चारण जिकी अमोलख चीज

जोधपुर महाराजा मानसिंहजी अपने साहित्यिक अवदान संवेदनशीलता व गुणग्राहकता के लिए राजस्थानी साहित्यिक जगत में समादृत रहें हैं। इन्होंने अपने प्रिय जनों को बुद्धि, विद्या, चारित्रिक दृढता व शुद्धाचरण की प्रेरणा चारण जाति से ग्रहण करने की नसीहत दी थी। उक्त महाराजा की दृढ मान्यता थी कि जो सत्ता जन-विरोधी आचरण करती है उसका गर्व निवारण चारण कवि अपने सत्य संभाषण से कर उसे सही राह पर लाते हैं अर्थात सत्ता को सत्य के दर्शन कराने में चारण कवि चूकते नहीं है ‘चारण चुभती चोट, हिरदै सबदां री हणै’।

जो लोग चारण काव्य को मात्र ठाकुर सुहाती मानते हैं उनमें से अधिकतर तथाकथित बुद्धजीवी आज के किसी वार्ड पंच/पार्षद अथवा एक साधारण एम एल ए के सामने अपनी बात रखने के लिए दृढता नहीं दिखला सकते तो कल्पना कीजिए कि उस निरंकुश सत्ता के खौफ से बेखौफ चारण कवियों ने किन परिस्थितियों में उनकी आंख से आंख मिलाने का दुस्साहस किया होगा? और उसके क्या परिणाम रहें होंगे? क्या वैसी कविता आज के जनप्रतिनिधियों को सुनाने का ये लोग साहस जुटा सकते हैं?

चारणों की सत्य के प्रति दृढ आस्था, स्वामीभक्ति, चारित्रिक उज्ज्वलता, साहित्यिक अवदान, शक्ति अवतरण की सुदीर्घ पुनीत परंपरा आदि को दृष्टिगत रखते हुए तात्कालिक सत्ता ने इन्हें जो सम्मान दिया वह उन महिपतियों की गुणग्राहकता की वो मिसाल है जिसकी सानी अन्यत्र नहीं मिलती। ऐसी ही कई बातों को समाहित करते हुए मैंने ‘चारण उत्तम चीज’ शीर्षक से कुछ दोहे लिखे हैं —

।।चारण उत्तम चीज।।
उत्तम कुल़ देख्यो अवन, चारण धारण चाय।
सगत हींगल़ा सांपरत, सदन प्रगट सुरराय।।1
करणी जन कलियाण कज, सरब हरण संताप।
चंडी जद घर चारणां, आई आवड़ आप।।2
पर्यावरण पशु प्रेम पुनी, जात सरब सम जाण।
भरण भाव प्रगटी भली, कुल़ चारण किनियाण।।3
ललक पूरणी लोकरी, लेखै काज ललाम।
देखो इण कुल़ देवियां, किया सरब हित काम।।4
मन-तन रू धन माण री, राजावां कर रीझ।
धुर चित कीनी धारणा, चारण उत्तम चीज।।5
महपतियां मानी मुदै, परघल़ साख पतीज।
अंतस आखर आखिया, चारण उत्तम चीज।।6
सुख में मन करता सरस, धिन दुख देता धीज।
भूपां जद ही भाखियो, चारण उत्तम चीज।।7
आतो संकट अचाण रो, भूपां रै सिर भाल़।
डगर विसासी दुरस दिस, पात घरां प्रतपाल़।।8
सुता सुतन घरणी सहित, बिखमी पड़तां वार।
छतरपती झट छोडता, दिल सूं चारण द्वार।।9
छती मात छतराणियां, मनसुध चारण मान।
साखी ख्यातां है सरब, राखी राजस्थान।।10
