भुवनेशी कात्यायनी स्तुति का भावानुवाद

( मेहाई सतसई – अनुक्रमणिका )

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भुवनेशी कतियांण री, कविता कथवा काज।
आखर दीजो ओपता, मेहाई महराज।।६३३
भजां मात भुवनेश्वरी, मुकुट चन्द्र सुभ साज।
तनें नमन मां त्रंबका, मेहाई महराज।।६३४
मंद मंद मुख हास ;कर, पाशांकुश वरदा ज।
अभयप्रदा, सोहत उमा, मेहाई महराज।।६३५
देव तवन नित दाखता, गद गद कँठ सूं राज।
किनियाणी करूणाकरा, मेहाई महराज।।६३६
सरणागतहरसंकटा, राजी व्हौ रिधु राज।
जगजननी जगपालिनी, मेहाई महराज।।६३७
प्रसन वेय पुहमीस्वरी, रक्ष अखिल रिधु राज।
धरणि चराचर री धणी, मेहाई महराज।।६३८
जगत खंभ जगदीश्वरी, रूप पृथि थित राज।
अनत पराक्रम आप रा, मेहाई महराज।।६३९
जळ मह रह नित जोगणी, जग तें तृप्त किया ज।
सर नद समदर बण सदा, मेहाई महराज।।६४०
वरा, बली मां वैष्णवी, विश्व बीज पण राज।
परा मात परमेश्वरी, मेहाई महराज।।६४१
विश्वविमोहन धा वडी, सब वस थां रिधु राज।
प्रसन वेय देती मुकत, मेहाई महराज।।६४२
कला-शिल्प-काव्यादि में, रूप आप रिधु राज।
विध्या वसुधा री विविध, मेहाई महराज।।६४३
नारी दुनिया री सकल, मूरत थारी मां ज।
जयकारी देवी जयो, मेहाई महराज।।६४४
व्यापकजग तारां तवन, कीकर कथणां राज?।
सबद पदारथ सूं परै(थूं), मेहाई महराज।।६४५
सुरग- मुकति- सुख- दायिनी, सरव रूप थूं मां ज।
स्तुति वदतां औ ह्वी परी, मेहाई महराज।।६४६
आखर एक न बावडै, कीरत कथवा मां ज।
परम उकति पुहमी स्वयं, मेहाई महराज।।६४७
सुरग- मोख-फल दायिनी, बसि नित बुध्धि बिराज।
नमन मात नारायणी, मेहाई महराज।।६४८
कला काठ रूपी कथी, जो परिणाम प्रदाज।
नमन मात नारायणी, मेहाई महराज।।६४९
सगत जगुपसंहार री, समरथ है थूं राज।
नमन मात नारायणी, मेहाई महराज।।६५०
मंगलजग मंगल प्रदा, सिध-सब-अरथ, शिवा ज।
नमन मात नारायणी, मेहाई महराज।।६५१
शरणे थारे त्रंबका, गवरी रूप भवा ज।
नमन मात नारायणी, मेहाई महराज।।६५२
सरजक, पाळक, सोखणी, सकळ जगत रिधु राज।
नमन मात नारायणी, मेहाई महराज।।६५३
गुणाधार गुणमय शिवा, गिरिजा शैल सुता ज।
नमन मात नारायणी, मेहाई महराज।।६५४
दीन दुःखी सरणागतां, नें रक्षे रिधू मां ज।
पीडाहर परमेश्वरी, मेहाई महराज।।६५५
ब्रह्माणी हंसासनी, कुश-जल छिडकण राज!
नमन मात नारायणी, मेहाई महराज।।६५६
नाग- चंद्र -तरशूळधर, वृखभ वाहणी राज।
माहेसी नारायणी, मेहाई महराज।।६५७
कूकड मोरां सूं सगत, रहै घिर्योडी राज।
कौमारी नारायणी, मेहाई महराज।।६५८
गदा-शंख-धनु -चक्र कर, धरण वैश्णवी राज।
प्रसन होहु नारायणी, मेहाई महराज।।६५९
महाचक्र है हाथ जिण, दाढां मँझ दुनिया ज।
रूप वराही राजती, मेहाई महराज।।६६०
नरसिंही खल नाशणी, त्रिभुवन तारण काज।
रता सदा नारायणी, मेहाई महराज।।६६१
देखत नित देशाणपत, सहसनयन सूं राज।
वज्रमुकुटधारी महा, मेहाई महराज।।६६२
वृतासुरक्षयकारणी, ऐन्द्रीरूपां राज।
नमन मात नारायणी, मेहाई महराज।।६६३
शिवदूती, खल बळ हणण, घोर रूप घण गाज।
नमन मात नारायणी, मेहाई महराज।।६६४
डाढाळी विकराळ मुख, नरमुँडमाली राज।
चंड मुंड दंडण चंडिका, मेहाई महराज।।६६५
महारात लिछमी लजा, पुष्टि स्वधा श्रधा ज।
विध्याविध्या जय ध्रुवा, मेहाई महराज।।६६६
मेधा सुरसत भूति वर, ब्राभव तामस राज।
नियता ईशा ईश्वरी, मेहाई महराज।।६६७
सरव रूप सरवेस्वरी, सगति सरवजुत राज।
भयहारी रक्षक नमन, मेहाई महराज।।६६८
सौम्यवदन त्रयनयन तव, भंजण भूरि भयां ज।
रक्ष! रक्ष! माता रिधू, मेहाई महराज।।६६९
ज्वाळामयतरशूळ सूं, हणो कोटि खल राज।
भद्रकाळी भय भंजणी, मेहाई महराज।।६७०
घंटारव खल भंजणो, तेजहरै असुरां ज।
पाप प्रजाळक सरव रो, (तव)मेहाई महराज।।६७१
खडग हाथ धर चंडिका, असुर रगत सिक्ताज।
मम मंगलकारी नमन, मेहाई महराज।।६७२
मन-वांछित मन-कामना, रूठ्यां छिनै राज।
तूठ्यां हरती रोग तन, मेहाई महराज।।६७३
शरण आपरी जो सगत, उण रा संकट थां ज।
(वह)अवर तणो ह्वै आसरो, मेहाई महराज।।६७४
मारण खल महि थें कियो, रूप विभाजित राज।
अवर करै कुण अंबिका, मेहाई महराज।।६७५
विध्या सास्तर वेद मँह, राज बिनां कुण राज।
विसय वर्ण्य थूं बीसहथ, मेहाई महराज।।६७६
मोह-ममत-तम चक्र मँह, भटकावण भव मांझ।
अवर कवण है आप बिन, मेहाई महराज।।६७७
खल, चोरां, अहि, राखसां, जलधि अगन बिच राज।
रखवाळक थूं हिज रिधू, मेहाई महराज।।६७८
अखिल जगत अधिपालिनी, धारे करां धरा ज।
विश्वरूप वंदन तनें, मेहाई महराज।।६७९
व्है वह वंदित खुद स्वयं, जो जन वंदे राज।
वंदनीय विश्वेस्वरी, मेहाई महराज।।६८०
व्है वो जगदाश्रय स्वयं, जो जन नमियो राज।
नमन मात नारायणी, मेहाई महराज।।६८१
रीझो मां जगदीस्वरी, खल दळ खंडण राज।
रिच्छा कर राजेस्वरी, मेहाई महराज।।६८२
सकल अमंगल नासिनी, पातक सरव जळा ज।
रोग महामारी भगा, मेहाई महराज।।६८३
निखिल जगत री पीड हर, चरण शरण हुं राज।
रीझ लोकतिहू पूजिता, मेहाई महराज।।६८४

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