बुद्धि के दाता:गणपति

हुई जब हौड़ नापे कौन जग दौड़,
सारे काम धाम छोड़ बड़े भ्राता बोले ध्यान दे।
मूषक सवार देख धरा को पसार,
तो से पड़ेगी ना पार क्यों न खड़ी-हार मान ले।
एकदंत एकबार कर ले पुनः विचार,
छोड़ अहंकार याके सार को तु जान ले।
‘शक्तिसुत’ षडानन-गजानन बीच ऐसे,
हुई थी जो हौड़ वाको कहूँ सुनो कान दे।।

मूषक से कहे मोर, आई आज मौत तोर,
दौर-दौर ठौर-ठौर हांफ मर जायेगो।
अरे ओ नादान तेरे स्वामी को अज्ञान देख,
केकी हु तें आगे कैसे ऊंदरो आजायेगो।
नान्हो सो सरीर पल दोय में अधीर होय,
खोय निज होश-जोश मात तु खा जायेगो।
‘शक्तिसुत’ कहे केकी, जीत तेरे नांहि लेखी,
मूषक मरेगो स्वामी मातम मनायेगो।।

पाय अनुशासन षडानन ओ गजानन,
निज वाहनन हुं के पीठ आ विराजे हैं।
भरि के उड़ान मोर कियो घनघान शोर,
चारों ओर जोर-जोर षडानन गाजे है।
मूषक निराश, नहीं जीतिबे की आस,
तो पे जिगर जिहास जोर जैसे-तैसे भाजे है।
‘शक्तिसुत’ जंग हुं में जोर वारो जीति जात,
होत जो निजोर लेय लानत वो लाजे है।।

होय के उदास आय वक्रतुण्ड पास,
बोले धीमे से मूषकदास स्वामी धीर धारिये।
वश को न काम नापूं वसुधा तमाम,
लघु चूहे हु को चाम यापे नज़र पसारिये।
कुटुंब के जंग हुं में किते हुं दबंग होउ,
रंग है इसी में जानबूझ कर हारिए।
‘शक्तिसुत’ मूषक के आनन को गजानन,
देख मुस्काये बोले भीति दूर डारिए।।

सोच के उपाय वक्रतुण्ड बतलाय कहे,
मूषक ये मात पिता तीन लोक जानिए।
एक परिक्रमा हु ते जीत ये हमारी होगी,
मन्न में उमंग भर बात मेरी मानिए।
शिवा अरु शंकर की दम्पति की संपति में,
परी है हजार जीति जाय पहचानिए।
‘शक्तिसुत’ बुद्धिमान बालक गणेश जैसे,
ठान जो सको तो प्रण ठाढे एम ठानिये।

जहाँ जहाँ जाए वहीं पदचिह्न पाए,
देखि देखि शरमाए मोर जोर कर भाजे है।
कैसे समझाए कैसे स्वामी को बताए,
मन माहीं पछताए केकी सोच सोच लाजे है।
पहुँचे घर आय तब शिवा समुझाय कह्यो,
माता ओ पिता में लोक सकल विराजे है।
‘शक्तिसुत’ बुद्धि हु को बल तें प्रबल करि,
देवों में प्रथम देव गणपति बाजे है।।

~~डॉ. गजादान चारण “शक्तिसुत”

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