्म व संस्कृति की रक्षार्थ अपने प्राण उत्सर्ग करने वाले शक्ति की प्रतीक दुर्गा के विभिन्न रूपों की उपासना करते रहे हैं। इन्हीं भावों को हृदयंगम कर यहाँ के कवियों ने विभिन्न ग्रंथों का प्रणयन कर अपने स्वाभाविक गुण वैशिष्ट्य का उदात्त परिचय दिया है।

सर्वविदित तथ्य है कि देवी शक्ति की प्रतीक रही है। जहाँ मरण महोत्सव की परंपरा रही हो, वहां के लोग दुर्गा को ही अपना आदर्श मानते रहे हैं। यही कारण हैं कि रणांगण में शौर्य प्रदर्शन कर जूंझने वाले योद्धा तो दैत्य संहार करने वाली रणचण्डी की झण्डी तले ही अपना जीवन सार्थक मानते रहे हैं। उन्होंने शक्ति की भक्ति में अनेक रचनाएं न केवल प्रणीत की हैं अपितु कर भी रहे हैं।

यहां यह उल्लेख करना समीचीन रहेगा कि राजस्थान में वैदिक देवियां, जैन देवियां, लोक देवियां के साथ ही सर्वाधिक रूप से चारण देवियां सम्पूजित रही हैं। इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं हैं कि समग्र राजस्थान में चारण देवियां किसी न किसी रूप में पूज्य ही नहीं रही अपितु इनकी मान्यता व्यापक स्तर पर भी रही हैं।

इन चारण देवियों के लिए ‘नवलख लोवड़याळ’ तथा ‘चौरासी चारणी’ का विरूद लोक प्रचलित है। चारण समाज में शक्ति अवतरण समय-समय पर होता रहा है। जोधपुर महाराजा मानसिंह के शब्दों में-

परम पवित्र पूजनीय प्रथीनाथन के,
प्राकृत पुराने परमार्थ के पत्र हैं।
मान मरूधीश के कहे दानवीर क्षत्रियन सो,
सजीवनी मंत्र जैसे सोह सर्वत्र हैं।
स्वामीभक्त सत्यवक्ता रू वचनसिद्ध,
देवियां व्है जाकौ द्वार दुहिता कलत्र हैं।
बिना पढ़े ही चारण वेद के उच्चारण सो,
चारण विवुध वरन चारन के छत्र हैं।।

चारण समाज में देवी अवतरण के गुण वैशिष्ट्य को रेखांकित करते हुए आधुनिक राजस्थानी कवि श्री हनुवंतसिंहजी देवड़ा ने भी सटीक लिखा है-

किण कुळ सूरां किण सती, ऐ दो गुणा जगत्त।
तिगुण गुणां कुळ चारणां, सूरां सती सगत्त।।

समग्र राजस्थान में चारण देवियों की जो सर्वग्राह्य मान्यता रही हैं उसके पीछे जो मुख्य कारण रहा है वो यह है कि इन देवियों ने सामाजिक सौहार्द्र, समरसता, बंधुत्व, एकता के साथ ही पर्यावरण संरक्षण का सुभग संदेश न केवल दिया अपितु अपने जीवन में भी ढाला। साथ ही विभिन्न शासक वर्गों का मार्गदर्शन करते हुए सुदृढ़ शासन व्यवस्था में महनीय व उल्लेखनीय अवदान देकर आदर्श भूमिका का निर्वहन भी किया था-

आवड़ तूठी भाटियां, गीगाई गोड़ांह।
श्री बिरवड़ सिसोदियां, करनी राठौड़ांह।।

जब हम मध्यकालीन राजस्थान के इतिहास का अवलोकन करते हैं तो उक्त दोहा ऐतिहासिक रूप से भी सटीक सिद्ध होता है। आवड़जी ने माड के शासक भाटियों को, बिरवड़ीजी ने चित्तौड़गढ़ के सिसोदियो को तथा करनीजी ने जांगलधरा तथा मारवाड़ के राठौड़ शासकों को सुदृढ़ शासन व्यवस्था स्थापित करने में अपनी वचनसिद्धता से मार्गदर्शन देकर उपकृत किया था। गीगाईजी ने गौड़ों को किस प्रकार उपकृत किया? यह अभी भी गवेष्य है।

यह सर्वविदित तथ्य है कि चारण देवियों के चारू चरित्र को निरूपित करते हुए अनेकानेक रचनाएं प्रकाशित-अप्रकाशित प्रसिद्ध हैं। इनमें अधिकतर रचनाएं आवड़जी, खोड़ियार, करनीजी, सैणीजी, देवलजी, नागबाई आदि से संबंधित तो है जबकि बिरवड़ीजी भी प्रसिद्ध चारण देवियों में सम्पूजित हैं। ‘करनीजी रा दूहा’ में बीकानेर महाराजा गजसिंहजी लिखते हैं-

राजबाई सैणीह, खोड़ी बिरवड़ खूबड़ी।
विघन हरण बाईह, न्यारी नह मेहासधू।।

लेकिन इनके निर्मल चरित्र को रेखांकित करती हुई रचनाएँ बहुत कम मात्रा में उपलब्ध होती हैं।
बिरवड़ी जी की उपलब्ध रचनाओं में सबसे प्रसिद्ध रचना कानूजी रचित है | इस रचना का भक्तजन पावन प्रभात में नित्य पाठ कर अपनी जिह्वा को धन्य करते है।

