भगत माल़ – गीत चित्त ईलोल़ -कवि ब्रह्मदास जी बीठू माड़वा, जैसलमेर

।।गीत – चित्त ईलोल़।।
प्रसण हुय प्रहल़ाद ऊपर, हर दिखाये हत्थ।
पाड़ सब्बल़ दैत्य पाड़्यौ, करण अदभुत कत्थ।।
तौ समरत्थ जी समरत्थ, सारी बात हर समरत्थ।।१

बाल़ धू वन जाय बैठौ, करण सेवस कांम।
देव अपणी ओट लीन्हौ, धणी अवचल़ धांम।
तौ निध नांम जी निध नांम, जग में व्यापियो निध नांम।।२

अगन झाल़ा बीच आये, और नही ऐलाज।
श्रीयादे वड़ देव सिमर्यौ, करण अपणो काज।
तौ महाराज जी महाराज, मिनिया राखिया महाराज।।३

ग्राह पकड़ै खांच गाढौ, सल़ल़ फिरगौ सीस।
तज गरुड़ गजराज तारै, बात बिसवा वीस।
तौ जगदीस जी जगदीस, जन कज दौड़णां जगदीस।।४

अहल्या पद रेण उधरी, कियौ निरभै कीर।
विभिखण कुं लंक बगसी, साथ राखण सीर।।
तौ रघुवीर जी रघुवीर, राखण नाम का रघुवीर।।५

भीलड़ी चुग किया भेल़ा, बौत हित सूं बोर।
प्रीत कर रघुनाथ पाया, कोय’क खांडी कोर।।
तो किशोर जी किशोर, किरपा करणहार किशोर।।६

पेख दास कबीर पड़िया, सांकड़े निज संत।
बार ढाल़ी आंण बाल़द, जेथ उधरै जंत।।
तौ भगवंत जी भगवंत, भगतां वाहरू भगवंत।।७

नरसलाकूं जांण निरधन, कोण हासी कीन।
होय सांवल़ साह हूंडी, द्वारका भर दीन।
तौ आधीन जी आधीन ईस्वर सेवगां आधीन।।८

छदामा के तंडल सारै, पावतां कर प्यार।
किसन सौव्रन पुरी कीनी, साख भर संसार।
तौ दातार जी दातार, दाल़द भांजणौ दातार।।९

छांन छीपै तणी छाई, मगन होय मुरार।
देवरौ उलटाय दीनौ, सरब कारज सार।।
तौ बल़िहार जी बल़िहार, पत ब्रजचंद पाल़णहार।।१०

द्रौपदी की बेर दीठी, मेट सब्ब मरोड़।
खांच थाकौ चीर कूं खल़, आवियौ नह ओड़।
तौ रणछोड़ जी रणछोड़ राखण लाज हर रणछोड़।।११

कहा सेवा करी करमां, भलौ आयौ भाय।
धाबल़ै रो धार पड़दौ, खीचड़ौ ग्या खाय।।
तौ हर राम जी हर रांम, है नित प्रीत वस हर राम।।१२

कहर सुरपत कोप कीनौ, सात दीन असराल़।
नीर बूठौ हुवौ नेक न, बिरज बंकौ वाल़।।
तौ गोपाल़ जी गोपाल़, गिरवर धारियौ गोपाल़।।१३

संत दादू दास सेती, मुगल़ मतकै मंद।
दूठ हाथी छोड़ दीनौ, रयौ सैभर रंद।
तौ गोविंद जी गोविंद, गैवर टाल़ियौ गोविंद।।१४

करण अपणौ नेम कूडौ, रचाणौ भाराथ।
हेत भीसम चक्र गहियौ, हुवौ ऊंचौ हाथ।
तौ जगनाथ जी जगनाथ, जन पण पाल़णा जगनाथ।।१५

मेडत्यां कुल़ मुरधरां मझ, अधपत्यां आधार।
मगन मूरत मांही नरतन, लई मीरां लार।।
तौ रिझवार जी रिझवार, भगवत गावतां रिझवार।।१६

सेन लागौ संत सेवा, भाव धर उर भूर।
रूप धर कर सेन को हरि, करी दुविधा दूर।।
तौ भरपूर जी भरपूर भगवत भाव सूं भरपूर।।१७

सीसोद्यां सिरताज नृपसूं, करी चुगली काय।
भवन खांडौ काठ को कर, लाख कौ तन खाय।।
तौ हरिराय जी हरि राय, पलट्यौ खड़ग तत हरि राय।।१८

संत दादू ब्रह्म आदू महा निरपख चाल।
दुस्टता सूं वैर कीनौ, मुवौ हुय बेहाल।।
तौ हरिलाल जी हरिलाल, है नित भक्ति पख हरि लाल।।१९

कहा गणिका वेद पढियौ, जात की कुलहीन।
सूवटा कौ प्यार करतां, मुक्त मारग लीन।।
तौ आधीन जी आधीन, ईस्वर सेवगां आधीन।।२०

बोर पाया वेद गाया, चाख बांध्या चीर।
प्रेम सूं इधकार कीनौ, बैठ सुलता तीर।।
तौ रघुवीर जी रघुवीर, राखण नांम हर रघुवीर।।२१

धनै धीरज धार मन में, कियौ हरि सूं काज।
बिनां वायां निपजायौ, हुवौ बहतौ नाज।।
तौ सिरताज जी सिरताज, संतां सीस पर सिरताज।।२२

दास मीरां साच प्रगट्यौ, उदै भये अंकूर।।
जहर प्याला अमि जरिया, प्रगट पीना पूर।।
तौ हजूर जी हजूर, हाजर भगत हेत हजूर।।२३

सिख दरिया प्रेम सतगुरु, दयण रसोई द्वार।
सिराणै गा मेल सूता, हूंडी सिरजणहार।।
तौ किरतार जी किरतार, कारज सारिया किरतार।।२४

ब्रह्म दास माहेस ब्रह्मा, धरत निस दिन ध्यांन।
देख संकट ऊठ दौड़ै, देण निरभै दांन।
तौ भगवांन जी भगवांन, भगतां तारणौ भगवांन।।२५

~~कवि ब्रह्मदास जी बीठू माड़वा, जैसलमेर

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