मरदां मर पूरा दिया, रसा रुखाल़ण रीत।
चावा चारणचार रा, जद गाईजै गीत!।।11
वकता सत बुद्ध रा विमल़, निसदिन पाल़ण नीत।
चरित उजल़ रख चारणां, पाई जग री प्रीत।।12
स्वामी भगती सधरपण, रखणी रजवट रूप।
वीदग जद ही खटक बिन, भट मन भाया भूप।।13
तिल नह राखी ताकवां, फितरत मांय फरेब।
सेवा भूपतियां सजी, जस कज बैय जल़ेब।।14
साच कहण नह संकिया, बहण सदा सतवाट।
रहण समोवड़ राजव्यां, थिर घर चारण थाट।।16
अतियाचार अन्याय पर, जग में बाही झाट।
रेणव साच रुखाल़बा, करी कूड़ री काट।।16
ललचाया नह लोभ सूं, लेस न गिणियो लाभ।
चहुंवल़ राखी चारणां, अपणी कायम आब।।17
स्वाभिमान घट में सदा, पिंड में रजवट पूर।
वसुपतियां कह वांदिया, साचा चारण सूर।।18
सदा सनातन धरम री, रखी पुरातन रीत।
मनसुध चारण मानिया, महपतियां मन मीत।।19
पमँग सुरभियां पाल़णा, वित्त करणा वौपार।
पाई साख इण बल़ प्रबल़, चारण वरण चकार।।20
सेवी सुरसत नैं सदा, आखर कहण अमाम।
सद हद साहित सिरजियो, नवखंड चावो नाम।।21
सगती री भगती सही, उगती कंठ अतोल।
जगती सब जाणी जदै, ईहग वरण अमोल।।22
धरती राजस्थान धिन, गहर धरा गुजरात।
साहित सेवी कोम नैं, हित सूं जोड़ै हाथ।।23
साहित सेवी जात आ, सदियां रही सदैव।
प्रिथमी पूरी पामियो, दरजो चारण देव।।24
दरजो चारण देव रो, सुपहां मन्यो सधीर।
वसुधा ज्यांनै वंदती, (वै)वँदता चारण वीर।।25
छिति उदाहरण है छता, इसड़ा अजै अनेक।
इतियासां पढजो अवस, नीति मन रख नेक।।26
महिपत नामी माढ रो, हो रावल हरराज।
प्रीत प्रघल़ धर पूजिया, किया सिरै कविराज।।27
अंत वेल़ा उण अधपति, अखिया वचन अमोल।
भल सुत मानै भीमड़ा, , तुलै नै ताकव तोल।।28
गढ री चिंता गढपति, भल मत करजै भीम।
ऐह रही घर आंपणै, कवियां प्रीत कदीम।।29
भला निभाया भीमड़ै, बाप तणा थिर बोल।
रेणव रावल़ राखिया, अधपत मान अमोल।।30
भली रखी नित भीमड़ै, पणधर पातां प्रीत।
रँगधर जादम राखिया, तन रा कर ताईत।।31
इणी गादी रै ऊपरै, ऐह हुवो अमरेस।
चुण चुण अरियण चारणां, रावल़ दीधी रेस।।32
तेजल वो रामै तणो, जबर हुवो जदुराण।
चढ अस वैर चितारियो, पातां रो पिंड पाण।।33
रूठो भड़ रामैण रो, केव्या रै सिर काल़।
सधर पातां रो वैर सत, वरधर आयो वाल़।।34
तटक जवन सिर तोड़ियो, तरवारां तेजल्ल।
अमर करी धर ऊपरै, गहर जदू ऐ गल्ल।।35
चूंडावत रिड़मल चढ्यो, वाल़ण मोकल वैर।
चूंथ्या अरि चित्तौड़ रा, जाहर कीना जैर।।36
संकिया मनां सिसोदिया, पौरस रिड़मल पेख।
मतो कियो भड़ मारबा, इल़ पर जम्या अनेक।।37