कानूजी कौन थे? यह अभी गवेष्य है। कुछ विद्वान इन्हें गूंद जाति का चारण मानते हैं तो कुछ मोतीसर जाति के प्रसिद्ध कवि कानूजी माड़वा। राजस्थान राज्य अभिलेखागार, बीकानेर में किशोरदान जी बारहठ (लोळावास) द्वारा संग्रहित की गई तीन प्रतियों तथा अभय जैन ग्रंथालय, बीकानेर की एक प्रति में उक्त छंद के रचयिता कानूजी मोतीसर (माड़वा) को बताया गया है।
वस्तुत: यह बात ठीक भी लगती है क्योंकि कानूजी मोतीसर भक्त कवि थे और उन्होंने ‘सूरजदेव रा छंद’, ‘अवतारां रा छंद’, ‘जळंधरनाथजी रा छंद’ जिस भावभूमि को ग्राह्य कर प्रणीत किए हैं उसी भावधारा को प्रतिबिंबित करता हुआ यह ‘बिरवड़ीजी रा छंद’ नामक रचना भी है। उन्होंने अपने एक छप्पय में लिखा है-

जाचै की जाचकां, जाच राजा जगपत्ती।
दीनै रो की दिए? आप ना होय त्रिपत्ती।
नरपत सुरपत नाग, राव राजा भिखियारी।
लख चौरासी जूण, एक दातार मुरारी।
जाचै तो जाच जनारजन, (जकौ) वेद पुराणां वाचिये।
कानिया जाच किरतार नै, जाचक रो की जाचिये?

कानूजी ने निस्वार्थ भाव से उदात्त घोषित मनीषी-मनीस्विनियों की कमनीय कीर्ति कर अपनी वाणी को धन्य किया है। अतःलोकमानस में बिरवड़ीजी को ‘अन्नपूर्णा’ की संज्ञा से अभिहित किया गया है। किसी कवि ने लिखा है-

बिरवड़ दैवण बाळ, देवी अन्नदीधां तणौ।
पुणिये सगत सुगाळ, बिरद तमीणो बिरवड़ी।।
पैली करूं प्रभात, चिरजा चाडाळू तणी।
भल जीमाया भात, वळां संपूरण बिरवड़ी।।

यही बात आधुनिक डिंगळ कवि डॉ. शक्तिदानजी कविया लिखते है-

प्रात सुजस जिणरौ पढ़ै, माघण साचै मन्न।
अन्नपूरणा ईसरी, (तन्नै) धिन्न बिरवड़ी धिन्न।।

जो देवी अन्नपूर्णा हो वो वस्तुत: देने वाले ही होती है और उनके आराधक उन्हें अद्वितीय मानकर लिखते भी है-

देवै तूं देवीह, निजराणो लेवै नहीं।
जोगण तूं, जेवीह, व्रन में हुई न बिरवड़ी।।

चारण कुलोत्पन्न देवियों में ‘चौरासी चारणी’ का विरूद बहुत प्रसिद्ध है। इन चौरासी को आद्यशक्ति का अवतार माना जाता है तथा इनकी मान्यता सर्व समाजों में व्यापक स्तर पर है | इनमें आवड़जी,
देवलजी, खूबड़जी, सैणीजी, करनीजी, नागबाई, कामेही आदि के साथ बिरवड़ीजी भी अग्रगण्य है | हिंगलाजदानजी कविया के में-

आओ मां आवड़ा, बैचरा आओ बाई।
ले हरोळ लांगड़ो, खड़ो मामड़ चखड़ाई।
चाहण बाहण चढ़ो, धाव चाचाई धावो।
सीमी गूंगी संग, उभै बचाई आओ।
सांभळो साद मेहासधू, करनादे ऊपर करो।
श्री महमाय इन्दर सकति, व्है सहाय संकट हरो।।

जब बिरवड़ीजी का परिचय प्राप्त करते हैं तो हमें विभिन्न विद्वानों का काव्य व पुस्तकें खंगालनी पड़ती हैं क्योंकि इनका परिचय सर्व सुलभ नहीं है। गुजराती विद्वान पिंगलसी परवतजी पायक ने चारण देवियों के निर्मल चरित्र को सर्वजन हेतु सुलभ कराने की मंशा से ‘मातृदर्शन’ नामक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में दो बिरवड़ीजी का लेखक ने उल्लेख किया है। दोनों का ही कुल, जन्म स्थान, पिता का नाम आदि बातें समरूपेण है जबकि जन्म समय दोनों का भिन्न है। राजस्थानी विद्वान बिरवड़ीजी का एक ही अवतार मानते है और सभी विद्वानों में मतैक्य भी है। अत: यहाँ इस बहस में नहीं जाकर हम भी एक ही बिरवड़ीजी की बात मानकर उनका जीवन चरित्र जानने की कोशिश करेंगे।

बिरवड़ीजी का जन्म खोड़ासर (गुजरात) में चखड़ोजी नरहा के घर हुआ था। किंवदंती है कि जन्म के साथ ही आपके मुख में बत्तीस दांत उपस्थित थे जिनमें एक दांत लोह सदृश था। जिनसे दाइयों के मन में डर बैठ गया और उन्होंने नवजात कन्या को बूरना (जमींदोज) श्रेयस्कर समझा। जब कन्या को बूरा गया उस समय चखड़ोजी घर पर नहीं थे। वे करीब एक माह बाद अपने गाँव आ रहे थे। जैसे ही गाँव के गौरवें में घुसे तो उन्होंने शुष्क रेत की एक ‘ढिगली’ और उस पर पीपली की प्रस्फुटित होती हुई कोंपले देखी। उन्हें आश्चर्य हुआ तब उन्होंने जिज्ञासावश उस रेत को खोदा तो देखा कि खड्डे में एक कन्या खेल रही है। उनकी संवेदना जाग उठी और वे उस कन्या को अपने घर लेकर आए। घर पर उन्हें विदित हुआ कि उक्त कन्या उन्हीं की संतति है। उन्होंने स्नेहवश उस कन्या का नाम बूरेवड़ी रखा | जो बाद में बूरोवड़ी/वरूड़ी/बिरवड़ी हो गया-

