भाज गई भेडांह !!

बीकानेर महाराजा दलपतसिंह स्वतंत्र प्रकृति रा पुरूष हा। इणां री इण प्रकृति रो कुफायदो केई लोगां उणां रै कुंवरपदै में उठायो ई हो जिणरै परिणामस्वरूप बाप-बेटे में खटरास ई पड़ियो पण इणां इण बात री कोई घणी गिनर नीं करी।

महाराजा रायसिंह रै सुरगवास पछै ऐ पाट बैठा। इणां नर नानाणै री गत महाराणा प्रताप रै चीले बैतां थकां मुगल़ सत्ता री घणी कद्र नीं करी।

जैड़ोकै आपां सगल़ा जाणां कै इणां रो नानाणै मेवाड़ महाराणा प्रताप रै घरै हो। इणां ई विद्रोह रो झंडो भलांई ऊंचो नीं राखियो पण मेलियो ई नीं!! इणसूं घबराय पातसाह जहांगीर इणांरै विद्रोही भाई महाराज सूरसिंह रो पख लियो अर बीकानेर माथै सेना मेली।

दलपतसिंह वीर, साहसी अर निडर नाहर हा सो मुकाबलो करण रणांगण में आया। उणांरै हाथी रै होदै खवासी में लारै चुरू ठाकर भीमसिंह बैठा हा। कुजोग ई कैयो जावैला कै उण बखत लगैटगै सगल़ा मौजीज ठाकर दलपतसिंह सूं बदल़ग्या। लड़ाई में ज्यूं ई उणां आपरो आपाण बतावणो शुरु कियो ई हो कै लारै सूं घात कर चुरू ठाकर भीमसिंह इणांनै आपरी बाथां में जरू पकड़ लिया। ज्यूं ई दलपतसिंह पकड़ीजिया अर त्यूं ई बीकानेरियां बांठां पग दिया। मुगल सेना उणां नै जनानै सैति अजमेर में कैद किया अर बीकानेर रो राज सूरसिंह नै दियो।

जद आ खबर इनै-बिनै पसरी कै दरबार जनानै सैति कैद है!! कोई माई रो लाल उणांरै जनानै री जाब्ता नीं राख सकियो !! आ नाजौगी बात वीठू सतै सूं सहन नीं होई अर उणां सगल़ै सिरदारां नै खारी पण खरी सुणावतां कैयो कै-

फिट वीदां फिट कांधलां, जंगल़धर लेडांह।
दलपत हुड ज्यूं पकड़ियो, भाज गई भेडांह।।
अर्थात अरे वीदां, कांधलां थांनै धिक्कार है !! क्यूंकै दलपत घेटै ज्यूं पकड़ीजियो अर थे सगल़ा भेडां ज्यूं भाजग्या !!

अजमेर कैद में ज्यूं-त्यूं महाराजा आपरै बिखै रा दिन काढै हा कै एक दिन कैद रै डेरै कनकर हरसोल़ाव ठाकर हाथीसिंह आपरै लवाजमै साथै निकल़िया। उणांनै उठै डेरा निगै आया तो उणां किणी नै पूछियो कै – “ऐ डेरा किणरा है?” जणै किणी बतायो कै अठै बीकानेर दरबार दलपतसिंह कैद है। आ बात सुणर, उणां दरबार नै मुजरो कैवायो तो महाराजा सेवागरां नै मेल कैवायो कै – “ठाकर नै जाय कैवो कै एकर म्हारै सूं मिलै!!”

हाजरियां जाय ठाकरां नै कैयो तो ठाकरां कैयो कै दरबार नै अरज करजो कै – “हूं हणै तो सासरै जाय रैयो हूं अर पाछो आवतो अवस मिलसूं।”

हाजरियां आय ठाकरां कैयो ज्यूं कैयो तो दरबार पाछो कैवायो कै – “भाई जकै कूकड़ला गवाड़ण अर मौज माणण जावै वे क्यूं म्हारै सूं मिलसी।”

आ बात जद ठाकर सुणी तो उणां रो मन दिगूपिचू होयग्यो। घोड़ै री लगाम ढीली पड़गी अर आगै जावण सारू मन माठो पड़ग्यो। उणां आपरै संगल़ियां सूं सलाह करी कै कांई करणो चाहीजै!!

उणां मांय सूं किणी कैयो कै – “हुकम बीकानेर रा धणी अर आपांरा नाक है!! अर पछै जनानो पण साथै है। जनानै री आबरू तो आपांरी ई आबरू है!! आपां आपांरी लुगायां री रिच्छा नीं कर सकां तो दूजा आपां सूं कांइ आसा राखैला? कांई आपां राठौड़ खाली कैवण रा ई रणबंका हां कै पछै साचाणी ई हां!! जे साचाणी हां!! जणै इणसूं बतो बधर कांई मरण परब होवैला?
सेर सूत बांधां ! पछै कांई नाक लेयर फिरांला, ओ मरण परब अठै ई मनावालां। बीकानेरियां सामघात कियो उणांनै दरगाह में ठौड़ मिलणी दौरी पण आपां ओ अवसाण क्यूं चूकावां?”

ठाकरां रै आ बात हाडोहाड बैठगी। उणां मरणो तेवड़ियो अर दरबार नै कैवायो कै – “सचेत रैजो म्हे मिलण नै आवां!!”

डेरो उठै ई दियो अर केसर मंगाय प्रभात रा केसरिया कर रजपूती राखण बहीर होया !! अचाणचक जाय दरबार रै डेरै हमलो कियो अर उठै सौ आदम्यां नै मार महाराजा री हथकड़ी काटी। जितै पातसाही सुबेदार नै खबर होई सो बो चार हजार री फौज ले आयो।

हाथीसिंह अर दरबार अदम्य साहस रै साथै लड़तां थकां वीरगत वरी।

हाथीसिंह री इण निस्वार्थ सेवा अर निकल़ंक कीरत री बात सोरम रै ज्यूं पसरी जद किणी कवि कैयो कै

अर्जुण री कांई सिद्धाई ही कै उणरै हाथ में बाण थका काबां गोपकां नै लूटली अर बो ऊभो देखतो रैयो जदकै हाथीसिंह रै ऊभां मुगलां रा हाथ दलपतसिंह री राणियां रै नीं लाग सकिया-
काबां जद लीध किसन ची कांमण,
पांणां ग्रहे देखतां पाथ।
किलमां तणा दलै ची कांमण,
हाथी थकां न पड़ियो हाथ।।

तो किणी दूजै कवि कैयो कै-

दलपत सिंह रै कारणै वीका तो नीं बढ सकिया जदकै हाथीसिंह जगत में जस राखण सारू मरण अंगेजियो-
दलपत तो पकड़ीजियो, बढिया नीं वीकाह।
हाथी चढ हरवल़ हुऔ, राखण जस नीकाह।।

दलपतसिंह रै वीरगत पायां पछै किणी कवि उणांरै मरसियै में लिखै कै-

हे दलपत! थारै मरतां ई पातसाह सूं रण मंडणो बंद होयग्यो इणसूं मरदां रो घोड़ा रो, तरवारां रो माण मिटग्यो अर वीरां बगतर उतार र राख दिया-
विघन तुआल़ै जैत वंशोधर,
मही हुआ सुंहगां मरद।
अस असमर आघ उतरिया,
जोधां ऊतरिया जरद।।

जे दलपतसिंह इणगत धोखै रा शिकार नीं होवता तो आज आपां महाराणा प्रताप, चंद्रसेन रै साथै ई तीजो नाम दलपतसिंह रो आजादी री अलख रै आगीवाणां में लेता।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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