भइयो भाटी भैर!

दिन ऊगां दातार, आखै जस सारी इल़ा।
सूमां रो संसार, नाम न जाणै नाथिया।।

कवि कितरी सतोल अर सखरी बात कैयी है कै दातार भलांई कदै ई हुयो हुसी पण उणरो नाम सारी धरती जाणै अर सूमां रो नाम कोई लैणो ई नीं चावै।

इणी खातर तो ईसरदासजी नै ई कैणो पड़्यो कै ‘दियां रा देवल़ चढै’ देवै सो अमर अर नीं देवै तो कवियां निशंक कह्यो है-

सर्वगुन ज्ञाता होय यद्यपि विधाता हो पे,
दाता जो न होय तो हमारे कौन काम को?

दातारगी रो कोई छेह नीं। मणां री ई दातारगी अर कणां री ई दातारगी हुवै। देवणियै रो मन अर लेवणियै री हैसियत माथै दातारगी री कूंत कवियां करी है।

इतियास में साधारण सूं साधारण मिनख आपरी उदारता रै पाण आज ई मोटै मिनखां री पंगत में भेल़ा गिणीजै। ऐड़ो ई एक साधारण मिनख हो भैरजी भाटी

खारिया गांम रो भाटी। जठै नाम रै मुजब ई पाणी अर कैर कंटाल़ां रूंखां रै टाल़ कीं नीं पण जद जोधपुर महाराजा मानसिंहजी अठै परणिया तो गांगी ई गीतां में गाईजण लागी। अठै रा भाटी सूरजमल भगवानदासोत आपरी बाई मानसिंहजी नै परणाई। कह्यो जावै कै भैरजी इण बाई रा भाई हा पण भैरजी माथै विरचित दूहां में सूरजमलजी रो नाम कविया़ं बाप री ठौड़ नीं लिख्यो है। कठै ई हिंदाल़जी तो कठै गैमरजी नाम मिलै-

थर मंडल थारोह, गैरो मंडल गैमरा।

थारी विरियां थाल़, हद बाज्या हींदाल़ रा।।

लागै किणी दो नायकां रै माथै रचित दूहां रो घालमेल़ हुयग्यो। खैर ओ इतियास रो विषय है पण इणमें कोइ संशय नीं है कै भैरजी महाराजा रा साल़ा हा। कठरूप इतरा कै देख्यां भैंस ई भिड़क जावै। पण आपां जाणां कै रूप तो उधारो मिलै नीं अर नीं रूप रो कीं बटै। नाम तो लारै, कियै काम सूं ऊबरै।

भैरजी रै एक ई व्यसन हो कै दिल खोल’र दातारगी करै। कोई पण आवो अर भैरजी कनै सूं चावो जिकी वुसत ले जावो। भैरजी री कीरत चोखल़ै पसरी। जेड़ोक कवियां कह्यो ई है-

नाई उपगारी गुणी, सिद्ध कारीगर तास।
दाता कवता केतकी, दूर, नजीक सुवास।।

भैरजी री सुजस-सोरम पसरी तो उवा पसरी कै कवियां कवितावां री झड़ां मांडदी। जणै किणी मोटबोलै कवि भैरजी माथै व्यंग्य करतां कह्यो-

पीतो पाणी खारिये, कांकड़ खातो कैर।
महर भई निरप मान री, भइयो भाटी भैर!!

मानसिंहजी भैरजी नै पल़ी रो ठिकाणो दियो। पल़ी पैला रूपावतां री ही पण जद रूपावतां माथै विजयसिंहजी खीझिया जणै खालसै हुयगी। भैरजी जैड़ै दातार रै कारण पल़ी रल़ियावणी लागण लागी क्यूंकै देवै सो मोटो। आ बात एक गरीब ढाढी रिडमल ई सुणी जद उणरै ई चजगी कै गावण-बजावण कै मांगणी करण जावूं जणै पाल़ो जावणो पड़ै। पैंडै सूं बरकां जम जावै। पछै थाकोड़ै सूं सरस गाईजै नीं क्यूंकै कुत्तो घाट खावै कै भुस्सै! तन कैवै आराम कर अर मन कैवै राग कर जिणसूं भाग जागै। सो भैर कनै जावूंलो अर एक पांगल़ लेय’र आवूंलो। आ सोच’र उवो आपरै गांम सूं निकल़्यो अर पल़ी कानी बहीर हुयग्यो। पल़ी सूं कोस-डोढ कोस आगो रह्यो हुसी कै उणरै जची कै खेजड़ियां सांतरी है थोड़ो लूंख बाढ लूं। क्यूंकै भैरजी ऊंठ देवैला तो भटारै नै न्हाखूंलो कांई? आ धार-विचार’र उवो गहडंबर खेजड़ी माथै चढ्यो अर एक-दो टाल़ी छांगी जितरै सताजोग सूं भैरजी आपरै खास जाखोड़ै माथै चढ्योड़ा उठीनै आयग्या। भैरजी देख्यो कै खेजड़ी माथै चढ्यो आदमी लूंख न्हाखै है! इणरै गुढै नीं छाल़ी-रिढ अर नीं कोई डागो अर गांम कोस-डोढ कोस आगो तो ओ लूंख रो कांई करैलो? आ सोच’र उणां खेजड़ी माथै बैठे आदमी नै पूछ्यो-
“कुण है रे?”

“हूं रिडमलियो ढाढी। ”

“तो थारै गुढै नीं रिढ-छाल़ी अर नीं कोई डागो तो पछै ओ लूंख किण वासतै बाढै?” भेरजी पूछ्यो तो दमामी कह्यो-
“हूं पल़ी जाय रह्यो हूं अर उठै भैरजी म्हनै ऊंठ देवैला सो उण ऊंठ वासतै ओ लूंख बाढ रह्यो हूं। ”

आ थारै कीकर जचगी कै तनै मांगता ई भैरजी ऊंठ दे देवैला! जे उवै नटग्या तो?”

