चारण का वाक् चातुर्य – ठा. नाहरसिंह जसोल संकलित पुस्तक “चारणौं री बातां” से

कच्छ की राजधानी भुज के राजमहलों में कच्छ के राव गौडजी और ओखा का राणा तेजोजी चौपड़ खेल रहे हैं। खेल पूरे यौवनावस्था में हिलोरें ले रहा है। कभी कच्छ के राव के पौ बारह पच्चीस तो कभी, ओखा के राणा के। दाव पर दाव और गोटी पर गोटी उड़ रही थी।

उस समय मांडवी तालुका के काठड़ा गांव का वारू चारण हिंगलाजदान सभा कक्ष में प्रवेश करता है। वारू चारण को गौडजी बावा का मरजीदान होने से राजदरबार में आने जाने की छूट की थी। उसने गौडजी को अभिवादन करते हुए अपना स्थान ग्रहण किया।

थोड़ी देर में खेल समाप्त हुआ। ओखा के राणा ने बाजी जीत ली। वे प्रसन्न मुद्रा में थे।

हंसी ठिठोली के लिए चारण कवियों को छेड़ने हेतु राजपूतों को बड़ा मजा आता है। अनेक विचित्र प्रश्नों की झड़ी लगाकर वे चारणों के वाक्चातुर्य को उकसाते हैं, और चारण की हाजिर जबाबी से, सभा में आनन्द की लहर उठ जाती है। उस समय, चारण कभी खरी खोटी भी सुना देता है तो प्रश्न पूछने वाला उसे सहज भाव से सुन लेता है।

ओखा के राणा तेजोजी कद काठी और रूप के धनी थे। विनोद के लिये हंसते हुए चारण हिंगलाजदान को पूछा-

कविराज एक बात पूछूं?

सात पूछो ना बापू! ऐक ही क्यों?

तो बताओ तुम्हारे राव गोड़जी और मेरे में सुन्दर कौन?

राणाजी! रूप की परीक्षा बिना, अभी कौन सा काम रुक रहा है? हिंगलाजदान जी ने बात टालते कहा।

ना, ना, पर कुछ बोले तो सही, तेजाजी ने अपने आग्रह को दोहराया।

बापू! आप तो अपनी बाजी वापस चालू करो इस बार हमारे गौड बावा जीतेंगे। हिंगलाजदान ने कहा।

“ये बाजी तो बाद में चालू करेंगे। पहले मेरे प्रश्न का उत्तर दो।”

अरे बावा! जाने दो ना! जोगी हठ और राज हठ एक जैसा।

“पर कुछ कहो तो सही।” तेजोजी ने हठ पकड़ा तो ऐसा पकड़ा कि चारण का पीछा छोड़े ही नहीं।

“मैं आपके प्रश्न का उत्तर दूं और आपको अच्छा न लगे तो?”

“जिसे अच्छा न लगे वो दो रोटी अधिक खायेगा।” तेजोजी ने कहा।

गौडजी बावा को भी इन दोनों की बातों में रस आ रहा था। वे चुपचाप बैठे इन दोनों के संवादों का आनन्द ले रहे थे।

तेजोजी के निरन्तर आग्रह से वारू चारण ने देखा कि तेजोजी को उनके प्रश्न का उत्तर तो देना ही पड़ेगा। पर उनके इस विचित्र प्रश्न का उत्तर क्या दिया जाय, इस विचार से वे ऊहापोह में पड़ गये। क्या उत्तर दूं? कुछ समझ में नहीं आ रहा था। राव गौडजी से निश्चय ही तेजोजी सुन्दर थे और तेजोजी की प्रशंसा करके वे अपने ठाकुर को नीचा भी नहीं दिखाना चाहते थे।

परन्तु इसी ऊहापोह के समय सरस्वती उनकी जिह्वा पर विराजमान हुई और तुरन्त एक दोहे की सृजना हो गइ-

तेजा! तूं त्रिया न थे, नित नवेली नार।
त पोढ़ाड़े पलंग ते, भुज धणी भूपार।।
“हे तेजा! तूं नित नवेली नारी होती, तो भुज का अधिपति तुझे अपने पलंग पर सुलाता।”

हिंगलाजदान जी के इस दोहे को सुन कर तेजोजी के काटो तो खून नहीं। क्रोध से लाल पीला होकर उसका हाथ पास में पड़ी तलवार पर बड़ा।