दांतां बत्तीसां सहत देवी, लियो दांत ज लोह रो।
देख दरसण डरी दायां, मेट तांतो मोह रो।
पख दोय बूरी रही पूरी, पिता वचनां परवड़ी।
नित वळा अन वळ दियण नरही, वळां पूरण विरवड़ी।।

नरहा कुल में जन्म लेने के कारण इन्हें ‘नरही’ नाम से भी जाना जाता है। किसी कवि ने लिखा है-

नरही थारो नाम, हरख करै नितप्रत लहां।
करण नवेविध काम, वरदाता तूं बिरवड़ी।।

बिरवड़ीजी के कितनी बहनें थी, इसका उल्लेख कम ही मिलता है लेकिन बिरवड़ीजी तथा शिवदेव/सहदेव नामक बहिन के साथ ही तोला नामक तीसरी बहिन का उल्लेख कविराजा दयालदासजी अपनी ख्यात में करते है।

इनकी शादी ध्रांगधरा के समीप खौड़ गाँव के भूयातजी देथा के साथ हुई थी। इस बात की पुष्टि मातृदर्शन’ के अलावा डिंगळ के प्रसिद्ध कवियों के काव्य से भी होती है। मानदानजी कविया (दीपपुरा) अपने एक गीत में लिखते है-

धन्य नरहां वंश धरियो, अम्बिका तन आय।
पात देथा घरै परण्यां, नेस खौड़े न्याय।
तो थिरथाय जी थिरथाय, थारी आसती थिर थाय।।

उनके कितनी संतति थी इसका कोई विशेष उल्लेख नहीं मिलता लेकिन बड़े बेटे बारूजी का नाम इतिहास में प्रसिद्ध है।
जब हम लोकविश्रुत इतिहास एवं डिंगळ काव्य को पढ़ते हैं तो बिरवड़ीजी के लोकहितैष्णा के कई कार्यों का उल्लेख सुनते और पढ़ते भी हैं।

किंवदंती है कि बचपन में बिरवड़ीजी और उनकी बहिन शिवदेव ने एक छोटी कुल्हड़ी में चावल बनाकर तथा पीपली के पत्तों को थालियों में परिवर्त्त कर जूनागढ़ के राव नवघण की समस्त सेना को भरपेट भोजन करवा दिया था। यही नहीं उन्होंने राव नवघण को कुछ अक्षत देकर कहा था कि “इन अक्षतों को जब वो उफनती नदी में डालेगा तो नदी स्वयं मार्ग दे देगी।”

उल्लेख्य है कि राव नवघण की मुँहबोली बहिन जाहिल अहरनी को सिंध के क्रूर सूमरा शासक ने उसके रूप लावण्य पर मुग्ध होकर बंदी बना रखा था। राव नवघण अपनी सेना सहित सिंध पर आक्रमण के उद्देश्य से जाते समय बिरवड़ी के नेस खोड़ासर में रुका थे। जहाँ बिरवड़ीजी ने उन्हें स्त्री-सम्मानार्थ लड़े जाने वाले युद्ध में विजयश्री वरण का वरदान दिया था। जो फलीभूत भी हुआ था।

छोटी चरवड़ी से सारी सेना को तृप्त करने की पुष्टि कानूजी मोतीसर ने इस प्रकार की है-

आध पाव ओरियो, राव नवघण नूतावै।
घोड़ा ग्रह ऊपरां, असंख फौजां खड़ै आवै।
पानां राळ पीपळी, थहै सोना री थाळी।
भांत-भांत भोजनां, बोहत परुसै वाळी।
नवलाख कटक नवघण तणो, कहो किसी विध सिग चड़ी।
बरवड़ी हाट कुबेर रो, कनां तिहाळी कुलहड़ी।।

किसी कवि ने लिखा है-

नीमतरियो नवलाख, कूलड़ियो हेके कटक।
सौभा चढ़ावण साख, वीसोतर नै बिरवड़ी।।

बीसवी सदी के श्रेष्ठ कवि मानदानजी कविया भी यही बात लिखते है-

कुल्हड़ी अणखूट कीधी,
पुरस लाखण पूत।
अन्नपूरण तूं भई अंबा,
नवघणां दळ नूत।
तो अदभूतजी अदभूत, इळ जस विसतर्यो अदभूत।।

यह बात चतरजी डीगरोळ अपनी एक चिरजा में लिखते है-

राजा नवघूण निवत राख्यो, जीमण कूलड़ी।
साहण बाहण साथ फौजां, लाख नौ चड़ी।
चारण वंश तारण अंबा, आप बिरवड़ी।
पीपळ पान तोड़ थाळ, सुब्रन रा घड़ी।
भांत-भांत भोजन कीधा, जिमाया उण घड़ी।
चारण वंश तारण अंबा, आप बिरवड़ी।।

इस संबंध में कतिपय कवियों की कुछ पंक्तियाँ आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत करनी समीचीन समझता हूं-

घोड़ा ग्रह घोड़ेह, नीवतियो नवघण तणो।
ऊठी आखाड़ैह, ब्रह्मंड लागी बिरवड़ी।।
~~अज्ञात

वे पख भोम रही मंझ बूरिय, आसत पूरिय जाहर जाणी।
बाल समै कुलड़ी रंधि तंदुल, नौघण को दळ न्यौत जिमाणी|
राण हमीर अभै वर देकर, धिन्न थिरू गढ़ राज थपांणी।
मान भणै ब्रिवड़ी विपदा हणि, चेत इसा व्रिद तूं चखड़ाणी।।
~~मानदानजी कविया दीपपुरा

रमंती बाळक रूप राणी, चरू चाचर चाड़िया।
नवलाख नवघण कटक निमत्रे, जिघन कर जीमाड़िया।
ताघियो ऊवह अतघ तारण, तास सत्तन तग्गए।
चारणी वडियां जेम चारण, जस्स करनी जग्गए।।
~~मेहाजी बीठू झिणकली

