चंदू माजी रा छंद


।।दोहा।।
अरि उथाल़ण ईसरी, गाल़ण सालम गात।
टाल़ण दिन नित तापरा, पाल़ण चंदू पात।।

।।छंद – सारसी।।
पीसण उथालण संत पाल़ण, भीर हालण भाणवां।
सालम सालण वसू वाल़ण, जग उजाल़ण जाणवा।
सेव्यां संभाल़ण चाड चालण, दुख दाल़ण दीसरी।
किरपाज सिंधू कर अणंदू आद चंदू ईसरी।।१

अखेसर आई तुं ऊदाई, सुरांराई सज्जिये।
मिल़िये उमाई सगत साई, करण भाई कज्जिये।
वसु राख बाई परभ पाई, सत बडाई संचरी।
किरपाज सिंधू कर अणंदू आद चंदू ईसरी।।२

ताकवा तरणी हाण हरणी, उमंग करणी ऊदरै।
धिन माड धरणी विमल़ वरणी, इल़ा जरणी अवतरै।
भंडार भरणी सकल़ सरणी, सूल़ धरणी शंकरी।
किरपाज सिंधू कर अणंदू आद चंदू ईसरी।।३

बोह रूप धारण बल़ बधारण, जल़्म चारण घर चँडी।
जुग कल़ू कारण अघ्घ जारण, महिख मारण रण मँडी।
भू हुई भारण हेर हारण, नेस तारण नीसरी
किरपाज सिंधू कर अणंदू आद चंदू ईसरी।।४

नेह निज्जर न्हाल़ी विघन बाल़ी, तो दयाल़ी दाखवां।
सांसण सँभाल़ी रंग राल़ी, सत्तवाल़ी साखवां।
आवै उंताल़ी बै बडाल़ी, तवां ताल़ी तीसरी।
किरपाज सिंधू कर अणंदू आद चंदू ईसरी।।५

अंतस उजासा पूर आसा, दूर तासा दाटदे।
वणिये विसासा विदग वासा, खट निरासा काटदे।
हिव समझ भासा कर हुलासा, राज पासा रीझरी।
किरपाज सिंधू कर अणंदू आद चंदू ईसरी।।६

सह काज सारत भिड़ै भारथ, निजू सारथ सापिया।
धर्म नाय धारत मिनख मारत, प्रीत छाडत पापिया।
भयभीत भारत फट पुकारत, सुणै आरत संतरी।
किरपाज सिंधू कर अणंदू आद चंदू ईसरी।।७

कल़जुग कराल़ा बगत काल़ा, वट सचाल़ा विसरिया।
जग ठगी जाल़ा चोर चाल़ा, पाप नाल़ा पसरिया।
बण भीर बाल़ां इण विचाल़ां सज पटाल़ा शंकरी।
किरपाज सिंधू कर अणंदू आद चंदू ईसरी।।८

तुंही करण परघल़ काज करनल, जयो देवल जामणी।
तुंही हुई शीलां रूप हरियल, रूप पेमल रामणी।
तुंही सजै सैणल मात मोगल़, वेल़ वेहल वंसरी।
किरपाज सिंधू कर अणंदू आद चंदू ईसरी।।९

धरुं तोय धीजो ध्यान दीजो, मा पतीजो अम्मणी।
कवि काज कीजो नकूं बीजो, छांह लीजो तम्मणी।
थिर साय थीजो राज रीझो, साद तीजो संभरी।
किरपाज सिंधू कर अणंदू आद चंदू ईसरी।।१०

दासुड़ी माता तु़ही दाता, सुख सातां साजणी।
पसरी प्रभातां ऐह बातां, भीड़ पातां भंजणी।
अबखी ज आतां चढै चातां, वा’र हाथां बीसरी।
किरपाज सिंधू कर अणंदू आद चंदू ईसरी।।११

ईहगां अणडर सजै सध्धर, बीसकर इम बावडी।
पखपाल़ परधर सुकर सिरधर, बाण मुखधर मावड़ी।
गह उनत घर घर आस उरधर, ऐम गिरधर ऊचरी।
किरपाज सिंधू कर अणंदू आद चंदू ईसरी।।१२

।।छप्पय।।
जग वंदे जगत़ब, मुदै संता अघ मेटण।
पूत कपूतां पाल़, भाल़ सुख सातुं भेंटण।
तरणी स़कट टाल़, काज सिग सारा करणी।
ऊदाई अखियात, बात कवेसर वरणी।
जग जरणी तो जाणै जगत, आणै हाजर ईसरी।
सुरराय गीध चंदू सरण, बीसहथी मत वीसरी।।

~~गिरधर दान रतनू “दासोडी”

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