भोम नमो भाद्रेस!!

भक्त कवि पीरदानजी लाल़स आपरै मानस गुरु ‘ईशरा परमेसरा’ नै वंदन करतां सटीक ई लिख्यो है-

उथियै साहब ऊपना, भोम नमो भाद्रेस।
पीरदान लागै पगां, ईसाणंद आदेश!!

आथूणी धरा रो ओ गांम सांसणां रो सेहरो है।

मल्लीनाथजी ओ दतब पूनसी रोहड़िया नै दियो। पूनसी आपरै भाई गादूजी रै साथै अठै रैवास कियो।

गादूजी बारठ री परंपरा में भक्त बारठ दीतोजी अर दीतैजी रै सूरोजी, आसोजी, जैतोजी, चागोजी, जीयोजी, राघवजी मेहाजल़जी आद सात बेटा अर बेटी देपू होई।

आं देपू नै प्रसिद्ध कवि दल्लाजी आसिया लाकड़थूंम नै परणाई। इणी दल्लाजी नै सिरोही राव सुरताण खांण गांम इनायत कियो। देपू साहसी अर ऊरमा वाल़ी लुगाई हा। जद इणां रै भाईयां जोधपुर राव मालदेवजी माथै कटारी खाधी उण बखत देपू ई आपरै भाईयां सूं हरावल़ हा!!

नैणसी ‘मारवाड़ रै परगना री विगत’ में लिखे-
“तरै आसै, राघव, चागौ, मेहाजल़ पांचे ई भाईयां बहन देपू जोधपुर गल़ै घाती। तो ईशरदासजी रै विषय में बांकीदासजी आपरी ख्यात में लिखै-
“ईसर सूरावत, सूरो दीतावत।”

हालांकै ‘महाकवि ईशरदास बारहठ की प्रमाणिक जीवनी’ रा लेखक महादानसिंह बारहठ, ईशरदास जी री वंश परंपरा री ओल़खाण देतां लिखै कै ‘पूनसी-ऊदोजी-सूरोजी-ईशरदास’।

अबै किसी वंशावली सटीक है कैयो नीं सकै पण मोकल़ी जूनी पांडुलिपियां में ईशरदासजी रै नाम आगै ईशर दीतावत अर आसो दीतावत लिख्यो मिलै।

आसाजी रै विषय में तो एक दूहो घणो चावो है-

दीतावत मालम दुनी, सो जाणै संसार।
नाथूसर मथुरा नगर, आसो हरि अवतार।।

‘बीकानेर रै सांसणां रै विगत री बही’ में इणां रै भाई जीये नै नीलको अर आसैजी नै नाथूसर देवण रो दाखलो इणविध है-
‘गांव नीलको बारहट जीये दीतावत नू़ं महाराज श्री कल्याणमलजी रो दत। ‘ आगै इणी बही में – गांव नाथूसर बारहट आसै दीतावत नु करमसी लूणकरणोत कुंवर पदे थकां कोड़़ रै भरणै मांहे दीन्हो। ‘

दयालदासजी आपरी ख्यात में लिखै कै आसाजी रै औलाद रैयी नीं जद नाथूसर आसिये पीरदान रै बेटां नै दे दियो पण जद भाद्रेस सूं इणां रा भाई राघव अर जैतो आया अर रायसिंहजी सूं अरज करी जद महाराजा राघव-जैतै दीतावत नै नाथूसर पाछो दे दियो-
“जिण आसै रै औलाद रही नहीं। तारां गांम भाद्रेस सूं इणां रा भाई राघौ तथा जैतौ आया चाकरी में रजू हुवा। गांव पटै राघै-जैतै दीतावत रै हुवौ।”

इणी भोम भाद्रेस में आगै जायर जैमल रोहड़ियो हुया। जिकै कवि अर नामी मिनख हा। इणांरो एक कारू हो, माल जात रो कुंभार सादूल़ो।

सादूल़ो इणां री चांटी काढण में हरमेस आगीवाण।

एक दिन जैमलजी बाजीसा आपरी उटीपी बाण में कोई छंद पढै हा, सादूल़ो मोहित भाव सूं दत्तचित्त होय सुणै हो।

ज्यूं ई बाजीसा ढबिया अर सादूल़ उणां रा पग पकड़िया।

बाजीसा आपरै बडेरचारै मुजब उणनै कैयो कै – आडो-बूढो डोकरो होय, पूत-परिवार वालो होय। जुगां जीवतो रैय। पण सादूल़ पग नीं छोडिया जणै बाजीसा कैयो-“रे सादूल़ा कांई बात है? आज पग जरू घणा झालिया है! कांई हंकराणो चावै?”

जणै सादूल़ बोलियो कै “बा! वचन दो तो कैवूं ! नींतर आज म्हारो माथो थांरै पगां में ई रैसी!!”

“वचन री कांई जरूत ? थारै सूं कीं आछो नीं। ऐ गाय, ऊंठ, घोड़ी, खेत जको मांगै सो थारा ई है!!” बाजीसा कैयो जणै पाछो सादूल़ कैयो “नीं बा! ऐ कीं नीं चाहीजै!! म्हनै तो जको मांगूं सो देवो जणै तो ठीक है नींतर माईतरां रा पग है, म्हारो माथो छौ पड़ियो।”

“वचन ! तूं जको मांगै सो थारो काला!! तूं ई मांझो (मेरा) धरम रो डीकरो है!!” बाजीसा कैयो जणै सादूल़ कैयो कै – “हुकम ! म्हनै ई कविता सीखावो!! आप जैड़ी र जैड़ी!!”