राव गौडजी जो इतने समय तक चुपचाप इन दोनों की बातों का आनन्द ले रहे थे, तेजोजी के क्रोधायमान होने से थोड़ा घबरा गये। सोचा हंसी हंसी में बात बिगड़ न जाये। तेजोजी का हाथ पकड़ते हुए बोले, हं! हं! देवीपुत्र है! शान्त हो जाओ।

राव के संकेत से तेजाजी थोड़े संभले। वे शान्त हुए, परन्तु ऊंची वाणी में बोले, यदि अपनी खैर चाहता है तो मुझे अपना मुंह मत बताना। गौडजी के संकेत से, चारण तो तुरन्त ही दोनों को अभिवादन करके वहां से चुपचाप निकल गया। बात आई गई पार पड़ी।

यही वारू चारण थोड़े समय पश्चात् द्वारकाधीश की यात्रा हेतु निकला। उसको तेजोजी की याद आई। सोचा क्यों नहीं क्षमा याचना करके तेजोजी को मनाया जाय। वे ओखा मंडल की ओर चल पड़े।

अनेक बार ऐसा संजोग हो जाता है कि जिस व्यक्ति की याद आती है, वह अकस्मात् राह चलते मिल जाता है। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ। ज्योंही चारण ने ओखा में प्रवेश किया, उसे तेजोजी घोड़े पर चढ़े हुए, सामने आते दिखाई दिये। वे शिकार हेतु हाथ में भाला लिये अपने दल के साथ घर से निकले थे। तेजोजी को एकाएक अपने सामने आता देख चारण देव एक बार तो सहम गए।

तेजोजी ने भी वारू चारण को देखा और पहचान लिया। पुरानी बात दिमाग में कौंधी और क्रोध भड़क उठा। आंखों से अंगारे बरसने लगे। चारण द्वारा अपमानित होने की पीड़ा उनके दिल में अभी भी खटक रही थी। उन्होंने अपना भाला संभाला।

चारण भी तेजोजी के हाव भाव देखकर समझ गया कि अब मौत सिर पर मंडरा रही है। तेजोजी शिकार करने निकले परन्तु उनकी पहली शिकार अब मैं होऊंगा। चारण के तो पैर चिपक गये। न भागते बने न बोलते। ऐसी विकट परिस्थिति में उसने अपनी आराध्य देवी मां हिंगलाज को याद किया। हे मां! रक्षा कर! और चमत्कार। एक दोहा उसके मुंह से स्वतः ही निकल गया-

वारू जा विनाण, कुर उरंभें कुछेआ।
रो तेजल राण, ईनी पगें ओखे धणी।।
“वारू चारण के कड़वे बोल तेरे कलेजे में खटक रहे हैं, पर हे ओखा के स्वामी! तूं जहां है वहीं खड़ा रहना, कारण कि मैं चारण हूं।”

चारण के साहस व वाकपटुता से तेजोजी का क्रोध कुछ कम पड़ा। परन्तु उठे हुए भाले को वापस नीचा कैसे करते? प्रहार तो करना ही पड़ेगा। अतः उस पर अपना रेशमी ‘‘अंगोछा’’ लपेट कर चारण की ओर फेंका जिसको चारण ने अधर झेल कर, तेजोजी को अभिवादन किया।

इसके पश्चात् हिंगलाजदान जी तेजोजी के अतिथि बन कर कई दिनों तक उनके पास रहे।

एक दिन तेजोजी ने बातों ही बातों में चारण को एक प्रश्न किया, “कविराज तुम्हारा कच्छ प्रान्त अच्छा या हमारा ओखा मंडल?”

कवि ने तुरन्त उत्तर दिया-

अक, अगीठो, आमरी, ओखे मेवो ऐ।
असीं अचोता नाथ ला, नकां डांठे जेडो डे।।
आपके ओखा में आकड़ा, अंगीठा और इमली जैसे फलों के वृक्ष है। मैं तो द्वारकाधीश के दर्शनार्थ यहां आया हूं, बाकी तो आपका प्रदेश सूखा टाट है।”

