भभूता सिद्ध रा छंद

राजस्थान रै लोक देवतावां में एक नाम भभूता सिद्ध रो ई है। उन्नीसवें शताब्दी रै पूर्वार्द्ध में भभूता सिद्ध रो जनम चारणवाल़ा रा सोलंकी गोमसिंह रै घरै होयो। कविवर शंकर रै आखरां में –

गोमा सुतन प्रगट गढ कोटां
मोटा भूपत मानै।
मेवा मिसठान पतासा मिसरी
थिरू चढावै थानै।।

कवि रुघजी रतनू आपरै रंग रै दूहां में इण भांत लिखै –

सातम है सिद्धराज री, चहुंकूंटां व्है चाव।
अमलां वेल़ा आपनै, रंग सोलंकी राव।।

सर्पदंश सूं भभूता सिद्ध देवलोक होया। काल़ीनाडी मुख्य स्थान है। आथूणै समूल़ै राजस्थान में घणी मानता। गांव गांव थान। म्हारै दादोसा (गुणजी हरदानजी रा) रा दादोसा सादजी नैं पान लड़ग्यो (सर्पदंश ), उणसूं उणांरो प्राणांत होयग्यो। घर में मातम छायग्यो। भभूता सिद्ध उण दिनां देव प्रगटिया ई हा, उणां रै भूभता सिद्ध रो इष्ट। ऐड़ी मानता है कै उणांनैं भभूता सिद्ध रो दरसाव होयो अर बे दिनुंगै अर्थी मांय सूं ऊभा होयग्या। उठै ऊभां नैं पूरी कथा बताई। खुशी अर आस्था री लहर छायगी। बाद में उणां एक मूर्ति बणाय आपरै घरै थापित करी अर जीया जितै उणरी सेवा करी। बाद में बा ई मूर्ति करनीजी रै मंदिर में थापित करदी गई ताकि सेवा सुचारु होवती रैवै। मूर्ति विषयक एक दूहो हमीरजी मोतीसर रै आखरां में –

महादान रो पोतरो मेसै रो दादोह।
सिद्ध भभूत री देवल़ी चढायग्यो सादोह।।

भलांई आज रै विज्ञान रै जुग में आ बात मनण कै मानणजोग नीं है ला पण आ बात आज म्हांरै भांयखै (इलाको) में चावी है कै सादजी बाजी नैं भभूता सिद्ध रो परचो होयो ।
म्हांरै परिवार में आज ई भभूता सिद्ध रै प्रति घणी आस्था है। एक भभूता सिद्ध री स्तुति आपरी नजर –

दूहा
सूंडाल़ा दीजै सुमत ,सुरसत कीजै साय।
सोलंकी सिद्धराज रो, वरणूं सुजस वणाय।।१
साच करै मन सेवना, नित ही लेवै नाम।
सोलंकी उण संत रा, टाल़ै विघन तमाम।।२

छंद रोमकंद
सिमरूं सिधराज सोलँकीय सांभल़, काज सदा महाराज करै।
पह पाखर साज सु वाज चढै पख, हाथ निजूं दुख दाझ हरै।
कल़ु मांझ चहूंवल़ राज सु कीरत, ईहग साच मनां उचरै।
सिधराज सोलँकीय देव सचाल़िय ध्यान दुनी निस दीह धरै।।३

अग साद जियावत खेत सु आवत, डग भरावत नाग डसै।
मग में मुरझावत साद सुणावत, नेस में धावत प्राण नसै।
जग बात रखावत साद जियावत, प्रीड़ प्रजाल़त दुक्ख दुरै।
सिधराज सोलँकीय देव सचाल़िय ध्यान दुनी निस दीह धरै।।४

सुध भाव सचाव करै मन सायल़, पेख पढै प्रभता प्रघल़ा।
सरणै सँत राख दहै सुख संपत, सोग रु रोग मिटै सगल़ा।
सुभभाल़ सदा अह पाल़ सनातन, जैर अजैर सु होय जरै।
सिधराज सोलँकीय देव सचाल़िय ध्यान दुनी निस दीह धरै।।५

बिछु जैर रहै नहीं ,नाम बकारिय, धीठ धरा मह चोर धसै।
विष ताप लगै नकुं ,जाप जपै वल़, वास काल़िंदर दूर वसै।
परड़ा़ं सँखचूड़ धणी परजाल़िय, साम नुं सेवग युं सिमरै।
सिधराज सोलँकीय देव सचाल़िय ध्यान दुनी निस दीह धरै।।६

थल़ मँगल जोत दिपै निज थानक, जोड़ उभै कर दास जपै।
सरपै कर राख दयाल़िय सांप्रत, आप अभै वरदान अपै।
अरपै कवि गीध इमां असतूतिय, कारण कान पसाव करै।
सिधराज सोलँकीय देव सचाल़िय ध्यान दुनी निस दीह धरै।।७

छप्पय
धरै दुनी तो ध्यान, गान गुण कवियण गावै।
सो पावै सनमान, ओट निज थानग आवै।
उथपै कोइन आण, भूत भय दाल़द भाजै।
पेखो लड़ै न पान, सँतां सुख संपत साजै।
अराधै दास विसवास उर, दान अभै वर दीजियै।
कीजियै मदत गिरधर कहै, रंग सोलंकी रीझियै।।८

~~संदर्भ -छंदां री छौल़ – गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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