नवलाख निमंते चरवी पते, वे मंडळ वळराव।
अन्नपूर अगोचर आसत अच्छर, छाण ऊपर छाव।।
~~रामचन्द्रजी बाबरिया

जिण नवघण जीमाड़, चाड़ कुलड़ी सुचंगी।
ऐसी वळ आपवी, मनै नर जैसे मंगी।
नदी नीर नीठिया, पमंग लाखां नर पीतां।
ऊठी आखां नांख, वदै संसार वदीतां।
वरवड़ी चखड़ाई वडी, वळां दियण दुख वारणी।
समरजै दीह ऊगां सदा, चौरासी लख चारणी।।
~~अज्ञात

कहते है कि आपने अपने बचपन में ही हिंगलाज यात्रियों के समूहों को कई बार मिट्टी के दोने में खीर बनाकर जीमाया था। कवि कानूजी लिखते है-

कापड़ी लख जात कारण, ऐकठा व्है आविया।
दोहण एकण दूध सूं देवी, करै तिरपत पाविया।
सत धिनो बिरवड़ कळा सूरज, प्रसद्ध नवखंड परवड़ी।
नित वळां अन वळ दियण नरही, वळां पूरण विरवड़ी।।

राजस्थान से बिरवड़ी के संबंध चित्तौड़गढ़ के राणा हमीर प्रथम की द्वारिका यात्रा के साथ जुड़ते हैं।
राणा हमीर प्रथम राज्यच्युत होने पर न केवल अवसाद से घिर गए थे अपितु वे मानसिक, शारिरीक रूप से भी रोगग्रस्त हो गये थे। ऐसे में उन्होंने वापिस राज्य प्राप्त करने की इच्छा त्यागकर द्वारिका यात्रा के बाद स्वैच्छिक देह त्यागने का मानस बना लिया था। वे द्वारिका यात्रा के समय रात्रि विश्राम हेतु खौड़ गाँव में रुके। वहाँ उनसे बिरवडी के पुत्र बारू मिले। राणा हमीर ने उन्हें अपनी मनेच्छा बताई। तब बारू देथा ने कहा कि “आप द्वारिका में देह त्याग का विचार छोड़कर सुबह मेरी मां से मिले। ”
राणा हमीर ने ऐसा ही किया और अपनी मनेच्छा बिरवड़ीजी को दर्शाई। तब बिरवड़ीजी ने कहा कि “आपको यात्रा के बाद पुन: चित्तौड़ जाना चाहिए। आपको मैं न केवल पाँच सौ घोड़े दूंगी अपितु मेरा पुत्र बारू भी आपके साथ मेवाड़ चलेगा। आपको पुन: मेवाड़ प्राप्त होगी तथा यशोवर्धन भी होगा।”–

एळा चित्तौड़ सह घर आसी,
हूं थारा दोखिया हरूं।
जणणी दूजी कहू नह जायो,
कहवै देवी धीज धरूं।।
हे हमीर ! इतना दिलगीर होने की जरूरत नहीं है | तुम साहसी और वीर हो। मुझे तुम्हारे समान कोई दूसरा वीर निगाह नहीं आ रहा क्योंकि अन्य जननी ने तुम्हारी होड़ करने वाला पुत्र पैदा ही नहीं किया है। अतएव मैं तुम्हारे दुखों को हर लूंगी और पूरी मेवाड़ धरा तुम्हारे पास पुन: आएगी।

बिरवड़ीजी का कथन फलीभूत हुआ। कृतज्ञ हमीर ने अन्नपूर्णा के नाम से प्रसिद्ध बिरवड़ीजी का चित्तौड़ में मंदिर बनवाया। ‘चारण-कुल प्रकाश’ में कृष्णसिंह बारठ लिखते है- “महाराणा हमीरसिंह ने खोड़ ग्राम से माता बरवड़ी जी को चित्तौड़ बुलाई और उनके देहान्त होने के बाद उनके नाम पर मंदिर बनवाया, जो ‘अन्नपूर्णा’ नाम से प्रसिद्ध है क्योंकि बरवड़ी देवी का दूसरा नाम अन्नपूर्णा था।”

राणा हमीर ने बारू को अपना पोलपात बनाकर 12 गाँवों से आंतरी गाँव व करोड़ पसाव देकर सम्मानित किया था। इतना ही नहीं उन्होंने अपनी संतति को शपथ दिलई कि सौदों से सिसोदिया कभी विमुख न हों-

कोड़ पसाव देख जग कहियो,
अधपतियां दाखै आ ओद।
श्रीमुख शपथ करै अड़सीसुत,
सौदां नह बिरचै सिसोद।।

इन सब बातों के अलावा जब हम मध्यकालीन ख्यात साहित्य पढ़ते हैं तब हमें यह भी विदित होता है कि बिरवड़ीजी का पश्चिमी राजस्थान में पदार्पण हुआ था। अकाल के समय वे अपने मवेशी लेकर फलौदी इलाके में देवलजी मीसण के यहाँ ‘गोळ’ रही थी।

जब जींदराव खींची ने देवलजी से रुष्ट होकर उनकी गायों का हरण किया, उस समय बिरवड़ीजी की गायें भी उन गायों के साथ ही हरण हुई थी। ऐसा उल्लेख नैणसी, दयालदासजी सिंढायच, जैन कवि समुद्रसुरिजी आदि ने किया है। इन बातों का उल्लेख करूं, उससे पूर्व देवलजी मीसण का संक्षेप में परिचय देना समीचीन रहेगा।