साम्हीं छाती सूर रै, इम नह पड़ी आसँग।
रची चूक रिड़माल सूं, बोतां जिकी बेढँग।।38
मद पी सूतो मारको, गहर खांचनै घोर।
अरियण आय अचाण रा, अड़िया यूं चहुंओर।।39
रजवट सूं रिड़माल रम, घट घण खाया घाव।
सधरपणै रँग सूरमै, दियो न हीणो डाव।।40
वीर पाई युं वीरगत, बोतां हाथ बताय।
बात जिकी विखियात आ, रचि मारूवै राय।।41
रिपुवां नैं धुर रेस दे, कियो अनोखो काम।
जोध,अड़कमल जाणली, रिड़मल कीधो राम!।।42
मान्यो डर मेवाड़ रो, सुत रिड़मल रां सैंग।
देह छोड बिन दाग ही, खड़िया मुरधर खैंग।।43
कही राण कुंभैण आ, बात सुणो सब वीर।
दाग मती धर दैण दो, सड़ियो पड़ै सरीर।।44
खिड़ियै सांभल़िया खरा, पौचा आखर पेख।
चवियो चांदण यूं चतुर, निरप नीत नीं नेक।।45
चारण चांदण चतुरपण, बात कही वरवीर।
मो ऊभां रिड़माल रो, सडसी नहीं सरीर।।46
म्हूं देसूं रिड़माल नै, दिन धोल़ै कर दाग।
बेटां ज्यूं ही बांधसूं, प्रिथी सोग री पाग।।47
मेदपाट दीधा म्हनैं, गुणपर रीझै गांम।
परहर सूं दीधा पटा, करण कमध रो काम।।48
चांदण कहियो चौवटै, खरी झेलसूं खाग।
रसा चारणपण राखसूं, देसूं रिड़मल दाग।।49
अडर हवेली आपरी, कर निज भांग कपाट।
दे रिड़मल नैं दाग जस, खिड़ियै लीधो खाट।।50
सामभगत उण सूरमै, चार पखां जल़ चाढ।
रँग हाथां रिड़माल़ रा, घाल गँगाजी हाड।।51
जग चारणपण जाणियो, पौरस चांदण पेख।
खिड़ियै हद राखी खरी, टणकाई री टेक।।52
स्वामी भगती साहसपण, धुर संकट में धीज।
इल़ा देख सत आखियो, चारण उत्तम चीज।।53
नीती मग बहिया निडर, खरी अनीती खीझ।
दुनी देख सत दाखियो, चारण उत्तम चीज।।54
आप कनै रख अहरनिस, पत्त प्रथमाद पतीज।
भरी सभा मुख भाखियो, चारण उत्तम चीज।।55
चारुमती कँवरी चवां, रूपनगढ री राज!
रूप निरख आंणै रसा, लोचन रंभा लाज।।56
सुंदरता चरचा सही, पहुमी कियो पसार।
पूगी इक दिन पाधरी, दिल्ली रै दरबार।।57
ओरँगजेब सँभल़ी अवस, कँवरी कीरत कान।
पतसा माडै परणबा, जोड़ी जोधां जान।।58
समाचार कँवरी सुण्या, आवै चढ असुराण।
जबरापण में जोड़सी, पतसा मोसूं पाण।।59
दिगर दीठ दे देखिया, मरद न आयो मींट।
रँज में राणो राजसी, पमँगां दीस्यो पीठ।।60
कागद ले लीधी कलम, लखिया अखर ललाम।
मन मा’राणो मानियो, सांप्रत म्है तो साम।।61
करी भीर जिम कानड़ै, जग रुखमण री जोय।
रँगधर राणा राजसी, हिव मो वाहर होय।।62
पढिया आखर प्रेम रा, सबद -सबद स्वमाण।
जगतावत रो जागियो, अँग दूणो आपाण।।63
धर जातां जातां धरम, निपट निसासी नार।
मरदपणै धुर मरण नै, तण सूं ले तरवार।।64
