भर्तुहरी कृत नीति शतक का राजस्थानी पधानुवाद

🌸दोहा🌸
🌹मंगलाचरण🌹
दिसा काल पूरण दिपै, अनुभव घट आनन्द|
लख्यौ अलख नें भरथरी, नमो सच्चिदानंद||१
समझ जाय ना- समझ ही, समझै समझण हार|
ब्रह्मा गुरू व्है भरतरी, समझै मूढ न सार||२
जडता हर चित साच भर, मान बढे हर पाप|
भरतरी कीरत लोक में, फल सतसंग प्रताप||३
जय रस सिध्ध कविसरां, दिव्य जोत दरसाय|
मरियां भरतरी आप रो, जस तन जुगां न जाय||४
जीणौ मरणौ जगत में, लाख करोडां लोग|
बंस उजाळै भरथरी, जीणो सोही जोग||५
फूलों री छिब फूटरी, दोय भांत दरसाय|
कै तो भरथरी श्रेष्ठ सिर, के झाडां मुरझाय||६
सूर्यकांत मिण जड सही, सुलग सुरज सूं जाय|
अपजस उत्तम पुरूस रो, क्यूं नही कोप कराय||७
सावक छोटा सिंह रा, झपट हाथियाँ जाय|
भरतरि नैना निपट है, ओज सुभावाँ आय||८
घणा जोग गुण खांण है, निबल अनाथां नाथ|
सुणै सकल री भरतरी, सब गुण कंचण साथ||९
तीन गती धन री कही, दान भोग अर नास|
नहि खायौ दीधौ नही, भरतरि अवस विणास||१०
विध्या जस पिंडत भरण, दान भोग दरसाण|
रिछिया जनता राखणी, षटगुण भरतरि जाण||११
दया हीण दहणो वृथा, पर धन पर तिय चित्त|
भरतरि बंधव दुसमणी, नुगरां परगत नीत||१२
भणियो पण कोनी भलौ, सुभ नहीं दुरजण संग|
माथै मिण पण भरतरी, भलौ न काल भुजंग||१३
नेता क्रोधी भरतरी, सदा न निभणौ साथ|
झाल आहुति जाळ दे, होम करंतां हाथ||१४
महा पुरूष सुख समृध्धि, कंवळा पुसब समान|
अवचल वै ही आपरा, करडा वज्र चट्टान||१५
देव एक हरि हर दुहू, भूप जती इक मिन्त|
भरतरि इक पुर विपिन ठा, उमा सती इक चिन्त||१६
फळिया तरु नीचै झुकै, अर बादळ जळ भार|
संपत पा सज्जण निवै, परगत पर उपकार||१७
सुरज कमल खिलाय दै, चंदौ कुमुद खिलाय|
भरतरि बिन ही मांगियां, बादळ जळ बरसाय||१८
गिरी हाथ री घात सूं, उछळै दडी इतीक|
आती जाती भरतरी, संतां विपत कितीक||१९
खीण चन्द पूरण खिलै, कट तरू फेर बढाय|
चिंता मत कर भरतरी, थिर सुख दुख नही थाय||२०
भरतरी आळस मिनख रो, जूनौ दुसमण जांण|
धंधा वाल्हा बन्धु है, होसी कदै न हांण||२१
किया करम फल काम दै, अकल करम अनुसार|
काम छोड कर भरतरी, पहलां सोच विचार||२२
भांण चन्द राहू भखै, पडै भुजंग गज पाश|
पिंडत निरधन पेखियां, विधि गति नहीं विसवास||२३
पिरथी भूषण सतपुरुष, सिरज रतन संसार|
औछी ऊमर आदमी, कीधौ क्यूं किरतार||२४
वन रण शत्रु अगन जल, जो गिरि समदर जाय,
सोवत जागत भरतरी, संचित पुन्न सहाय||२५
चोखौ बुरौ बिचार नें, करसी पिंडत काम|
भरतरि दुख पावै नहीं, नहिं पछतावौ नाम||२६
बणै सुरग बन खंड तौ, दुरजण सज्जण दीठ|
भरतरि अन धन ऊफणै, मिळै पुन्न फळ मीठ||२७
पुहमी एक पराक्रमी, धरणी मेर धुजाय|
प्रगट त्रिलोक प्रकास सूं, भांण एक भर जाय||२८
मां जिम सत व्रत मांण री, कठण निभावण कांण|
भरतरि व्है हसता तजै, प्रण राखण खुद प्रांण||२९
न विध्या तप दान नहीं, धरम शील नहीं ज्ञान|
भार भरतरी भौम वो, है नर पशु समान||३०
ढांढां में ढल भरतरी, वन डूंगर कर वास|
इन्द्र भवन आछौ नहीं, नीचां संग निवास||३१
🌹सवैया🌹
डारण ग्राह री डाढ दबी मिण, हाथ सूं खींच निकाल लो कोई|
छौळ तरंग चढ्या दरियाव में, कूदर पार करौ नर कोई|
नाग छिड्यौ फुफकार करे पण, सेवरौ सीस रै बांध लो कोई|
तौ पण मूरख रा चित मांय नें, भर्तरि ज्ञान असंभव होई||३२
बेकलू रेत सूं तेल कढै नहिं, तोय कढावण संभव जांणूं|
जो म्रग री तृषणा भ्रम री जल, प्यास बुझै तोहि संभव जांणूं|
सींग नहीं खरगोस रे सीस मैं तो वन जंगल खोजर आणूं|
मूरख मारग लावण री जुगती नहीं भर्तरि म्है कोइ जाणूं||३३