आ बात भैरजी कैयी तो उण ढाढी पाछो कह्यो-
“हुकम! जे मांगणियै नै भैरजी नट जावै तो आप पक्की मानजो गोरख ज्ञानहीण हुय जासी। खीर-समंदर सूख जासी, अर आसमान धरती माथै पड़ जासी। जे ऐ बातां असंभव है तो भैर रो नटणो ई असंभव है–

खीर सँमदर ना घटै, गोरख हटै न ग्यान।
जे भाटी भैरो नटै, उलट पड़ै असमान।।

आ दूहो सुण’र भैरजी कह्यो-
“बात थारी सटीक है पण तूं एक गरीब ढाढी है अर ढाढी नै उणां ऊंठ नीं दियो तो?”

“अरे नीं हुकम! इंदर वरसती वेल़ा महल अर अकूरड़ी में कोई भेद करै भला?

महल अरोड़ी एकमन, वरसै एकण धार।
भैर गरीबां भाग रो, इंद्र लियो अवतार।।

दूहो सुण भैरजी कह्यो- “वाह रे वाह! बात तो थारी ठीक है पण पल़ी में कांई नेपो है रे? धड़ांं री धरती ! उठै कठै ऊंठ है ? जे तूं माल़वै किणी ठाकर नै जाचण जावतो तो कोई बात ई बणती। ”

आ बात सुण’र ढाढी उणी विश्वास सूं पाछो कह्यो–

मांगण जाय मल़ीह, दूर पराये देश में।
पारस भैर पल़ीह, मुरधर में ही माल़वो।

कीरत हुय कालीह, मनकर चाली मालवै।
वुसतां दे वालीह, भाटी राखी भैरजी।।

“वाह रे रिड़मला वाह! ले खेजड़ी सूं नीचो उतर अर इण डागै नै ले। ओ ऊंठ तनै दियो।”

जणै उण पाछो कह्यो-
“हुकम! थांरै सूं ऊंठ नीं लूं ! थे थांरै मारग जावो। हूं तो भैरजी सूं ई ऊंठ लेऊंलो-

भाटी भैरवियाह, कव वसीरा तैं किया।
मंगजण मोल लियाह, आंक दिया सिर ऊपरै।।”

भैरजी दूहा सुण गदगद हुयग्या। उणां कह्यो-
“काला तूं भैरजी नै ओल़खै कै नीं?”

जणै ढाढी कह्यो-
“नीं हुकम! हूं ओल़खूं नीं पण म्हनै भैरजी ओल़खै कै इणरै ऊंठ री चाहना है सो उवै मतै ई दे देवैला। ”

जणै भैरजी कह्यो-
“हूं ईज भैरो भाटी हूं। ले ओ ऊंठ तनै दियो। चढ’र पाछो थांरै गांम जा। ”

“वाह भैरजी वाह! बापो! बापो!! पण हुकम पछै आप किण सवारी माथै चढोला?”

“म्हैं ओ ऊंठ तनै दे चूको सो ई माथै हमें आगै चढ’र नीं जावूं। ले बधा ऊंठ। ”
भैरजी कह्यो तो उण ढाढी आगै दूहो कह्यो–

भाटी तूं भोपाल़, जस री रात ज जनमियो।
थारी वरियां थाल़, हद बाज्यां हींदाल़ रा।।

ढाढी ऊंठ लेय घरै कानी बहीर हुयो। मारग में उणनै एक बारठजी मिलग्या। रिड़मलै नै चड़ी वाल़ै ऊंठ माथै चढ्यो देख्यो तो पूछ्यो-
“ऊंठ माथै किण चढायो रे?”

जणै उण एक दूहो कह्यो-

पल़ी रूंख रल़ियावण, ज्यां लग भाटी भैर !
मंगजण हंदो माल़वौ, नितरी बांटै खैर !!

दूहो सुण बारठजी कह्यो-
“काला जुलम किया! इण दूहे सूं भैरजी री ऐल़ नीं बैवै। पल़ी रा रूंख भैर है जितरै रल़ियावणा है ! पछै नीं।

खैर कारण कोई पण रह्यो हुसी पण भैरजी री ऐल़ नीं हाली। पण भैरजी री कीरत-लता घणी पसरी समकालीन चारण कवेसरां ई गीत, दूहा अर कवित्त घणा कह्या–

थल़ थोथा मोथा मँडल़, तल़ खेजड़ तमांम।
जिथ भाटी भैरो वसै, व्रनखट रो विसराम।।

भैरो भणकारोह, नाकारो दीधो नहीं।
जादम जस थारोह, जूनो हुवै न च्यारजुग।।

भूपत डूंगो भाखरी, भैर पल्ली कुल़भांण।
बापो! पीथल बांमणूं, घोड़ा दे घण जाण।।

किणी चारण कवेसर लिख्यो है कै कीरती रो असली स्वाद कांई हुवै? आ बात भैरजी पल़ी सावजोग रूप सूं जाणी–

दैत हय धाटी ऊंठ आठी भटी छाई ऐसी,
बीच थल़वाटी कल़वृच्छ सो कहायो है।
काटी है विपत जिग पढै जस पाटी कव,
खाटी को सवाद एक भैर भाटी पायो है।

आज ई आथूणै राजस्थान में भैरजी भाटी पल़ी रो नाम सिरै दातारां में लिरीजै अर लिरीजतो रैसी।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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