चारण के साहसपूर्वक उत्तर से तेजोजी प्रसन्न हुए और अच्छी ‘‘सीख’’, सिरोपाव, द्रव्य आदि देकर उन्हें सम्मानित किया। विदाई के समय तेजोजी ने कविराजा को कहा कि कविराजा यदि तुम सच्चे सरस्वती पुत्र हो तो गोंडल के शासक कुंभाजी, जिन्होंने चारणों पर नाराज होकर चारणों को अपने राज्य से निकाल दिया, उन्हें यदि मना कर वापस गोंडल में अपने भाईयों को बसा दो तो जानूं, तुम श्रेष्ठ चारण हो।

तेजोजी के कटाक्ष भरे शब्द कविराजा के हृदय में तीर की भांति घुस गये। अंतर्वेदना से वे छटपटा उठे। अपने गांव जाने के बदले उन्होंने गोंडल का मार्ग लिया।

चारण शब्द सुनकर गोंडल के शासक कुंभाजी की आंखों से आग बरसती थी। उन्होंने आज्ञा दे रखी थी कि कोई भी चारण उनके राज्य की सीमा में आये, उसे धक्के देकर बाहर निकाल दिया जाय। चारणों के प्रति उनके दिल से घृणा निकालने हेतु अनेक कविजनों ने प्रयास किया पर सभी प्रयास विफल रहे।

गोंडल नरेश कुंभाजी बड़े कुशल, पराक्रमी, बुद्धिमान शासक थे। वे जितने पराक्रमी थे उतने ही साहित्य प्रेमी भी थे। चारणों के वे विशेष प्रशंसक एवं गुणग्राही थे।

एक बार दो चारण कवि, जो आपस में भाई भी थे, उनके दरबार में आये। कुंभाजी का यशोगान किया और वीर रस, श्रृंगार, भक्ति, करूण रस की अनेक रचनाएं अपने मधुर कंठ से गाकर सुनाई। पूरा दरबार उनकी काव्य रचनाओं से रीझ गया। कुंभाजी ने उन दोनों को अपने नीजि अतिथियों की भांति बहुत समय तक अपने यहां रखा।

विदायगी के समय गहने, पोशाकें, घोड़े आदि प्रदान करके सम्मानित किया। इससे भी जी न भरा, तो उन्हें एक दिन और रोका, और एक एक सोने का कड़ा और दिया।

रात्रि के समय एक भाई की नीयत बिगड़ी। उसने पास में सोये अपने भाई का कड़ा चुरा लिया। प्रातः जब ये दोनों रवाना होने लगे तो एक भाई ने अपने सामान से कड़ा गायब पाया। राजमहलों के कर्मचारियों को पूछा गया। दिन में कौन कौन लोग राजमहलों में आये, उनसे पूछा गया, पर कड़े का कहीं भी पता न लगा। यहां तक कि रानियों और रनिवास में रहने वाली महिलाओं के सामान की भी तलाशी ली गई। पर कड़ा न मिला। अंत में त्रसित होकर कुंभाजी ने नया कड़ा बनवा कर चारणों को विदा किया।

कुछ समय पश्चात् इस चोरी का पता चला। कुंभाजी को इसकी सूचना दी गई कि कड़ा तो चारण ने ही चोरा था। तब से कुंभाजी को चारणों से घृणा हो गई और उन्होंने यह कठोर राजाज्ञा निकाली कि उनके राज्य में कोई भी चारण न आये। इससे पूरे चारण जाति का अपमान हुआ। अनेक कविश्वरों ने गोंडल के शासक की क्रोधाग्नि शान्त करने का प्रयत्न किया पर सभी प्रयास निष्फल गये। इससे पूरा चारण समाज त्रसित था, दुःखी था। ओखा के अधिपति तेजोजी द्वारा किया गया कटाक्ष कि, “यदि तुम खरे कवि हो तो गोंडल में वापस अपने भाईयों को बसाओ”, वारू चारण के लिए एक बड़ी चुनौती थी।

वारू चारण हिंगलाजदान की जिह्वा पर सरस्वती विराजमान थी। वे एक अच्छे कवि थे। गोंडल आकर कवि ने सोचा, चारण की तरह यदि मैं दरबार में जाऊंगा तो मुझे निश्चय ही धक्के देकर बाहर निकाल दिया जायेगा। अपमान और आत्मग्लानि के अतिरिक्त कुछ हाथ न लगेगा। उसने ब्राह्मण का वेष करके दरबार में जाने की युक्ति सोची। तिलकधारी ब्राह्मण का वेष किया, हाथ में “खडि़या”, “टीपणा” लिया और पहुंच गया कुंभाजी के दरबार में। आगे दरबार लगा हुआ था। वह भी एक कोने में खड़ा हो गया। सोचा कुंभाजी की नजर उस पर पड़ेगी तो अवश्य कुछ न कुछ पूछेंगे।

और हुआ भी ऐसे ही। बातें करते करते कुंभाजी की नजर ब्राह्मण वेषधारी चारण कवि पर पड़ी। वे पूछ बैठे ‘‘महाराज अपना आसन ग्रहण करो! कहां से पधारे?

