चाळकनेची री स्तुति – कवि जगमाल सिंह “ज्वाला” सुरतांणिया कृत

|| दोहा  ||
चूडी झळहऴ चमकती, कडीयां गुंथ्या केश।
उभी मरुधर आंगणै,नमो मां चाळकनेश॥1॥
हेम जड़ीत गळ हारलौ,बिच मंह नंग विशेष।
सोहत सुरज सारखी, नमो मां चाळकनेश॥2॥

|| छंद रोमकंद ||
संग सात सहेलिय आवड भेळिय गीगल गेलिय रास रमै।
नित रोज नवेलिय सांझ सवेलिय भेऴिय खेतरपाळ भमै।
करती घण केलिय आप अकेलिय शेर चढेलिय तुं शगति।
किरपा कर चाळक मात कृपाळक बाळक तोय करे बिनति॥1॥

मिळ ढोल हबोळ त्रंबोळ बजावत डैरव डाक टंकार धुनि।
रमझोळ किलोळ करे दिल खोल हिकोळ उडै घण नाद सुणि।
घणगाज अवाज अग्राज घटा धर अंबर दोय फटै अणति।
किरपा कर चाळक मात कृपाळक बाळक तोय करे बिनति॥2॥

घुंघराळज बाल नमो लटियाळ जबै विकराळ जु काळ लगै।
भल मांग सिंदूर ज शोभित मामड जाण तमां बिच जोत जगै।
अबके अंधियार भयो अवनि बिच छोड अमां मत जा शगति।
किरपा कर चाळक मात कृपाळक बाळक तोय करे बिनति॥3॥

नथ नाक विराजत शोभित छाजत लाजत आज शशि लपियो।
मुख तेज रवि ह्रद शोणित राजत सूरज जाय कठे छुपियो।
हिय हार झळोमळ कान सु कोमळ घुमर झुमर दोय गति।
किरपा कर चाळक मात कृपाळक बाळक तोय करे बिनति॥4

कर झाल कटार थही असवार करे ललकार ज वार कियो।
हणियां अणपार अपार भूमिपर भोम तणो हर भार लियो।
शुंभ मार विचार महाखळ मामड खाय गई जू अगस्त जति।
किरपा कर चाळक मात कृपाळक बाळक तोय करै बिनति॥5॥

बडडाट बजै भलबाट जू बाकर श्रोण पिवे छणणांट चंडी।
गळहुं गडडाट वळे जिम वादळ मोद भरे मडडाट मंडी।
हंसतां हडडाट करै झट हाकल आप घटा अडडाट अति।
किरपा कर चाळक मात कृपाळक बाळक तोय करै बिनति॥6॥

विनवै नित शेष महेश गणेश ज पार नहीं जगदीश पयो।
घणदेश विदेश करी नव वेश तउ लवलेश न भेद लयो।
रहता अवधेश हमेश हमेशज भेश करयो दरवेश जति।
किरपा कर चाळक मात कृपाळक बाळक तोय करे विनति॥7॥

परचा अणपार अपार प्रथी पर मां निरधार आधार दयो।
“जगमाल” पुकार करे हदपार सुणी इण वार उगार लयो।
सब कष्ट निवार करो सुखसार दया दिल धार दयो सुमति।
किरपा कर चाळक मात कृपाळक बाळक तोय करे बिनति॥8॥

|| छंद:छप्पय  ||
धराज थळवट धाम,चाळकना माता रो मठ।
धूप अगरु धमरोळ,चँवर ढुळावत चौसठ।
झालर री झणकार, त्रंबाळू नित्त त्रंबकतां।
डैरव री डणकार,चारणाँ छंद उचरतां।
“जगमाल”दोय कर जोड कह,हिये हेत दरसावजो।
चाळकनेची ममता मयी,सुख स्नेह सुधा सरसावजो

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