पोयण फूल री नाल रा तागां सूं, मस्त महा गजराज बँधावै|
फूल सरैस री पांखडियां बल हीरा नें बींध प्रतक्ष बतावै|
मीठी मधुरस बूंद मिलाय नें खार समंदर मीठौ बणावै|
वो नर ही खल मूढ जणौ समझायर भर्तरि मारग लावै||३४
बारमबार है धिन्न थनै किरतार बडौ उपकार कियौ है|
मांगण नें भटकौ मत भर्तरि औ गुरू तो अणमोल दियौ है|
केडौ ही शंख महा उण मूढ रो ढांकण आप ही आप हुयौ है|
बैठण नें विदवान सभा बस मंतर मून बणाय लियौ है||३५
लाय बुझै जल औषध सूं छतरी इक तावडौ औषध है|
अंकुश हाथि री औषध तो लठ ढौर जिनावर औषध है|
रोग री औषधियाँ कितरी बिछु साँप री मंतर औषध है|
सारि ही औषध लायक भर्तरि मूरख री नहि औषध है|३६
काव्य कला कळसा सूं निकाळ कदी न सुधारस पान कियौ है|
साज संगीत सुधा सरिता रस पैठ कदी नँह स्नान कियौ है|
है जग मांय कळा कितरी पण हाय कदी नहीं ध्यान दियौ है|
भर्तरी वो नर पूंछ ने सींग बिनां त्रण खाय भलांही जियौ है||३७
जितरा कितरा धन माल मिल्या विदया धन ही सिरमौर बतायौ|
लूंट न बाँट न चोर सके नहँ फेर करै उपकार सवायौ|
दान दियां बढसी दुगुणी मरणां लग दीठियौ साथ निभायौ|
भर्तरी रीस करौ मत राजन पिंडत सो धन आप न पायौ||३८
रूप बडौ नर रो विदया छिपियौ धन गुप्त कहै सब भाई|
सै सुख भोग मिळै जस कीरत, उत्तम चीज सुजांण बताई|
बंधु बणै परदेस गयाँ गुरु देवत सिध्ध जिसी दरसाई|
राज समाज में मान बढावण भर्तरि सोच बडी सुखदाई||३९
पिंडत वै परमारथिया ज्यारि बुध्धि अनीत में कीकर आवै|
कूड कमाई करी लिछमी घर मांय नें वां रै कदी नहीं आवै|
राजसी ठाठ नें ठोकर मार नै पिंडत न्याव रो पक्ष लिरावै|
सूत री कोकडी काचा सा ताग सूं भर्तरी हाथी कदी न बँधावै||४०
भूषण कंकण कोकडी कोय नहीं भुजबंध मिणां जडियौ है|
चंदण केसर तेल फूलेल नें हार नहीं हिवडै पडियौ है|
डालि बिचित्र मिठास मृदु जद बैण सुधा श्रवणां सुणियौ है|
भूषण श्रेष्ठ गिरा मुख भूषण बाकी तौ भर्तरि खींण हुयौ है||४१
सजनां उपकार दया परिवार रखै सठ रै संग मैं सठता|
साधु सनेह खलों कुटिलाई रहै नित पंडित सूं निवता|
अरियां बिच सूर छमा गुरुआं कामणि संग न धूरतता|
नर जो हुशियार कला इतरी जद भर्तरि लौकिक री खिंवता||४२
पूत सपूत पतिव्रत नार है, मालिक द्रष्टि सदा सुभकारी|
मिंत सनेही कुटुम्ब बिनां छल रंच नहीं दिल है दुखियारी|
देह सुडौल रहै थिर वैभव सारद वास है कंठ मंझारी|
भर्तरि पूरब कर्म भला इतरा सुख भोग मिलै तन धारी||४३
घात कदी निरदोस नहीं सब जीव दया सत कर्म सुहावै|
दीन सुपातर दान करै पर नारि कथा मुख मौन रहावै|
छोड कुलोभ नमें गुरुआं नित वित्त परायौ न चित्त चहावै|
भर्तरि सास्तर बोल कहै सब औ पुनकर्म कियां फल पावै||४४
नीच मना घबरावणिया विघनां भय काज सरू न करैला|
मध्यम छेडने काज कोई विपदा पडियां मझ में मुकरैला|
उत्तम वृत्ति नरां अवलोकलौ बात जिणी किण हाथ धरैला|
भर्तरि संकट आफत सूं भिड अंत विजै वे हिज वरैला||४५
न्याय सूं प्रीत महापुरूषों अणजोग अाचार कदी न करैला|
संकट री घडियां पडियां बण दीन ज्यूं हाथ नहीं पसरैला|
गौरव मांण निभावण में धड सूं जिण सीस भलांई गिरैला|
भर्तरि खांडा री धार तणै व्रत प्राण पयाण हुयां तक व्हैला||४६
डील बुढापण में गळगौ अर भूख बिहाल अठी निबळाई|
तेज प्रताप विहीन हुऔ तन सांप्रत कष्ट खडा दरसाई|
तौ पण मत्त गयंद कुंभाथल खावण चाह नहीं बिसराई|
सिंह भलौ मर जाय तौ भर्तरि घास र पात कदी नँह खाई||४७

~~नारायण सिंह जी कविया “शिवाकर” नोंख

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