बेटी का अपमान असह्य है (कलू माऊ)

राजस्थानी में एक दोहा है जिसका आशय है कि वर की परीक्षा लेने से पहले यह जान लेना आवश्यक है कि वो किस मिट्टी में जन्मा है क्योंकि उसकी श्रेष्ठता या निष्कृष्टता भूमि पर ही निर्भर करती है। राजस्थान की धरती के कुछ गांव इस दिशा में विशेष उल्लेख्य है जहां के जन्में हर नर-नारी में वीरता, धैर्य और गंभीरता का त्रिवेणी संगम उपस्थित होता है।

इसी श्रृंखला में जैसलमेर का कोडा गांव भी आथूणै अंचल में अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण विश्रुत रहा है। यहां की धियारियां (बेटियां) अपनी उज्ज्वल चारित्रिक आभा व जन हितैष्णा में अपना सर्वस्व न्यौछावर करने हेतु अन्यों से हमेशा अग्रगामी रही है।

कोडा गांव रतनू कोडाजी ने बसाया था, उनकी संतति रतनुओं में कोडैचा या कोडा कहलाती हैं। उन्होंने अपने नाम से इस गांव में ‘कोडल्याई नामक’ तल़ाब खुदवाया जो प्राचीन समय में यहां के निवासियों के लिए जलस्रोत का साधन था।

किंवदंती है कि महाशक्ति देवलजी अपनी ससुराल जाते समय कुछ समय के लिए इस गांव में ठहरी थी। तब उन्होंने यहां की सेवाभावी व संस्कारी बालिकाओं के चारणोचित्त व्यवहार से प्रसन्न होकर वरदान दिया था कि यहां की बेटियां अपने कुल का नाम उज्ज्वल करने वाली होगी।

इस धरती के रजमे का ही कारण है कि यहां आई और जाई दोनों में देवीय गुणों के समुज्ज्वल दर्शन होते हैं। इन्होंने अन्याय, अत्याचार, शोषण, और साधारणजन के हितार्थ जमर की ज्वालाओं में अपने प्राण समर्पित करते समय किसी भी प्रकार की हिचकिचाहट महसूस नहीं करके पश्चिम राजस्थान में ‘आ कोडेची है’ के गौरवपूर्ण विरुध्द से अभिमंडित हुई।

इसी श्रृंखला में एक नाम आता है कलू (कल्याण) माऊ का।

कलू माऊ का जन्म वि. की अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में कोडा गांव के रतनू गजदानजी के घर हुआ था-

प्रसिद्ध डिंगल कवि कैलाशदानजी झीबा अपनी रचना ‘कलू मा रा छंद’ में उल्लेख करते हैं-

धन ऊजल़ कोडा धरा, दूथी धन गजदान।
धन्न धन्न कलु धीवड़ी, उण घर जनमी आय।

इनकी शादी बाल़ेबा के पूनसी बारठ म्यारमजी के साथ हुई थी।

उन दिनों बाल़ेबा में पानी का सर्वथा अभाव था अतः इस गांव के निवासी अपनी मवेशी को पानी पिलाने व स्वयं लाने हेतु खाबड़ियों के गांव देदड़यार जाया करते थे। इस बात को रेखांकित करते हुए वर्तमान के अग्रगामी डिंगल कवि कैलाशदानजी झीबा लिखते हैं-

वित्त बाल़ेबै वासियां, जल़ पीवण नै जाय।
कुओ देदड़यार कहूं, नीर न कदै निठाय।।

यहां उन दिनों समेल़ा नामक खाबड़िया प्रभावशाली भी था तो संवेदनहीन भी। बाल़ेबा के चारणों के अलावा अन्य किसी जाति की मवेशी जाती, तो तंग करता था। वे लोग पुनः आकर चारणों को कहते लेकिन चारणों की भी मजबूरी थी। वे निरूपाय थे।
यों कई वर्ष व्यतीत हो गए। ऐसे में एक दिन बाल़ेबा की एक खत्री जाति की स्त्री अपनी प्यासी भैंसें लेकर पानी पिलाने देदड़यार गई। वहां कुएं पर समेल़ा खाबड़िया बैठा था। जैसे ही प्यासी भैंसें खेल़ी पर ढूकी और उसने उन भैसों के पीठ पर चाबके मारने शुरु किए। खत्रण ने मना किया तो उसे भी बुरा-भला कहा। खत्रण वहां से रोती हुई कलू मा के पास पहुंची। जैसे कलू मा ने खत्रण की दारुण दशा और अबोल पशुओं की पीठ पर कोरड़ों के निशान देखें तो उन्हें क्रोध आ गया। उनकी आंखों में अंगारें बरसने लगे।