देवलजी मीसण का जन्म अणदाजी मीसण के घर चौदहवीं सदी में हुआ था। राजस्थानी के कालजयी दोहाकार करमाणदजी मीसण इनके भाई थे। इनके पति का नाम ऊदाजी चारण मिलता है लेकिन इनके गौत्र तथा गाँव आदि का कोई उल्लेख उपलब्ध नहीं है। ‘पाबू प्रकाश’ आदि में विवरण मिलता है कि इनके पास दिव्यांगी घोड़ी थी, जिसे ‘केसर काळमी’ के नाम से इतिहास में जाना जाता है। उस घोड़ी की चारूता, तेजस्विता, सुड़ौलता और स्वामीभक्ति की चर्चा चतुर्दिक थी। उस समय अश्वविहीन राजपूत की समाज में कोई विशेष पहचान नहीं होती थी। तभी तो कहा है-

दे घोड़ा रजपूत कर, देवण देसां दोस।
भावै बणावै रयतकर, भावै जिणसूं खोस।।

यह ही नहीं यह कहावत भी प्रसिद्ध है-

“बळधां खेती घोड़ां राज,
मरदां सरै पराया काज।”

उस घोड़ी को प्राप्त करने हेतु मुँह मांगी रकम लेकर कई क्षत्रिय देवलजी के पास आए लेकिन उन्होंने ये करामाती घोड़ी किसी को नहीं दी। जब पाबूजी राठौड़ उक्त घोड़ी लेने देवलजी के पास आए तो देवलजी ने यह घोड़ी तो उन्हें दे दी परंतु एक शर्त रख दी कि जब कोई कुक्षत्रिय उनकी गायों का हरण कर लें तब बिना किसी किंतु-परंतु के गायों को पुन: लाने व उस आततायी को दंडित करने का दायित्व पाबू राठौड़ का होगा-

अणदा री मीसण अखां, झिलै त्रिशुल्लां झल्ल।
पाबू नै दी काळमी, गढ़ां उबारण गल्ल।।

पाबूजी ने न केवल उस शर्त को माना अपितु अवसर आने पर अपने रक्त संबंधियों से रणांगण में दो-दो हाथ भी किए।
प्रसिद्ध हैं कि पाबूजी के ही बहनोई जायल के खीची जींदराव ने देवलजी की गायों का हरण किया था। पाबूजी प्रणपालनार्थ न केवल जींदराव से लड़े अपितु गौ रक्षार्थ वीरगति को प्राप्त भी हुए | कवियों ने लिखा है-

उड़ जासी आबूह, गिरनारी जासी गरक।
प्रथमी पर पाबूह, मिणधारी रहसी अमर।।

कवि मोडजी आशिया ने ऐसा इसलिए लिखा कि पाबूजी ने साधारण जनों के हितार्थ अपनाजीवन समर्पित किया था। उनमें चारण, नायक, राईका आदि थे। यही कारण था कि लघराजजी मुहता ने भी पाबूजी को उस समय का जननायक घोषित किया क्योंकि पाबूजी ने बिना किसी स्वार्थ के गरीबों की मदद की थी-

सबळ तणी पख व्है सदा, खलक तणौ ओ खेल।
तैं कीनी धांधळ तणा, वीर गरीबां वेल।।

यहाँ यह उल्लेख करना समीचीन रहेगा कि देवलजी तथा बिरवड़ीजी की गायों की रक्षार्थ लड़े गए युद्ध में चंदा-ढेबा आदि भील वीरों के साथ उनके 140 संबंधी भी वीरगति को प्राप्त होकर यश के भागी बने थे। उनके इस निस्वार्थ बलिदान के पीछे एकमेव कारण पाबूजी के प्रति स्वामीभक्ति व चारणों के प्रति स्नेह था।
नायकों के इस बलिदान को रेखांकित करते हुए देवाजी आशिया ने लिखा है-

पारधियां नै पातवां, जाणी छै भैळप्प।
वाहर सुरै वढाविया, बीसां सातां वप्प।।

देवाजी ने भीलों की वंशावली भी लिखी और यह भी कहा कि मैं उक्त रचना लिखकर भीलों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कर ऋषि ऋण परिशोधन की क्षुद्र चेष्टा भर कर रहा हूँ।

जैसा कि पूर्व में उल्लेख कर चुका हूँ कि बिरवड़ीजी का पश्चिमी राजस्थान से भी संपर्क रहा है। यहां यह उल्लेख करना ज्यादा समीचीन लगता है कि यह पश्चिमी राजस्थान चारण देवियों को अत्यंत प्रिय स्थल रहा है। कवियों ने इस इलाके को देवियों के पीहर की संज्ञा से अभिहित किया है। उदयराजजी उज्ज्वल ने लिखा है-

इण पिच्छम धर आय, अवतरी आवड़ खूबड़।
सैणी मालण बूट, बेचरा मालण बिरवड़।
इण पिच्छम धर आय, अवतरी करनल आई।
नव लख लोवड़ियाल़, धरा पिछमांण धराई।
वरन रो आद ओइज उतन, कियौ ऊंच किरतार रे।
देवियां तणो पीहर दिपै, सत पिच्छम सिरदार रे।।

जींदराव खीची ने इनकी गायों का हरण किया था। दयालदासजी अपनी ख्यात में लिखते है- “हमै पाबूजी घरै वडै सुख सूं रहै पीछै चारणी बिरवड़ी वित्त लैय नै दैवल मीसण कनै आई थी, कुसमै सुं सौ उणांरौ वित फलौधी रै गांवां रहतां, सूं उठै जींदराव खीची धौड़ियो तिण में बिरवड़ी रौ वित मांय आयौ तद गवाल आय बिरवड़ी नूं कयौ वित जींदराव खीची लीयौ तारां बिरवडी़ में देवल मीसण आय बूड़ैजी नूं कयौ वाहर करौ तद बूड़ैजी कयो म्हारी आख्यां दूखै है चडीयौ जाय नहीं पीछै देवल नै बिरवड़ी आय पाबूजी नै कयो बाहर करौ तद पाबूजी चांदै नायक बगैरे और चांदै री बेटी रो ब्याह तो सूं नायक 104 जान में ता जिकै पण हाजर हुआ।”

