भगवान ना ओळुम्भा २०२५ मे काळ पड़ने पर – कवि स्व. भँवरदान जी वीठू “मधुकर” (झणकली)

॥छन्द जात झुलणा॥

अनादी वखत सूं तुमारी आस पर, जला कर अटल विश्वास जोती।
मरुधरा वासीयां कष्ट मोटा आया, पेट बांधे पढी पोथी।
ग्वाळ गोपाळ रा गीत गाया उठे, आज क्यां धेन माता उदासी।
आफती निवारण आवजो ईश, जगदीश वर तुम्हारी पेट जासी,
ए प्रभु पेट पाल्यां बिना पेठ जासी ॥१॥

इन्द्र महाराज री साख बावल उड़ी, काम करती नही आंख कांणी।
बाढ सु पूर्वी हिन्द बूडे रयो, पछम वरस्यो नही बून्द पाणी।
हर तरफ हाय तोबा मची हिन्द मां, आप बिन बंधावे कोण आसी।
आफती निवारण आवजो ईश, जगदीश वर तुम्हारी पेट जासी
ए प्रभु पेट पाल्यां बिना पेठ जासी॥२॥

सुगम जोतीस सब संत साखी थकी, पड़ते पछतावीया घ्रत पुणे।
भोमीया देवता भूत भड़ भागीया, धाप भोपा गया शीश धूणे।
मंत्र जादू जंन्त्र तंन्त्र माटी मीलया, वाजती देख आंधी विनाशी।
आफती निवारण आवजो ईश, जगदीश वर तुम्हारी पेट जासी
ए प्रभु पेट पाल्यां बिना पेठ जासी॥३॥

भई विधवा धरा नग्न गिरवर भया वन सती किया कंगाळ वाना।
सेठाणी कळे कर पालीयो सेठ ना, उधारि तोलतां एक आना।
पचीसे मवेशी मार पाधर किया, निरखतां लख छावीसो शाख नाशी
आफती निवारण आवजो ईश, जगदीश वर तुम्हारी पेट जासी
ए प्रभु पेट पाल्यां बिना पेठ जासी॥४॥

निरखतां बीज आकाश नेणां थकी, थकी सरकार दातार थाका।
पल्क दरियाव नां पोच किण री प्रभु, सात काळा सके जोड़ साकां।
राज फेमिन रो काज थाले रयो, आज मजदूर भटके उदासी।
आफती निवारण आवजो ईश, जगदीश वर तुम्हारी पेट जासी
ए प्रभु पेट पाल्यां बिना पेठ जासी॥५॥

भये बेहाल हम तुमारे भरोसे, देख तुमको दया नही आई।
नाम करुणा निधि राख नारायण, वखत पर राख लीजे बड़ाई।
रुसिया चीन विशवास छोड़े रया, होवेला हिन्द मा अवर हासी॥
आफती निवारण आवजो ईश, जगदीश वर तुम्हारी पेट जासी
ए प्रभु पेट पाल्यां बिना पेठ जासी॥६।।

कांपवा फंद गजराज रो केशवा, सवारी छोड़ पेदल सिधाया।
द्रोपदी तणी फरियाद सुण दोड़ियो, लाज कज हजारा चीर लाया।
अनेको दुखी अबला लखे आज क्यू, बूढीयो वण्यो बेकूंट वासी॥
आफती निवारण आवजो ईश, जगदीश वर तुम्हारी पेट जासी
ए प्रभु पेट पाल्यां बिना पेठ जासी॥७॥

उधमी भागीरथ आज रा इन्जीनियर, बांध कर भाखड़ा बंद भारी।
काल ना पछाड़न करम पोरष करे, त्रिवेणी लाण कीधी तेयारी।
आवता नहर नलकूप ईण देश मा, आपरी करेला कुण आसी।
आफती निवारण आवजो ईश, जगदीश वर तुम्हारी पेट जासी
ए प्रभु पेट पाल्यां बिना पेठ जासी॥८॥

मनुज कदमां तले दाबीयो चन्द्रमा, मंगल गुरु शुक्र मां मीठ घाती।
आविया जाण रोकेट अमरा पूरी, छनी महाराज री चीर छाती।
मांण नी तज्यो तो हेक दिन मानवी, आप ना लेण बेकुट आसी।
आफती निवारण आवजो ईश, जगदीश वर तुम्हारी पेट जासी
ए प्रभु पेट पाल्यां बिना पेठ जासी॥९॥

मेट सांसो मरुधरा मां मेह कर, सही संकट हरण नाम साजो।
बिलखते ग्वाल रे काज दिनां बंधु, वळे इक बार गोपाल वाजो।
काल कटजो हरी तुमारी क्रीत पर गीत बारट भंवरदान गासी।
आफती निवारण आवजो ईश, जगदीश वर तुम्हारी पेट जासी
ए प्रभु पेट पाल्यां बिना पेठ जासी॥१०॥

~~कवि स्व. भँवरदान जी वीठू “मधुकर” (झणकली)
(टंकणकर्ता भगवान दान हुकम दान जी झणकली)

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