भवाष्टक – कवि जोगीदान कविया (सेवापुरा)

भवा अन्न तू धन्न तू विश्व व्यापै,भवा कर्म तू धर्म तू आप आपै।
भवा नेम तू व्रत तू सृष्टि साधै, भवा काम सारै लियाँ नाम आपे।।१।।

भवा भक्त रै रूप तू शक्ति सेवै,भवा शक्ति रै रूप तू भक्ति देवै।
भवा भक्ति रे रूप तू चित्त सोधै, भवा चित्त रै रूप तू धी प्रबोधै।।२।।

भवा धीय रे रूप तू भेद जानै,भवा भेद रै रूप तू एक मानै।
भवा एक रै रूप अन्नेक भासै,भवा रूप अन्नेक तू भ्रम्म नासै।।३।।

भवा भ्रम रै रूप तू भो भ्रमाव,भवा पार तोरा नहीँ कोय पावै।
भवा मच्छ रे रूप तू बेद तारै, भवा कच्छ रै रूप पाहाड़ धारै।।४।।

भवा बाराह रूप भूमि त्यारी,भवा नृसिंहा रूप प्रहलाद प्यारी।
भवा वामना रूप तू बल्लि छल्यो,भवा पर्शु रै रूप माँ घात घल्यो।।५।

भवा राम रै रूप रावण्ण मार्यो, भवा कृष्ण रै रूप तू कंस जार्यो।
भवा बुद्ध रै रूप तू बुद्धि देवै भवा कल्कि रै रूप औतार लेवै।।६।।

भवा कौशल्या रूप तू राम जायो, भवा राम रै रूप तू नाम पायो।
भवा देवकी रूप तू कृष्ण कीधो,भवा कृष्ण रै रूप तू ज्ञान दीधो।।७।।

भवा द्रोपदी रूप तू पण्डु भेटै, भवा पण्डवाँ रूप तू कैरु मेटै।
भवा चीर व्है द्रोपदी लाज राखी, भवा विश्व विश्वेसरी सर्व साखी।।८।।
~~कवि जोगीदान कविया (सेवापुरा) कृत

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