दयालदासजी अपनी ख्यात में लिखते हैं कि पाबूजी 200 घोड़ों से जींदराव पर चढ़े और बिरवड़ीजी की गायें लाकर कोलू के गुंजवै कुएँ पर अपने हाथ से बारै निकालकर पिलाई। इसी ख्यात में बिरवड़ीजी की एक और बहिन ‘तोली’ का नाम हमारे सामने प्रथम बार आता है- “बिरवड़ी री बैन तोली जाय बूड़ैजी नूं कयौ हमै कितरा काळ जीवसी, पाबूजी तो काम आया”

यही बात नैणसी अपनी ख्यात में लिखते है- “ताहरां गौहरी आय पुकारियौ। कही-“जींदराव खीची धन सरब लिया जावै छै” तद विरोड़ी चारण आय कूकी। कही “बूड़ा वाहर धाय, खीची गायां घेरियां।”

इन्हीं बातों की पुष्टि जैन कवि समुद्रसुरिजी भी करते है। वे लिखते हैं-

तळही तुरत सींचावि, गूंजवै पाया गायां।
तितरै ‘वीरू’ आय, बूडै लगी बात लगायां।।

इन सब बातों को पहले गद्य में और बाद में पद्य में पिरोया हैं ‘बीसहथी मां बिरवडी’ नामक पुस्तक में महेन्द्रसिंह छायण ने।
महेन्द्रसिंह सिसोदिया ‘छायण’ गद्य और पद्य दोनों में सिद्धहस्त हैं तो साथ ही इनकी लेखनी आधुनिकता और परंपरा का मणिकांचन संयोग भी कहा जा सकता है। जहाँ एक ओर श्री सिसोदिया अपने समय के सच को शब्दों में ढालकर समकालीन सृजनधारा में अपनी यथोचित उपस्थिति दर्ज करवा रहे हैं तो दूसरी ओर यहाँ के सांस्कृतिक व अंजसजोग गौरवबिंदुओं का अपने शब्दों में पुनर्लेखन कर युवा पीढ़ी हेतु महनीय कार्य भी कर रहे है ताकि हमारी अतीत की गौरवगाथाएँ आज के नैराश्यपूर्ण जीवन में आशा का दीप आलोकित कर आगे बढ़ने हेतु मार्ग प्रशस्त करते हुए युवा पीढ़ी को ‘अप्प दीपो भव:’ का सुभग संदेश का मर्म समझने के साथ ही प्रेरणा पथ का निर्माण भी कर सके।

श्री सिसोदिया ने बिरवड़ीजी के वंदनीय चारू चरित्र की चंद्रिका को चतुर्दिक चमकाने हेतु गद्य और पद्य दोनों शैलियों में अपनी कलम का कमाल दिखाया है। श्री छायण ने पहले बिरवड़ीजी के लोकोपकारी चरित्र को सहज सम्प्रेषणीय गद्य में गूंथा है। यहाँ श्री छायण ने अपनी आस्था के उजास को दीप्त रखते हुए एक शोधार्थी की निष्पक्ष दृष्टि तथा जिज्ञासु प्रवृत्ति को भी बनाए रखा है। कहीं भी कल्पना का सहारा नहीं लिया गया है। बिरवड़ीजी से संबंधित जो संदर्भ भलेही ‘वीर विनोद, राजपूताना का अपूर्व इतिहास, चारण-कुल प्रकाश’ आदि हो, भलेही मध्यकालीन डिंगल काव्य हो। इन संदर्भों के साथ श्री छायण ने प्रामाणिक बात कही है।

सहज प्रश्न उठता हैं कि आज की युवा पीढी़ के सृजनधर्मी जहां विभिन्न आधुनिक विषयों में लेखन कर वाह-वाही बटोरने की ओर अग्रसर हैं वहीं छायण जैसे युवा को इतिहास जैसे जटिल और नीरस विषय पर कलम चलाने और श्रमसाध्य कार्य करने की क्या आवश्यकता पड़ी? श्रमसाध्य इसलिए कि ‘इतिहास’ पर कलम चलाने वाला सूंठ का गांठिया रखकर पंसारी नहीं बन सकता। उसे स्वाध्याय के साथ ही विभिन्न संदर्भ खंगालने पड़ेंगे। ऐसे में आज की युवा पीढ़ी ऐसे विषयों की तरफ झांकती भी नहीं। लेकिन, परम संतोष का विषय हैं कि अभी भी कुछ उत्साही व परिश्रमी युवा अपनी जड़ों से जुड़ाव रखते हैं। श्री छायण का इस पुस्तक लेखन के पीछे जो ध्येय है वो ‘एक पंथ दो काज’ से परिलक्षित होता है-

राधा पूजी गोरजा, भर मोतीन को थाळ।
मथुरा पायो सासरो, वर पायो गोपाळ।।

श्री सिसोदिया के पूर्वज राणा हमीर की मां बिरवड़ीजी ने जो आपातकाल में सहायता की उससे न केवल इतिहास की धारा बदली अपितु सिसोदिया वंश की गौरवगाथा भी अक्षुण्ण रह सकी। उसी भावभूमि के ऊपर विचरते हुए श्री छायण ने कृतज्ञ भावों तथा ऋषि ऋण परिशोध की पावना भावना के आधार पर उक्त सृजन किया तथा इस दोहे को सार्थकता प्रदान की-

प्रीत पुराणी नह पड़ै, जो उत्तम सो लग्ग।
सौ बीसां जळ में रहै, (तोई) पत्थरी तजै न अग्ग।।