अब कविराजा की बारी थी।

चारण कवि ने दोहे पर दोहे कहने प्रारम्भ किये-

बड़ा विरद वीर, जाड़ा! तुं न झलिये।
त कारीं धोरा खीर, कीं कुंभंधा कुंभड़ा।।
“हे कुंभराज! हे जाड़ेजा वीर! तेरे जैसा राजा यदि अपने विरुद का त्याग कर देगा तो काली भैंसों के स्तनों से सफेद दूध कैसे निकलेगा।”

सुजस संधा साज, पेरे तुं न पोरसे।
त जर मथे जहाह, कीं तरंदा कुंभड़ा।।
“सुयश की पोशाक धारण करके जब तक तूं प्रफुल्लित न होवे, तो हे कुंभराज! दरिया पर वाहन कैसे तैरेंगे?”

वड़ी पनोती विसमुं रा, रवि नांय तिन रास।
कुंभो जिनी तें ओपेओ, तें आ नोंय गो निरास।।
“बड़ी भारी विकट ग्रह दशा है, उससे भी अधिक राहू की दशा, सूर्य भी आग नहीं बढ़ सकता, पर जिस पर कुंभा ने कोप कर दिया, उसके तो नौ ही ग्रह विकृत हो गये।

नेजा नभामन जा, धसे गिडा तें धींग।
तो सामी तरसींग, करे बंधधो कुंभड़ा।।
हे शक्तिशाली राजवी! तूंने अनेक नवाबों को परास्त करके उन्हें अपने झण्डे के नीचे लाकर खड़ा कर दिया अब तेरे से सामना कौन करे?”

दोहे सुनते ही कुंभाजी समझ गये कि छद्म वेश में यह चारण कवि है। उसके सभी दूहों का अर्थ भी वे समझ गये। परन्तु कुंभाजी पर इन मार्मिक दोहों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। परन्तु चारण की प्रतिभा व हिम्मत से वे अवश्य प्रभावित हुए।

“देवीपुत्र! चारण का वेश त्याग कर ब्राह्मण का वेश क्यों धारण किया?”

“बापू! जहां देवीपुत्रों को दूर से ही धक्के देकर निकाल दिया जाता है, वहां पहुंचने हेतु छद्म वेश के अतिरिक्त दूसरा कोई उपाय ही नहीं। आपके राम राज्य में देवीपुत्रों का यदि इतना अनादर होने लगे तो वे कहां जाकर आश्रय लेंगे?”

“पर देवीपुत्रों पर अब कलियुग की छाया पड़ गई है, यह तो तुम्हें खबर है या नहीं।”

“सब जानता हूं मेरे बाप! परन्तु यह तो सूखे के साथ हरा जलने वाली बात हो गई। निर्दोषों को क्यों प्रताडि़त करते हो?”

“प्रताडि़त किये बिना दुसरा कोई उपाय भी तो नहीं। आप लोगों को भूल का अहसास कराने हेतु ही यह कड़वा घूंट मुझे पीना पड़ा।”

“यह शोभा नहीं देता मेरे मालिक! भरे हुए तालाब से यदि पशुधन प्यासा जाता है तो अनहोनी बात हो जाय मेरे राजा!”

“कविराज! दूसरी सब बातें छोड़ो। जिस प्रयोजन से तुम छद्म वेश करके आये हो, वह तो फलीभूत होने वाला नहीं। अन्य कोई मांग हो तो बोलो।”

“मैंने तो पहले ही मांग लिया सरकार। अब बार बार क्या मांगू?”