उन्होंने खत्रण से कहा कि-
“मैं इस दुष्ट के अत्याचारों के खिलाफ जमर कर रही हूं। उस समेल़ै ने तेरा अपमान नहीं करके मेरा अपमान किया है क्योंकि तुम मेरी रैयत हो। रैयत भी संतान समान होती है। तुम स्त्री हो, इस नाते तुम मेरी बेटी हो और मा के जीते जी कोई दुष्ट बेटी का अपमान करें, यह मैं कतई सहन नहीं कर सकती। पानी से पतला क्या होता होगा? उसके लिए ही एक क्षत्रिय ऐसा क्रूर व्यवहार करे ! आज से तुम बाल़ेबा वासी इस निनामे कूप पर मत जाना और इस समेल़ै को मा लोवड़याल़ पहुंचेगी।”

इतना कहकर मा कलू ने जमर की तैयारियां शुरू करवाई। इधर जब उस समेल़ै को मा कलू के जमर की तैयारी का पता चला तो वो अपने कौटुम्बिक सदस्यों सहित वहां आया। मा के चरणों में दूध अर्पित कर अपने कुकृत्य हेतु क्षमायाचना की और जमर नहीं करने हेतु अनुनय विनय किया। तब मा कलू ने कहा कि-
“मैं जमर तो मानसिक रूप से कर चुकी, यह तो कतई टल नहीं सकता लेकिन मैं तुम्हें जा क्षमा करती हूं।” इतना कहकर मा कलू योगसाधना से जमर की ज्वालाओं में अपने शरीर को वि. स. 1910 माघ सुदि 14 के दिन समर्पित कर दिया। कैलाशदानजी झीबा के शब्दों में–

सत उगणीस विक्रम सदी, वरस दसै री बात।
माघ सुदी चवदस मुणां, आप करी अखियात।।

यह उल्लेख्य है कि मा कलू को बाल़ेबा व आसपास के गांव पूजते ही है साथ ही वे लोग भी श्रद्धा से पूजते हैं जिनपर उन्होंने जमर किया था।

।।कलू माऊ रा दूहा।।
कोडां रतनू कीरती, गढव लीनी गजदान।
कलू कोम पावन करी, उठै धरी देह आन।।1
बाल़ेबै बारठ बसै, मह नांमी म्यारांम।
सोभा बधाई सदन री, वर वरियो वरियांम।।2
घणथट गायां जिकण घर, थिर सब बातां थाट।
किसबी जिणरा कुशल़ सह, बहणा सतवट वाट।।3
जिण धर लंबो झूंसरो, खड़ भरिया हर खेत।
मतवाल़ी सुरभ्यां मछर, हरख चरै धर हेत।।4
बाकी बातां थाट बो, इल़ जल़ तणो अभाव।
देखै देदड़यार दिस, अवर न कोय उपाव।।5
खाबड़िया वासी खिती, जो मचियोड़ा जोर।
पाणी कदै कै पीण दे, पाछा कदैक फोर।।6
खाबड़ियां में खुटल़ इक, नीच समेल़ो नाम।
आए दिन रा आल़ ले, रिदै तज्योड़ो राम।।7
बाल़ैबै री इक वधू, जिणरी खतरी जात।
डांडी देदड़यार दिस, जो हर कीधी जात।।8
महकी पासै मछरती, उणरै कनै अनूप।
तिरसी मरती ताकड़ी, कटक ढूकी जल़ कूप।।9
आय समेल़ै उण बखत, निसचै कियो नकार।
मूढ बाया उण महिसियां, चाबकिया दुय च्यार।।10
खतरण लटिया खोसती, बहि बाल़ैबै वास।
बांह बिनां बल़ बापड़ी, नारी हुई निरास।।11
कनै कलू रै कूकती, उर ले पूगी आस।
पूंछ आंसू नै प्रेम सूं, हिव दीनी हिवल़ास।।12
चख झाल़ा व्रन चोल़ भो, बदन भयो विकराल़।
रढियाल़ी कज रैत रै, भई पखै भट भाल़।।13
जमर कियो जद जाहरां, महि कुल़ कीरत मंड।
जन पख निबल़ां तूं जुड़ी, दियण दोयणां दंड।।14
डरिया दुसटी जिकण दिन, बसू बणी अह बात।
हरख रैत रै काज हित, मरण तेवड़्यो मात।।15
उण पुल़ कूक्यो आयनै, खाबड़ियो खड़ खाय।
सुज मन कयो समेल़ियै, माफ गुनो कर माय।।16
माफी दीनी मावड़ी, मन मोटै सूं मात।
दया धरण दुनियांण में, बात हुई विखियात।।17
उगणीसो दस्सो अखां, वसुधर हुवा बखांण।
शुकल़ माध चवदस सही, जमर कियो जग जांण।।18
कलू ऊजल़ी कीरती, विमल़ वसु विसतार।
कल़ा तिहारी मूढ कव, लखै न मात लिगार।।19
च्यार पखां जल़ चाढियो, कर निज ऊजल़ कोम।
आखरियां जस विमल़ इल़, भणै गरब कर भोम।।20
परहित पथ थपियो प्रिथी, हरख झल़ां तन होम।
अँजसै इल़ अजतक अखँड, कलू तिहारी कोम।।21

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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