वैसे भी हम मध्यकालीन राजस्थान के इतिहास पर दृष्टिपात करते हैं तो पाते हैं कि कुछ राजपूतों व चारणों के आपसी संबंध प्रगाढ़ थे-

सौदां नै सिसोदियां, रोहड़ नै राठौड़।
दुरसावत नै देवड़ा, जादम रतनू जोड़।।

इन्हीं प्रगाढ़ संबंधों के कारण ही जनकवि ऊमरदान लाळस ने कहा था-

रग रगां रगत छायौ रहै, देह विषया ज्यूं डारणां। |
छत्रियां साथ नातौ छतौ, चोळी दामण चारणां।।

अत: इस बात को हम नकार नहीं सकते कि आज की युवा पीढ़ी में इस विषय की संवेदना और समझ नगण्य लोगों में ही रही है। महेन्द्रसिंह सिसोदिया उन्हीं कतिपय युवाओं में से हैं, जिन्हें अपनी संस्कृति, इतिहास और संस्कारों की समझ है। यही कारण है कि ‘बीसहथी मां बिरवड़ी’ में एक ओर आस्था का उजास उद्भाषित होता है वहीं दूसरी ओर वर्तमान की सामाजिक विद्रूपताएं, मानवीय मूल्यों में आता हृास, प्रकृति के साथ होती क्रूरता, सांस्कृतिक पतन, सामाजिक समरसता में उत्पन्न होता विघटन आदि को भी कवि ने अपने सोरठों के माध्यम से उद्घाटित किया है।

दोहा और सोरठा राजस्थानी कवियों का प्रिय छंद रहा है। दोहे को जहाँ “छोटी तुक रो दूहरो, सब कवितन का भूप” कहकर इसकी श्रेष्ठता स्वीकारी है वहीं सोरठा भलेही मूलत: सोराष्ट्र प्रदेश का छंद रहा है, इसीलिए इसका नाम सोरठा रखा गया है और कहा भी है–

सोरठियो दूहो भलो, घोड़ो भलो कमेत।
ठाकरियो दाता भलो, कपड़ो भलो सपेत।।

लेकिन राजस्थानी कवियों ने सोरठा छंद का प्रयोग अपने ग्रंथों में बहुतायत से साफल्यमंडित प्रयोग किया है। श्री सिसोदिया ने अपने पूर्ववर्ती कवियों का अनुसरण कर उक्त रचना में सोरठा छंद का प्रयोग किया है।

‘बीसहथी मां बिरवड़ी’ एक टकसाली डिंगळ रचना है, डिंगळ की सभी विशेषताओं से परिपूर्ण। लगभग समग्र रचना में वयणसगाई का प्रयोग हुआ है, वो भी लगभग उत्तम वयण सगाई का। देता है तो कहीं-कहीं कवि ने ‘पेखीजै रस पोस’ का अनुसरण भी किया है।

कृति में कवि ने एक शतक, एक त्रिभंगी तथा एक चिरजा प्रणीत की है तो साथ ही बिरवड़ीजी से संबंधित उपलब्ध रचनाएं भी संकलित की गई है।

कवि का पद्य “सौ मण धान री मुट्ठी बानगी स्वरूप है |” इसमें भक्त हृदय की निर्मलता है तो स्तवन के बहाने देश में पसरते आतंकवाद, धार्मिक उन्माद, आचरण में आती गिरावट तथा भ्रष्टाचार के पसरते पंखों पर भी चिंता व्यक्त की गई है। कवि बिना किसी छद्म वेश धारण किये लिखता हैं कि ‘हे मां बिरवड़ी! अगर तूं उस विपदा में हमीर को संबल नहीं देती तो हिंदूओं के लिए गौरव प्रतीक मेवाड़ आज प्रभा विहीन होता। उस धरती पर आज विधर्मियों की धार्मिक प्रार्थनाएँ अनुगूंजित होती–

कलमां पढ़त कलाम, जे नीं पूगत जोगणी।
आज हती इसलाम, वीरधरा मां बिरवड़ी।।

कवि छायण लिखते हैं कि साम्राज्यविस्तारवादी सोच रखने वालों को मेवाड़ी वीरों ने बिरवड़ी के मार्गदर्शन में फण उठाने से पहले ही कुचल दिया वरना आज ये न केवल चित्तौड़ को दंश मारते अपितु समग्र भारत के लिए भयानक सिद्ध होते–

डसतां जिकां डराय, कर फूंफाड़ा काळ बण।
डग भर दिया दबाय, (उण) व्याळ फणां नै बिरवड़ी।।

देवी तो देने वाली है क्योंकि इसका दिल दरियाव सा विशाल है। जिसने धर्मपथ के ध्वजवाहक राव नवनवघण के हृदय में उजास कर विजय का पूर्व आभास दिलाया था–

दिल थारौ दरियाव, तरपत उर कीनौ तुरत।
राजा नवघण राव, विसरै कीकर बिरवड़ी?