मही अजै मेवाड़ री, सिरै साख संसार।
मरजादा कज मरणनै, तण सूं ले तरवार।।65
पुरखां कीधो पहुम पर, कीरत -वीरत कार।
इल़ा रखूं कथ ऊजल़ी, ताती ले तरवार।।66
धरती मोटो धरम धुर, समझ लियो मन सार।
महल़ां मंडण माण कज, तण लेवो तरवार।।67
मही सुणै नह महल़ री, पितल़ज जिकै पुकार।
लजवाल़ा कर लेवसी, तणनैं कर तरवार।।68
रखै नहीं रजपूत बे, औरत वाल़ी आब!।
दूठ उठै की देवसी, जगदीसर नैं जाब?।।69
लखियो कँवरी मरम लज, धरम मिनख ऱो धार।
राणै लीनी राजसी, तवां जिकी तरवार।।70
परणी कँवरी पाण सूं, भुजां धरम ऱो भार।
उण दिन राखी ऊजल़ी, तण राणै तरवार।।71
लाज रखण हिंदवाण लख, खा मुगलां पर खार।
राण भल़ाई राजसी, तनै शरम तरवार।।72
राण अडर धिन राजसी, उदियापुर अजरेल।
परण लिवी चढ पदमणी, थट अरियां रा ठेल।।74
आयो ओरँगजेब तण, खार राण पर खाय।
उदियापुर रै ऊपरै, गहर सँकट गहराय।।75
छतरपती गढ छोडियो, जद इम राजड़ जोय।
पह डरतां तज पोल़नै, लारै बहिया लोय।।77
नरै खरै सँभल़ी निडर, अमरावत उणबार।
प्रथम रुखाल़ी पोल़ री, तण बांधू तरवार।।78
प्रगट रुखाल़ी पोल़ री, हित चित दीध हमीर।
अडर पीढियां आजलग, सौदां करी सधीर।।79
सही मौनै सिसोदियां, सदा दियो सनमान।
साच आज सनमान रो, धुर हूं रखसूं ध्यान।।80
ऊभां मो इण पोल़ में, आवै किम असुराण।
पैला दूं इम पोल़ सूं, प्रिसणां सूं भिड़ प्राण।।80
जावै राण तो जाणदो, बदल़ै रखसूं बात।
पह रुखाल़ो पोल़ रो, (हूं)परतख ऊभो पात।।82
नरियै सोदै निडरपण, बोल्या इसड़ा बोल।
रीस धार पग रोपिया, तरवारां कर तोल।।83
मुगलां सूं भिड़ियो मरद, सुजस रखण संसार।
पात आप निज पोल़ रो, भुजां उठायो भार।।84
जोय अरिदल़ झूड़िया, जग जेठी जोधार।
नर पुंगव नरपाल़ियै, चिर्च्यो चारणचार।।85
जोयो नरपत जूझतां, जद नैणां जगदीश।
ईश श्री मुख आखियो, (ओ)अडरां में इकवीस।।86
निडर रखी नरपाल़ियै, ताकवपण री टेक।
प्रिसण न घुसिया पोल़ में, ऊभा पगां न एक।।87
तण रमियो तरवारियां, नमियो नाही नाक।
चोयो नरपत चावसूं, अरियां रै घट आक।।88
मार अरि दल़ मोकल़ा, निपट कियो कज नेक।
वीरगति उ वीरवर, पाई इणविध पेख।।88
परतख निज री पोल़ नै, निडर न करी निरास।
दियो चारभुज चावसूं, सौदै नैं साबास।।90
राणै सुणियो राजसी, कव रो अंजस काम।
इम नरपत उदियाण रो, निकलँक राख्यो नाम।।91
मुकण न देवै माण नैं, खावै रिपूवां खीझ।
राणै कहियो राजसी, चारण ऐड़ी चीज।।92

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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