भोर भई अब जाग जीव तू

bhorभोर भई अब जाग जीव तू, आदीतो1 अम्बर आयो।
अरुण-किरण उठ आभै आई, हर पंछी मन हरसायो।।
चहकत द्वार चारु चिड़कलियां, कलियां चटकत सुख चायो।
गलियां महकत गुल-सोरम2 सूं, अलिसुत3 रलियां हित आयो।।
हिमकर4 उतर तजी असवारी5, हिरणी रो मन हरसायो।
दधिसुत6 खिलत छूटियो अलिसुत, कौमुदसुत7 मन कुमलायो।।
नव किसलय8 निरखत सुख निपजै, दरखत-दरखत सरसायो।
सीतल-मन्द-सुगंध समीरण, घर-घर बांटन को आयो।।
उडगन9 उड निजघर को आए, मंगन10 पर घर को धायो।
मस्त मतंगन11 के मद-सोरम12, भँवर उड़त मन भरमायो।।
घर-घर मंगळचार घणेरा, जोत आरती जस गायो।
शंख टकोर नगारां साथै, स्वर झालर मृदु झणणायो।।
आळस नींद छोड सब उठिया, पुनि चकवी प्रीतम पायो।
रविमुखि कमल खिलै रस रँग ले, गोधन वन चरबा धायो।।
जाग जाग मेरे जाग जीव तू, भ्रम आळस उर भरमायो।
सोवत है सो खोवत सांप्रत, गुणियणियां इण विध गायो।।
आसावत गजराज अरज कर, बहुरि गरज कर बतळायो।
जाग्यां इ माण मिलै इण जगती, ‘शक्तिसुत’ इम समझायो।।

~~डॉ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’ 

1 आदीतो- सूरज
2 गुल सोरम- पुष्प की खुशबू
3 अलिसुत -भंवरा
4 हिमकर -चन्द्रमा
5 हिमकर की सवारी-मृग
6 दधिसुत- कमल
7 कौमुद्सुत- कुमोदनी का पुष्प
8 नव किसलय – नये पत्ते/ कोंपल
9 उडगन-तारे
10 मंगन -याचक
11 मतंगन- हाथी
12 मद-सोरम- हाथी के मद में कमल की खुशबु आती है, जिससे भँवरा भ्रमित होकर उसके गंडस्थल के आसपास मंडराने लगता है।

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