कुंभाजी समझ गये कि यह चारण पीछा छोड़ने वाला नहीं। विचार में पड़ गये कैसे पीछा छुड़ाऊं? मन ही मन कविराज के हृदयस्पर्शी दूहों से प्रभावित तो हुए पर उसके साथ ही अपनी राजाज्ञा को भी तो यथावत् रखना था। मूंछ का सवाल जो था। जानते भी थे कवीश्वरों के बिना राजदरबार सूना, नीरस। सोचा, एक बार अपनी हेंकड़ी यथावत् रखने हेतु थोड़े समय तक इस समस्या को टाला जा सकता है, आगे फिर देखा जायेगा।

अपने आपको संभालते हुए कुंभाजी ने चारण कवि को कहा-

तुम तो बहुत माने हुए कवि हो हिंगलाजदान! एक शर्त पर मैं अपना आदेश वापस ले सकता हूं।

कैसी शर्त बापू?

“शर्त इतनी ही कि जामनगर वाले मेरू खवास को यदि तुम उसके मुंह पर खवास या गोला कह दो तो तुम्हारी अरदास पर विचार करूं।”

“बस इतनी सी बात? यह काम मेरा। चारणों को सच्ची बात मुंह पर कहने में कभी हिचकिचाहट या भय नहीं रहा।”

इतना कहकर चारण कवि तो कुंभाजी को अभिवादन करके चल पड़ा जामनगर की ओर।

जब ये जामनगर पहुंचा तो, रास्ते में उसके अंगरखे की एक कस टूट गई थी। सोचा इसको दर्जी की दुकान जाकर टांका लगवा दूं। पहुंचे दर्जी के वहां। दर्जी उस समय जामनगर के मेरू खवास के ही कपड़े सी रहा था। चारण देव काफी देर तक बैठे रहे पर दर्जी तो उनकी ओर देखे ही नहीं। वो कपड़े सीने में लीन था।

काफी देर तो कविराजा ने संयम रखा परन्तु आखिर में तंग आकर ऊंची आवाज में बोल ही पड़े-

अबे ओ कारीगर के बच्चे! देखता नहीं मैं कितनी देर से यहां बैठा हूं, अंगरखे की कस के एक छोटा सा टांका लगाना है, लगाता है या नहीं?

“बारहठजी! तुम्हें पता है ये किसके कपड़े सी रहा हूं? ये बड़े बड़े दातों वाले मेरू काका के कपड़े है। उसका काम छोड़कर तुम जैसों के कस को कैसे टांक सकता हूं?” दर्जी भी ऊंची आवाज में बोला।

“मेरू काका तेरा! मेरा नहीं, समझा तूं! मेरे लिये तो जामनगर के जाम का चाकर है।” कवि कुछ उत्तेजित होकर बोले।

“चाकर, चाकर, यहां बैठे कह रहे हो। उसके मुंह पर कह कर देखो तो सही। तुम्हारी जुबान खिंचवाले, समझे।”

“तेरे मुंह पर चाकर ही कहा है उसके मुंह पर गोला कहूंगा। सुनना हो तो तू भी आ जा मेरे साथ।”

इतना कह कर कविराज तैश में आकर चल दिये।

दूसरे दिन वारू चारण मेरू खवास की कचहरी में जा पहुंचा।

मेरू को अभिवादन करके एक दूहा फटकारा-

गोला! गोला! गोला! गोढ़ण हेठ कैक नर नमाविया।
भूपत छोडज्ञ़े भेठ, मोठा आगळ मेरूआ।।

मेरू की कचहरी में बैठे सभी लोग यह दूहा सुनकर स्तब्ध रह गये। अब क्या होगा? सभी आतुरता से मेरू के मुंह की ओर देखने लगे। सभी को लगा इस चारण की मौत आ गई।

मेरू की भी मुख मुद्रा गंभीर बन गई। भौंहे तन गई। आंखों से अंगारे निकलने लगे। इससे पहले कि वह कुछ बोले, कविराजा ने दूसरा दूहा फटकारा-

धन माता ने धन पिता, धन जनम दिन रात।
खंड खंड जात खवास, तें उजवाली मेरूआ।।
“धन्य है तेरे माता और पिता को और उस रात को जिस दिन तेरा जन्म हुआ। खवास जाति को तूंने कीर्तिमान कर दिया।”

वारू चारण की निर्भीकता व काव्य शैली से मेरू बहुत प्रभावित हुआ। कवि को विपुल धन राशि देकर सम्मानित किया।

वहां से सीधा पहुंचा गोंडल और गोंडल के राजा को उसके राज्य में वापस चारणों को बसाने हेतु राजी किया।

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