‘देव! देव! कहि आलसी पुकारा’ का प्रतिबिंब इन सोरठों में नहीं है। कवि अपनी कलम देश हित में उठाने के साथ ही देश हित में चिंतन करते हुए माँ भारती के संवेदनशील सपूतों को शक्ति संचय कर स्वयं को देश हित में न्योछावर करने हेतु अभिप्रेरित भी कर रहा है। कवि अपने उन अग्रजों का अनुसरण कर रहा है जिन्होंने लिखा था-

भुज में मम शक्ति स्वरूप बसो।
मुख में तुम भारती रूप लसो।।
~~किशोरसिंह बार्हस्पत्य

कवि श्री छायण के शब्दों में-

अबकाळै मां आव, दसा बदळ दे, देस री।
रंकां साथै राव, विनवै नितप्रत बिरवड़ी।।
गढ़ां मढ़ां गिरराय, थळियां भाखर थाट सूं।
राजी मन सुरराय, बसै बीसहथ बिरवड़ी।।

चारणों में शक्ति अवतरण तथा इनपर देवी की असीम कृपा की ओर संकेत करते हुए श्री छायण लिखते हैं–

चावी चखड़ाई, महि महमाई,
सरसज लाई अठ सिधियां।
चारण कुळ चाई, नेह निभाई,
सगत दिराई, नव निधियां।
समर्यां सुरराई, इंछ पुराई,
दे वरदाई, अन-धन मां।
जोगण जोराळी, धाबळवाळी,
लोवड़याळी, बिरवड़ मां।।

राजस्थानी कवियों ने प्रकृति को ही देवी माना है। उन्होंने स्पष्ट लिखा हैं कि “पान-पान निज जोत प्रकाश। ” यानी हर पत्ते-कोंपल में तुम उद्भाषित हो रही हो। कवि श्री छायण भी प्रकृति प्रेमी कवि है। इन्हें यहाँ चिंता हैं कि जिस तेजी से मरू विस्तीर्ण हो रहा है और असंवेदना के साथ स्थानीय प्रकृति को हम हमारे हाथों विनष्ट कर रहे हैं उससे निश्चित ही हम जल्दी ही किसी आगत संकट में पड़ने वाले हैं। ऐसे में प्रकृति को भी आस्था के साथ पूर्वजों की जोड़ी हुई भावना का हस्तांतरण युवा पीढ़ी में किया जाना चाहिए–

शीतळ ठंडी छाँव, रूंखां री रळियांवणी।
घरै गौरवें गाँव, बची रहै नित बिरवड़ी।।
पंखी करै पसार, मन री पांखां मावड़ी।
उडै़ गगन इणबार, बंधण तोड़ण बिरवड़ी।।

आज जिस तीव्रता से आपसी संबंधों में कड़वाहट के साथ ही सद्भावों की सरिता सूखने लगी है। यही नहीं, युवा पीढ़ी में संस्कारहीनता भी आ रही है। ऐसे में हमारा दायित्व हैं कि हम हमारी युवा पीढ़ी में संस्कार रूपी सलिला में सलिल सींचन का सुभग कार्य करते रहें, जिससे सद् मार्ग का भान होगा तो सही-गलत का नीर-क्षीर विवेक भी जागृत होगा–

गाँव-गौरवें गंग, संस्कारां री सूखगी।
शीतलता रै संग, विगसा पाछी बिरवड़ी।।
स्नेह प्रेम सदभाव, नेक नीयति नेम सह।
लोगांं रै हिंय लाव, बीसहथी मां बिरवड़ी।।

बैवूं सीधी वाट, डिगूं नहीं नख डोकरी।
थिर रख म्हारै थाट, बीसभुजाळी बिरवड़ी।।
मन-मिंदर महकाय, आय उबारै कष्ट सूं।
सदा ज करै सहाय, बाळक री मां, बिरवड़ी।।

चारण कवियों की भाँति ही श्रीछायण ‘एक ही रूप अनेक’ के माध्यम से देवी की आराधना करते हुए अडग आस्था की उद्घोषणा करते है–

कामाही करनल्ल, आदी सगती आवड़ा।
स्हाय करै सैणल्ल, विध-विध सूं आ बिरवड़ी।।
चोंच दिवी तो चूंण, देती आई डोकरी।
जगमगती आ जूंण, बरसाती जा बिरवड़ी।

सारांश में यह कहा जा सकता है कि डिंगल़ की वर्तमान काव्यधारा के श्री छायण युवाओं में अग्रगण्य कवि हैं जिनकी भाषा में डिंगल का ठेठपन उपस्थित है तो विषय के अनुरूप भावधारा प्रवाहित करने का सामर्थ्य भी। ऐसा नहीं है कि श्री छायण केवल डिंगल की डगर के राही हैं। ये तो अपने समकाल पर सधे कदमों से कदमताल भी बड़ी ठिमरता से कर रहें हैं।

‘बीसहथी मां बिरवड़ी’ में अपनी जड़ों से जुड़े रहने की युक्ति तो है ही साथ ही इतिहास के एक उज्ज्वल अध्याय को शोध संदर्भों के साथ रखने की प्रावीण्यता भी परिलक्षित होती है। बिरवड़ीजी से संबंधित छोटी सही शायद पहली पुस्तक है।

शक्ति आराधना व लोकपूज्य चारणों देवियों के समुज्ज्वल चरित्र तथा उनके लोकहितकारी कार्यों से सर्वसाधारण को जानकारी सुलभ करवाने के सद्प्रयासों में कई लोग लगे हुए हैं लेकिन अधिकतर केवल पिष्टपेषण तक ही सीमित रहकर अपने कार्य की इतिश्री मान लेते हैं या यों कहे कि ऐसे महानुभाव केवल पुस्तकों के शीर्षक तो बड़े चातुर्य से बदल देते हैं लेकिन उनमें किसी प्रकार की अभिवृद्धि करने अथवा उनमें रही त्रुटि में संशोधन की तरफ कोई रुचि ही नहीं है।

ऐसे विद्रूप समय में महेंद्रसिंह छायण अपनी निष्ठा व लगन के बूते न केवल विश्वास दिलाते हैं नहीं है अपितु करके भी दिखाते हैं।
आशा ही नहीं विश्वास है कि श्री छायण अपनी लेखनी के प्रति पाठकों अथवा श्रोताओं में पनप रहे पतियारे को न केवल बनाएं रखेंगे अपितु उत्तरोत्तर प्रगति पथ पर बढ़ते रहेंगे।

इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी
प्राचीन राजस्थानी साहित्य संग्रह संस्थान दासोड़ी, कोलायत, बीकानेर (राज)

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