“इतरी ज बात है! इणमें इतरै हठ री कांई बात? ढोली रो छोरो रोवै तो ई राग में! तनै ऐड़ी कविता सीखावूंलो जको लोग म्हनै भलांई याद राखै कै नीं राखै पण तनै अवश याद राखसी!!” बाजीसा कैयो।

अबै बाजीसा उणनै कविता सीखावणी शुरू की।

सादूल़ ई धुन रो पक्को नीकल़ियो जको एक-दो साल में ई नामी कविता करणी सीख ली। उटीपा गीत बणावण अर सुणावण लागो। बाजीसा नै आपरै शिष्य माथै पूरो पतियारो होयग्यो जणै उणां एक दिन कैयो – “रे सादूल़ा! महाराणा राजसिंह जिण वीरत सूं रूपनगढ़ री कुंवरी चारूमति नै ओरंगजेब सूं माडै परण लाया। उणां रो इण विषय में कोई गीत बणा! जको उदयपुर हाल दरबार नै थारै सूं कानपसाव करावां।”

जणै दो उटीपा गीत सादूल़ बणाय बाजीसा नै सुणाया।

गीत सुण बाजीसा कैयो – “वाह सादूल़ वाह!! थारा गीत किणी टणकसिंह चारण सूं कम नीं है। म्हारी मेहनत घिरी। सवार रा घोड़ी त्यार कर जको हमे खाटू ई जावणो है जणै मोटोड़ी ई जावांला।” बाजीसा कैयो।

सवार रा दोनूं उदयपुर बहीर होया। दिन लागां उदयपुर पूगा। दरबार में हाजर होवण सारू बाजीसा कैवायो। जैमलजी रो नाम चावो हो सो दरबार रजा दी। रीत मुजब बाजीसा अभिवादन कियो अर कैयो – “हुकम ! आपरी अनुमति होवै तो इण छोकरियै सूं गीत पढावू़ं!!” आ सुण उणां कैयो कै-“बा ! पैला इणरी ओल़खाण तो दो कै ओ आपरो डीकरो है कै कोई तन-गिनायत!!”

आ सुण बाजीसा कैयो – “हुकम ओ म्हारै धरम रो डीकरो है। म्हारो कारू है। कुंभार सादूल़ो!!”

बाजीसा री बात पूरी ई नीं होई जितै उठै बैठो कोई बोलियो – “कुंभार है जणै, अठै कांई काम ? डोभर (बर्तन) घड़ ! न्याई पक्का!! कठै ई हांडकै-तामणिया दे!! अठै इणरो कांई काम? वो ई भल़ै कविता रो?” –

मोती बींधण जल़ तिरण, दैण मूढ नै सीख।
कविता करबो बोलबो, बोत काम बारीक!!

आ सुण बाजीसा दरबार साम्हीं जोवतां कैयो – “हुकम ! ओ दो घड़ा पका र लायो है!! कठै ई जोजरा तो नीं रैयग्या या कोई तीणो तो नीं रैयग्यो है सो आपरै अठै बैठै इण कवियां अर सिरदारां सूं पारखा करावण लायो हूं !! सो बजायर लेवो!!”

दरबार कीं बोलता जिण सूं पैला ई जैमलजी कैयो-
“पढ रे छोकरिया !! दीवाण खुद थारै घड़ां री पारखा करैला।”

सादूल़ दो गीत पढिया। जिणरै एक रो भाव तो ओ हो कै महाराणा कुंवरी नै परणती वेल़ा मुंगलां माथै ऐड़ी तोपां छोडी जिणसूं इंद्रलोक धुंवायमान होयग्यो अर शेषनाग उण ताप नै झेल नीं सकियो। जको दोनां री लुगायां आप-आप री शक्ति मुजब धणियां नै राहत पुगावण रा जतन कर रैयी है-

आकुल़त व्याकुल़त चलत नह आंगणै,
पीव किण भांत आरांम पांमै।
सु-कर दे सकर चा नैण मुदै सची,
नागणी नाग सिर घड़ा नामै।।

तो दूसरै गीत में कवि कैयो कै भलांई किसन समर्थ हो ला ! पण शिशुपाल रै डर सूं डरियो कुंदणापुर सूं रुकमणी नै कंवारी ई ले गयो अर आगै जायर ई परणियो जदकै राजसिंह ओरंगजेब सूं अबीह बाजतै ढोलां कुंवरी नै परण लायो-

एह अखियात हिंदू धरम ईखतां,
जका आ क्रीत संसार जाणी।
किसन रुकमण घरै ले गयो कंवारी,
अमर रै कल़ोधर परण आणी।।

ज्यूं ई सादूल़ दोनूं गीत पूरा किया अर त्यूं ई वाह ! वाह! री बोकार साथै पूरै दरबार सादूल़ नै धिनकारियो। दोनां नै महाराणा पूगतो सनमान दे विदा किया।

ठाह नीं आज कितरा लोग बारहठ जैमलजी रो नाम जाणता होसी पण सादूल़ रो नाम साहित्य प्रेमियां बिचाल़ै चावो है।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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