चाळकनेची चामुंडा – कवि हमीरदान जी रतनू (धडोई)

कवि श्री हमीर जी रतनू गाँव धडोई कच्छ रा राजकवि री कहियोडी चाळकनेची री त्रिभंगी छंद रे मांय स्तुति ।
Chamunda

छंद को श्रीमान सुरेन्द्र सिंह जी रतनू की सुमधुर आवाज़ में सुनने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें

॥दोहा॥
गंग गया काशी गया, पावन किया निपाइ।
जग अभया विजया जया, उमिया खमिया आइ॥1
विमळा कमळा वीजळा, चख भुंभळा सुचंग।
महिला अकळा मंगळा, सकळ कळा शिव संग॥2
अवरी अमरी अपछरी, शिकोतरी शकत्त।
आशापुरा अगोचरी, माहेशरी महत्त॥3
जग हरणी करणी जगत, सुर सामण सुभेद।
अशरण शरणी अपरणी, वां वरणी चत्रवेद॥4

॥छंद त्रिभंगी॥
वेदां वंचाणी, पढे पुराणी, क्रोड विनाणी, कतियांणी।
कै काम कमाणी, अकह कहांणी, जय सुर राणी जगजाणी।
भाखे ब्रह्माणी, तुं मन भाणी, अविरळ वांणी, उदंडा।
रव राय रवेची, मुंह माडेची, चाळकनेची, चामुंडा॥1

आशापुरा आई, देव दुगाई, महण मथाई, मंहमाई।
सतशील सदाई, जुध्ध जिताई, गाढ वडाई, गरवाई।
दैतां दुःखदाई, सुरां सहाई, खिति उपाई नव खंडा।
रवराय रवेची, मुंह माडेची, चाळकनेची, चामुंडा॥2

सेवे बह भत्ती, जत्ती सत्ती, आद शगत्ति, अवगत्ती।
पावन प्रकत्ती, वेद वकत्ती, तुं सरसत्ती, त्रिशगति।
महामाय मुरत्ती, उत्तम अत्ती, सत्ती पत्ती पतसुंडा।
रव राय रवेची, मुंह माडेची, चाळकनेची चामुंडा॥3

सुंदर हंसलाळी, सदा सुखाळी, रम्मतियाळी, रतियाळी।
कोहला गिरि वाळी, धरण कमाळी, बुढ्ढी बाळी, बिरदाळी।
त्रिपुराचर ताळी, मन मछराळी, पाप प्रजाळी परचंडा।
रव राय रवेची, मुंह माडेची चाळकनेची चामुंडा॥4

केहरि असवारी, अगन कुंवारी, मांस अहारी, मै वारी।
धन पुहच तिहारी, अज-अवतारी, तुं भव नारी, भवतारी।
पीयण रत पाडा, मारण जाडां, अहर अराडा अरिथंडा।
रव राय रवेची, मुंह माडेची, चाळकनेची, चामुंडा॥5

माता मातंगी, उत्तम अंगी, वाण सुचंगी, वेदंगी।
त्रिचख अरधंगी, लहर तरंगी, निज भेदंगी, नादंगी।
निहकळ नकळंगी, रिध सिध रंगी, अजा उमंगी, उद्दंडा।
रव राय रवेची, मुंह माडेची, चाळकनेची, चामुंडा॥6

वीरां रा टोळां, साथ सबोळां, झुल झकोळां, रमझोळां।
धूपां ढगसोळां, नित्त उधोळां, होय किलोळां, हिंगोळां।
जोगण खैंखट्टा, रुप विकट्टां, खेल झपट्टा खळ खंडां।
रव राय रवेची, मुंह माडेची, चाळकनेची, चामुंडा॥7

उतरे आकाशं, विवरे वासं, वळे विळासं, कवळासं।
वड वडां तमासं, हास हुलासं, जोत प्रकाशं उजासं।
जग व्यापक जोई, कळे न कोई, पार न होई, पाखंडां।
रव राय रवेची, मुंह माडेची, चाळकनेची, चामुंडा॥8

॥कलश छप्पय॥
चाळराय चामुंड, माड मांडण महमाया।
चरिताळी चंडिका, काळिका कायम काया।
नव नेता भव नारि, नवे दुरगा नव निध्ध।
इम हमीर उच्चरै, शरम राखे हर सिध्धि।
सावित्रि गौरी लखमी शगति, गुण रज तमो सतोगुणी।
वीसहथी धनि थारी वडम, जय जाळंपा जोगणी॥

~~कवि हमीरदान जी रतनू (धडोई)

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