बिरवडी जी रा छंद – कवि कानदासजी

BirwadiMa1

॥दोहा॥
तुं दीधा नूं देव, नरही लीधा नूं नही।
गरवी मां गंगैव, बिरद तुहाळौ बिरवडी॥ 1 ॥
निवत कटक नव लाख, जिण नवघण जिमाडियो।
सुरज शशिहर शाख, बिरद तुहाळौ बिरवडी॥ 2 ॥

॥छंद सारसी (हरिगीत)॥
दांतां बतीसां सौत जाई, लिया दांत सु लोहरा।
अचरज्ज दरशण हुऔ अंबा, मिट्या वादळ मोहरा।
पख दोय पूरी शगत सूरी,पिता हुकम पर वडी।
नित वळां अन वळ दियण नरही, वळां पूरण वरवडी॥ 1 ॥

नव लाख घोडे चढै नवघण, सूमरां घर सल्लडै।
सर सात खळभळ, शेष सळवळ, चार चकधर चल्लडै।
इण रुप चढियो सिंध धरपर इळा रज अंबर अडी।
नित वळां अन वळ दियण नरही, वळां पूरण वरवडी॥ 2 ॥

बायां ते रमवा वेश बाळै नेस हूंतां निसरी।
माहेश दादो शेश मामो इम्म दुय पख ऊजळी।
देशौत नवघण निमत जिण दिन, चाढ नांनी चरवडी।
नित वळां अन वळ दियण नरही, वळां पूरण वरवडी॥ 3 ॥

सह देव समवड आप समवड चोज राखण वड चडी।
तासळां कीधां पान त्रोडै,घणै समचै तिण घडी।
कोइ कळा बिरवड धपै कटकड किया तरपत कुल्लडी।
नित वळां अन वळ दियण नरही, वळां पूरण वरवडी॥ 4॥

अन घिरत अण थह चरु एकण पोहर सहदळ पोंखिया।
कइ वार जीमण कटक पडकै समद जळ घण शोखिया।
उण वार दह मैं नांख आखा, उबकै जळ उण घडी।
नित वळां अन वळ दियण नरही, वळां पूरण वरवडी॥ 5 ॥

दळवाट वहतां कह्यो दवियण थाट ऐ कुण थंभवै।
मुख नाट बोल्यौ जाट मद सूं हाट बळहट किम हुवै।
सुण फेर दिन समराट फिरसी घाट अवळै तिण घडी।
नित वळां अन वळ दियण नरही, वळां पूरण वरवडी॥ 6 ॥

चित्तौड गढ हम्मीर गढपत, थाग को पिंड कोढ रो।
पोहो सजै रथ छौड परसण नेस संखडा निसरो।
परभात बिरवड लगो पावां गयो कोढज तिणघडी।
नित वळां अन वळ दियण नरही, वळां पूरण वरवडी॥ 7॥

कापडी लख जात कारण एकठां हिज आविया।
दोहणे हेकण तुंहीज देवी पंथ बहतां पाविया।
सत धिनो बिरवड कळा सहको प्रसिध नवखंड पर वडी।
नित वळां अन वळ दियण नरही, वळां पूरण वरवडी॥ 8 ॥

भुवा घर निज नार भाळी राब छिल्ली रांधणी।
भण भुण देखत खाण भरियल जांण सासु अडवडी।
चंखडा सधू जो आद चारण वळै तुं मन वरवडी।
नित वळां अन वळ दियण नरही, वळां पूरण वरवडी ॥ 9॥

कामाई तुंही तुंही करनल आद तुंही आवडा।
सहदेव तुंही तुंही शेणल खरी देवल खूबडा।
बड देव वडीआं पाट बिरवड लियां नवलख लोवडी।
नित वळां अन वळ दियण नरही, वळां पूरण वरवडी॥10॥

॥छप्पय॥
सुमरंता सेवतां, पंथ वहतां पाळंता।
गुण गीतां गावतां, मिटै चिन्ता मागंता।
धीणां धानां ध्रवै, नवै निध आवै  नेसां।
पत राखण पाळणी, देश देशां परदेशां।
चंखडा सधू कान्हड चवै, जेण सुजस छायो जमी।
बिरवडी दियण पातां वळां, सूरज उगंतां समी॥ 1 ॥

~~कवि कानदासजी

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